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क्या हार में, क्या जीत में,किंचित नहीं भयभीत मैं,संघर्ष-पथ पर जो मिले,यह भी सही, वह भी सही,वरदान माँगूंगा नहीं।लघुता न मेरी अब छुओ,तुम हो महान बने रहो,अपने हृदय की वेदना,मैं व्यर्थ त्यागूंगा नहीं,वरदान माँगूंगा नहीं।चाहे हृदय को ताप दो,चाहे मुझे अभिशाप दो,कुछ भी करो कर्तव्य पथ से,किंतु भागूंगा नहीं,वरदान माँगूंगा नहीं।– शिवमंगल सिंह ‘सुमन’उपर्युक्त कविता के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए1. कवि ने जीवन को क्या माना है ?2. सुमन जी भयभीत क्यों नहीं हैं ?3. कवि किन परिस्थितियों में कर्तव्य-पथ से नहीं भागना चाहता है ?4. कवि किसे व्यर्थ मानता है ?5. ‘संघर्ष-पथ पर जो मिले’ में कौन-सा अलंकार है ?

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1. कवि ने जीवन को संघर्ष-पथ माना है।

2. सुमन जी हार-जीत की परवाह नहीं करते है इसलिए ये भयभीत नहीं हैं।

3. कवि कहता है कि चाहे मुझे पीड़ा पहुँचाओ, अभिशाप दो या कुछ भी करो, मैं हर स्थिति में कर्तव्य-पथ पर डटा रहूँगा।

4. कवि अपने हृदय की वेदना के त्याग को व्यर्थ मानता है।

5. ‘संघर्ष-पथ’ अर्थात् संघर्ष रूपी पथ रूपक अलंकार है।



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