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ससंदर्भ भाव स्पष्ट कीजिए :मेरा यह बचपन, तुम्हारा मातृत्वये ही गहने हैं मेरे लिए, माँ;मैं तुम्हारा गहना; तुम मेरा गहना;फिर अन्य गहने क्यों चाहिए, माँ?

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प्रसंग : प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य गौरव’ के ‘गहने’ नामक आधुनिक कविता से लिया गया है, जिसके रचयिता कुवेंपू हैं।

संदर्भ : कुवेंपु जी आपसी रिश्तों में प्रेम को, गहनों से भी कई ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं। वे कहना चाहते है की भौतिक पदार्थ (सोना, आभूषण वगैरह) माँ की ममता और पुत्री के स्नेह के आगे कुछ भी महत्व नहीं रखते।

भाव स्पष्टीकरण : बेटी माँ से गहनों की व्यर्थता के बारें में कह रही है। वह कहती है कि मेरा यह प्यारा बचपन जिसमें तुमने मुझे खूब प्यार और स्नेह दिया है, मेरे लिए मेरा यह बचपन गहने से भी बढ़कर है। तुम्हारा मातृत्व सुख दुनिया का सबसे बड़ा सुख है। हमारा यह सुख (मेरा बचपन का और तुम्हारा मातृत्व का) सबसे बड़ा सुख है। इस सुख की प्राप्ति धन से या आभूषणों से नहीं की जा सकती। माँ! जब हमारे पास इतनी बड़ी संपत्ति है तब फिर अन्य संपत्ति या गहने क्यों चाहिए? इस प्रकार कुवेंपु जी माँ-बेटी के बचपन और मातृत्व के सुख को सब सुखों से बढ़कर बताते हैं।

विशेष : कन्नड़ से अनुवादित कविता है।



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