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सामन्तवाद के उदय के राजनीतिक कारण लिखिए।

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पश्चिमी यूरोप में रोमन साम्राज्य का पाँचवीं शताब्दी में पतन हो  गया। इसके साथ ही सामन्तवाद का उदय हुआ और अगले पाँच-सौ वर्षों में इसका विकास हुआ। इसके उदय के निम्नलिखित राजनीतिक कारण थे

राजनीतिक कारण

रोमन साम्राज्य में सम्पूर्ण पश्चिमी यूरोप सम्मिलित था। रोमन सम्राटों ने इस क्षेत्र के अधिकांश भू-भाग को अपने अधिकार में करके बाहरी बर्बर आक्रमणों से इसकी रक्षा की थी और बहुत अंशों में शान्ति-व्यवस्था स्थापित की थी। परन्तु, पाँचवीं शताब्दी में रोमन साम्राज्य के पतन के बाद यूरोप में सर्वत्र अराजकता, अशान्ति एवं अव्यवस्था फैल गई थी। आन्तरिक उपद्रव और बाह्याक्रमणों के कारण स्वतन्त्र किसानों का संकट बढ़ने लगा था। बर्बर जातियों के आक्रमणों ने उपद्रव और अशान्ति को बढ़ा दिया था। चारों ओर लूट-खसोट मची हुई थी। किसानों का कोई रक्षक नहीं था और वे बड़े कष्ट में थे। कोई भी अकेला व्यक्ति सुरक्षित न था। रोमन साम्राज्य के कुलीनवर्गीय सरदार अपने-अपने गाँवों में चले गए जहाँ उनके किले होते थे। इन लोगों ने किसानों पर और भी अत्याचार करना शुरू किया। वे अपने दुर्गों से छापा मारने के लिए निकल पडते थे। गाँव में वे किसानों को लूटते था तथा जमीन पर अपना अधिकार करने के लिए अपनी बराबरी के अन्य बड़े सामन्तों से लड़ते थे। इस प्रकार, सर्वत्र अराजकता का बोलबाला था। किसान और जमींदार सभी इस असह्य स्थिति से ऊब गए थे। न तो किसानों का जान-माल सुरक्षित था और न सामन्तों की जमींदारी ही। इस स्थिति में दोनों एक-दूसरे की सहायता चाहते थे। इसीलिए सब लोग मिलकर ऐसे व्यक्ति की खोज में थे जो उनसे अधिक शक्ति सम्पन्न हो तथा उनके जान-माल की रक्षा कर सके। किसानों की दृष्टि में सामन्त ही ऐसा व्यक्ति दिखलाई पड़ा, क्योंकि उसके पास दुर्ग और हथियार थे। इसीलिए किसानों ने सामन्तों से एक समझौता करके अपनी जमीन उसके हाथ में सौंप दी और यह तय हुआ कि यदि सामन्त किसानों को लूटना बन्द कर दें और आन्तरिक तथा बाह्य शत्रुओं से उन्हें बचाएँ तो वे अपने खेत की पैदावार का कुछ हिस्सा उन्हें दिया करेंगे और दूसरी तरह की सेवाएँ भी करेंगे। इस तरह की व्यवस्था से किसान अब जमीन के स्वतन्त्र स्वामी नहीं रहे। वे कृषिदास (sert) बन गए। इस प्रक्रिया से अनेक छोटे-छोटे सामन्त बन गए। फिर, ये सामन्त भी अपने को अनारक्षित ही पाते थे, इसलिए इन्होंने अपने को किसी बड़े सामन्त की सेवा में समर्पित कर दिया। बड़े भूमिपति बाहरी हमले से स्वयं अपनी रक्षा नहीं कर सकते थे, वे भी छोटे-छोटे सामन्तों की सेवा की अपेक्षा करते थे। इसलिए जागीरों के रूप में अपने विजित प्रदेश के टुकडे उन्होंने छोटे-छोटे सामन्तों को दे दिए। इसके बदले में उन्होंने सैनिक सेवा देने का वचन दिया। इस प्रकार, एक नई सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था उत्पन्न हो गई। इसे ही सामन्तवाद का नाम दिया गया। सामन्तवाद के विकास का एक दूसरा राजनीतिक कारण भी था। रोमन साम्राज्य के अन्तर्गत स्थानीय शासन को भार स्थानीय सरदारों पर रहता था। जब तक केन्द्रीय शासन सुदृढ़ रहा तब तक इन स्थानीय सरदारों को नियन्त्रण में रखा जा सका, लेकिन केन्द्रीय सत्ता के कमजोर होने से स्थानीय सरदार धीरे-धीरे स्वतन्त्र होने लगे। रोमन साम्राज्य के पतन के बाद वे पूर्ण स्वतन्त्र हो गए। जर्मन जातियों के आगमन से भी सामन्तवाद के विकास को प्रश्रय और प्रोत्साहन मिला। पाँचवीं शताब्दी में पश्चिमी यूरोप में रोमन साम्राज्य का अन्त होने पर जर्मन जातियों की शाखाएँ जर्मनी से निकलकर प्रायः सम्पूर्ण यूरोप पर छा गई। ये लोग अपने-अपने कबीलों में बँटे रहते थे। इन कबीलों के नेता होते थे। जब जर्मन लोग प्रदेश जीतते गए तो कबीलों के पास काफी जमीन हो गई। इस जमीन को वे अपने अनुयायियों में इस शर्त पर बाँटने लगे कि सैनिक और राजनीतिक सेवा प्रदान करेंगे। कबीलों का नेता इस प्रकार एक बड़ा सामन्त हो गया।



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