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‘यह अपूर्ण संसार न मुझको भाता’-इस पंक्ति के अनुसार कवि को यह संसार अधूरा क्यों लगता है?

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इस संसार में सब कुछ अपूर्ण-अधूरा है। कुछ भी स्थायी नहीं है, सभी माया-मोह में फंसे हैं तथा राग-द्वेष और स्वार्थपरता में लीन हैं। कवि का अपना अलग ही सपनों का संसार है। कवि उसी में पूर्णता पाता है।



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