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यदि विश्व के प्रत्येक देश में लोकतन्त्र की स्थापना हो जाए तो विश्व स्वयं लोकतांत्रिक बन जाएगा।क्या यह कथन अध्याय में किए गए विचार से मेल खाता है?

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विश्व के अधिकांश देशों में लोकतन्त्र की स्थापना हो चुकी है, लेकिन आज भी अनेक देश तानाशाही, एक दलीय शासन व्यवस्था एवं वंशानुगत् शासन प्रणाली से ग्रस्त हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ सबसे बड़ा अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है जिसकी स्थापना विश्व-शान्ति की स्थापना करने तथा युद्ध को रोकने के लिए की गई है। संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी महत्त्वपूर्ण फैसले सुरक्षा परिषद् में लिए जाते हैं। सुरक्षा परिषद् के कुल 15 सदस्य हैं जिनमें से 5 बड़े राज्य (संयुक्त-राज्य अमेरिका, रूस, इंग्लैण्ड, चीन तथा फ्रांस) इसके स्थायी सदस्य हैं जिनके पास ‘वीटो करने की शक्ति है। सुरक्षा परिषद् में तब तक कोई भी निर्णय नहीं लिया जा सकता जब तक कि यह पाँचों देश उससे सहमत न हों। दूसरे शब्दों में इन पाँचों देशों में से कोई भी एक देश अपनी ‘वीटो’ शक्ति का प्रयोग करके किसी भी निर्णय को रोक सकता है।

इस प्रकार सुरक्षा परिषद् के पास ‘वीटो’ (Veto) का अधिकार अलोकतंत्रीय हैं। इसी प्रकार अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (I.M.F.) विश्व के किसी भी देश को ऋण देने वाली सबसे बड़ी संस्था है। इस संगठन की कार्यप्रणाली भी अलोकतंत्रीय है क्योंकि इसके सभी 173 सदस्य देशों को समान मताधिकार प्राप्त नहीं है। प्रत्येक देश इस कोष में जितने धन का योगदान करता है, उसी अनुपात में उसके वोट का वजन भी तय होता है। इस प्रकार मुद्रा कोष के लगभग आधे वोटों पर केवल 7 देशों (अमेरिका, जापान, फ्रांस, ब्रिटेन, सऊदी अरब, चीन तथा रूस) का अधिकार है। जब सरकारों को पैसे की जरूरत होती है तो उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष तथा विश्व बैंक उधार देते हैं। उधार देने से पहले ये संस्थाएँ सरकार से अपना हिसाब-किताब दिखाने को कहती हैं और उनकी आर्थिक नीतियों में परिवर्तन का निर्देश देती हैं।



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