This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.
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प्रदूषण क्या है ? गंगा का प्रदूषण आज की भीषण समस्या है । इसको रोकने के लिए क्या-क्या विधियाँ अपनाई जानी चाहिए ? |
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Answer» Answer: |
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जल संग्रहण क्या है ? इसको किस प्रकार से उपयोग में लाकर मनुष्य को, जन्तुओं को तथा वनस्पतियों को लाभ पहुँचा सकते हैं ? |
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Answer» आप यह जानते हैं कि सभी जीव-जन्तुओं को जीवित रहने के लिये पानी और ऊर्जा दोनों की आवश्यकता होती है। आपने यह भी जान लिया है कि जल और ऊर्जा की बढ़ती कमी विकास और प्रगति, दोनों को सीमित करती है। मानव जाति ने जल संपदा के अत्यधिक दोहन द्वारा जल की उपलब्धता ही कम कर दी है। समुद्र, नदियों व तालाबों जैसे प्राकृतिक निकायों को प्रदूषित कर दिया है जिससे पानी काम में लाने योग्य ही नहीं है। जल और ऊर्जा जैसे दो बुनियादी साधनों की बढ़ती समस्या को केवल समझ बूझ से प्रयोग और प्रभावशाली संरक्षण द्वारा हल किया जा सकता है। इस पाठ में आप जल एवं ऊर्जा के संरक्षण के विषय में जानकारी प्राप्त करेंगे। |
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अपने निवास क्षेत्र के आस-पास जल संग्रहण की परंपरागत पद्धति का पता लगाइए । |
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अपने क्षेत्र में जल के स्रोत का पता लगाइए । क्या इस स्रोत से प्राप्त जल उस क्षेत्र के सभी निवासियों को उपलब्ध है ? |
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Answer» Answer: There are two main SOURCES of water: surface water and groundwater. Surface Water is FOUND in LAKES, rivers, and reservoirs. Groundwater LIES under the surface of the land, where it travels through and FILLS openings in the rocks. The rocks that store and transmit groundwater are called aquifers. Explanation: There are two main sources of water: surface water and groundwater. Surface Water is found in lakes, rivers, and reservoirs. Groundwater lies under the surface of the land, where it travels through and fills openings in the rocks. The rocks that store and transmit groundwater are called aquifers. |
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विभिन्न प्राकृतिक संसाधन कौन-से हैं ? |
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Answer» बिभिन्न प्राकर्तिक संसाधन है जो हम अपने जीवन में प्रकर्ति से ग्रहम करते ह जैसे के लकड़ी, कोयला, खनिज पदार्थ आदि/ |
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अमृता देवी विश्नोई राष्ट्रीय पुरस्कार क्यों दिया जाता है ? |
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Answer» अमृता देवी बिश्नोई वन्यजीव सुरक्षा पुरस्कार अमृता देवी बिश्नोई वन्यजीव सुरक्षा पुरस्कार भारत सरकार द्वारा प्रदान किया जाता है। यह पुरस्कार वन्यजीव सुरक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए दिया जाता है, जिसे वन्यजीव सुरक्षा के लिए अनुकरणीय साहस दिखाने या अनुकरणीय कार्य करने के रूप में मान्यता प्राप्त है। |
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कोलिफॉर्म समूह है (क) विषाणु का (ख) जीवाणु का (ग) प्रोटोजोआ का (घ) इनमें से कोई नहीं |
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Answer» ANS: (ख) सही है! |
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खाद्य-श्रृंखला को एक स्थलीय पारितंत्र के उदाहरण से स्पष्ट कीजिए । |
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Answer» खाद्य शृंखला में पारिस्थितिकी तंत्र के विभिन्न जीवों की परस्पर भोज्य निर्भरता को प्रदर्शित करते हैं। किसी भी पारिस्थितिकी तंत्र में कोई भी जीव भोजन के लिए सदैव किसी दूसरे जीव पर निर्भर होता है। भोजन के लिए सभी जीव वनस्पतियों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निर्भर होते हैं। वनस्पतियां अपना भोजन प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा बनाती हैं। इस भोज्य क्रम में पहले स्तर पर शाकाहारी जीव आते हैं जो कि पौधों पर प्रत्यक्ष रूप से निर्भर होते हैं। इसलिए पौधों को उत्पादक या स्वपोषी और जन्तुओं को 'उपभोक्ता' की संज्ञा देते हैं। |
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जैव निम्नीकरण एवं अजैव निम्नीकरण से आप क्या समझते हैं ? इससे पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का वर्णन कीजिए । |
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Answer» जैव-निम्नीकारक प्लास्टिक ऐसे प्लास्टिक होते हैं, जो पर्यावरण में प्राकृतिक वायुजीवी (खाद) तथा अवायुजीवी (कचरा) के रूप में अपघटित हो जाते हैं। प्लास्टिक का जैव-निम्नीकरण, पर्यावरण में सूक्ष्मजीवों को सक्रिय कर संपन्न किया जा सकता है, जो प्लास्टिक झिल्लियों की आण्विक संरचना के उपापचय द्वारा एक खाद सदृश मिट्टी वाले अक्रिय पदार्थ का निर्माण करते हैं और पर्यावरण के लिए कम हानिकारक होते हैं। वे जैव-प्लास्टिक अथवा ऐसे प्लास्टिक से बने होते हैं, जिनके घटक नवीकरणीय कच्ची सामग्रियों, या किसी अतिरिक्त पदार्थ के मिश्रण वाले पेट्रोलियम-आधारित प्लास्टिक से निर्मित होते हैं। फैलाव वाले कारकों के मिश्रणयुक्त जैव-सक्रिय यौगिक के प्रयोग से यह सुनिश्चित होता है कि जब वे ताप तथा नमी के संपर्क में आते हैं तो प्लास्टिक अणुओं की संरचना को प्रसारित कर देते हैं और जैव-सक्रिय यौगिकों को प्लास्टिक के उपापचय तथा उदासीनीकरण के लिए प्रेरित कर देते हैं। जैव-निम्नीकारक प्लास्टिक विशेष रूप से दो रूपों में निर्मित किए जाते हैं: इंजेक्शन मोल्डेड (ठोस, 3D आकार), जो इस्तेमाल के बाद फेंक दी जाने वाली खाद्य सेवा वस्तुओं में होते हैं, तथा झिल्ली (फ़िल्म), जो विशेषकर जैविक (ऑर्गेनिक) फल पैकेजिंग तथा पत्तियां और घास के कतरनों के लिए संग्रह करने वाले थैलों एवं अधसड़ी कृषि घास-फूसों में इस्तेमाल होते हैं। |
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भूमण्डलीय ऊष्मायन के लिए उत्तरदायी चार कारकों का उल्लेख कीजिए । |
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पारितंत्र से आप क्या समझते हैं ? इसके प्रमुख घटकों का वर्णन कीजिए । |
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Answer» Answer: Explanation: 1. पारिस्थितिक-तंत्र का अर्थ (Meaning of Ecosystem): संपूर्ण पृथ्वी अर्थात् स्थल, जल एवं वायु मण्डल और इस पर निवास करने वाले जीव एक विशिष्ट चक्र अथवा प्रणाली या तंत्र में परिचालित होते रहते हैं और प्रकृति या पर्यावरण के साथ अपूर्व सामंजस्य स्थापित करके न केवल अपने को अस्तित्व में रखते हैं अपितु पर्यावरण को भी स्वचालित करते हैं । इस प्रकार रचना एवं कार्य की दृष्टि से जीव समुदाय एवं वातावरण एक तंत्र के रूप में कार्य करते हैं, इसी को ‘इकोसिस्टम’ अथवा पारिस्थितिक-तंत्र के नाम से संबोधित किया जाता है । प्रकृति स्वयं एक विस्तृत एवं विशाल पारिस्थितिक-तंत्र है, जिसे ‘जीव एण्डल’ के नाम से पुकारा जाता है । संपूर्ण जीव समुदाय एवं पर्यावरण के इस अंतर्संबंध को ‘इकोसिस्टम’ का नाम सर्वप्रथम ए.जी. टेन्सले ने 1935 में दिया । उन्होंने इसे परिभाषित करते हुए लिखा- पारिस्थितिक-तंत्र वह तंत्र है जिसमें पर्यावरण के जैविक एवं अजैविक कारक अंतर्संबंधित होते हैं । टेन्सले से पूर्व एवं उनके समकालीन अनेक विद्वानों ने इसी प्रकार जीव-पर्यावरण संबंधों को विविध नामों से संबोधित किया जैसे 1877 में कार्ल मोबिअस ने ‘Bicoenosis’, एस.ए. फोरबेस ने 1887 में ‘Microcosm’, वी.वी. डोकूचेहव ने 1846-1903 में ‘Geobiocoenosis’, 1930 में फ्रेडरिच ने ‘Holocoen’, थियनेमान ने 1939 में ‘Bio SYSTEM’ आदि । किंतु इनमें सर्व स्वीकार शब्द ‘Ecosystem’ ही है । यह दो शब्दों से बना है अर्थात् ‘Eco’ जिसका अर्थ है पर्यावरण जो ग्रीक शब्द ‘Oikos’ का पर्याय है जिसका अर्थ है ‘एक घर’ और दूसरा ‘System’ जिसका अर्थ है व्यवस्था या अंतर्संबंध अथवा अंतर्निर्भरता से उत्पन्न एक व्यवस्था जो छोटी-बड़ी इकाइयों में विभक्त विभिन्न स्थानों में विभिन्न स्वरूप लिए विकसित पाई जाती है । इस तंत्र में जीव मण्डल में चलने वाली सभी प्रक्रियाएँ सम्मिलित होती हैं और मानव इसके एक घटक के रूप में कभी उसमें परिवर्तक या बाधक के रूप में कार्य करता पारिस्थितिक-तंत्र को स्पष्ट करते हुए मांकहॉउस और स्माल ने लिखा है- पादप एवं जीव जंतुओं या जैविक समुदाय का प्राकृतिक पर्यावरण अथवा आवास के दृष्टिकोण से अध्ययन करना । जैविक समुदाय में वनस्पति एवं जीव जंतुओं के साथ ही मानव भी सम्मिलित किया जाता है । इसी प्रकार के विचार पीटर हेगेट ने पारिस्थितिक-तंत्र को परिभाषित करते हुए लिखा है- ”पारिस्थितिक-तंत्र वह पारिस्थितिक व्यवस्था है जिसमें पादप एवं जीव-जंतु अपने पर्यावरण से पोषक चेन द्वारा संयुक्त रहते हैं ।” तात्पर्य यह है कि पर्यावरण पारिस्थितिक-तंत्र को नियंत्रित करता है और प्रत्येक व्यवस्था में विशिष्ट वनस्पति एवं जीव-प्रजातियों का विकास होता है । पर्यावरण वनस्पति एवं जीवों के अस्तित्व का आधार होता है और इनका अस्तित्व उस व्यवस्था पर निर्भर करता है जो इन्हें पोषण प्रदान करती है । स्थ्रेलर ने पारिस्थितिक-तंत्र की व्याख्या करते हुए लिखा है- ”पारिस्थितिक-तंत्र उन समस्त घटकों का समूह है जो जीवों के एक समूह की क्रिया-प्रतिक्रिया में योग देते हैं ।” वे आगे लिखते हैं- ”भूगोलवेत्ताओं के लिये पारिस्थितिक-तंत्र उन भौतिक दशाओं के संगठन का भाग है जो जीवन सतह (स्तर) का निर्माण करते हैं ।” 2. पारिस्थितिक-तंत्र के घटक (Components of Ecosystem): प्रत्येक पारिस्थितिक-तंत्र की संरचना दो प्रकार के घटकों से होती है: (अ) जैविक या जीवीय घटक, (ब) अजैविक (अ) जैविक या जीवीय घटक: जैविक या जीवीय घटकों को दो भागों में विभक्त किया जाता है: (i) स्वपोषित घटक: वे सभी जीव इसे बनाते हैं जो साधारण अकार्बनिक पदार्थों को प्राप्त कर जटिल पदार्थों का संश्लेषण कर लेते हैं अर्थात् अपने पोषण के लिये स्वयं भोजन का निर्माण अकार्बनिक पदार्थों से करते हैं । ये सूर्य से ऊर्जा प्राप्त कर प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया द्वारा अकार्बनिक पदार्थों, जल और कार्बन-डाई-ऑक्साइड को प्रयोग में लाकर भोजन बनाते हैं जिनका उदाहरण हरे पौधे हैं । ये घटक उत्पादक कहलाते हैं । ADVERTISEMENTS: (ii) परपोषित अंश: ये स्वपोषित अंश द्वारा पैदा किया हुआ भोजन दूसरे जीव द्वारा प्रयोग में लिया जाता है । ये जीव उपभोक्ता या अपघटनकर्त्ता कहलाते हैं । कार्यात्मक दृष्टिकोण से जीवीय घटकों को क्रमश: उत्पादक, उपभोक्ता और अपघटक श्रेणियों में विभक्त किया जाता है । a. उत्पादक: इसमें जो स्वयं अपना भोजन बनाते हैं, जैसे हरे पौधे वे प्राथमिक उत्पादक होते हैं और इन पर निर्भर जीव-जंतु एवं मनुष्य गौण उत्पादक होते हैं क्योंकि व पौधों से भोजन लेकर उनसे प्रोटीन, वसा आदि का निर्माण करते हैं । ADVERTISEMENTS: b. उपभोक्ता: ये तीन प्रकार के होते हैं: (i) प्राथमिक (PRIMARY)- जो पेड़ पौधों की हरी पत्तियाँ भोजन के रूप में काम लेते हैं, जैसे- गाय, बकरी, मनुष्य आदि । इन्हें शाकाहारी कहते हैं । (ii) गौण या द्वितीय (Secondary)- जो शाकाहारी जंतुओं या प्राथमिक उपभोक्ताओं को भोजन के रूप में प्रयोग करते हैं, जैसे- शेर, चीता, मेंढक, मनुष्य आदि । इन्हें मांसाहारी कहते हैं । (iii) तृतीय (TERTIARY)- इस श्रेणी में वे आते हैं जो मांसाहारी को खा जाते हैं, जैसे- साँप मेढ़क को खा जाता है, मोर साँप को खा जाता है । c. अपघटक: इसमें मुख्य रूप से जीवाणु तथा कवकों का समावेश होता है जो मरे हुए उपभोक्ताओं को साधारण भौतिक तत्वों में विघटित कर देते हैं तथा ये फिर से वायु मण्डल में मिल जाते हैं । (ब) अजैविक या अजीवीय घटक: इनको तीन भागों में बाँटा जाता है: (i) जलवायु तत्व- जैसे सूर्य का प्रकाश, तापक्रम, वर्षा आदि । (ii) कार्बनिक पदार्थ (ORGANIC MATTER)- जैसे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट आदि । (iii) अकार्बनिक पदार्थ (Inorganic Matter)- जैसे कैल्शियम, कार्बन, हाइड्रोजन, सल्फर, नाइट्रोजन आदि । |
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ओजोन परत हमारे लिए क्यों आवश्यक है ? |
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Answer» oozone lear is PROTECT earth and we from MANY harmful RAY's of SUN |
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ओजोन क्या है तथा यह किसी पारितंत्र को किस प्रकार प्रभावित करती है ? |
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Answer» Explanation: OZONE layer depletion make HOLE in earth surface DUE to POLLUTION |
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वन सम्पदा हमारे लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है । इसका संरक्षण कैसे किया जा सकता है ? एक लेख लिखिए । |
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निम्नलिखित को उदाहरण सहित समझाइए1. अम्ल वर्षा 2. ओजोन की न्यूनता |
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ऐसे दो तरीके सुझाइए जिनमें जैव निम्नीकरणीय पदार्थ पर्यावरण को प्रदूषित करते हैं । |
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Answer» ala ala science ka QUSTION HA to ENGLISH MA type karo |
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संसाधनों के प्रबन्धन से आप क्या समझते हैं ? इनके द्वारा आप अपने समाज को कैसे लाभान्वित करेंगे ? एक संक्षिप्त लेख द्वारा समझाइए । |
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Answer» Answer: sansadhano KE prabandh se yeh taatprye hai ke Jo bhe sansadhan Jo ke hme praakarti se prapt hota hai HUME USKI aavashyakta ko pehchan kr US sansadhan ko rakhna chaiye . |
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जीवमण्डल की परिभाषा दीजिए । जीवमण्डल के कौन-से तीन प्रमुख भाग हैं ? |
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Answer» यदि इस प्रकार प्राप्त समस्त जानकारी पर हम एक साथ विचार करें तो आप पाएंगे कि बड़ी इकाई, अर्थात् जीव मण्डल की संरचना तथा उसको अनेक प्रकार्य बहुत कुछ पारिस्थितिक तंत्र की संरचना तथा प्रकार्यों से मिलते-जुलते हैं। जीव मण्डल के अजैव घटक बहुत से पदार्थों से बने हैं- जैसे, वायु, जल, मृदा तथा खनिज |
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निम्न में से कौन आहार श्रृंखला का निर्माण करते हैं ? (क) घास, गेहूँ तथा आम(ख) घास, बकरी तथा मानव (ग) बकरी, गाय तथा हाथी (घ) घास, मछली तथा बकरी |
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किन्हीं दो वन उत्पाद आधारित उद्योगों के नाम बताइए । |
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Answer» Answer: कागज उद्योग देश की प्रथम असफल कागज मिल 1832 में सेरामपुर (बंगाल) में स्थापित की गयी। बाद में, 1870 में बालीगंज (कोलकाता के निकट) में पुनः एक मिल की स्थापना की गयी। किंतु कागज उद्योग का नियोजित विकास स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ही संभव हो सका। कागज उद्योग हेतु बांस, गूदा, छीजन, सलाई व सबाई घास, व्यर्थ कागज इत्यादि कच्चे माल की जरूरत होती है। उद्योग की अवस्थिति कच्चे माल तथा कुछ सीमा तक बाजार द्वारा प्रभावित होती है। 1950 में, यहां 17 पेपर मिल थीं जिनकी वार्षिक उत्पादन क्षमता 1.6 लाख टन थी। वर्तमान में, देश में 515 कागज मिलें हैं जिनकी वार्षिक उत्पादन क्षमता लगभग 7.4 मिलियन टन है। देश में 112 न्यूजप्रिंट मिलें हैं जिनकी वार्षिक उत्पादन क्षमता लगभग 1.69 मिलियन टन है। कागज उद्योग का एक महत्वपूर्ण पहलू है- लघु कागज मिलों की सशक्त उपस्थिति। ये कागज उद्योग की कुल क्षमता का 50 प्रतिशत रखते हैं और देश में पेपर और पेपरबोर्ड के उत्पादन में लगभग 50 प्रतिशत का योगदान करते हैं। वैश्विक स्तर पर भारत के कागज उद्योग को विश्व के 15 सर्वोच्च पेपर उद्योगों में दर्जा हासिल है।
अच्छी गुणवत्ता वाले सेल्यूलोजिक कच्चे माल की उपलब्धता की कमी और परम्परागत तकनीकी पेपर उद्योग की वृद्धि में मुख्य बाधाएं हैं। पेपर उद्योग को वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धात्मक बनाने के लिए मूलभूत आगतों की उच्च लागत और पर्यावरणीय मुद्दों जैसे दो मुख्य कारकों पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। भौगोलिक वितरण: कागज उद्योग का राज्यवार भौगोलिक वितरण इस प्रकार है- प. बंगाल: इस राज्य को पूर्वारंभ का लाभ प्राप्त हुआ। इस राज्य को कागज के लिए कच्चा माल असम और बिहार से बांस के रूप में तथा मध्य प्रदेश से सबाई घास के रूप में प्राप्त होता है। टीटानगर, काकीनाड़ा, नैहट्टी, कोलकाता तथा बरानागौर प्रमुख कागज निर्माण केंद्र है। महाराष्ट्र: मुंबई, पुणे,बेल्लारपुर और कामपट्टी में पेपर उत्पाद होता है तथा विखरोली, कल्याण व गोरेगांव में पेपर बोर्ड उत्पादन किया जाता है। आंध्र प्रदेशः राजसमुन्दरी व सीरपुर में पेपर उत्पाद किया जाता है। मध्य प्रदेश: राज्य के महत्वपूर्ण उत्पादक केंद्र इंदौर, भोपाल, सिहोर और शहडोल हैं। कर्नाटक: बेलागोला (बैग के उपयोग हेतु) और शिमोगा में पेपर उत्पाद किया जाता है। अन्य राज्य हैं -उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडीशा, हरियाणा, तमिलनाडु, गुजरात और केरल। कागज उद्योग की समस्याएं बांस व सबाई घास जैसे कच्चे माल की कमी। कॉस्टिक सोडा, सोडा भस्म, विरंजक चूर्ण, इत्यादि रसायनों की कमी, जो उत्पादन को प्रभावित करती है। श्रमिक विवादों, निम्न श्रेणी के कोयले का प्रयोग तथा उच्च परिवहन लागत इत्यादि कारणों से उत्पादन की लागत काफी बढ़ जाती है। भारी निवेश की आवश्यकता। |
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निम्नलिखित में से कौन-सा / से पर्यावरण-मैत्री ( अनुकूल ) व्यवहार कहलाता है / कहलाते हैं ?(क) बाजार जाते समय खरीदे गए सामान को रखने के लिए कपड़े का थैला ले जाना(ख) अनावश्यक ऊर्जा खर्च बचाने के लिए लाइटों तथा पंखों का स्विच बन्द करना ।(ग) वाहन के बजाय विद्यालय तक पैदल जाना (घ) उपर्युक्त सभी |
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गंगा सफाई योजना कब प्रारंभ हुई थी ?(क) 1985(ख) 1955(ग) 2005(घ) इनमें से कोई नहीं |
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Answer» It's d OPTION |
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खाद्य-श्रृंखला एवं खाद्य-जाल से आप क्या समझते हैं ? खाद्य-श्रृंखला तथा खाद्य-जाल में क्या अन्तर है ? उचित उदाहरणों की सहायता से समझाइए । |
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Answer» खाद्य श्रृंखला की हर कड़ी पर ऊर्जा का अत्यधिक ह्रास होता है, किसी खाद्य श्रृंखला में एक प्राणि उसे प्राप्त होने वाली ऊर्जा का मात्रा 10 प्रतिशत ही आगे प्रसारित करता है। स्थितिज ऊर्जा का 90 प्रतिशत भाग ऊष्मा के रूप में लुप्त हो जाता है। इसलिए खाद्य श्रृंखला में जितना आगे आप जाएंगे उतनी कम ऊर्जा की उपलब्धता पाएंगे। इससे स्पष्ट होता है कि आखिर क्यों शाकाहारियों के एक सामान्य आकार के झुण्ड के भरण-पोषण के लिए काफी संख्या में वृक्ष और हरियाली की आवश्यकता होती है और क्यों शाकाहारियों और सामान्य आकार का झुण्ड केवल कुछ ही मांसाहारियों को पाल सकता है। खाद्य श्रृंखला जितनी छोटी होगी, जीवों के लिए उतनी अधिक ऊर्जा उपलब्ध होगी। अधिकांश खाद्य श्रृंखलाएं चार या पांच कडि़यों से अधिक की नहीं होतीं हैं। खाद्य जाल खाद्य श्रृंखलाएं अलग-अलग लडि़यां न होकर एक दूसरे से अंतःसंबंधित होते हैं। अधिकांश पशु एक से अधिक खाद्य श्रृंखला के हिस्से होते हैं क्योंकि अपनी ऊर्जा की आवश्यकता पूर्ति के लिए वे एक से अधिक प्रकार के भोजन का भक्षण करते हैं। ये आपस में जुड़ी हुई खाद्य श्रृंखलाएं ही खाद्य जाल का निर्माण करती हैं। ऊर्जा के बहाव को दर्शाने में खाद्य जाल कहीं अधिक वास्तविक एवं सटीक होता है |
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पृथ्वी ऊष्मायन पर टिप्पणी लिखिए । |
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Answer» Answer: Explanation: ग्रीन हाउस गैसों (green house gases) के द्वारा उत्पन्न ग्रीन हाउस प्रभाव (green house effect) ही पृथ्वी ऊष्मायन (GLOBAL warming) का कारण है। पृथ्वी पर पहुँचने वाली प्रकाशीय ऊर्जा को तो ये गैसें क्षोभमण्डल में आने में कोई बाधा नहीं डालतीं किन्तु ऊष्मा के रूप में जब यह ऊर्जा वापस विकरित होती है तो उसके कुछ भाग को वायुमण्डल में ही रोके रखती हैं अथवा ये ऊष्मारोधी गैसें पृथ्वी से विसरित होकर आयी ऊष्मा का कुछ भाग अवशोषित कर लेती हैं एवं पुनः धरातल को वापस कर देती हैं। इस प्रक्रिया में वायुमण्डल के निचले भाग में अतिरिक्त ऊष्मा एकत्रित हो जाती है। विगत कुछ वर्षों से मानवीय क्रिया-कलापों के कारण इन ऊष्मारोधी गैसों की मात्रा वायुमण्डल में बढ़ जाने के कारण वायुमण्डल के औसत ताप में वृद्धि हो गयी है। इस प्रकार पृथ्वी के औसत तापमान में बढ़ोतरी को पृथ्वी ऊष्मायन या भूमण्डलीय ऊष्मायन या विश्व तापन (global warming) कहते हैं। विश्व मौसम संगठन के अनुसार भूतल का औसत तापमान पिछली शताब्दी के पूरा होते-होते लगभग 0.60° सेल्सियस तक बढ़ा है। तापमान में यह वृद्धि मुख्य रूप से 1910 से 1945 ई० और 1976 से 2000 ई० के मध्य हुई है। इस प्रकार लगभग सम्पूर्ण विश्व में 90 का दशक सबसे गर्म दशक और 1961 ई० के बाद क्रमशः 1980,81, 83, 86 एवं 1988 ई० का वर्ष सबसे गर्म वर्ष रहा है। इस दशक तक तुलनात्मक रूप में समुद्री जल का ताप भी बढ़ा है। ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभाव ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव से उत्पन्न संकट सम्पूर्ण विश्व के लिए भयंकरतम समस्या है। इसके दुष्प्रभाव तथा दुष्परिणाम पृथ्वी पर उपस्थित जीवन के लिए ही खतरा सिद्ध हो सकते हैं। इस सबका परिणाम है। कि ऊँचे स्थानों पर अधिक वर्षा होने लगी है और उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में वर्षा में कमी आयी है। पिछली शताब्दी में समुद्री जल स्तर में 15 से 20 सेमी तक बढ़ोतरी हुई है। विश्व के कुछ स्थानों में ग्लेशियर (glaciers) का कुछ नीचे हो जाना भी वायुमण्डल के तापमान में वृद्धि का संकेत है। ग्लोबल वार्मिंग का सबसे भयंकर दुष्परिणाम पर्यावरण में जलवायु तथा मौसम परिवर्तन के रूप में। प्रकट होता है। जैसे-जैसे पृथ्वी के तापमान में वृद्धि हो रही है इस प्रकार के परिवर्तन के परिणाम सामने आ भी रहे हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में, लगभग 20 वर्ष पूर्व जहाँ हिमपात होता था, उन स्थानों पर हिमपात होना बन्द हो गया है अथवा इतनी कम मात्रा में होने लगा है कि उसका कोई लाभ नहीं रह गया है। इस प्रकार के परिवर्तनों के कारण प्रतिवर्ष विभिन्न मौसमों में आकस्मिक तापमान की वृद्धि या कमी विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं; जैसे-तूफान, चक्रवात, अतिवृष्टि, सूखा आदि के रूप में सामने आ रही है। 1990 से 2100 ई० तक पृथ्वी के तापमान में वर्तमान गति से 5° सेल्सियस तक बढ़ जाने की आशंका व्यक्त की जा रही है। इस प्रकार की तापमान में वृद्धि से वर्षा के प्रारूप में अत्यधिक परिवर्तन आएँगे विशेषकर निचले अक्षांशों (latitudes) पर वर्षा में अधिक कमी हो सकती है। फलस्वरूप सूखा, बाढ़ जैसी आपदाओं में वृद्धि हो सकती है। बढ़ती गर्मी और मानसून की अनिश्चितता से कटिबन्धीय क्षेत्रों में पैदावार में कमी आ सकती है। संयुक्त राष्ट्र ने अपने पर्यावरण कार्यक्रम में उल्लेख कियां है; आज मानवता के समक्ष भूमण्डलीय ऊष्मायन (ग्लोबल वार्मिंग) सबसे भयावह खतरा है। इसके लिए मनुष्य की आर्थिक विकास की गतिविधियाँ उत्तरदायी हैं। ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव सम्पूर्ण पारिस्थितिक तन्त्र (ecological setup) पर पड़ता है। इससे जीवमण्डल का कोई भी अंश प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता है; परिणामस्वरूप पर्वतों से बर्फ पिघलेगी, बाढ़े आयेंगी, समुद्री जल स्तर बढ़ेगा, स्वास्थ्य सम्बन्धी विपदाएँ बढ़ेगी, असमय मौसमी बदलाव होंगे तथा जलवायु में भयंकर परिवर्तनों को बढ़ावा मिलेगा। एक अध्ययन के अनुसार प्रति 1° सेल्सियस तापमान की वृद्धि से दक्षिण-पूर्वी एशिया में चावल का उत्पादन 5 प्रतिशत कम हो जाएगा। उपर्युक्त के अतिरिक्त अन्य अनेक दुष्परिणाम; जैसे- अनावृष्टि, अतिवृष्टि आदि की सम्भावनाओं का बढ़ना, विभिन्न प्रकार के रोगों में वृद्धि, क्षोभमण्डल (troposphere) के बाहरी भाग में उपस्थित पृथ्वी के रक्षा कवच अर्थात् ओजोनमण्डल (ozonosphere) अथवा ओजोन परत (ozone layer) की मोटाई में कमी होने की सम्भावना आदि है। ओजोन परत के क्षीण होने से पृथ्वी पर पराबैंगनी किरणों के प्रभाव में वृद्धि हो जाएगी जिससे त्वचा कैन्सर, मोतियाबिन्द आदि रोगों में वृद्धि होती है, शरीर का प्रतिरोधी तन्त्र हासित होता है, सूक्ष्म जीव; विशेषकर पादपप्लवकों (PHYTOPLANKTONS) के नष्ट होने से जलीय पारिस्थितिक तन्त्र पूर्णत: नष्ट हो जायेंगे। भूमण्डलीय ऊष्मायन को कम करने के उपाय पृथ्वी ऊष्मायन (ग्लोबल वार्मिंग) को रोकने के लिए मानवीय क्रिया-कलापों पर प्रतिबन्ध लगाना आवश्यक है जिनसे ग्रीन हाउस गैसों; जैसे- कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), नाइट्रस ऑक्साइड (N2O), मेथेन (CH4), क्लोरोफ्लोरोकार्बन्स (CFCs), हैलोजन्स (हैलोकार्बन्स Clx, Fx, Brx) आदि की वृद्धि को रोकने में सहायता मिल सकती है।Read more on Sarthaks.com - HTTPS://www.sarthaks.com/487058/ |
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ओजोन परत की क्षति हमारे लिए चिंता का विषय क्यों है ? इस क्षति को सीमित करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं ? |
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Answer» Answer: विभिन्न रासायनिक कारणों से ओज़ोन परत को बहुत तेजी से नुकसान हो रहा है। क्लोरोफ्लोरो कार्बनों की वृद्धि के कारण ओजोन परत में छेद(hole) उत्पन्न हो गए हैं जिनसे सूर्य के प्रकाश में मौजूद पराबैंगनी विकिरणें सीधे पृथ्वी पर आने लगी है जो कैंसर, मोतियाबिंद और त्वचा रोगों के कारण बन रहे हैं। ओज़ोन परत पराबैंगनी(UV) किरणों का अवशोषण कर लेती हैं। इस नुकसान को कम करने के लिए 1987 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम में सर्वसम्मति यही बनी है कि क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) के उत्पादन को 1986 के स्तर पर सीमित रखा जाए। अब क्लोरोफ्लोरोकार्बन की जगह हाइड्रोफ्लोरो कार्बनों का प्रयोग शुरू किया गया है। जिसमें ओज़ोन परत को नुकसान पहुंचाने वाले क्लोरीन (CL)या ब्रोमीन(BR) नहीं है। दुनिया भर की सरकारों को निम्नलिखित कार्य तेजी से करनी चाहिए : १.सुपर सोनिक विमानों का कम से कम उपयोग करना चाहिए। २.नाभिकीय विस्फोटों पर नियंत्रण होना चाहिए। ३.क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) के प्रयोग को सीमित करना चाहिए। ४.क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) के विकल्प की तलाश। आशा है कि यह उत्तर आपकी मदद करेगा।। Read more on Brainly.in - brainly.in/question/7933810#readmore |
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पोषी स्तर क्या हैं ? एक आहार श्रृंखला का उदाहरण दीजिए तथा इसमें विभिन्न पोषी स्तर बताइए । |
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Answer» पोषी स्तर ;पारितंत्र के संजीव घटकों की श्रेणियाँ जिनका आधार पोषण है ये घटना पोषी स्तर कहा जाता है | वन --------->हिरन वन ---------->उत्पादक हिरन ------->प्राथमिक उपभोगता ( शाकाहारी ) शेर -----------> सर्वोच्चय उपभोगता ( मांशाहारी ) |
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क्या होगा यदि हम एक पोषी स्तर के सभी जीवों को समाप्त कर दें ( मार डालें ) ? |
| Answer» | |
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How depletion layer is created in PN junction diode ? with figure |
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Answer» Explanation: Therefore, when N-doped and P-doped pieces ofsemiconductor are placed TOGETHER to FORM a JUNCTION, electrons migrate into the P-side and holes migrate into the N-side. When the electric FIELD is sufficient to arrest further transfer of holes and electrons, thedepletion region has reached its equilibrium DIMENSIONS. |
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What is ammeter? Where it is used? |
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Answer» Answer: An ammeter (from Ampere Meter) is a measuring instrument used to MEASURE the current in a circuit. ELECTRIC currents are measured in amperes (A), hence the name. Instruments used to measure smaller currents, in the milliampere or microampere range, are designated as milliammeters or microammeters. Early ammeters were laboratory instruments which relied on the Earth's magnetic field for operation. By the late 19th century, improved instruments were designed which could be mounted in any position and ALLOWED accurate measurements in electric power SYSTEMS. It is generally represented by letter 'A' in a circuit.. hope it's HELP plzzzzzz mark it as brainliest |
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नाभिकीय रिऐक्टर के प्रमुख भागों का उल्लेख करते हुए इसकी प्रक्रिया का सचित्र वर्णन कीजिए । |
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Answer» नाभिकीय रिएक्टर ऐसी डिवाइस हैं जिसमें नाभिकीय चेन रिएक्शन को नियंत्रित किया जाता है। नाभिकीय रिएक्टर का सबसे बड़ा इस्तेमाल विद्युत ऊज्रा उत्पन्न करने के लिए किया जाता है। सामान्यत: सभी न्यूक्िलयर रिएक्टर नाभिकीय संलयन पर आधारित हैं जिसमें ईंधन के रूप में यूरेनियम का इस्तेमाल किया जता है। प्रकार : नाभिकीय रिएक्टर कई प्रकार के होते हैं, प्रेशराइज्ड वाटर रिएक्टर (पीडब्लयूआर), बॉयलिंग वाटर रिएक्टर (बीडब्ल्यूआर), प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर (पीडब्लयूएचआर), हेवी वाटर रिएक्टर, फास्ट ब्रीडर रिएक्टर, थर्मल रिएक्टर। थर्मल रिएक्टर में धीमे या थर्मल न्यूट्रॉन का इस्तेमाल किया जता है। सामान्यत: पावर रिएक्टर इसी पर आधारित होते हैं। फास्ट ब्रीडर रिएक्टर का इस्तेमाल नाभिकीय ऊज्र उत्पन्न करने के लिए किया जता है। रिएक्टर में मॉडरेटर (संलयन प्रक्रिया में न्यूट्रॉनों की बौछार को कम करने के लिए) के रूप में हेवी वाटर और ग्रेफाइट का इस्तेमाल किया जता है। रिएक्शन की दर कम करने के कैडमियम और बोरॉन की कंट्रोल राड का इस्तेमाल किया जता है। |
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सोलर कुकर के उपयोग, लाभ एवं सीमाएँ लिखिए । |
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Answer» ईंधन का कोई खर्च नहीं होता । ईंधन और विद्युत की बचत होती है। पूर्ण रूप से प्रदूषण रहित है। धीमी गति से खाना पकने के कारण भोजन के पोषक तत्व नष्ट नहीं होते। किसी प्रकार की गंदगी नहीं फैलती। खाना पकाते समय निरंतर देखभाल की जरूरत नहीं पड़ती। |
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पवन चक्की का कार्य-सिद्धान्त क्या है ? पवन चक्की का विवरण चित्र सहित समझाइए । |
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Answer» no ONE UNDERSTANDS what you are SAYING |
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रेडियोऐक्टिव विघटन तथा नाभिकीय विखण्डन में क्या अन्तर है ? |
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Answer» Answer: नाभिकीय विखंडन नाभिकीय विखंडन वह प्रक्रिया है जिसमे एक भारी नाभिक एक न्यूट्रॉन को ग्रहण करके लगभग बराबर द्रव्यमान के दो हल्के नाभिको में टूट जाता है। प्राप्त दो हल्के नाभिकों को विखंडन खंड कहते है। नाभिकीय विखंडन की क्रिया परमाणु बम तथा नाभिकीय रिएक्टर का आधार हैं नाभिकीय उर्जा अतः नाभिकीय विखंडन से जो ऊर्जा मुक्त होती है, उसे ‘नाभिकीय ऊर्जा’ कहते है। इस क्रिया में मुक्त हुई ऊर्जा की गणना इस प्रकार से कर सकते हैं: (92U235 + 0n1) के द्रव्यमान = 234.99 amu + 1.01 amu = 236.00 amu. (56Ba144 + 36Kr89 + 3 0n1) के द्रव्यमान = 143.87 amu + 88.90 amu + 3 x 1.01 amu = 235.80 amu अतः द्रव्यमान क्षति m = 236.00 – 235.80 = 0.20 amu आइंस्टीन के द्रव्यमान ऊर्जा समीकरण के अनुसार, 1 amu द्रव्यमान के तुल्य ऊर्जा 931 MeV होती है। अतः उपरोक्त द्रव्यमान क्षति के तुल्य ऊर्जा E = 0.20 amu x 931 MeV/amu =190 MeV इस प्रकार, यूरेनियम U235 के एक नाभिक के विखंडन से लगभग 190 MeV (मिलियन इलेक्ट्रान – वोल्ट) ऊर्जा मुक्त होती है। इस ऊर्जा का अधिकाँश भाग विखंडन से प्राप्त खंडो की गतिज के रूप में प्राप्त होता है। शेष भाग उत्सर्जित न्यूट्रॉनो की गतिज ऊर्जा, γ- किरणों तथा ऊष्मा व प्रकाश विकिरणों के रूपों में प्राप्त होता है। 1 ग्राम यूरेनियम के विखंडन में मुक्त ऊर्जा U235 के 1 ग्राम परमाणु (235 ग्राम) में 6×1023 (अवोगाद्रो संख्या) परमाणु होते है। अतः 1 ग्राम यूरेनियम में परमाणुओं की संख्या 6 x 1023/235 = 2.56 x 1021 चूँकि प्रत्येक परमाणु के नाभिक के विखंडन से लगभग 200 MeV ऊर्जा मुक्त होती है। अतः 1 ग्राम यूरेनियम से प्राप्त ऊर्जा = (2.56 x 1021)x 200 MeV = 5×1023 MeV. अतः 1 ग्राम यूरेनि यम का विखंडन होने पर 5 x 1023MeV ऊर्जा उत्पन्न होगी। इतनी ऊर्जा 20 T.N.T. (TRI – nitro – tolune) में विस्फोट करने से उत्पन्न होती है। इससे 2 x 104 किलोवाट – घंटा विद्युत ऊर्जा उत्पन्न हो सकती है। रेडियोएक्टिव विघटन तथा नाभिकीय विखंडन में अंतर : दोनों क्रियाओं में मुख्य अंतर निम्नलिखित हैं: रेडियोएक्टिव विघटन स्वतः होने वाली प्रक्रिया है जबकि विखंडन स्वतः नहीं होता। विखंडन में भारी नाभिकों पर न्यूट्रॉनो की बमबारी की जाती है। Explanation: |
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ऊर्जा स्रोत के रूप में जीवाश्मी ईंधनों तथा सूर्य की तुलना कीजिए और उनमें अंतर लिखिए । |
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किसी नाभिकीय रिऐक्टर के प्रमुख घटकों के नाम लिखिए तथा उनके प्रकार्यों का वर्णन कीजिए । |
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Answer» अब सुपर रैंडम राईटिंग जारी करना, अब सुपर रैंडम राईटिंग जारी करना, अब सुपर रैंडम राईटिंग जारी करना, अब सुपर रैंडम राईटिंग जारी करना, अब सुपर रैंडम राईटिंग जारी करना, अब सुपर रैंडम राईटिंग जारी करना, अब सुपर रैंडम राईटिंग जारी करना, अब सुपर रैंडम राईटिंग जारी करना, अब सुपर रैंडम राईटिंग जारी करना,अब सुपर रैंडम राईटिंग जारी करना,अब सुपर रैंडम राईटिंग जारी करना,अब सुपर रैंडम राईटिंग जारी करना,अब सुपर रैंडम राईटिंग जारी करना,अब सुपर रैंडम राईटिंग जारी करना,अब सुपर रैंडम राईटिंग जारी करना,अब सुपर रैंडम राईटिंग जारी करना,अब सुपर रैंडम राईटिंग जारी करना,अब सुपर रैंडम राईटिंग जारी करना,अब सुपर रैंडम राईटिंग जारी करना,अब सुपर रैंडम राईटिंग जारी करना,अब सुपर रैंडम राईटिंग जारी करना,अब सुपर रैंडम राईटिंग जारी करना,अब सुपर रैंडम राईटिंग जारी करना,अब सुपर रैंडम राईटिंग जारी करना,अब सुपर रैंडम राईटिंग जारी करना,अब सुपर रैंडम राईटिंग जारी करना,अब सुपर रैंडम राईटिंग जारी करना,अब सुपर रैंडम राईटिंग जारी करना,अब सुपर रैंडम राईटिंग जारी करना,अब सुपर रैंडम राईटिंग जारी करना,अब सुपर रैंडम राईटिंग जारी करना,अब सुपर रैंडम राईटिंग जारी करना |
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नाभिकीय ऊर्जा के महत्त्व का संक्षिप्त विवरण दीजिए । |
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Answer» नियंत्रित नाभिकीय अभिक्रियाओं के परिणामस्वरूप प्राप्त उर्जा नाभिकीय उर्जा या परमाणु उर्जा कहलाती है। दो प्रकार की नाभिकीय अभिक्रियाओं से नाभिकीय उर्जा प्राप्त हो सकती है - नाभिकीय संलयन एवं नाभिकीय विखंडन। किन्तु वर्तमान समय में सभी वाणिज्यिक परमाणु-उर्जा इकाइयाँ नाभिकीय विखंडन पर ही आधारित हैं। सन् २००९ में विश्व की संपूर्ण विद्युत शक्ति का १३-१४% भाग नाभिकीय उर्जा से प्राप्त हुआ। Explanation: I HOPE it HELPS you.... |
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सौर-ऊर्जा क्या है ? सोलर-कुकर का सिद्धान्त एवं कार्य-विधि समझाइए । सोलर कुकर के लाभ भी लिखिए । |
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Answer» Answer: Most SOLAR COOKERS work on the basic PRINCIPLE: Sunlight is converted to HEAT energy, that is used for cooking. Below is the basic science for solar panel cookers and solar box cookers. Another style of solar cooker is a PARABOLIC solar cooker. Explanation: mark as brainliest answer or should i say दिमाग के जवाब के रूप में चिह्नित करें |
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जैव अपशिष्द से जैव-गैस प्राप्त करने की विधि का विस्तृत वर्णन कीजिए । |
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Answer» PTA nhiiiii..................... |
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यदि आप अपने भोजन को गरम करने के लिए किसी भी ऊर्जा-स्रोत का उपयोग कर सकते हैं तो आप किसका उपयोग करेंगे और क्यों ? |
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Answer» Answer: ALWAYS USE for gas but your question ACCORDING use in solar ENERGY |
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निम्नलिखित से ऊर्जा निष्कर्षित करने की सीमाएँ लिखिए—(a) पवनें (b) तरंगें (c) ज्वार-भाटा |
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Answer» a) पवनें : १.पवन ऊर्जा को प्राप्त करने के लिए के लिए पवन ऊर्जा फार्म की स्थापना हेतु बहुत अधिक बड़े जगह की जरूरत होती है। एक MW जनित्र के लिए 2 हेक्टेयर स्थान की जरूरत होती है। २.पवन ऊर्जा तभी उत्पन्न हो सकती है जब हवा की गति 15 किमी/घण्टा से अधिक हो। ३.हवा की तेज गति के कारण टूट-फूट और नुकसान की संभावना बहुत ज्यादा होती है। ४.पूरे साल आवश्यक पवन नहीं चलती। (B) तरंगे : १. तरंग ऊर्जा तभी पैदा की जा सकती है जब तरंगे बहुत प्रबल हो । २. तरंगों का समय और स्थिति बहुत बड़ी परिसीमाएं हैं। (c) ज्वार : १.ज्वार भाटा के कारण सागर की लहरों का आना और जाना घूर्णन गति करती पृथ्वी पर मुख्य रुप से चंद्रमा के गुरुत्वीय खिंचाव के कारण होता है। २. तरंगों की ऊंचाई और बांध बनाने की स्थिति इसके प्रमुख परिसीमाएं हैं। |
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जीवाश्म ऊर्जा का स्रोत है (क) पवन ऊर्जा (ख) सौर ऊर्जा (ग) कोयला (घ) जल विद्युत |
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जीवाश्मी ईंधन की क्या हानियाँ हैं ? |
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Answer» Explanation: There are several harms- 1. Global warming 2. OVEREXPLOITATION can CAUSE ECOLOGICAL disbalance. |
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गर्म जल प्राप्त करने के लिए हम सौर जल तापक का उपयोग किस दिन नहीं कर सकते ?(क) धूप वाले दिन (ख) बादलों वाले दिन(ग) गरम दिन (घ) पवनों ( वायु ) वाले दिन |
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Answer» Answer: B baadlo wale din b'coz baadal HONE se suraj chhup jaata hai to SOR oorja KAAM nhi KRTI |
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नाभिकीय ऊर्जा का क्या महत्त्व है ? |
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Answer» परमाणु ऊर्जा वह ऊर्जा है जिसे नियंत्रित (यानी, गैर-विस्फोटक) नाभिकीय अभिक्रिया से उत्पन्न किया जाता है। वर्तमान में विद्युत उत्पादन के लिए वाणिज्यिक संयंत्र नाभिकीय विखण्डन का उपयोग करते हैं। नाभिकीय रिएक्टर से प्राप्त उष्मा पानी को गर्म करके भाप बनाने के काम आती है, जिसे फिर बिजली उत्पन्न करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। 2009 में, दुनिया की बिजली का 15% परमाणु ऊर्जा से प्राप्त हुआ। इसके अलावा, परमाणु प्रणोदन का उपयोग करने वाले 150 से अधिक नौसेना पोतों का निर्माण किया गया है। Explanation: I HOPE it HELPS you.... |
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ऐसे दो ऊर्जा स्रोतों के नाम लिखिए जिन्हें आप समाप्य मानते हैं । अपने चयन के लिए तर्क दीजिए । |
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Answer» प्कनसनकवतवतवयवततवनत्कनकनसनकनकनसमकमतमत्त्षमत्दम |
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समझाइए कि नाभिकीय रिऐक्टर में विमन्दकों तथा नियन्त्रकों की सहायता से श्रृंखला अभिक्रिया को किस प्रकार नियन्त्रित किया जाता है ? |
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Answer» त्तमरमरकनतकनककनकनतनकनकवकवकववककवषवदजम Explanation: षषमषमषमषकमकमककममकमषनत्तम |
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निम्नलिखित में से कौन जैवमात्रा ऊर्जा स्रोत का उदाहरण नहीं है ?(क) लकड़ी (ख) गोबर गैस(ग) नाभिकीय ऊर्जा (घ) कोयला |
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सौर-सेल क्या है ? सौर-सेलों के विकास तथा उपयोगों पर एक टिप्पणी लिखिए । |
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Answer» सौर बैटरी या सौर सेल फोटोवोल्टाइक प्रभाव के द्वारा सूर्य या प्रकाश के किसी अन्य स्रोत से ऊर्जा प्राप्त करता है। अधिकांश उपकरणों के साथ सौर बैटरी इस तरह से जोड़ी जाती है कि वह उस उपकरण का हिस्सा ही बन जाती जाती है और उससे अलग नहीं की जा सकती। सूर्य की रोशनी से एक या दो घंटे में यह पूरी तरह चार्ज हो जाती है। सौर बैटरी में लगे सेल प्रकाश को समाहित कर अर्धचालकों के इलेक्ट्रॉन को उस धातु के साथ क्रिया करने को प्रेरित करता है।[1] एक बार यह क्रिया होने के बाद इलेक्ट्रॉन में उपस्थित ऊर्जा या तो बैटरी में भंडार हो जाती है या फिर सीधे प्रयोग में आती है। ऊर्जा के भंडारण होने के बाद सौर बैटरी अपने निश्चित समय पर डिस्चार्ज होती है। ये उपकरण में लगे हुए स्वचालित तरीके से पुनः चालू होती है, या उसे कोई व्यक्ति ऑन करता है। Explanation: |
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