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व्यक्तिगत स्वास्थ्य से आप क्या समझती हैं? व्यक्तिगत स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए।

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व्यक्तिगत स्वास्थ्य का अर्थ

किसी व्यक्ति विशेष के शारीरिक, मानसिक एवं संवेगात्मक पक्षों के कल्याण को व्यक्तिगत स्वास्थ्य के रूप में जाना जा सकता है। अतः वह शारीरिक रूप से रोगमुक्त, बलशाली, कुशल एवं प्रफुल्ल होना चाहिए तथा मानसिक रूप से उत्साही, सक्रिय एवं विवेकशील होना चाहिए और इनके साथ-साथ उसका पारिवारिक एवं सामाजिक अनुकूलन सही होना चाहिए।

व्यक्तिगत स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कारक

व्यक्तिगत स्वास्थ्य को विभिन्न कारक प्रभावित करते हैं। उत्तम स्वास्थ्य के लिए इन कारकों को ध्यान में रखना आवश्यक होता है। व्यक्तिगत स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक निम्नलिखित हैं.

(1) उचित पोषण:
व्यक्तिगत स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाला मुख्यतम कारक है–उचित पोषण। शरीर के स्वस्थ रहने के लिए पर्याप्त मात्रा में सन्तुलित आहार की आवश्यकता होती है। सन्तुलित आहार से शरीर का उत्तम पोषण होता है तथा व्यक्ति अभावजनित रोगों का शिकार नहीं होता। उचित पोषण की अवस्था में समस्त शारीरिक क्रियाएँ सुचारू रूप से चलती रहती हैं तथा शरीर का ढाँचा भी स्वस्थ एवं सुविकसित होता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि उत्तम स्वास्थ्य के लिए उचित पोषण अनिवार्य कारक है।

(2) रोगों से मुक्त रहना:
रोग से मुक्त रहने वाला व्यक्ति ही स्वस्थ कहलाता है। यदि कोई व्यक्ति अक्सर किसी-न-किसी रोग से ग्रस्त रहता है, तो उस व्यक्ति को स्वस्थ व्यक्ति नहीं कहा जा सकता, भले ही रोग साधारण ही क्यों न हो। उदाहरण के लिए-निरन्तर नजला-जुकाम रहने से भी व्यक्ति स्वस्थ नहीं कहला सकता।यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि यदा-कदा रोगग्रस्त हो जाना। कोई विशेष बात नहीं है तथा इसे स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाला कारक नहीं माना जा सकता।

(3) नियमबद्धता:
दैनिक कार्यों को सदैव एक नियमित योजना के अनुसार करना चाहिए। उदाहरण के लिए-सुबह शीघ्र उठना, शौच जाना, नाश्ता-भोजन समय पर करना, नित्यप्रति व्यायाम करना तथा समय से सोना इत्यादि। अनियमित जीवन का स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि स्वस्थ व्यक्ति अपनी दिनचर्या के नियमों का निर्धारण स्वयं करता है। तथा उनका स्वेच्छा से पालन करता है। बाहरी रूप से थोपे हुए नियमों का कोई महत्त्व नहीं है।

(4) शारीरिक स्वच्छता:
शरीर स्वच्छ रखने से स्फूर्ति बनी रहती है, मन प्रसन्न रहता है तथा रोगों की सम्भावना बहुत कम रहती है। शारीरिक स्वच्छता के लिए त्वचा की स्वच्छता, मुँह एवं दाँतों की स्वच्छता, नाखूनों की स्वच्छता, बालों की स्वच्छता, नेत्रों एवं नाक-काने की स्वच्छता आवश्यक है। नियमित शारीरिक स्वच्छता का व्यक्तिगत स्वास्थ्य से घनिष्ठ सम्बन्ध है। शारीरिक स्वच्छता के अभाव में व्यक्ति का स्वस्थ रह पाना प्रायः कठिन हो जाता है। शारीरिक स्वच्छता के साथ-साथ शरीर पर धारण किए जाने वाले वस्त्रों की स्वच्छता भी शारीरिक स्वास्थ्य के लिए एक अनिवार्य कारक है।

(5) नियमित व्यायाम करना:
शरीर को स्वस्थ एवं स्फूर्तियुक्त बनाए रखने के लिए नियमित व्यायाम करना आवश्यक है। व्यायाम से मांसपेशियों की क्रियाशीलता एवं कार्यक्षमता में वृद्धि होती है। व्यायाम का व्यक्ति के पाचन-तन्त्र, श्वसन तन्त्र तथा रुधिर परिसंचरण तन्त्र पर भी अच्छा प्रभाव पड़ता है। स्पष्ट है कि नियमित व्यायाम करना भी स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाला कारक है।

(6) विश्राम एवं निद्रा:
लगातार कार्य करने से शरीर थक जाता है तथा इसकी कार्यक्षमता कम हो जाती है। पुनः शक्ति प्राप्त करने के लिए विश्राम करना अत्यधिक आवश्यक है। निद्रा सबसे अच्छे प्रकार का विश्राम है। अत: प्रत्येक व्यक्ति को उपयुक्त एवं आवश्यक समय के लिए निद्रा लेनी चाहिए।

(7) मादक वस्तुओं से दूर रहना:
अफीम, भाँग, चरस, कोकीन, शराब व तम्बाकू इत्यादि मादक पदार्थ स्वास्थ्य को कुप्रभावित करते हैं। इनका आवश्यकता से अधिक सेवन करने से शारीरिक बल घटता जाता है तथा अनेक घातक रोगों की आशंका हो जाती है। अतः स्वस्थ रहने के लिए तथा पारिवारिक एवं सामाजिक हित में मादक पदार्थों से दूर रहना ही विवेकपूर्ण एवं कल्याणकारी है।

(8) स्वस्थ मनोरंजन:
व्यक्तिगत स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाला एक महत्त्वपूर्ण कारक स्वस्थ मनोरंजन भी है। मनोरंजन द्वारा व्यक्ति के जीवन की ऊब दूर होती है तथा व्यक्ति अपने अवकाश के समय को व्यक्तित्व के विकास के लिए उपयोग में लाता है। स्वस्थ मनोरंजन से व्यक्ति का शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य उत्तम बनता है।



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