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Answer» भारत में 1991 से सरकार की नियंत्रणवाली बाजार आधारित निजी सम्पत्ति और निर्णय की स्वतंत्रतावाली मुक्त अर्थतंत्र की ओर गति की गयी, जिसे आर्थिक सुधारों के नाम से भी जानते हैं । 1951 से भारत में नियंत्रित समाजवादी ढंग की समाजरचना का उद्देश्य था । इस नीति में 1991 में परिवर्तन किया गया । आज लगभग 25 वर्ष के अनुभव पर से इसकी असरों का मूल्यांकन दो भागों में कर सकते हैं । (1) आर्थिक सुधार की अनुकूल असर (इच्छनीय असर) : आर्थिक सुधारों की मुक्त नीति की अनुकूल असरें निम्नानुसार हैं : - देश के ग्राहकों को अन्तर्राष्ट्रीय गुणवत्तावाली वस्तुएँ सरलता से, कम कीमत पर मिलने लगी ।
- देश की विदेशी मुद्रा भंडार में वृद्धि हुयी ।
- भारत की निर्यात में वृद्धि हुयी ।
- सरकार विदेशी ऋण का बोझ घटा और सीधे-सीधे प्रत्यक्ष विदेशी पूँजी निवेश बढ़ा जिसका खतरा सरकार पर नहीं था ।
- बड़े पैमाने पर निवेश द्वारा निजी क्षेत्रों का विकास हुआ, जिससे उत्पादन-रोजगार बढ़ा ।
- साधनों की गतिशीलता में वृद्धि हुयी ।
- सरकार के नियंत्रण के कारण भ्रष्टाचार, अफ्सरशाही, निर्णय विलंब, जड़ता थी जो क्रमशः कम हुये ।
- सरकार के नियंत्रण तथा पूँजी की कमी के कारण उपेक्षित क्षेत्रों में निजी पूँजी निवेश द्वारा गति दी ।
- वस्तु और सेवाओं का अभाव घटा, वैविध्य में वृद्धि हुयी ।
- अन्य देशों के साथ सामाजिक-सांस्कृतिक सम्बन्ध मजबूत बने ।
(2) आर्थिक सुधारों की प्रतिकूल असर (अनिच्छनीय असर) : आर्थिक सुधारों की अनुकूल असरों के साथ-साथ कुछ प्रतिकूल असर भी हुयी जो निम्नानुसार है : - बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के विज्ञापन खर्च और स्पर्धा के सामने छोटे पैमाने तथा गृह उद्योग टिक नहीं सके । बहुत बड़ा नुकसान हुआ।
- अन्तर्राष्ट्रीय स्पर्धा में राष्ट्रीय उद्योगों को बहुत नुकसान हुआ और बहुत से उद्योग बंद हो गये ।
- सार्वजनिक सेवाओं का निजीकरण हुआ । सबसिडी घटी परिणामस्वरूप सार्वजनिक सेवाओं की सुविधाएँ महँगी हुयी । जिससे सभी वस्तु-सेवा के उत्पादन खर्च में वृद्धि हुयी ।
- भारतीय चलन अंतर्राष्ट्रीय बाजार में खूब कमजोर हुआ । परिणामस्वरूप आयात खर्च में खूब वृद्धि हुयी ।
- बहुराष्ट्रीय कंपनी, बड़ी कंपनियों ने नीचे दर पर पूर्ति बड़े पैमाने पर रखी ।
- विकसित देशों ने भारतीय वस्तुओं-सेवाओं पर अपने देश में जैसे-तैसे नियंत्रण चालू रख्खे जिससे भारत में विदेश व्यापार का बहुत अधिक लाभ नहीं हुआ ।
- निजीकरण के कारण बड़े पैमाने पर उद्योग स्थापित हुये परंतु उन्हें रास्ते, बिजली, पानी, कच्चे माल की सुविधाएँ नहीं मिली जिससे तंगी सर्जित हुयी ।
- आर्थिक असमानता में वृद्धि हुयी है ।
- जीवन जरूरी वस्तुओं – सेवाओं के स्थान पर समाज के निम्न वर्ग की आवश्यकताओं को संतुष्ट करनेवाली मोजशौक की वस्तुओं का उत्पादन-विक्रय बढ़ा ।
- सामाजिक-सांस्कृतिक वसियत को व्यापक नुकसान हुआ है ऐसा बहुत से मानते हैं ।
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