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पाठ के किन वाक्यों से पता चलता है कि राजेंद्र बाबू अपनी वेश-भूषा के प्रति सचेष्ट नहीं रहते थे? ऐसा क्यों?

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लेखिका ने जब पहली बार राजेंद्र बाबू को देखा तो उसे उनकी वेश भूषा बहुत अस्त-व्यस्त लगी। उनके कोट के ऊपर के भाग का बटन टूट जाने के कारण खुला था। उनका एक मोज़ा जूते पर उतर आया था और दूसरा टखने पर घेरा बना रहा था। जूतों पर मिट्टी की पर्त चढ़ी हुई थी। उनके सिर पर पहनी हुई गांधी टोपी भौंहों पर खिसक आई थी। उनकी वेश-भूषा देखकर लगता था मानो वे किसी हड़बड़ी में चलते-चलते कपड़े पहनते आए हैं, जो जिस स्थिति में अटक गया, वह उसी स्थिति में अटका रह गया।



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