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वितरण से आप क्या समझते हैं ? वितरण की समस्याएँ समझाइए।

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वितरण का अर्थ एवं परिभाषाएँ-उत्पादन के विभिन्न उपादानों में संयुक्त उपज को बाँटने की क्रिया को वितरण कहते हैं।

वितरण की परिभाषा विभिन्न विद्वानों ने निम्नलिखित प्रकार से की है
प्रो० चैपमैन के अनुसार, “वितरण का अर्थशास्त्र इस प्रकार की व्याख्या करता है कि समाज द्वारा उत्पन्न की गयी आय का, उन साधनों में अथवा साधनों के मालिकों में जिन्होंने उत्पादन में भाग लिया, किस प्रकार का बँटवारा होता है।”
प्रो० निकोलस के अनुसार, “आर्थिक दृष्टि से वितरण राष्ट्रीय सम्पत्ति को विभिन्न वर्गों में बाँटने की क्रिया की ओर संकेत करता है।”
प्रो० विक्स्टीड के शब्दों में, “अर्थशास्त्र में हम वितरण के अन्तर्गत उन सिद्धान्तों का अध्ययन करते हैं जिनके अनुसार किसी विशेष औद्योगिक संगठन की संयुक्त उत्पत्ति व्यक्तियों में बाँटी जाती है। जो उसे प्राप्त करने में सहायक होते हैं।”
संक्षेप में, वितरण के अन्तर्गत उन नियमों व सिद्धान्तों का अध्ययन किया जाता है जिनके द्वारा सामूहिक उत्पादन व राष्ट्रीय लाभांश को उत्पादन के उपादानों में बाँटा जाता है अर्थात राष्ट्रीय लाभांश को उपादानों में बाँटने की क्रिया को वितरण कहते हैं।”

वितरण की समस्या
आधुनिक औद्योगिक युग में उत्पादन प्रक्रिया जटिल होती जा रही है। आज प्रतिस्पर्धा के युग में उत्पादन बड़े पैमाने पर, श्रम-विभाजन व मशीनीकरण द्वारा सम्पादित किया जा रहा है। उत्पादन कार्य में उत्पादन के साधन-भूमि, श्रम, पूँजी, संगठन व साहस-अपना सहयोग देते हैं। चूँकि उत्पादन समस्त उत्पत्ति के साधनों का प्रतिफल है; अत: यह प्रतिफल सभी उत्पत्ति के साधनों में उनके पुरस्कार के रूप में वितरित किया जाना चाहिए अर्थात् कुल उत्पादन में से श्रम को उसके पुरस्कार के रूप में दी जाने वाली मजदूरी, भूमिपति को लगान, पूँजीपति को ब्याज, संगठनकर्ता को वेतन तथा साहस को लाभ मिलना चाहिए।
अब प्रश्न यह है कि उत्पत्ति के साधनों को उनका पुरस्कार कुल उत्पादन में से किस आधार पर दिया जाए, यह वितरण की केन्द्रीय समस्या है। आज उत्पत्ति के विभिन्न उपादानों में २ष्ट्रीय उत्पादन में से अधिक पुरस्कार प्राप्त करने के लिए एक प्रकार की प्रतिस्पर्धा उत्पन्न हो गयी है। कि राष्ट्रीय उत्पादन (लाभांश) में से कौन अधिक भाग प्राप्त करे ? यही प्रतिस्पर्धा वितरण की समस्या बन जाती है। इस कारण वितरण की समस्या बड़े पैमाने के सामूहिक उत्पादन के कारण उत्पन्न हुई है। यदि एक ही व्यक्ति उत्पादन के सभी साधनों का स्वामी होता तो वितरण की समस्या उत्पन्न ही नहीं होती, क्योंकि वही व्यक्ति समस्त उत्पादन का अधिकारी होता। वितरण की समस्या उत्पन्न होने के निम्नलिखित कारण हैं
⦁     सामूहिक उत्पादन के कारण उत्पादन के सभी उपादानों के सहयोग का अलग-अलग मूल्यांकन करना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है। इस कारण वितरण की समस्या उत्पन्न होती है।
⦁     उत्पादन के उपादानों के स्वामी अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने का प्रयास करते हैं तथा प्रत्येक अपने सहयोग के लिए अधिक-से-अधिक भाग प्राप्त करने के लिए संघर्ष करता है।
⦁    वितरण की समस्या को बढ़ाने में राजनीतिक व आर्थिक विचारधाराओं ने भी अपना पूर्ण सहयोग दिया है। पूँजीवादी विचारधारा के समर्थक राष्ट्रीय उत्पादन में से पूँजीपतियों के अधिक भाग का समर्थन करते हैं। दूसरी ओर साम्यवादी व समाजवादी विचारधारा में उत्पादन प्रक्रिया में श्रमिक केन्द्रीय धुरी होता है। अतः श्रमिकों को राष्ट्रीय लाभांश में से अधिक भाग मिलना चाहिए। इस कारण वितरण की समस्या विवादास्पद बन जाती है।

वितरण के समय कौन-कौन सी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं?
वितरण की निम्नलिखित प्रमुख समस्याएँ हैं
⦁    वितरण किसका होता है या किसका होना चाहिए ?
⦁    वितरण किस-किसके मध्य होता है या किस-किसके मध्य होना चाहिए ?
⦁     वितरण का क्रम क्या रहता है या क्या होना चाहिए ?
⦁     वितरण में प्रत्येक उत्पादन के उपादान का भाग किस प्रकार निर्धारित किया जाता है या किया जाना चाहिए ?
1. वितरण किसका होता है या किसका होना चाहिए ? – वितरण में सर्वप्रथम यह समस्या उत्पन्न होती है कि वितरण कुल उत्पादन का किया जाए या शुद्ध उत्पादन का। वितरण कुल उत्पादन गाता, वरन् कुले उत्पादन में से अचल सम्पत्ति पर ह्रास व्यय, चल पूंजी का प्रतिस्थापन व्यय, करों के भुगतान का व्यय तथा बीमे की प्रीमियम आदि व्यय को घटाने के पश्चात् जो वास्तविक या शुद्ध उत्पादन बचता है उसका वितरण किया जाता है। फर्म की दृष्टि से भी वास्तविक या शुद्ध उत्पत्ति का ही वितरण हो सकता है, कुल उत्पत्ति का नहीं अर्थात् कुल उत्पत्ति में से चल पूँजी के प्रतिस्थापन व्यय, अचल पूँजी के ह्रास, मरम्मत और प्रतिस्थापन व्यय, सरकारी कर तथा बीमा प्रीमियम निकाल देने के बाद जो शेष बचता है उसे वास्तविक उत्पत्ति (Net Produce) कहते हैं। यह वास्तविक उत्पत्ति ही उत्पत्ति के साधनों के बीच बाँटी जानी चाहिए। राष्ट्र की दृष्टि से राष्ट्रीय आय अथवा राष्ट्रीय लाभांश (National Dividend) का वितरण उत्पत्ति के समस्त साधनों में होता है।
2. वितरण किस-किसके मध्य होता है या किस – किसके मध्य होना चाहिए ? – दूसरी महत्त्वपूर्ण समस्या यह है कि वितरण किस-किसके मध्य होना चाहिए ? इस समस्या का समाधान सरल है-उत्पादन में उत्पत्ति के जिन उपादानों (भूमि, श्रम, पूँजी, संगठन और साहस) ने सहयोग किया है, शुद्ध उत्पादन का विभाजन या वितरण उन्हीं को किया जाना चाहिए। उत्पादन के उपादानों (भूमि, श्रम, पूँजी, संगठन एवं साहस) के स्वामी क्रमशः भूमिपति, श्रमिक, पूँजीपति, प्रबन्धक एवं साहसी कहलाते हैं। इन्हीं को राष्ट्रीय लाभांश में से भाग मिलता है। राष्ट्रीय लाभांश में से भूमिपति को लगान, श्रमिक को मजदूरी, पूँजीपति को ब्याज, प्रबन्धकं को वेतन तथा साहसी को प्राप्त होने वाला प्रतिफल लाभ कहा जाता है। अतः वास्तविक उत्पत्ति का वितरण उत्पादन के विभिन्न उपादानों में किया जाना चाहिए।
3. वितरण का क्रम क्या रहता है या क्या होना चाहिए ? – प्रत्येक उद्यमी उत्पादन के पूर्व यह अनुमान लगाता है कि वह जिस वस्तु का उत्पादन करना चाहता है उसे उस व्यवसाय में कितनी शुद्ध उत्पत्ति प्राप्त हो सकेगी। इन अनुमानित वास्तविक उत्पत्ति में से उत्पत्ति के चार उपादानों को अनुमानित पारिश्रमिक देना पड़ेगा। जब उद्यमी उत्पादन कार्य आरम्भ करने का निश्चय कर लेता है तो वह उत्पत्ति के उपादानों के स्वामियों से उसके पुरस्कार के सम्बन्ध में सौदा तय कर लेता है और अनुबन्ध के अनुसार समय-समय पर उन्हें पारिश्रमिक देता रहता है। समस्त उपादानों को उनका पारिश्रमिक देने के उपरान्त जो शेष बचता है, वह उसका लाभ होता है। लेकिन यह भी सम्भव है कि शुद्ध आय विभिन्न उपादानों पर व्यय की जाने वाली राशि से कम हो। ऐसी स्थिति में साहसी को हानि होगी। इस प्रकार स्पष्ट है कि साहसी को छोड़कर उत्पादन के अन्य उपादानों का पारिश्रमिक तो उत्पादन कार्य आरम्भ होने से पूर्व ही निश्चित कर उन्हें दे दिया जाता है। उद्यमी का भाग अनिश्चित रहता है। उद्यमी का यह प्रयास रहता है कि उसे अपने व्यवसाय में हानि न हो। इस कारण वह उत्पत्ति के अन्य साधनों को पारिश्रमिक कम-से-कम देने का प्रयास करता है। उत्पादन के अन्य उपादानों का अनुमान ऐसा रहता है। कि उद्यमी उनका शोषण करके अधिक लाभ अर्जित करने का प्रयास कर रहा है। इस कारण वितरण की समस्या उत्पन्न हो जाती है। अत: उत्पादन के उपादानों को लाभ में सहभागिता प्राप्त होनी चाहिए।
4. वितरण में प्रत्येक उत्पादन के उपादान का भाग किस प्रकार निर्धारित किया जाता है। या किया जाना चाहिए ? – संयुक्त उत्पादन में से प्रत्येक उपादान का भाग किस आधार पर निश्चित किया जाए, इस सम्बन्ध में अलग-अलग विद्वानों ने अलग-अलग विचार प्रस्तुत किये हैं। प्रो० एडम स्मिथ तथा रिका ने ‘वितरण का परम्परावादी सिद्धान्त’ दिया है जिसके अनुसार, राष्ट्रीय आय में से सर्वप्रथम भूमि का पुरस्कार अर्थात् लगान दिया जाए, उसके बाद श्रमिकों की मजदूरी, अन्त में जो शेष बचता है वह पूँजीपतियों को ब्याज व साहसी को लाभ के रूप में दिया जाना चाहिए। रिका के अनुसार, लगान का निर्धारण सीमान्त व अधिसीमान्त भूमि के उत्पादन के द्वारा निर्धारित होना चाहिए तथा मजदूरों को ‘मजदूरी कोष’ (Wage Fund) से पुरस्कार प्राप्त होना चाहिए। जे० बी० क्लार्क, विक्स्टीड एवं वालरस ने वितरण के सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है।
इनके अनुसार, “किसी साधन का पुरस्कार अथवा उसकी कीमत उसकी सीमान्त उत्पादकता द्वारा निर्धारित होती है अर्थात् एक साधन का पुरस्कार उसकी सीमान्त उत्पादकता के बराबर होता है। सीमान्त उत्पादकता को ज्ञात करना एक दुष्कर कार्य है। वितरण का आधुनिक सिद्धान्त माँग व पूर्ति का सिद्धान्त है। इसके अनुसार संयुक्त उत्पत्ति में उत्पत्ति के किसी उपादान का भाग उस उपादान की माँग और पूर्ति की शक्तियों के अनुसार उस स्थान पर निर्धारित होता है जहाँ पर उपादान की माँग और पूर्ति दोनों ही बराबर होते हैं। उपर्युक्त इन चारों सिद्धान्तों के द्वारा वितरण की समस्या को हल करने का प्रयास किया गया है।



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