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Essay on ativrusti problem

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वर्षा कि बौछार तपती धरती को शीतलता प्रदान करती है। जहाँ एक ओर लोगों के लिए यह मस्ती से भरी होती हैं, वहीं दूसरी ओर यह किसानों के लिए बुआई का अवसर लाती है। नाना प्रकार की बीजों की बुआई की जाती है। चावलों की खेती के लिए तो यह उपयुक्त मानी जाती है। गरमी से मुरझाए पेड़, लता-पुष्पों में बहार छा जाती है। जगलों व बागों में कोयलों के मधुर स्वर व मोरों का आकर्षक नृत्य दिखाई देने लगते हैं। कवियों ने तो इस ऋतु को अपनी काव्य रचना के लिए उपयुक्त ऋतु माना है।

परन्तु जब इस ऋतु में अतिवृष्टि होती है, तो जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। जगह-जगह पानी भर जाता है। इसके कारण पूरा शहर रूक जाता है। लोगों को आने-जाने में कठिनाई उठानी पड़ती है। रास्ते बंद हो जाते हैं। अधिक वृष्टि के कारण मकान घिर जाते हैं।

गाँव में तो स्थिति इससे भी अधिक खराब होती है। अतिवृष्टि के कारण खड़ी फसलें नष्ट हो जाती है। जमा करके रखा गया अनाज सड़ जाता है। मिट्टी से बने मकान रेत के समान ढह जाते हैं। नदी का जल स्तर बढ़ जाता है जिसके कारण भयंकर बाढ़ आ जाती है। गाँव के गाँव इसकी चपेट में आ जाते हैं। करोड़ों रूपए के जानो-माल को नुकसान पहुँचता है। शहरों का आपस में संपर्क टूट जाता है। क्योंकि मुख्य मार्ग गाँव और नदियों के मध्य से होने वाले रास्तों और सेतुओं से गुजरते हैं। इसके कारण मंहगाई में उछाल देखने को मिलता है। खाद्य सामग्री नहीं पहुँचने के कारण खाद्यापूर्ति पर दुष्प्रभाव पड़ता है और कलाबाज़ारी ज़ोर पकड़ती है। यातायात साधन जैसे- रेलमार्ग, बस आदि ठप्प पड़ जाते हैं। संचार के साधनों पर भी इसका दुष्प्रभाव देखने को मिलता है।



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