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This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.

1.

किसने, किससे कहा-सभी पशु-पक्षियों में समझौता हो गया है।

Answer»

लोमड़ी ने मुर्गे से

2.

लोमड़ी की बात सुनकर मुर्गे ने क्या कहा?

Answer»

मैं खूखार जानवरों के डर से यहाँ बैठा हूँ।

3.

लोमड़ी की बात सुनकर मुर्गे ने क्या किया?

Answer»

मुर्गे ने अपनी गर्दन उठाकर देखा जैसे दूर की कोई चीज देख रहा है।

4.

किसने, किससे कहा-कुछ शिकारी कुत्ते तेजी से इस ओर दौड़े चले आ रहे हैं।

Answer»

मुर्गे ने लोमड़ी से

5.

रानी बिटिया कहाँ से चली थी?

Answer»

रानी बिटिया दिल्ली से चली थी।

6.

माँ ने रानी बिटिया से क्या पूछा?

Answer»

माँ ने रानी बिटिया से पूछा, ‘बाहर कहाँ गई थी?’

7.

हमें वृक्षों के प्रति कैसा व्यवहार करना चाहिए?

Answer»

हमे वृक्षों के प्रति मित्रतापूर्ण व्यवहार करना चाहिए।

8.

किसने, किससे कहा-लगता है, शिकारी कुत्तों ने अभी यह समाचार नहीं सुना।

Answer»

लोमड़ी ने मुर्गे से

9.

रेल के अलावा टिकट और कहाँ-कहाँ लगता है?

Answer»

रेल के अलावा टिकट बस में, हवाई जहाज में, सिनेमा में, सरकस आदि में लगता है।

10.

मोनू ने वाराणसी में क्या-क्या देखा?

Answer»

मोनू ने वाराणसी में अनेक चीजें देखीं। उसने गोदौलिया में ऊँचे-ऊँचे मन्दिर, जगत्प्रसिद्ध विश्वनाथ मन्दिर, दशाश्वमेध घाट, टेढा मन्दिर, सारनाथ में संग्रहालय और अशोक की लाट, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, रेलगाड़ी बनाने का कारखाना, बाजारों की चमक-दमक आदि देखी।

11.

चाँद को पकड़ने के लिए बंदरों ने क्या योजना बनाई?

Answer»

चाँद को पकड़ने के लिए बन्दरों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़कर लटकने की योजना बनाई।

12.

मोनू वाराणसी कैसे गया?

Answer»

मोनू वाराणसी रेलगाड़ी से गया।

13.

माँ ने झिंगोला सिलने की बात क्यों कही?

Answer»

माँ ने झिंगोला सिलने की बात इसलिए कही क्योंकि चाँद का आकार रोज घटते-बढ़ते रहता है। ऐसे में झिंगोला हर रोज बदन में आ सकता है।

14.

कविता में किस मौसम का वर्णन किया गया है?

Answer»

कविता में बरसात के मौसम का वर्णन किया गया है।

15.

स्वतन्त्रता आन्दोलन के कुछ और सेनानियों के नाम।

Answer»

स्वतन्त्रता आन्दोलन के कुछ और सेनानियों के नाम निम्न हैंगोपाल कृष्ण गोखले, लाला लाजपतराय, बाल गंगाधर तिलक, विपिनचन्द्र पाल, मदनमोहन मालवीय, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, सरोजिनी नायडू, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, एनी बेसेन्ट आदि।

16.

युद्ध से क्या-क्या हानियाँ होती हैं?

Answer»

युद्ध से बहुत हानियाँ होती हैं। जन-धन की हानि तो प्रत्यक्ष हानि होती ही  है, युद्ध से देश की अर्थव्यवस्था ठप्प हो जाती है। शान्ति के समय होने वाले विकास कार्य रुक जाते हैं। जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है।

17.

नेताजी ने नौकरी क्यों नहीं की?

Answer»

नेताजी ने नौकरी इसलिए नहीं की, क्योंकि उन्होंने देश को स्वतंत्र कराने का संकल्प किया था।

18.

सूरज क्यों नहीं दिखाई दे रहा है?

Answer»

सूरज बादलों में छिपे होने के कारण दिखाई नहीं दे रहा है।

19.

बंदरों ने चाँद को क्यों पकड़ना चाहा?

Answer»

बन्दरों ने चमकते हुए चाँद को तालाब में देखा और आकर्षित होकर उसे पकड़ना चाहा।

20.

आसमान में चाँद कब नहीं दिखाई देता है?

Answer»

आसमान में चाँद अमावस्या को नहीं दिखाई देता है।

21.

चाँद बड़ा कब दिखाई देता है?

Answer»

पूर्णमासी को चाँद बड़ा दिखाई देता है।

22.

चाँद ने माँ से क्या कहा?

Answer»

चाँद ने माँ से कुर्ता सिलवाने के लिए कहा।

23.

तालाब में चाँद था या कुछ और?

Answer»

तालाब में चाँद की परछाईं दिखाई दे रही होगी।

24.

रामेश्वर के पहले वह कहाँ-कहाँ गई?

Answer»

रामेश्वर से पहले वह चण्डीगढ़ और जयपुर गई।

25.

अनंत शून्य में रेडियम की स्थिति क्या थी?

Answer»

रेडियम अनंत शून्य में अकेला और निराधार था। वह अनंत शून्य में बहुत वर्षों तक इधर-उधर घूमता रहा।

26.

रेडियम के दो कण कहाँ संग्रहित हैं?

Answer»

रेडियम के दो कण लंदन के मिडल सेक्स अस्पताल में संगृहीत हैं।

27.

वैज्ञानिकों ने रेडियम के साथ कैसा व्यवहार किया?

Answer»

वैज्ञानिकों ने रेडियम को उसके अन्य सहचर चिरसंगी धातुओं से अलग कर दिया और मनुष्यों के सामने उपस्थित कर दिया।

28.

‘रेडियम’ कहाँ रहना नहीं चाहता था?

Answer»

रेडियम पृथ्वी के ऊपरी भाग पर नहीं रहना चाहता था।

29.

स्वास्थ्य के लिए, स्वास्थ्य शिक्षा के अन्तर्गत मुख्य रूप से क्या सुझाव दिए जा सकते हैं? 

Answer»

स्वास्थ्य शिक्षा से आशय

जन सामान्य को स्वास्थ्य के सभी पहलुओं से अवगत कराना ही स्वास्थ्य शिक्षा कहलाती है। यह एक ऐसा साधन है, जिससे कुछ विशेष शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों की सहायता से लोगों को स्वास्थ्य सम्बन्धी ज्ञान तथा व्याधियों से बचने के उपायों का प्रसार किया जा सकता है।
स्वास्थ्य शिक्षा के द्वारा जनसाधारण को यह समझने का प्रयास किया जाता है कि उसके लिए क्या स्वास्थ्यप्रद और क्या हानिप्रद है तथा इनसे साधारण बचाव कैसे किया जाए। संक्रामक रोगों; जैसे- चेचक, क्षय और विसूचिका इत्यादि के टीके लगवाकरे हम कैसे अपनी सुरक्षा कर सकते हैं। स्वास्थ्य शिक्षक ही जनता से सम्पर्क स्थापित कर स्वास्थ्य शिक्षा द्वारा आवश्यक नियमों का उन्हें ज्ञान कराता है।

स्वास्थ्य शिक्षा से सम्बन्धित सुझाव

1.स्कूलों एवं कॉलेजों के स्तर पर

⦁    व्यक्तिगत स्वास्थ्य एवं पारिवारिक स्वास्थ्य की रक्षा हेतु लोगों को । स्वास्थ्य के नियमों की जानकारी कराने के लिए स्वास्थ्य शिक्षा को स्कूल व कॉलेजों के पाठ्यक्रम में जोड़ना आवश्यक है

⦁    संक्रामक रोगों की अधिकता तथा रोग निरोधक के मूल तत्त्वों का ? विद्यार्थियों को बोध कराया जाना चाहिए।

⦁    स्वास्थ्य रक्षा के सामूहिक उत्तरदायित्व को वहन करने की शिक्षा देना। इस प्रकार से स्कूलों में स्वास्थ्य शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्र आगे चलकर सामुदायिक स्वास्थ्य सम्बन्धी कार्यों में निपुणता से कार्य कर सकते हैं तथा अपने एवं अपने परिवार के लोगों की स्वास्थ्य रक्षा हेतु उचित उपायों का प्रयोग कर सकते हैं। यह देखा भी गया है कि इस प्रकार से स्कूलों में स्वास्थ्य शिक्षा से सम्पूर्ण देश की स्वास्थ्य रक्षा में प्रगति हुई है।

2. सामान्य जनता को स्वास्थ्य सम्बन्धी सूचना देना यह कार्य मुख्य रूप से स्वास्थ्य विभाग का है, परन्तु अनेक ऐच्छिक स्वास्थ्य संस्थाएँ एवं अन्य संस्थाएँ जो इस कार्य में रुचि रखती हैं, सहायक रूप से कार्य कर सकती हैं। इस प्रकार की स्वास्थ्य शिक्षा का कार्य आजकल रेडियो, समाचार-पत्रों, भाषणों, सिनेमा, प्रदर्शनी तथा पुस्तिकाओं की सहायता से यथाशीघ्र सम्पन्न हो रहा है। इसके अतिरिक्त अन्य सभी उपकरणों का भी प्रयोग करना चाहिए, जिससे अधिक-से-अधिक जनता का ध्यान स्वास्थ्य शिक्षा की ओर आकर्षित हो सके। इसके लिए विशेष प्रकार के व्यवहार कुशल और शिक्षित स्वास्थ्य शिक्षकों की नियुक्ति करना श्रेयस्कर है।

3. स्वास्थ्य शिक्षा सम्बन्धी केन्द्र स्वास्थ्य से सम्बन्धित शिक्षा देने के लिए विभिन्न स्थानों पर केन्द्रों की स्थापना की जानी चाहिए। इन केन्द्रों के माध्यम से स्वास्थ्य विशेषज्ञ निम्नलिखित सहायता प्रदान कर सकते हैं।

⦁    प्रत्येक रोगी तथा प्रत्येक घर जहाँ चिकित्सक जाता है, वहाँ किसी-न-किसी रूप में उसे स्वास्थ्य शिक्षा देने की हमेशा आवश्यकता पड़ती है।

⦁    रोग के सम्बन्ध में रोगी के भावात्मक विचार तथा अन्धविश्वास को दूर करना।

⦁    रोगी का रोगोपचार, स्वास्थ्य रक्षक तथा रोग के समस्त रोगनिरोधात्मक उपायों का ज्ञान कराना।

⦁    अपने ज्ञान से रोगी को पूरा विश्वास दिलाना, जिससे रोगी अपनी तथा अपने परिवार की स्वास्थ्य रक्षा के हेतु उनसे समय-समय पर सलाह ले सकें।

⦁    रोग पर असर करने वाले आर्थिक एवं सामाजिक प्रभावों का भी रोगी को बोध कराए तथा एक चिकित्सक, उपचारिका, स्वास्थ्य चर तथा इस क्षेत्र में कार्य करने वाले स्वयंसेवकों की कार्य सीमा कितनी है, इसका भी लोगों को बोध कराना अत्यन्त आवश्यक है।

30.

स्वास्थ्य शिक्षा से क्या आशय है? स्वास्थ्य शिक्षा के उददेश्य तथा शिक्षा में सहायक संस्थाओं पर प्रकाश डालिए।अथवास्वास्थ्य शिक्षा क्या है? स्वास्थ्य शिक्षा में कौन-कौन सी सस्थाएँ सहायक हैं?

Answer»

जन सामान्य को स्वास्थ्य के सभी पहलुओं से अवगत कराना ही स्वास्थ्य शिक्षा कहलाती है। यह एक ऐसा साधन है, जिससे कुछ विशेष शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों की सहायता से लोगों को स्वास्थ्य सम्बन्धी ज्ञान तथा व्याधियों से बचने के उपायों का प्रसार किया जा सकता है।

स्वास्थ्य शिक्षा के उद्देश्य

स्वास्थ्य शिक्षा के अन्तर्गत पर्यावरण, शारीरिक स्वास्थ्य, सामाजिक स्वास्थ्य तथा बौद्धिक स्वास्थ्य इत्यादि सभी को सम्मिलित किया जाता है। स्वास्थ्य शिक्षा के द्वारा ही व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह ऐसा बर्ताव करता है, जो स्वास्थ्य की उन्नति, रख-रखाव तथा उसकी पुनर्घाप्ति में सहायक हो।
देश में स्वास्थ्य शिक्षा को विकसित करने और बढ़ावा देने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए केन्द्रीय स्वास्थ्य ब्यूरो ने निम्नलिखित उद्देश्य बताए हैं।

⦁    स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मन्त्रालय की योजनाओं, कार्यक्रमों और उपलब्धियों की व्याख्या करना।

⦁    स्वास्थ्य व्यवहार, स्वास्थ्य शिक्षा प्रक्रियाओं और साधनों के लिए सन्दर्शिका तैयार करना और शोध आयोजित करना।

⦁    विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं और कार्यक्रमों से सम्बन्धित स्वास्थ्य शिक्षा सामग्री को तैयार करके टाइप कराकर वितरित करना।।

⦁    प्रमुख स्वास्थ्य और समुदाय कल्याण कर्मियों को स्वास्थ्य शिक्षा और शोध की विधियों में प्रशिक्षित करना, प्रशिक्षण के लिए प्रभावशाली विधि और प्रशिक्षण के साधन विकसित करना।

⦁    विद्यालय के छात्रों हेतु स्वास्थ्य शिक्षा के लिए विद्यालयों और शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों की सहायता करना।
⦁    राज्य, जिला और अन्य स्तरों पर स्वास्थ्य शिक्षा इकाइयों की संगठनात्मक व्यवस्था और प्रचालन हेतु दिशा निर्देश प्रदान करना।

⦁    स्वास्थ्य शिक्षा कार्य में लगी आधिकारिक और गैर-आधिकारिक एजेन्सियों को तकनीकी सहायता प्रदान करना और उनके कार्यक्रमों को समन्वित करना।

स्वास्थ्य शिक्षा में सहायक संस्थाएँ

स्वास्थ्य शिक्षा के सन्दर्भ में निम्नलिखित संस्थाओं का सहयोग है।

1. परिवार इसे बच्चे की प्रथम पाठशाला माना जाता है। परिवार द्वारा बच्चे को स्वास्थ्य की जानकारी तथा स्वास्थ्य सम्बन्धी नियमों का ज्ञान होता है।

2. विद्यालय बालक पारिवारिक वातावरण से निकलकर विद्यालय में प्रवेश करता है, जहाँ उसे स्वस्थ रहने के तरीकों का ज्ञान होता है। विद्यालय में बालक को शारीरिक व्यायाम तथा रोगों से बचाव हेतु शिक्षा दी जानी चाहिए, जिससे स्वास्थ्य की रक्षा होती है।

3. चिकित्सालय नगरों में सामान्य चिकित्सालय खोले गए हैं, जहाँ प्रशिक्षित नर्स तथा डॉक्टर होते हैं, जो विशेष रूप से लोगों को स्वास्थ्य शिक्षा के विषय में जानकारी देते हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ शुद्ध व सन्तुलित भोजन तथा टीका लगवाने की प्रेरणा दी जाती है।

4. प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र यह स्वास्थ्य केन्द्र ग्रामीण जनता को स्वास्थ्य सम्बन्धी नियमों की जानकारी देने, रोगों से बचाव, स्वच्छता, शिशु की देखभाल तथा गर्भवती स्त्रियों को पोषण सम्बन्धी जानकारी देते हैं। यह केन्द्र नि:शुल्क होते हैं।

5. नगर निगम के स्वास्थ्य केन्द्र यह केन्द्र शहर में स्वच्छता का ध्यान रखते हैं। इसका मुख्य कार्य सड़क एवं गलियों के किनारे डी.डी.टी.का छिड़काव व चूना डलवाना, कूड़ा-करकट हटवाना तथा रोगों से बचाव हेतु टीके लगवाना आदि हैं।
. परिवार नियोजन केन्द्र देश के लगभग सभी गाँव, कस्बे तथा शहरों में परिवार नियोजन केन्द्र बनाए गए हैं, जहाँ जनसंख्या वृद्धि पर रोक लगाने सम्बन्धी जानकारी दी जाती है। अन्य संस्थाएँ स्वास्थ्य संगठनों में अन्य छोटी-बड़ी संस्थाएँ निम्नलिखित हैं।

⦁    प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र

⦁    मोबाइल अस्पताल

⦁    मातृ शिशु कल्याण केन्द्र

⦁    प्रसूति रक्षा केन्द्र

⦁    बाल शिशु रक्षा केन्द्र

⦁    औद्योगिक केन्द्र

राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय एवं गैर-सरकारी स्वास्थ्य संगठन

स्थानीय स्वास्थ्य संगठनों के अतिरिक्त कुछ राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय एवं गैर-सरकारी स्वास्थ्य संगठन भी हैं, जिनका सम्बन्ध स्वास्थ्य शिक्षा से है। इनमें विश्व स्वास्थ्य संगठन,यूनीसेफ, केयर, रेडक्रॉस सोसायटी तथा खाद्य एवं कृषि संगठन प्रमुख हैं, जो निम्न हैं।

1. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) यह संगठन विश्वभर में स्वास्थ्य रक्षा हेतु विशेष लोगों को प्रशिक्षण देता है, जिससे स्वास्थ्य रक्षा के कार्यों में सहायता मिले। यह अपने दस्यदेशों को उनके स्वास्थ्यसेवाओं, शोध व स्वास्थ्य कार्यक्रमों का विकास में प्रोत्साहन देता है।

2.यूनिसेफ (UNICEF) यह संस्था संयुक्त राष्ट्र संघ के सहयोग सेवर्ष 1946 में स्थापित की गई। इस संस्था के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं।
⦁    माताओं व शिशुओं को रोगों से बचाना
⦁    बच्चों की शिक्षा, पोषण व स्वास्थ्य सम्बन्धी सहायता देना
⦁    विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ मिलकर स्वास्थ्य व सुरक्षा केसन्दर्भ में कार्य करना।

3. केयर (CARE) यह संस्था बालकों की पोषण सम्बन्धी सभी आवश्यकताओं को पूर्ण करने हेतु समाधान करती है।

4. रेडक्रॉस सोसायटी (Red Cross Society) यह स्वास्थ्य सम्बन्धी एक स्वतन्त्र संगठन है, जो लगातार अपनी सेवाएँ देता है।

5. खाद्य एवं कृषि संगठन यह संस्था संयुक्त राष्ट्र संघ की एक शाखा है। यह संस्था मनुष्य के सामाजिक स्तर को बढ़ाने का कार्य, पोषण की सुविधा देने तथा ग्रामीण लोगों कीदशा सुधारने का कार्य करती है। इन सभी संगठनों ने स्वास्थ्य के नियमों में सुधार लाने के सुधारात्मक आन्दोलन चलाए हैं, जिससे जनसुरक्षात्मक कार्यों में वृद्धि हुई है।

31.

सरकारी स्वास्थ्य विभाग द्वारा कौन-कौन सी संस्थाएँ संचालित होती हैं? संक्षेप में समझाइए।

Answer»

देश में स्वास्थ्य शिक्षा से सम्बन्धित जागरूकता लाने के लिए सरकार द्वारा वर्ष | 1956 में केन्द्रीय स्वास्थ्य मन्त्रालय के अन्तर्गत केन्द्रीय स्वास्थ्य ब्यूरो की स्थापना की गई, अन्य संस्थाएँ निम्नलिखित हैं।

1. केन्द्रीय स्वास्थ्य संगठन केन्द्रीय स्वास्थ्य ब्यूरो का गठन वर्ष 1957 में किया गया, जिसमें स्वास्थ्य शिक्षा का प्रचार करने के लिए तीन अलग-अलग विभाग बनाए गए।

⦁    प्राथमिक स्कूलों के लिए कार्य करने वाले
⦁    माध्यमिक विद्यालयों के लिए।
⦁    शिक्षा प्रशिक्षण विद्यालयों के लिए

2. राज्य स्वास्थ्य विभाग वर्ष 1959 में केन्द्रीय स्वास्थ्य मन्त्रालय के प्रस्ताव से 13 राज्यों में राज्य स्वास्थ्य ब्यूरो स्थापित किए गए, जिनके मुख्य कार्य हैं।

⦁    चिकित्सालय परिवार नियोजन केन्द्र तथा स्वास्थ्य केन्द्र स्थापित करना।
⦁    स्वास्थ्य शिक्षा हेतु राष्ट्रीय कार्यक्रम चलाना।
⦁    क्षेत्र विकास खण्डों में स्वास्थ्य केन्द्र स्थापित करना।

3. जिला स्वास्थ्य विभाग प्रत्येक जिले में एक स्वास्थ्य विभाग होता है तथा नगर के सभी अस्पताल इसी के अन्तर्गत आते हैं

4. नगर परिषद् स्वास्थ्य विभाग इस विभाग का मुख्य कार्य नगर में फैलने वाली बीमारियों को रोकना है। यह विभाग नगर में स्वास्थ्य सुरक्षा के कार्य करता है; जैसे-साफ-सफाई, शुद्ध पेयजल, संक्रामक रोगों की रोकथाम आदि।
 

32.

राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं के नाम बताइए, जो जनस्वास्थ्य के कार्यक्रमों में सहायक हैं।

Answer»

जनस्वास्थ्य से सम्बन्धित संस्थाए निम्नलिखित हैं- विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), यूनीसेफ (UNICEF), केयर (CARE) तथा रेडक्रॉस सोसायटी (Red Cross Society) आदि।

33.

स्वास्थ्य शिक्षा किसे कहते हैं?

Answer»

जन सामान्य को स्वास्थ्य के सभी पहलुओं से अवगत कराना ही स्वास्थ्य शिक्षा कहलाती है। यह एक ऐसा साधन है, जिससे कुछ विशेष शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों की सहायता से लोगों को स्वास्थ्य सम्बन्धी ज्ञान तथा व्याधियों से बचने के उपायों का प्रसार किया जा सकता है।

34.

केन्द्रीय स्वास्थ्य ब्यूरो की स्थापना कब की गई?

Answer»

देश में स्वास्थ्य शिक्षा से सम्बन्धित जागरूकता लाने के लिए सरकार द्वारा वर्ष 1956 में केन्द्रीय स्वास्थ्य मन्त्रालय के अन्तर्गत केन्द्रीय स्वास्थ्य ब्यूरो की स्थापना की गई।

35.

यूनिसेफ का मुख्य कार्यालय है  (a) पेरिस में(b) न्यूयार्क में(C) टोकियो(d) हनोई में

Answer»

(b) न्यूयार्क में

36.

परिवार नियोजन केन्द्रों में किस सन्दर्भ में जानकारी दी जाती(a) बाल शिशु सुरक्षा(b) प्राथमिक चिकित्सा(c) जनसंख्या वृद्धि(d) मातृ शिशु सुरक्षा

Answer»

(c) जनसंख्या वृद्धि

37.

स्वास्थ्य शिक्षा में सहायक संस्थाएँ मानी जाती हैं(a) परिवार(b) विद्यालय(c) नगर निगम(d) ये सभी

Answer»

सही विकल्प है (d) ये सभी

38.

विवाह की विशेषताओं में शामिल हैं।(a) आर्थिक सहयोग(b) वैघ सन्तानोत्पत्ति का माध्यम(c) धार्गिक एवं सामाजिक उद्देश्यों की पूर्ति(d) उपरोक्त सभी

Answer»

(d) उपरोक्त सभी

39.

अनुलोम विवाह में लइका विन्स कुत से सम्वन्ध रखता है?(a) उच्च(b) निम्न्(c) उच्च या निम्न में से कोई भी(d) इनमें से कोई नहीं

Answer»

सही विकल्प है (a) उच्च

40.

अन्तर्विवाह का आशय है।(a) अपने समूह में विवाह करना(b) समूह से बाहर विवाह ‘ना।(c) गाँव की सीमा से बार विवाह करना(d) जमरो में से कोई नहीं ।

Answer»

(a) अपने समूह में विवाह करना

41.

विवाह सम्वन्धी वैधानिक योग्यताओं में ब्रिटिश काल के अधिनियमों की विवेचना कीजिए।

Answer»

विवाह नामक संस्था प्रत्येक काल में देखने को मिलती है। यद्यपि इसका स्वरूप समय के अनुसार बदला रहा हैं। विशाह से सन्त अधिनियम भी बनाए गए, जिनमें ब्रिटिश काल में बने अधिनियम तथा स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् सरकार द्वारा बनाए गए अधिनियम महत्वपूर्ण हैं। ब्रिटिश काल के विवाह सम्बन्धी वैधानिक प्रमुख अधिनियम इस प्रकार से है।

1. सती–प्रथा निषेध अधिनियम 1829 (Regulation o. XVII, 1529) 1829 से पूर्व भारत में सती–प्रथा का प्रचलन था। एक ओर हिन्दुओं में बाल-विवाह का प्रचलन था और दूसरी ओर विधवा हो जाने पर स्त्रियों पति के साथ चिता में जल जाने के लिए मजबूर किया जाता था। उन्हें यह प्रलोभन दिया जाता था कि सती होने पर स्वर्ग मिलेगा। कई बार तो विधवाओं को जबरन मृत पति के साथ सती होने के लिए मजबूर किया जाता था और चिता में पकेल दिया जाता था। इस अमानुषिक प्रथा को समाप्त करने के लिए राजा राममोहन राय जैसे समाज सुधारको कठोर परिश्रम और आन्दोलन किया और उनके प्रयासों से 1829 में सती–प्रथा निषेध अपिनियम बना।

2. हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1858 (Hindu Widow marriage Act, 1866) 155 से पूर्व विधाओं को न तो पुननिता को स्वीकृति पी और न उन्हें अपने मूत पति को सम्पनि में कोई असर हो बाल-विवाह एवं बेमेल विवाह के कारण सत्र में विधवाओं की संख्या बढ़ गई थी त उनको दशा बड़ी दयनीय पी। कई विपाएँ तो धर्म परिवर्तन कर मुसलमान या ईसाई बन गई दी। आर्य सामान, ब्रहा सगाज, ईश्वरचन्द्र मिशागर राममोहन राय ने सरकार का इस समस्या की ओर ध्यान आकर्षित किया। इनके प्रयासों से 186 में हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम बना। इस अधिनियम द्वारा हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम बना। इस अधिनियम द्वारा हिन्दु विषयाओं के पुनर्विवाह को कानूनी बाधाओं को समाप्त कर दिया गया।

3. बाल-विवाह निरोधक अधिनियम, 1121 Child Murriat kaistraint Act, 1929 1929 बाल-विवाह रोकने का अधिनियम पारित किया गया। यद्यपि इससे पूर्व भो छोटे छोटे बच्चों के विवाह पर रोक लगाने के लिए 100 1 1881 में यह अधिनियम पारित का विवाह की आयु सङ्गकियों के लिए मशः 10 तथा 12 वर्ष कर दी गई थी, किन्तु 1929 में हरविलास शारदा के प्रयत्नों से बाल-विवाह विरोधक अधिनियम पारित हुआ, जिसे ‘शरदा एक्ट’ के नाम से भी जाना जाता हैं। इस अधिनियम को मुख्य बातें इस प्रकार है-इस अधिनियम के अनुसार विवाह के समय तड़के की आयु 18 वर्ष तथा सड़कों की आयु 15 वर्ष होनी चाहिए। इससे कम आयु के बिगह को बात-वि। माना जाएगा, कना या पनि बाल-विवाह को रोकने में अधिक सफल नहीं रहा। 1978 में इस अधिनियम में शोपन कर दिया गया। यह अधिनियम अन्य बाल-विवाह निरोधक (संशोधित) अधिनियम 1978 के नाम से जाना जाता है। इस नियम के अन्तर्गत सड़कों के लिए 1 का न्यूनतम आयु 21 वर्ष और सकियों के लिए न्यूनतम आयु 18 वर्ष कर दी गई।

4. हिन्दू स्त्रियों को सम्पत्ति पर अधिकार अधिनियम, 1937 (Hindu Wom Rigtit to EProperty Act, 1937) हिन्दू स्त्री के विधवा होने पर मृत पति की सम्पत्ति में अधिकार प्रदान करने की दृष्टि से 1837 में यह अधिनियम पारित किया। गया है।

5. अलग रहने और भरण-पोषण हेतु स्त्रियों को अधिकार अधिनियम, 1946 इस अधिनियम के अनुसार हिन्दू स्त्रियों को कुछ परिस्थितियों में पति से अलग रहने पर। भरण-पोषण के अधिकार प्राप्त होते हैं। जौ को पाण-पोषण का अधिकार तभी मिलेगा जब

⦁    ति किसी ऐसे घृणित रोग से पीड़ित हो जो उसे पत्नी के संसर्ग से न हुआ हो।

⦁    पति निर्दयता का व्यवहार करता हो अथवा पत्नी पति के साथ रहना। खतरनाक समझी हो।

⦁    पत्नी को उसके पति ने छोड़ हो।

⦁    पति ने दूसरा विवाह कर लिया हो।

⦁    पति ने धर्म परिवर्तन का लिया हो।

⦁    पति किसी अन्य स्त्री से सम्बन्ध राखता हो।

विवाह के जीवशास्त्रीय योग्यताएँ

बियाह के लिए जीवशास्त्रीय योग्यताएँ निम्नलिखित हैं

⦁    विवाह से सम्बन्धित लड़का व लहको दोनों शारीरिक एवं मानसिक रूप से परिपक्व

⦁    लड़का एवं लड़की दोनों की आयु 18 अर्ष हों।
⦁    विवाह में जाति वन्धन अनिवार्य नहीं है।
⦁    जैविक रूप से लड़का एवं सड़की दोनों ही 18 वर्ष की आयु में विवाह के योग्य हो जाते हैं। अतः जैविक रूप से आयु को वन्धन नहीं माना जाता हैं।

42.

विवाह के प्रतिबन्धों में अन्तर्विवाह का क्या आशय है? इसके कारण और प्रभाव बताइए।

Answer»

विवाह के प्रतिवन्धों में अन्तर्विवाह अन्तर्विवाह का तात्पर्य हैं एक व्यक्ति अपने जीवन साथी का चुनाव अपने ही समूह से करे। इसे परिभाषित करते हुए रियर्स ने लिखा है, “अनार्यवाह से अभिप्राय उन विनिमय से है, जिसमें अपने समूह में से ही विवाह कमायो चुनना अनिवार्य होता है।”

वैदिक एवं उतरवैदिक काल में द्विजों (ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य) का एक ही वर्ग वा और द्विज वर्ग के लोग अपने य (द्विज) में ही विवाह करते थे। शत्र वर्ग पृथक् था। स्मृतिकाल में अन्तर्षियाहों को स्पीकृति प्रदान की गई थी, लेकिन जब एक वर्ण कई जातियों एवं उपजातियों में विभक्त हुआ तो विवाह का दायरा सौमित होता गया और लोग अपनी जाति एवं उपजाति में विवाह करने लगे, इसे ही अन्तबिंबाह माना जाने लगा। 
कुछ उपजातियों में ‘गोल’, ‘एकड़ा’ आदि हैं, जो चुनाव के क्षेत्र को एक स्थानीय सीमा तक संवित कर देते हैं। वर्तमान समय में एक व्यक्ति अपनी ही जाति, उपजाति, प्रजाति, धर्म, क्षेत्र, भषा एवं वर्ग के सदस्यों से ही विवाह करता है। केतकर के अनुसार कुछ हिन्दु जातियाँ ऐसी हैं, जो पन्द्रह परिवारों के बाहर विवाह नहीं करतीं।
अन्तर्विवाह के कारण विवाह के क्षेत्र को इस प्रकार पॉम्ति करने के अनेक सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारक रहे हैं। इनमें प्रमुख कारक निम्नलिखित है

⦁    अन्तर्रजातीय मिश्रण को रोकने के लिए अन्तर्वर्ण विवाहों पर प्रतिबन्ध लगाए गए। विशेषतः आर्य एवं इविड़ प्रजातियों के बीच रस्त मिश्रण को रोकने के लिए ऐसा किया गया।

⦁    प्रत्येक जाति और उपजाति अपनी सांस्कृतिक विशेषता को बनाए रखना चाहती थी, अल; न्। अ चाह पर बल दिया।

⦁    जैन एवं बौद्ध धर्म में शिथिलता आने से ब्राह्मणों ने अपनी लोई प्रतिष्ठ को पुनः प्राप्त करने के लिए कठोर जातीय नियम बनाए।

⦁    मध्य युग में बाल विवाह में वृद्धि के कारण जातीय नियमों पर बल दिया आने लगा।

⦁    प्रत्येक गति का एक परम्परात्मक व्यवसाय पाया जाता है। अपने व्यावसायिक ज्ञान को गुप्त रखने की इच्छा ने भी अन्तर्निवाह को प्रोत्साहित किया।

अत्तर्विवाह का समाज पर प्रभाव

अन्तर्विवाह में समाज पर निम्नलिखित प्रभाव दिखाई दिए

⦁    इससे लोगों के सम्पर्क का दायरा समंत हो गया, जिससे उपयुक्त वर-वधु चुनने में ना आने लगी।

⦁    संकीर्णता की भावना पनपी, शारिक मृणा, द्वेष एवं कटुता में वृद्धि हुई।

⦁    क्षेत्रोक्ता की भावना उत्पन हुई, जातिवाद बढ़ा।

⦁    व्यावसायिक ज्ञान एक समूह तक ही सीमित हो गया।

⦁    इससे समाज की प्रगति में अवर-द्धता आई।

43.

विवाह की शारीरिक योग्यताओं को बताइट।

Answer»

विवाह की शारीरिक योग्यताएँ निम्नलिखित हैं।

⦁    विवाह की आयु विवाह का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि विशाह के समय वर एवं वम् की आयु परिपक्व होनी चाहिए। हिन्दू धर्म-शास्त्रों में विवाह की आयु को लेकर मतभेद पाया जाता है। वैदिक युग में 15 या 18 वर्ष की कन्या और 30 वर्ष के लड़के का विवाह होता था। गृहसूत्र में ‘नॉमिका’ अथवा ‘ननिका’ के क्विाह का सुझाव दिया गया है। 4 से 12 वीं की कन्या को ‘नन्का ‘ कहा गया है। वर्तमान में एक निश्चित आयु प्राप्त करने के पश्चात् ही वैधानिक रूप से उपयुक्त माना जाता है।

⦁    स्वास्थ्य विवाह के पश्चात् दम्पत्ति को सन्तान उत्पत्ति के दायित्व का निर्वहन सना होता है, इसलिए दोनों का स्वस्थ होना अनिवार्य है। स्वास्थ्य खराब होने की स्थिति में परेशानी हो सकती हैं।

⦁    संक्रामक रोग विवाह संक्रामक रोगों की जांच करके ही करना चाहिए, क्योकि पति-पत्र दोनों में तो किसी एक को भी यदि कोई संक्रामक रोग होता है तो विष पश्चात् एक-दूसरे को भी हो सकता है। इसके अतिरिक्त रात्र को भी वह रोग हो जाता है।

⦁    प्रजनन सम्वन्धी रोग पति-पत्नी में से कोई भी यौन रोग आदि का शिकार नहीं होना चाहिए। इससे पारिवारिक स्थिति दु:खद होने के साथ ही सन्तान प्राप्ति का लक्ष्य पूरा होने में बाधाएँ आ सकता है। अत: दोनों संतान उत्पत्ति के योग्य हों और प्रजनन सम्बन्धी उत्तम स्वास्थ्य रखते हों।

⦁    मानसिक रोग मानसिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ होना भी विवाह का एक आवश्यक पास है। इसके अन्त में धात्य और कष्टमय हो सकता है। दोनों में से किसी को भी कोई अंग विकार नहीं होना चाहिए।

44.

गोत्र शब्द के अर्थ हैं।(a) गौशाता(b) मा क गर(c) किना या पर्गत में सभी(d) ये सभी

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सही विकल्प है (d) ये सभी

45.

प्रतिलोम विवाह क्या है?

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प्रतिलोम विवाह अनुलोम विवाह का विपरीत रुप प्रतिलोम विवाह है। इस प्रकार के विवाह में लड़को उच्च वर्ण, आति, उपजाति, कुल या वेश की होती है और लड़का निम्न वर्ण, जाति, उपजाति, कुल या वंश का होता है। इसे परिभाषित करते हुए कपाडिया लिखते हैं, “एक मि पण के व्यक्ति का जय वर्ग को स्त्री के साक्ष वितार प्रतिलोम कालात का।” उदाहरण के लिए, यदि एक ब्राह्मण सड़की का विवाह किसी क्षत्रिय, वैश्य अपणा शूद्र सड़के से होता है, तो ऐसे विवाह को प्रतिलोम विवाह कहा जाता है। इस प्रकार के विवाह में स्त्री की स्थिति निम्न हो जाती है। स्मृतिकारों ने ऐसे विवाह को क्यु आलोचना की है। ऐसे विवाह को पन मान को ‘चाहत’ अथवा ‘निषाद कहा जाता हो। दू विवाह वैधता अधिनियम, 11 एवं हिन्दू विवाह अधिनियम, 1965 में अनुलोम एवं प्रतिलोम विवाह दोनों को ही वैध माना गया है।

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उसी मेयर ने विवाह को किस प्रकार परिभाषित किया है?

Answer»

लुसी मेयर ने विवाह को परिभाषित करते हुए लिखा है कि विवाह स्त्री-पुरुष का ऐसा योग है, जिससे जमी सन्तान वैध मानी जाती है।

47.

बहिर्विवाह के विभिन्न स्वरूपों का उल्लेख कीजिए।

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बहिर्विवाह से तात्पर्य है एक व्यक्ति जिस समूह का सदस्य है उससे बाहर विवाह करे। रिवर्स के अनुसार विवाह वह विनिमय है, जिसमें एक सामाजिक समूह के सदस्य के लिए यह अनिवार्य होता है कि वह दूसरे सामाजिक समूह से अपने जीवनसाथी का चुनाव करे। हिन्दुओ में बहिर्विवाह के नियमानुसार एक व्यक्ति को अपने परिवार, गोत्र, प्रर, पिण्ड आदि समूहों से बाहर विवाह करना पड़ता है। जनजातियों में एक ही टोटम को मानने वाले मोगों को भी परस्पर विवाह करने की मनाही हैं। हिन्दुओं में प्रचलित बहिर्विवाह के विभिन्न स्वरूप निम्नलिखित है।

1. गोत्र बहिर्विवाह हिन्दुओं में सगोत्र विवाह निषेध हैं। गोत्र का सामान्य अर्थ उन व्यक्तियों के समूह से है, जिनकी उत्पत्ति एक आणि पर्यज से हुई हो। सवाषाड़ हिरण्यकेशी औतसूत्र के अनुसार, विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप और गस्त्य नामक आठ ऋषियों को सन्तानों को गोत्र के नाम से पुकारा गया।
गोत्र शब्द के तीन या चार अप हैं; जैसे- गौशाला, गाय का समूह, किला तया पर्वत। गोत्र का शाब्दिक अर्थ अर्थात् गायों के बांधने का स्थान (गौशाला या धावा) अथवा गौपालन करने वाले समूह में है। जिन लोगों की गाएँ एक स्थान पर बैधती थी, उनमें नैतिक सम्बन्ध बन आते थे और सम्पतः ये रक्त सम्बन्की भी होते थे, अत; वे परस्पर विवाह नहीं करते थे। विज्ञानेश्वर ने क्षेत्र का अर्थ स्पष्ट करते हुए कहा है कि वंश-परम्परा में जो नाम प्रसिद्ध होता है, उसी को गोत्र कहा जाता है। इस प्रकार एक गोत्र के सदस्यों द्वारा अपने गोत्र से बाहर विवाह करना ही गोत्र बहिनिंबाह कहलाता है।

2. सप्रवर बहिर्विवाह गोत्र से सम्बन्धित ही एक शब्द है प्रगार’ जिसका वैदिक इण्डेक्स के अनुसार शाब्दिक अर्थ है ‘आह्वान करना। (invitation Summon) कर्वे के अनुसार, “श्वर का अर्थ क्षत्रियों में गभग वंशकार वा कुलकर की तरह ही है। प्रवर का अर्थ है ‘महान् (Great on) आहाण लोग हवन-यज्ञ आदि के समय गोत्र व अंशकार के नाम का उच्चारण करते थे। इस अर्थ में प्रवर का तात्पर्य ‘श्रेष्ठ (The Excellent 00) से था। इस प्रकार समान पत्र और अमान मषियों के नाम का अरण करने वाले यति अपने को एक ही प्रवर से सम्बद्ध मानने लगे। एक प्रवर के व्यक्ति अपने को सामान्य आणि पूर्वजों से संस्कारात्मक एवं आध्यात्मिक रूप से सम्बन्धित मानते हैं, अतः वे परस्पर विवाह नहीं करते। हो,कपाडिया लिखते हैं, “प्रवर संस्कार अथवा ज्ञान के उस समुदाय की ओर संकेत करता है, जिसमें एक व्यक्ति सम्बन्धित होता है।” प्रवर आध्यात्मिक दृष्टि से परस्पर सम्बन्धित लोगों के समूह की ओर संकेत करता है न क र जान्थयों की ओर। हिन्दू विवाह अधिनियम द्वारा ‘सप्रखर विवाह सम्बन्धी निषेधों को समाप्त कर दिया गया है ।

3. सपिण्ड हेर्षियाहू सवर और सगोत्र बहिर्विवाह के नियम पिच पक्ष के । सम्यन्मियों में विवाह की स्वीकृति नहीं देते। सपिण्ड विषङ्ग निषेध के नियम मातृ एवं पितृ पक्ष की कुछ पीढ़ियों में विवाह पर रोक लगाते हैं। इरावती – कर्वे सपिण्हता का अर्थ बताती है स + पिण्ड (Together + thall of rice, abody) अर्थात् मृत व्यक्ति को पिण्ड दान देने वाले या उसके रक्त कण से सम्बन्धित लोग। स्मृति में सपिण्ड का प्रयोग दो अर्षों में हुआ है-

⦁    वे सभी व्यक्ति सपिण्डी है, जो एक व्यक्ति को पिण्ड दान करते हैं

⦁    मिताक्षरा के अनुसार वे सभी व्यक्ति जो एक ही शरीर में पैदा हुए हैं,

पिता और पुत्र सपिण्डी हैं, क्योंकि पिता के शरीर के अवयव पुत्र में आते हैं। इसी प्रकार से माँ व सन्ताने, दादा-दादी एवं पोते भी सपिण्ड हैं। सपिण्ड विवाह भी निषिद्ध रहे हैं। रामायण एवं महाभारत काल में सपिण्डता का निदम एक स्थान पर निवास करने वाले पितृपय लोगों पर लागू होता था। मध्ययुगीन टोकाकारों के अनुसार पिता की ओर से सात व माता की ओर से पाँच पीदियों में विवाह नहीं किया जाना चाहिए। हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 ने सपिण्ड बहिर्निवाह को मान्यता प्रदान की हैं। माता एवं पिता दोनों पक्षों से तीन तीन पीदियों के सपिडियों में परस्पर विवाह पा रोक लगा दी गई है। फिर भी यदि किमी मह व प्रथा अपना परम्परा इसे निषिद्ध नहीं है, तो सा विवाह भी वैध माना।

4. ग्राम बहिर्विवाड़ उत्तर भारत और प्रमुखत: पंजाब एवं दिल्ली के आस-पास यह नियम है कि एक व्यक्ति अपने ही गांव में विवाह नहीं करेगा। पंजाब में तो उन गाँवों में भी विवाह करने की मनाही है, जिनकी सीमा व्यक्ति के गाँव को सीमा को सूती हो। इस प्रकार के खिलाह का कारण गाँव की जनसंख्या का सीमित होना, उसमें एक ही गोत्र, वंश अथवा परिवार के सदस्यों का निवास होना, आदि रहे हैं। सगोत्री एवं सपड़ियों से विवाह के निषेध के कारण हो ऐसे विवाह प्रक्ष में आए। गांवों में इस प्रकार के विड़ को खेड़ा बहिर्नियाह’ के नाम से जाना जाता है।

5. टोटम बहिर्विवाह इस प्रकार के विवाह का नियम भारतीय जनजातियों में प्रचलित है। टोटम कोई भी एक पशु, पक्षी, पेड़-पौधा अथवा निर्जीव वस्तु हो सकती है, जिसे एक गोत्र के लोग आदर एवं श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं, उससे अपना आध्यात्मिक सम्बन्ध जोड़ते हैं। एक गोत्र का एक टोटन होता है और एक टोटम को मानने से परस्पर भाई-बहन समझे जाते हैं, अत: वे परस्पर विवाह नहीं कर सकते।

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ग्राम बहिर्विवाह का प्रचलन किन क्षेत्रों में पाया जाता है? गाँवों में ये क्या कहलाते हैं?

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शाम बहिर्विवाह का प्रचलने उत्तरी भारत और पुतः पंजाब एवं दिल्ली के आस-पास है। गाँवों में इस प्रकार के विवाह को ‘खेड़ा बहिर्विवाह के नाम से जाना जाता है।

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बहिर्विवाह से क्या तात्पर्य है?

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बहिर्विवाह से तात्पर्य है एक व्यक्ति जिस समूह का सदस्य है इससे बाहर विवाह को अद। म विवाह में परिवार, गोत्र, प्रर, पिण्ड शम, डोटम आदि में चार विवाह करना पड़ता है।

50.

अनुलोम विवाह किस प्रकार सम्पन्न किया जाता है?

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जब एक उच्च वर्ण, जाति, उपजाति, कुल एवं गोत्र के लड़के का विवाह ऐसी हड़की से किया जाए, जिसका वर्ण, जाति, उपजात, कुल लड़के से नीचा हो तो ऐसे विवाह को अनुलोम विवाह कहते हैं। अन्य शब्दों में, इस प्रकार के विवाह में लड़का उच्च सामाजिक समूह का होता है और लड़की निम्न सामाजिक समूह को। उदाहरण के लिए, एक प्राण लवे का विवाह एक अत्रिय या वैश्य लड़की से होता है, तो इसे हम अलोम विवाह कहेंगे। वैदिककाल से लेकर स्मृतिकाल तक अनुलोम विवाहों का प्रचलन रहा है। मनुस्मृति में लिखा है कि एक ब्राह्मन को अपने से मि तन व अत्रिय, वैश्य एवं शुद की कन्या से, क्षत्रिय को अपने से निम दी य वैश्य एवं शूद से और वैश्य अपने वर्ग के अतिरिक्त शुद्र कन्या से भी विवाह कर सकता है, किन्तु मनु नपण संस्कार करने की स्वीकृति के गवर्ण विवाह के लिए ही देते हैं। याङ्गषम्य ने ब्राह्मण को चार, क्षत्रिय को तीन, वैश्य को दो एवं शूद्र को एक विवाह करने की बात कही है।