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This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.

1.

घुरिये ने जाति-व्यवस्था की कितनी विशेषताएँ बतायी हैं ?(क) 8(ख) 6.(ग) 10(घ) 4

Answer»

सही विकल्प है (ख) 6

2.

एम०एन० श्रीनिवास की किसी एक पुस्तक का नाम लिखिए।

Answer»

‘सोशल चेंज इन मॉडर्न इंडिया’ श्रीनिवास द्वारा रचित प्रमुख पुस्तक है।

3.

जाति की सामाजिक मानवशास्त्रीय परिभाषा को सारांश में बताएँ।

Answer»

जाति की कुछ परिभाषाएँ ऐसी हैं जो जाति के साथ-साथ जनजाति पर भी लागू होती हैं। इन परिभाषाओं को ही जाति की सामाजिक मानवशास्त्रीय परिभाषा कहते हैं। उदाहरणार्थ-रिजले ने अपनी पुस्तक ‘दि पीपुल ऑफ इंडिया’ में जाति को इन शब्दों में परिभाषित किया है, “यह परिवार या कई परिवारों का संकलन है जिसको एक सामान्य नाम दिया गया है, जो किसी काल्पनिक पुरुष या देवता से अपनी उत्पत्ति मानता है तथा पैतृक व्यवसाय को स्वीकार करता है और जो लोग विचार कर सकते हैं उन लोगों के लिए एक सजातीय समूह के रूप में स्पष्ट होता है। यह एक ऐसी परिभाषा है। जो दी तो गई है जाति के संदर्भ में, परंतु जनजाति पर भी लागू होती है। जनजाति भी अनेक परिवारों का एक समूह है जिसका एक विशिष्ट नाम होता है। जनजाति के लोग भी अपनी उत्पत्ति किसी देवी-देवता से मानते हैं, निश्चित व्यवसाय करते हैं तथा सजातीय समूह का निर्माण करते हैं।

4.

भारतीय संस्कृति तथा समाज की क्या विशिष्टताएँ हैं तथा ये बदलाव के ढाँचे को कैसे प्रभावित करते हैं?

Answer»

भारतीय संस्कृति तथा समाज का एक लंबा इतिहास है। इसे बनाए रखने में इसकी संरचनात्मक विशिष्टताओं एवं प्रमुख परपंराओं का विशेष योगदान रहा है। प्राचीनता, स्थायित्व, सहिष्णुता, अनुकूलनशीलता, सर्वांगीणता, ग्रहणशीलता एवं आशावादी प्रकृति भारतीय संस्कृति तथा समाज की प्रमुख विशिष्टताएँ हैं। हजारों वर्षों में हुए परिवर्तन के बावजूद ये विशिष्टताएँ यथावत् बनी। हुई हैं। विभिन्न विद्वानों ने भारतीय संस्कृति तथा समाज की अलग-अलग विशिष्टताओं का उल्लेख किया हैं एम०एन० श्रीनिवास ने सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता पर बल दिया है तो ड्युमो ने श्रेणीबद्धता को प्रमुख माना है। योगेन्द्र सिंह ने श्रेणीबद्धता, समग्रवाद, निरंतरता तथा लोकातीतत्व को प्रमुख माना है।

मैंडलबानी ने भारतीय संस्कृति तथा समाज को समझने के लिए दो संकल्पनाओं को। इसकी कुंजी के समान माना है- जाति तथा धर्म। जाति तथा धर्म ने परिवर्तनों के बावजूद न केवल । अपने स्वरूप को बनाए रखा है, अपितु नवीन गुण भी ग्रहण किए हैं। इसी को डी०पी० मुकर्जी ने ‘जीवंत परंपरा’कहा है। भारतीय संस्कृति तथा समाज की विशिष्टताएँ समय के साथ-साथ परिवर्तन की संवेदनशीलता से जुड़ी रही हैं। इसीलिए भारतीय समाज की सभी संरचनात्मक विशिष्टताएँ आज भी किसी-न-किसी रूप में विद्यमान हैं।

5.

एम०एन० श्रीनिवास ने किस गाँव का अध्ययन किया है?

Answer»

एम०एन० श्रीनिवास ने मैसूर के रामपुरा गाँव का अध्ययन किया है।

6.

समाजशास्त्रीय शोध के लिए गाँव को एक विषय के रूप में लेने पर एम०एन० श्रीनिवास तथा लुईस ड्यूमो ने इसके पक्ष तथा विपक्ष में क्या तर्क दिए हैं?

Answer»

एम०एन० श्रीनिवास ने अपने पूरे जीवन भर गाँव तथा ग्रामीण समाज के विश्लेषण में अत्यंत रुचि ली। उन्होंने गाँव में किए गए क्षेत्रीय कार्यों का नृजातीय विवरण तथा इस पर परिचर्चा देने के साथ-साथ भारतीय गाँव को सामाजिक विश्लेषण की एक इकाई के रूप में भी स्वीकार किया। उनका मत था कि गाँव एक आवश्यक सामाजिक पहचान है तथा ऐतिहासिक साक्ष्य इस एकीकृत पहचान की पुष्टि करते हैं। श्रीनिवास ने यह दर्शाया कि गाँव में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं तथा गाँव कभी भी आत्म-निर्भर नहीं थे। वे विभिन्न प्रकार के आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक संबंधों से क्षेत्रीय स्तर पर जुड़े हुए थे। इसीलिए उन्होंने उन सभी ब्रिटिश प्रशासकों तथा सामाजिक मानववैज्ञानिकों की आलोचना की है जिन्होंने भारतीय गाँव का स्थिर, आत्म-निर्भर तथा लघु गणतंत्र के रूप में चित्रण किया।

लुईस ड्यूमो गाँव के अध्ययन के पक्ष में नहीं थे। उनका मत था कि जाति जैसी सामाजिक संस्थाएँ गाँव की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण थीं क्योंकि गाँव केवल कुछ लोगों का विशेष स्थान पर निवास करने वाला समूह मात्र था। गाँव बने रह सकते हैं या समाप्त हो सकते हैं और लोग एक गाँव को छोड़ दूसरे गाँव को जा सकते हैं, लेकिन उनकी जाति अथवा धर्म जैसी सामाजिक संस्थाएँ सदैव उनके साथ रहती हैं जहाँ वे जाते हैं वहीं सक्रिय हो जाती हैं। इसीलिए ड्यूमो का मत था कि गाँव को एक श्रेणी के रूप में महत्त्व देना गुमराह करने वाला हो सकता है।

7.

अनन्तकृष्ण अय्यर तथा शरतचंद्र रॉय ने सामाजिक मानवविज्ञान के अध्ययन का अभ्यास कैसे किया?

Answer»

एल० के० अनन्तकृष्ण अय्यर (1861-1937 ई०) तथा शरदचंद्र रॉय (1871-1942 ई०) को भारत के अग्रणी विद्वानों में माना जाता है जिन्होंने समाजशास्त्रीय प्रश्नों को आकार प्रदान किया। उन्होंने एक ऐसे विषय पर कार्य करना प्रारंभ किया जो भारत में न तो अभी तक विद्यमान था और न ही कोई ऐसी संस्था थी जो इसे किसी विशेष प्रकार का संरक्षण देती। अय्यर ने अपने व्यवसाय की शुरुआत एक क्लर्क के रूप में की; फिर स्कूली शिक्षक और उसके बाद कोचीन रजवाड़े के महाविद्यालय में शिक्षक के रूप में नियुक्त हुए।

यह रजवाड़ा आज केरल राज्य का एक भाग है। 1902 ई० में कोचीन के दीवान द्वारा उन्हें राज्य के नृजातीय सर्वेक्षण में सहायता के लिए कहा गया। ब्रिटिश सरकार इसी प्रकार के सर्वेक्षण सभी रजवाड़ों तथा अन्य इलाकों में कराना चाहती थी जो प्रत्यक्ष रूप से उनके नियंत्रण में आते थे। अय्यर ने यह कार्य पूर्णरूपेण एक स्वयंसेवी के रूप में अवैतनिक सुपरिंटेंडेंट के रूप में संपन्न किया। उनके इस कार्य की काफी सराहना की गई तथा तत्पश्चात् उन्हें मैसूर रजवाड़े के इसी प्रकार के सर्वेक्षण हेतु नियुक्त किया गया। इन सर्वेक्षणों से वे राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान् बन गए।

कानूनविद् शरत्चंद्र रॉय भी अग्रणी समाज-वैज्ञानिक माने जाते हैं। उन्होंने कुछ अवधि तक कानून की प्रैक्टिस करने के पश्चात् 1898 ई० में राँची के एक ईसाई मिशनरी विद्यालय में अंग्रेजी के शिक्षक के रूप में कार्यभार सँभाला। कुछ वर्षों पश्चात् उन्होंने पुनः राँची की अदालत में कानून की प्रैक्टिस प्रारंभ कर दी। 44 वर्ष राँची में निवास के दौरान उन्होंने छोटा-नागपुर प्रदेश (आज को झारखंड) में रहने वाली जनजातियों की संस्कृति तथा समाज का अध्ययन किया तथा वे इसके विशेषज्ञ बन गए। रॉय की रुचि जनजातीय समाज में, अदालत में दुभाषिए के रूप में उनकी नियुक्ति के कारण भी हुई। अदालत में वे जनजातियों की परंपरा तथा कानूनों को दुभाषित करते थे। उन्होंने जनजातीय क्षेत्रों का व्यापक भ्रमण किया तथा जनजातियों को गहराई से समझने का प्रयास किया। उन्होंने ओराँव, मुंडा तथा खरिया जनजातियों पर भी काफी कुछ लिखा तथा रॉय भारत तथा ब्रिटेन के छोटा-नागपुर के मानवविज्ञानी विशेषज्ञ माने जाने लगे।

8.

एम०एन० श्रीनिवास ने गाँव के अध्ययन में किस परिप्रेक्ष्य को अपनाया है?

Answer»

एम०एन० श्रीनिवास ने गाँव के अध्ययन में संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक परिप्रेक्ष्य को अपनाया है।

9.

भारत में प्रजाति तथा जाति के संबंधों पर हरबर्ट रिजले तथा जी०एस० घूर्ये की स्थिति की रूपरेखा दें।

Answer»

ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारी हरबर्ट रिजले मानवविज्ञान के मामलों में अत्यधिक रुचि रखते थे। उन्होंने प्रजातियों का विभाजन उनकी विशिष्ट शारीरिक विशेषताओं के आधार पर किया। उनके अनुसार भारत विभिन्न प्रजातियों के उविकास के अध्ययन की एक विशिष्ट प्रयोगशाला’ था तथा काफी लम्बे समय तक इन प्रजातियों में परस्पर विवाह सम्भव नहीं था क्योकि प्रत्येक प्रजाति अंतर्विवाह पर बल देती थी। जैसे-जैसे विवाह संबंधी यह नियम शिथिल हुआ, वैसे-वैसे विभिन्न प्रजातियों में विवाह होने लगे तथा जाति प्रथा की उत्पत्ति इसी का परिणाम है। अन्य शब्दों में यह कहा जा सकता है कि रिजले के अनुसार जाति व्यवस्था की उत्पत्ति प्रजातीय कारकों में निहित है। उन्होंने अपने मत की पुष्टि में यह तर्क दिया कि उच्च जातियाँ आर्य प्रजाति की विशिष्टताओं से मिलती हैं, जबकि निम्न जातियों में मंगोल तथा अन्य प्रजातियों के गुण देखे जा सकते हैं।

भारत में जी०एस० घुर्ये को जाति तथा प्रजाति का अध्ययन करने वाला प्रमुख विद्वान् माना जाता है। 1932 ई० में प्रकाशित उनकी पुस्तक कास्ट एण्ड रेस इन इंडिया’ इस विषय पर लिखी गई एक आधिकारिक पुस्तक मानी जाती है। इस पुस्तक में उन्होंने जाति तथा प्रजाति के संबंधो पर प्रचलित सिद्धांतों की विस्तारपूर्वक आलोचना की। घूर्ये; रिजले के इन विचारों को अंशत: सत्य मानते थे तथा इसलिए उनसे पूरी तरह से सहमत नहीं थे। उनका मत था कि रिजले द्वारा उच्च जातियों को आर्य तथा निम्न जातियों को अनार्य बताया जाना केवल उत्तरी भारत के लिए ही सही है। भारत के अन्य भागों में विभिन्न प्रजातीय समूहों को आपस में काफी लंबे समय से मेल-मिलाप था। अतः प्रजातीय शुद्धता केवल उत्तर भारत में ही बसी हुई थी क्योंकि वहाँ अंतर्विवाह निषिद्ध था। शेष भारत में अपनी ही जाति या समूह में विवाह करने का प्रचलन उन वर्गों में हुआ जो प्रजातीय स्तर पर वैसे ही भिन्न थे।

10.

एम० एन० श्रीनिवास के जीवन के बारे में आप क्या जानते हैं ?

Answer»

एम० एन० श्रीनिवास भारत के एक सुप्रसिद्ध समाजशास्त्री रहे हैं जिनका जन्म 16 नवंबरं, 1916 ई० को मैसूर के आयंगार ब्राह्मण परिवार में हुआ। उन्होंने मैसूर विश्वविद्यालय से 1936 ई० में सामाजिक दर्शनशास्त्र में बी०ए० (आनर्स) किया। सामाजिक दर्शनशास्त्र में उस समय समाजशास्त्र तथा सामाजिक मानवशास्त्र भी पढ़ाया जाता था। तत्पश्चात् श्रीनिवास उच्च शिक्षा के लिए बंबई विश्वविद्यालय चले गए तथा वहीं 1938 ई० में “Marriage and Family among the Kannada Castes in Mysore State” विषय पर शोध-निबंध लिखकर एम०ए० समाजशास्त्र की उपाधि प्राप्त की।

बाद में यह शोध-प्रबंध 1944 ई० में पुस्तक के रूप में प्रकाशित भी हो गया। 1944 ई० में उन्हें प्रो० जी०एस० घूर्ये के निर्देशन में दक्षिण भारत के कुर्ग लोगों पर थीसिस लिखने के आधार पर पी-एच० डी० की उपाधि प्रदान की गई। इसके पश्चात् वह ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में सामाजिक मानवशास्त्र में उच्च अध्ययन करने के लिए चले गए तथा वहाँ सुप्रसिद्ध सामाजिक मानवशास्त्री ए०आर० रैडक्लिफ-ब्राउन तथा ई०ई० ईवांस-प्रिचार्ड के विचारों से अत्यधिक प्रभावित हुए।

जिन आँकड़ों को आधार मानकर उन्होंने बंबई में पी-एच०डी० के लिए थीसिस लिखा था उन्हीं आँकड़ों के आधार पर डी० फिल० (D. Phil.) के लिए “Religion and Society among the Coorgs of South India” नामक विषय पर थीसिस लिखा जो कि 1952 ई० में पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक में ही उन्होंने सर्वप्रथम ‘संस्कृतिकरण’ की अवधारणा का प्रयोग किया है। श्रीनिवास 1999 ई० में स्वर्ग सिधार गए।

11.

ए० आर० देसाई के जीवन के बारे में आप क्या जानते हैं?

Answer»

देसाई का जन्म बड़ौदा के एक सुप्रसिद्ध परिवार में 1915 ई० में हुआ था। उन्होंने कानून की शिक्षा प्राप्त कर बंबई विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में प्रो० घूयें के निर्देशन में पी-एच०डी० की उपाधि प्राप्त की। वे इसी विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्राध्यापक और बाद में विभागाध्यक्ष बन गए। देसाई कुछ समय तक ‘भारतीय साम्यवादी दल के सदस्य भी रहे, किन्तु पार्टी के कुछ मुद्दों पर मतभेद हो जाने के कारण 1939 ई० में उन्होंने दल की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया। 1953 ई० में वे ‘ट्राटस्कीवादी क्रांतिकारी समाजवादी दल के सदस्य बन गए, किंतु उनकी समझौतेवादी प्रकृति न होने और खरी बौद्धिक ईमानदारी ने अंततः 1961 ई० में उन्हें इस संगठन को भी छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया। फिर भी, वे आजीवन अपनी मार्क्सवादी विचारधारा के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध रहे। बंबई विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने “स्वंतत्रता के बाद भारतीय विकास की द्वंद्वात्मकता विषय पर गहन शोध कार्य किया।

देसाई ‘भारतीय समाजशास्त्रीय परिषद् के संस्थापक सदस्यों में से रहे हैं। वे इस संस्था के 1978-80 के सत्र में अध्यक्ष थे तथा 1951 ई० में यूनेस्को की एक कार्य योजना ‘भारत में समूह तनाव’ के सह-निदेशक थे। वे इसी संस्था के ‘बंबई के औद्योगिक श्रमिकों की साक्षरता और उत्पादन संबंधी कार्य-योजना के मानद निदेशक भी रहे हैं। देसाई ‘इण्डियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च के राष्ट्रीय शोधार्थी (1981-83) भी रहे हैं। देसाई की प्रथम प्रमुख कृति ‘भारतीय राष्ट्रवाद की सामाजिक पृष्ठभूमि’ (हिन्दी अनुवाद) न केवल अपने मार्क्सवाद शैक्षिक परिप्रेक्ष्य के करण एक नवीन प्रवृत्ति स्थापित करने वाला गौरव ग्रंथ (क्लासिक) रहा है, अपितु इसे भारत में समाजशास्त्र का इतिहास के साथ समागम करने वाली एक उत्कृष्ट प्रथम कृति कहा जा सकता है।

देसाई ने इस ग्रंथ के बाद कई भिन्न विषयों; जैसे भारतीय राज्य, कृषक समाज व्यवस्था, प्रजातंत्रात्मक अधिकार, नगरीकरण, कृषक आंदोलन आदि पर लिखा है। उनकी भारत में ग्रामीण समाजशास्त्र नामक संपादित पुस्तके अपने विषय की एक प्रामाणिक पाठ्य-पुस्तक मानी जाती रही है जिसके अब तक कई संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। उन्होंने इसमें भारतीय कृषक व्यवस्था के सामंती चरित्र को उजागर किया है। 1994 ई० में ए०आर० देसाई स्वर्ग सिधार गए।

12.

क्या आप ऐसे किसी व्यक्ति को जानते हैं जो नगर छोड़ गाँव में जाकर बस गया हो? क्या आप ऐसे किसी व्यक्ति को जानते हैं जो वापस जाना चाहता हो? अगर हाँ, तो वे कौन-से कारण हैं जिनके लिए ये नगर छोड़ गाँव में जाकर बसना चाहते हैं?

Answer»

कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो रोजगार की तलाश में बिना सोचे-समझे गाँव छोड़ देते हैं। नगर में उन्हें पहले तो रोजगार मिलता ही नहीं और यदि रोजगार मिल भी जाता है तो वे इससे अपने पूरे परिवार का खर्चा नहीं उठा सकते। नगरों में मकानों के महँगे किराये हैं तथा जीवनयापन हेतु भी अधिक धन की आवश्यकता होती है। हो सकता है कि कोई व्यक्ति इन सबसे निराश होकर पुनः गाँव जाने का निर्णय ले ले। वह यह सोचकर वापस गाँव चला जाए कि इतने पैसे कमाकर तो वह गाँव में ही अपना गुजारा आसानी से कर सकता है।

उसके साथ कोई ऐसी घटना भी घटित हो सकती है जो उसे नगरीय जीवन से विमुख कर दे। पहले कभी फिल्मों में यह दिखाया जाता है था कि जब कोई हीरो गाँव से नगर पहली बार आता है तो या तो उसका सामान चोरी हो जाता है या उसकी जेब काट ली जाती है या उसे कोई ऐसा व्यक्ति मिल जाता है जो उसके भोलेपन का फायदा उठाने वाला होता है। ऐसे व्यक्ति वापस जाने को तैयार हो जाते हैं। अधिकांश व्यक्ति, जिन्हें नगरीय जीवन ग्रामीण जीवन से अधिक सुविधा-संपन्न लगता है, कभी भी गाँव वापस जाने के बारे में सोचते ही नहीं हैं। गाँव छोड़ने के कारणों में नगरों में बच्चों हेतु उच्च, तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा की उपलब्धता, रोजगार के अधिक अवसर, नगरीय जीवन का आकर्षण आदि प्रमुख हो सकते हैं।

13.

जनजातीय समुदायों को कैसे जोड़ा जाए’-इस विवाद के दोनों पक्षों के क्या तर्क थे?

Answer»

1930 एवं 1940 के दशकों में भारत में इस विषय पर वाद-विवाद प्रारंभ हुआ कि भारत में जनजातीय समाज का क्या स्थान हो और राज्य उनसे किस प्रकार का व्यवहार करे। एक तरफ अंग्रेज प्रशासक एवं मानव-वैज्ञानिक थे जिनका मत था कि जनजातियों को संरक्षण देने में राज्य को आगे आना चाहिए ताकि वे अपनी जीवन-पद्धति तथा संस्कृति को बनाए रख सकें। ऐसे विचारकों को यह तर्क था कि यदि सीधे-सादे जनजातीय लोग हिंदू समाज तथा संस्कृति की मुख्य धारा में सम्मिलित हो जाएँगे तो उनका न केवल सांस्कृतिक रूप से पतन होगा, अपितु वे शोषण से भी नहीं बच पाएँगे। इसलिए ऐसे विचारक जनजातियों को अलग-थलग रखने के पक्ष में थे ताकि उन्हें अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने का अवसर मिलता रहे।

जनजातियों को अलग-थलग रखने के विरुद्ध दूसरी तरफ ऐसे राष्ट्रवादी भारतीय भी थे जिनका यह मत था कि जनजातियों के पिछड़ेपन को आदिम संस्कृति के संग्रहालय’ के रूप में ही बनाए नहीं रखा जाना चाहिए। घूर्ये राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रबल समर्थक थे तथा उन्होंने जनजातियों को ‘पिछड़े हिंदू समूह’ के रूप में पहचाने जाने पर बल दिया। उन्होंने अनेक ऐसे साक्ष्य भी दिए जिनसे यह प्रमाणित होता था कि वे लंबे समय तक हिंदुत्व से आपसी अंत:क्रिया द्वारा जुड़े हुए थे। घूयें जैसे राष्ट्रवादी विचारकों का मत था कि जनजातियों को राष्ट्रीय विचारधारा में सम्मिलित किया जाना चाहिए। ऐसा करने में होने वाले दुष्परिणाम मात्र जनजातीय संस्कृति तक ही सीमित न होकर भारतीय समाज के सभी पिछड़े तथा दलित वर्गों में समान रूप से देखे जा सकते हैं। विकास के मार्ग में आने वाली ये वे आवश्यक कठिनाइयाँ हैं जिनसे बचा नहीं जा सकता।

14.

भारत में जनजातीय समाज का अध्ययन करने वाले किन्हीं दो प्रारंभिक विद्वानों का नाम लिखिए।

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एल०के० अनन्तकृष्ण अय्यर तथा शरत्चंद्र रॉय भारत में जनजातीय समाज का अध्ययन करने वाले दो प्रमुख प्रारंभिक विद्वान् थे।

15.

जनजातीय आंदोलन जैसे कितने और संघर्षों के बारे में आप जानते हैं? पता लगाइए कि इन संघर्षों के पीछे कौन-से मुद्दे थे? आप और आपके सहपाठी इन समस्याओं के बारे में ” क्या सोचते हैं?

Answer»

भारत में जनजातीय आंदोलनों के अतिरिक्त अनेक समाज-सुधार आंदोलन भी हुए हैं जिनका उद्देश्य समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर कर उनसे प्रभावित वर्गों का उत्थान करना रहा है। ऐसे आंदोलन मुख्य रूप से निम्न जातियों (पूर्व में अस्पृश्य जातियाँ) तथा महिलाओं पर अधिक केंद्रित रहे. हैं। अधिकतर जनजातीय आंदोलन अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक तथा राजनीतिक पहचान पर बल देते हैं। वास्तव में, झारखंड तथा छत्तीसगढ़ राज्यों का निर्माण इसी प्रकार के आंदोलनों का फल है। विकास के नाम पर बड़े-बड़े बाँधों, खदानों एवं फैक्टरियों के निर्माण के कारण जनजातीय वर्गों पर एक असमान दबाव पड़ता है जिससे विस्थापन जैसी गंभीर समस्या विकसित होने लगती है। भारत में पिछले पचास से अधिक वर्षों में 3,300 बड़े बाँध बनाए गए हैं जिनके परिणामस्वरूप लगभग 21 से 33 मिलियन लोग विस्थापित हुए हैं।

जनजातीय एवं दलित वर्गों की स्थिति विस्थापितों में और भी दयनीय है तथा 40-50 प्रतिशत विस्थापित लोग जनजातीय समुदायों के ही हैं। घूर्ये ने जनजातियों को ‘पिछड़े हिंदू समूह’ कहा तथा उन्हें भारत की. मुख्य धारा की संस्कृति में सम्मिलित करने पर बल दिया। ऐसा करने पर जनजातियों में होने वाले आंदोलनों एवं संघर्षों के वैसे ही परिणामों की बात कही जैसे कि अन्य पिछड़े वर्गों में रहे हैं। अस्पृश्यता समाप्त करने हेतु किए गए समाज-सुधार आंदोलनों के पीछे भी इस अमानवीय कुप्रथा को समाप्त कर अस्पृश्यों के स्तों को ऊँचा करना रहा है। इसी भाँति बाल विवाह, सती प्रथा, नरबलि जैसी कुप्रथाओं को लेकर हुए आंदोलनों का लक्ष्य महिलाओं की स्थिति में सुधार करना था। महिला स्वतंत्रता जैसे आंदोलनों के पीछे महिलाओं को समान अधिकार देने जैसा मुद्दा प्रमुख रहा है।

16.

क्या राज्य पहले की अपेक्षा आज अधिक कार्य कर रहा है या कम? आपको क्या लगता है-यदि राज्य इन कार्यों को करना बंद कर दे तो क्या होगा?

Answer»

आज राज्य पहले की अपेक्षा कहीं अधिक कार्य कर रहा है। कानून व्यवस्था बनाए रखने के अतिरिक्त राज्य बाजारी शक्तियों को नियंत्रित एवं नियमित करने तथा सामाजिक समस्याओं के समाधान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। राज्य के कार्यों में निरंतर वृद्धि हुई है। इसका प्रमुख कारण राज्य पर कमजोर वर्गों के हितों को संरक्षण देकर उनका सामाजिक-आर्थिक उत्थान रहा है। साथ ही, परिवर्तन के परिणामस्वरूप जिन संस्थाओं में विकृतियाँ आ गई हैं उन्हें दूर करने हेतु सामाजिक अधिनियम बनाना भी राज्य का कार्य समझा जाने लगा है। यदि राज्य इन सभी कार्यों को करना बंद कर देगा तो अमीर और गरीब में अंतराल अत्यधिक बढ़ने लगेगा तथा समाज के कमजोर वर्गों के हितों की रक्षा नहीं हो पाएगी। उनका शोषण बढ़ जाएगा तथा जीवनयापन अत्यंत कठिन हो जाएगा। यदि हम अपने पड़ोस में राज्य द्वारा दी गई सुविधाओं एवं सेवाओं की एक सूची बनाएँ तो यह पहले राज्य द्वारा किए जाने वाले कार्यों से अधिक लंबी होगी।

उदाहरणार्थ- इस सूची को विद्यालय से ही प्रारंभ किया जा सकता है। पहले जो विद्यालय थे उनमें निम्न जातियों के बच्चों को प्रवेश नहीं दिया जाता था। अधिक फीस होने के कारण केवल अमीर परिवारों के बच्चे ही शिक्षा ग्रहण कर सकते थे। अब यदि कोई विद्यालय ऐसा करता है तो उसकी न केवल सरकारी सहायता बंद कर दी जाती है, अपितु इस कार्य हेतु उसे बंद भी किया जा सकता है। स्कूलों में भवन का निर्माण सरकारी धन से होता है, प्राध्यापकों एवं अन्य कर्मचारियों का वेतन सरकार देती है, बच्चों से बहुत कम फीस ली जाती है, अनुसूचित जाति/जनजाति के बच्चों को छात्रवृत्ति प्रदान की जाती है, यदि बुक बैंक योजना है तो छात्र-छात्राओं को पुस्तकें भी उपलब्ध कराई जाती हैं तथा कमजोर वर्गों के छात्रों के लिए मुफ्त में अतिरिक्त कक्षाओं का प्रबंध किया जाता है।

यदि किसी विद्यालय में अनुसूचित जाति/जनजाति हेतु ‘आरक्षित स्थानों का पालन नहीं किया जाता तो उस विद्यालय के विरुद्ध कठोर शासकीय कार्यवाही की जा सकती है। इसी भाँति, यदि हम अपने पड़ोस में सरकार द्वारा किए जाने वाले कार्यों की सूची बनाएँ तो यह पहले की तुलना में काफी लंबी होगी। गलियों में प्रकाश की व्यवस्था, घरों में बिजली-पानी उपलब्ध कराने की व्यवस्था, गंदगी की निकासी हेतु सीवर की व्यवस्था, बच्चों के खेल एवं मनोरंजन के लिए-पार्को की व्यवस्था, समय-समय पर टूटी सड़कों एवं गलियों की मरम्मत करने या उन्हें फिर से नया बनाने की व्यवस्था राज्य द्वारा ही की जाती है। इतना अवश्य है कि सरकार द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली सुविधाओं से सभी लोग कभी भी संतुष्ट नहीं होते हैं। कुछ लोग इन्हें अपर्याप्त मानकर सरकार एवं संबंधित सरकारी विभाग की आलोचना भी करते रहते हैं। हो सकता है कि कार्य समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण उनकी आशा के अनुकूल न हो रहा हो।

17.

कल्याणकारी राज्यों ने अपने नागरिकों के लिए जो किया उससे अधिक करना चाहिए अथवा राज्य को अपनी भूमिकाओं को निरंतर कम करके इन्हें स्वतंत्र बाजार के हवाले कर देना चाहिए। इस दृष्टिकोण पर चर्चा कीजिए और दोनों पक्षों को ध्यानपूर्वक सुनिए।

Answer»

कल्याणकारी राज्यों ने अपने नागरिकों के लिए जो किया है उससे अधिक करना चाहिए अथवा राज्य को अपनी भूमिकाओं को निरंतर कम करके इन्हें स्वतंत्र बाजार के हवाले कर देना चाहिए। यह एक विवादास्पद मुद्दा है। ए०आर० देसाई जैसे मार्क्सवादी विद्वानों एवं राष्ट्रवादियों द्वारा यह तर्क दिया जाता है कि कल्याणकारी राज्य लोगों के कल्याण के जो दावे करता है वे खोखले हैं। अमेरिका तथा यूरोप के राज्य, जो अपने आप को तथाकथित कल्याणकारी राज्य कहते हैं, अपने । नागरिकों को न केवल निम्नतम आर्थिक तथा सामाजिक सुरक्षा देने में असफल रहे हैं, अपितु वे आर्थिक असमानताओं को कम करने में भी विफल रहे हैं। वे धन के असमान वितरण तथा अत्यधिक बेरोजगारी रोकने में भी असफल रहे हैं। अत: कल्याणकारी राज्यों को इन सभी कार्यों को भी करना चाहिए तथा वास्तव में कल्याणकारी होने का प्रयास करना चाहिए।
दूसरी ओर, अनेक विद्वान ऐसे हैं जो राज्य के कार्यों को सीमित करने के पक्ष में हैं। उनका तर्क है कि राज्य को केवल कानून बनाने तथा इसे लागू करने पर ही अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए ताकि समाज में शांति बनी रहे एवं कानून का शासन स्थापित हो सके। बाकी सभी कार्य राज्य को या तो स्वतंत्र बाजार के हवाले कर देने चाहिए अथवा अन्य संस्थाओं को स्थानांतरित कर देने चाहिए। राज्य से उन सब कल्याणकारी कार्यों की आशा नहीं की जा सकती जो वह कर ही नहीं सकता। इसलिए कल्याणकारी राज्य निर्धनता, बेरोजगारी, सामाजिक भेदभाव, नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करने, पूँजीवादियों की अधिक लाभ कमाने की प्रवृत्ति, श्रमिकों के शोषण आदि समस्याओं का समाधान नहीं कर पाए हैं।

18.

टी०वी, फिल्म अथवा अखबारों में गाँव पर कितनी बार चर्चा की जाती है?

Answer»

टीवी, फिल्म अथवा अखबारों में पहले गाँव की बहुत चर्चा हुआ करती थी। अनेक टीवी कार्यक्रम अथवा फिल्में ग्रामीण परिवारों के इर्द-गिर्द ही निर्मित होते थे। अब अधिकांश टी०वी० कार्यक्रम एवं फिल्में नगरों में बने स्टूडियों में बनाए जाने लगे हैं जिनमें गाँव की चर्चा कम होने लगी है। इनमें नगरीय परिवारों; विशेष रूप से मध्य एवं उच्च वर्ग के परिवारों का चित्रण अधिक होने लगा है। समाचार-पत्रों में भी अधिकांश घटनाएँ नगरों में संबंधित ही प्रकाशित होती हैं। टी०वी० एवं फिल्मों की भाँति समाचार-पत्रों में भी गाँव की चर्चा कम होने लगी है।

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