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वीरता की अभिव्यक्ति अनेक प्रकार से होती है | लड़ना- मरना, खून बहाना, तलवार के सामने झुकना ही नहीं कर्ण की भाँति याचक को खाली हाथ न लौटाना या बुद्ध की तरह गूढ़ तत्वों की खोज में सांसारिक सुख त्याग देना भी वीरता ही है | वीरता तो एक अंत:प्रेरणा है | वीरता देश-काल के अनुसार संसार में जब भी प्रकट हुई है, तभी अपना एक नया रूप लेकर आई और लोगों को चकित कर गई | वीर कारखानों में नहीं ढलते, न खेतों में उगाए जाते हैं, यह तो देवदार के वृक्ष के समान जीवन रूपी वन में स्वयं उगते हैं, बिना किसी के पानी दिए, बिना किसी के दूध पिलाए बढ़ते हैं | वीर का दिल सबका दिल और उसके विचार सबके विचार हो जाते हैं | उसके संकल्प सबके संकल्प हो जाते हैं | औरतों और समाज का हृदय वीर के हृदय में धड़कता है | उपर्युक्त गद्यांश का शीर्षक दीजिए – *2 pointsवीरतावीरों का उद्भववीरता का महलकोई नहीं |
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