Explore topic-wise InterviewSolutions in Current Affairs.

This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.

1.

सामन्तवाद की परिभाषा दीजिए।

Answer»

“सामन्तवाद एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें स्थानीय शासक उन शक्तियों का प्रयोग करते हैं, जो राजा या केन्द्रीय सत्ता को प्राप्त होती हैं।”

2.

सामन्तवाद से आप क्या समझते हैं? स्पष्ट कीजिए।

Answer»

मध्यकालीन यूरोप की एक प्रमुख विशेषता सामन्तवाद थी। रोमन साम्राज्य के पतन के बाद यूरोप में उनके छोटे-छोटे राज्य बन गए, और उनकी शक्ति भी क्षीण हो गई। इन राज्यों के राजाओं ने धन के अभाव में राज्य की भूमि को अपने विश्वासपात्र, सामन्तों में बाँट दिया और युद्ध के समय उनसे सैनिक सहायता लेनी प्रारम्भ कर दी। सामन्तवाद में राज्य की सम्पूर्ण भूमि पर राजा का अधिकार होता था। राजा राज्य की भूमि को अपने विश्वासपात्र, स्वाभिमानी एवं कर्तव्यनिष्ठ सामन्तों को दे देता था। सामन्तों को राजा से जो अधिकार प्राप्त होते थे, उन्हें सामन्ती अधिकार कहा जाता था। भूमि-वितरण की यह व्यवस्था ही यूरोप में सामन्तवाद’ कहलाती थी। यूरोप की सामन्तवादी व्यवस्था, भारत की जमींदारी व्यवस्था के ही समान थी। यह प्रथा परम्परागत थी। सामन्ती प्रथा में राजा का स्थान महत्त्वपूर्ण तथा सर्वोपरि होता था। खेतिहर कृषक ‘सर्फ’ कहलाते थे। सामन्त चर्च के साथ ताल-मेल बनाकर रखते थे। ये सामन्त अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार स्थायी सेना रखते थे और राजा के दरबार में उपस्थित होकर उसे उपहार, भेट आदि दिया करते थे। ये राजा के दरबार में आकर समय-समय पर शासन सम्बन्धी विषयों पर भी परामर्श दिया करते थे।

3.

सामन्तवाद की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।

Answer»

⦁     जागीर और
⦁     सम्प्रभुता।

4.

सामन्तवाद के दो दोषों का उल्लेख कीजिए।

Answer»

⦁    सामाजिक विषमता तथा
⦁     निम्न वर्ग का शोषण।

5.

सामन्तवाद के उदय के क्या कारण थे?

Answer»

सामन्तवादी प्रथा के उदय के लिए निम्नलिखित प्रमुख कारण उत्तरदायी थे

⦁    सामन्तवाद का विकास धीरे-धीरे हुआ था।
⦁    तत्कालीन परिस्थितियाँ सामन्तवाद के उदय के लिए उत्तरदायी थीं।
⦁     राज्यों में फैलने वाली अशान्ति और अव्यवस्था के कारण सामन्तवाद का उदय हुआ।
⦁    सामन्तों को स्थानीय व्यवस्था एवं प्रशासन सौंपना आवश्यक बन गया।
⦁    राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों ने सामन्तवाद को मुख्य रूप से जन्म दिया।
⦁     राजा सामन्तों के व्यय पर एक सुव्यवस्थित सेना रखने में समर्थ हो गए।
⦁     चर्च के प्रभाव एवं संगठन तथा सामन्तों और राजाओं के सहयोग से यूरोप में सामन्तवाद का उदय हुआ।
⦁     राज्य के संचालन एवं सुव्यवस्था के लिए भी सामन्तवाद का उदय आवश्यक हो गया था।

6.

मध्यकालीन यूरोपीय समाज के प्रमुख वर्गों का विवरण दीजिए।

Answer»

मध्यकालीन यूरोप का समाज मध्य युग के यूरोपीय समाज में निम्नलिखित वर्ग थे

⦁    राजा : सामन्तवादी समाज में राजा को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था। राजा राज्य की भूमि को सामन्तों में बाँट देते थे।
⦁    सामन्त : राजा के बाद सामन्तों का स्थान था। इनकी निम्नलिखित श्रेणियाँ थीं
⦁    ड्यूक(अर्ल) : राजा जिन लॉड को जागीर प्रदान करता था, उन्हें ड्यूक (अर्ल) कहते थे।
⦁    छोटे लॉर्ड( बैरन) : बड़े लॉर्ड राजा से प्राप्त भूमि का वितरण छोटे लॉ अथवा बैरनों में कर देते थे। राजा से इनका प्रत्यक्ष कोई सम्बन्ध नहीं होता था। इनके अधिपति ड्यूक होते थे। आवश्यकता पड़ने पर इन्हें ड्यूकों को सैनिक सहायता देनी पड़ती थी।
⦁     नाइट : इनके अधिपति छोटे लॉर्ड या बैरन होते थे। इन्हें भूमि बैरनों से प्राप्त होती थी तथा ड्यूक अथवा लॉों से इनका कोई सम्बन्ध नहीं था। ये बैरनों को सैन्य सहायता देते थे।
⦁    किसान : सामन्तों के बाद किसानों का वर्ग था, जो तीन श्रेणियों में बँटा हुआ था
⦁    स्वतन्त्र किसान : स्वतन्त्र किसानों को भूमि उनके अधिपतियों से प्राप्त होती थी। उन्हें केवल कर देना पड़ता था, परन्तु अधिपति के लिए वे कोई कार्य नहीं करते थे। इसके अतिरिक्त उनसे उपज का कोई अतिरिक्त भाग भी नहीं लिया जाता था।
⦁     कृषि दास :  ये मध्यम श्रेणी के किसान होते थे। उन्हें अधिपतियों के खेतों पर कुछ दिन निःशुल्क कार्य (बेगार) भी करना पड़ता था और उपज का एक भाग भी देना पड़ता था।
⦁    सर्फ : निम्नतम श्रेणी के किसान ‘सर्फ’ कहलाते थे। इनकी दशा अत्यन्त शोचनीय थी। इन्हें अपने अधिपति के लिए बेगार करनी पड़ती थी। अधिपति अपने खेतों पर सफ की भाँति इनसे भी कुछ दिन नि:शुल्क काम करवाते थे तथा उपज का भाग भी लेते थे। मध्यकाल में अन्तिम वर्षों में मध्यम वर्ग’ नामक एक नए वर्ग का विकास हुआ। इस वर्ग के लोगों ने शिक्षा, साहित्य, व्यापार, उद्योग-धन्धों आदि के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। नगरों के विकास में भी इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। ये लोग इतने समृद्ध और सम्पन्न हो गए थे कि राजा भी इनकी आर्थिक सहायता पर निर्भर रहने लगा। इससे सामन्तों का प्रभाव क्षीण हो गया।

7.

सामन्तवाद के उदय के राजनीतिक कारण लिखिए।

Answer»

पश्चिमी यूरोप में रोमन साम्राज्य का पाँचवीं शताब्दी में पतन हो  गया। इसके साथ ही सामन्तवाद का उदय हुआ और अगले पाँच-सौ वर्षों में इसका विकास हुआ। इसके उदय के निम्नलिखित राजनीतिक कारण थे

राजनीतिक कारण

रोमन साम्राज्य में सम्पूर्ण पश्चिमी यूरोप सम्मिलित था। रोमन सम्राटों ने इस क्षेत्र के अधिकांश भू-भाग को अपने अधिकार में करके बाहरी बर्बर आक्रमणों से इसकी रक्षा की थी और बहुत अंशों में शान्ति-व्यवस्था स्थापित की थी। परन्तु, पाँचवीं शताब्दी में रोमन साम्राज्य के पतन के बाद यूरोप में सर्वत्र अराजकता, अशान्ति एवं अव्यवस्था फैल गई थी। आन्तरिक उपद्रव और बाह्याक्रमणों के कारण स्वतन्त्र किसानों का संकट बढ़ने लगा था। बर्बर जातियों के आक्रमणों ने उपद्रव और अशान्ति को बढ़ा दिया था। चारों ओर लूट-खसोट मची हुई थी। किसानों का कोई रक्षक नहीं था और वे बड़े कष्ट में थे। कोई भी अकेला व्यक्ति सुरक्षित न था। रोमन साम्राज्य के कुलीनवर्गीय सरदार अपने-अपने गाँवों में चले गए जहाँ उनके किले होते थे। इन लोगों ने किसानों पर और भी अत्याचार करना शुरू किया। वे अपने दुर्गों से छापा मारने के लिए निकल पडते थे। गाँव में वे किसानों को लूटते था तथा जमीन पर अपना अधिकार करने के लिए अपनी बराबरी के अन्य बड़े सामन्तों से लड़ते थे। इस प्रकार, सर्वत्र अराजकता का बोलबाला था। किसान और जमींदार सभी इस असह्य स्थिति से ऊब गए थे। न तो किसानों का जान-माल सुरक्षित था और न सामन्तों की जमींदारी ही। इस स्थिति में दोनों एक-दूसरे की सहायता चाहते थे। इसीलिए सब लोग मिलकर ऐसे व्यक्ति की खोज में थे जो उनसे अधिक शक्ति सम्पन्न हो तथा उनके जान-माल की रक्षा कर सके। किसानों की दृष्टि में सामन्त ही ऐसा व्यक्ति दिखलाई पड़ा, क्योंकि उसके पास दुर्ग और हथियार थे। इसीलिए किसानों ने सामन्तों से एक समझौता करके अपनी जमीन उसके हाथ में सौंप दी और यह तय हुआ कि यदि सामन्त किसानों को लूटना बन्द कर दें और आन्तरिक तथा बाह्य शत्रुओं से उन्हें बचाएँ तो वे अपने खेत की पैदावार का कुछ हिस्सा उन्हें दिया करेंगे और दूसरी तरह की सेवाएँ भी करेंगे। इस तरह की व्यवस्था से किसान अब जमीन के स्वतन्त्र स्वामी नहीं रहे। वे कृषिदास (sert) बन गए। इस प्रक्रिया से अनेक छोटे-छोटे सामन्त बन गए। फिर, ये सामन्त भी अपने को अनारक्षित ही पाते थे, इसलिए इन्होंने अपने को किसी बड़े सामन्त की सेवा में समर्पित कर दिया। बड़े भूमिपति बाहरी हमले से स्वयं अपनी रक्षा नहीं कर सकते थे, वे भी छोटे-छोटे सामन्तों की सेवा की अपेक्षा करते थे। इसलिए जागीरों के रूप में अपने विजित प्रदेश के टुकडे उन्होंने छोटे-छोटे सामन्तों को दे दिए। इसके बदले में उन्होंने सैनिक सेवा देने का वचन दिया। इस प्रकार, एक नई सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था उत्पन्न हो गई। इसे ही सामन्तवाद का नाम दिया गया। सामन्तवाद के विकास का एक दूसरा राजनीतिक कारण भी था। रोमन साम्राज्य के अन्तर्गत स्थानीय शासन को भार स्थानीय सरदारों पर रहता था। जब तक केन्द्रीय शासन सुदृढ़ रहा तब तक इन स्थानीय सरदारों को नियन्त्रण में रखा जा सका, लेकिन केन्द्रीय सत्ता के कमजोर होने से स्थानीय सरदार धीरे-धीरे स्वतन्त्र होने लगे। रोमन साम्राज्य के पतन के बाद वे पूर्ण स्वतन्त्र हो गए। जर्मन जातियों के आगमन से भी सामन्तवाद के विकास को प्रश्रय और प्रोत्साहन मिला। पाँचवीं शताब्दी में पश्चिमी यूरोप में रोमन साम्राज्य का अन्त होने पर जर्मन जातियों की शाखाएँ जर्मनी से निकलकर प्रायः सम्पूर्ण यूरोप पर छा गई। ये लोग अपने-अपने कबीलों में बँटे रहते थे। इन कबीलों के नेता होते थे। जब जर्मन लोग प्रदेश जीतते गए तो कबीलों के पास काफी जमीन हो गई। इस जमीन को वे अपने अनुयायियों में इस शर्त पर बाँटने लगे कि सैनिक और राजनीतिक सेवा प्रदान करेंगे। कबीलों का नेता इस प्रकार एक बड़ा सामन्त हो गया।

8.

सामन्तवाद के पतन के दो प्रमुख कारण लिखिए।

Answer»

⦁    राष्ट्रीय राज्यों की स्थापना तथा
⦁    बारूद को आविष्कार और प्रयोग।

9.

सामन्तवाद के पतन के क्या कारण थे?

Answer»

सामन्तवाद के पतन के कारण निम्नलिखित थे

⦁     सामन्तों का पारस्परिक संघर्ष सामन्तवाद के पतन का प्रमुख कारण था।
⦁    धर्मयुद्धों के कारण पूर्व तथा पश्चिम के लोग निकट सम्पर्क में आए और व्यापार में वृद्धि होने लगी। व्यापार का विस्तार भी सामन्तवाद के पतन को लाने में सहायक सिद्ध हुआ।
⦁    राजाओं की निरंकुशता में वृद्धि भी सामन्तवाद के पतन का कारण बनी।
⦁    राष्ट्रीय राज्यों की स्थापना ने यूरोप में सामन्तवाद का पतन सुनिश्चित कर दिया।
⦁    आधुनिक हथियारों तथा बारूद के आविष्कार ने यूरोप की युद्ध-प्रणाली में परिवर्तन कर दिया। नई युद्ध-प्रणाली के प्रयोग के फलस्वरूप सामन्तवाद का पतन होने लगा।

10.

रोमन साम्राज्य का पतन हुआ(क) 476 ई० में(ख) 527 ई० में(ग) 814 ई० में(घ) 1453 ई० में

Answer»

सही विकल्प है (क) 476 ई० में

11.

चर्च की सर्वोच्च संता थी(क) रोम के पोप के पास(ख) इंग्लैण्ड के सम्राट के पास(ग) फ्रांस के चर्च के पादरी के पास(घ) कॉन्स्टेनटाइन के पास

Answer»

सही विकल्प है (क) रोम के पोप के पास

12.

आर्थिक संस्था का आधार क्या था?(क) श्रेणी(ख) धन(ग) मेनर(घ) लॉर्ड

Answer»

सही विकल्प है (क) श्रेणी।

13.

भिक्षुणी को निम्नलिखित में से क्या कहते थे?(क) नन(ख) नर्स(ग) श्रेणी(घ) चॉसक

Answer»

सही विकल्प है  (क) नन

14.

सामन्तवाद का शाब्दिक अर्थ क्या है?

Answer»

सामन्तवाद (feudalism) जर्मन के शब्द ‘फ्यूड’ से बना है, जिसका अर्थ ‘एक भूमि का टुकड़ा है।

15.

'फिफ’ किसे कहते थे?

Answer»

लॉर्ड नाइट को खर्चा चलाने के लिए भूमि को एक भाग देता था जिसे ‘फिफ’ कहा जाता था। इसके बदले नाईट लॉर्ड को रक्षा का वचन देते थे।

16.

मेनर का नियन्त्रण किस पर होता था?(क) राज्य पर(ख) नगरों पर(ग) ग्रामों पर(घ) ग्रामीणों पर

Answer»

सही विकल्प है (ग) ग्रामों पर

17.

‘ धर्म ' सुधार आन्दोलन से क्या अभिप्राय है?

Answer»

मध्यकाल में चर्च और पोप के अत्याचारों से असन्तुष्ट होकर मार्टिन लूथर तथा काल्विन जैसे धर्म-सुधारकों ने जो आन्दोलन चलाया, उसे ही ‘धर्म सुधार आन्दोलन’ कहा जाता है। इसी धर्म सुधार आन्दोलन के परिणामस्वरूप प्रोटेस्टेण्ट धर्म की नींव पड़ी थी।

18.

मध्य युग में चर्च की सर्वोच्चता के क्या कारण थे?

Answer»

मध्य युग में यूरोप की अन्धविश्वासी व अज्ञानी जनता चर्च को सर्वोत्तम सत्ता मानकर उसकी इच्छाओं का पालन करती थी तथा पोप को ईश्वर का प्रतिनिधि मानती थी। फलस्वरूप चर्च को सर्वोच्चता प्राप्त हो गई थी।

19.

मेनर से आप क्या समझते हैं?

Answer»

लॉर्ड के घर को ‘मेनर’ कहा जाता था। इसमें उनके घर, उनके निजी खेत, चरागाह और दास होते थे।

20.

मठों में भिक्षुओं द्वारा पालन किए जाने वाले मुख्य नियम क्या थे?

Answer»

मठों में भिक्षुओं द्वारा पालन किए जाने वाले मुख्य नियम निम्नलिखित थे

⦁     बेनेडेक्टाइन मठों में भिक्षुओं को बोलने की आज्ञा नहीं थी, वे कुछ विशिष्ट अवसरों पर ही बोल सकते थे।
⦁     भिक्षुओं को विनम्रता का व्यवहार अपनाना आवश्यक था।
⦁    कोई भिक्षु निजी सम्पत्ति नहीं रख सकता था।
⦁    आलस्य आत्मा का शत्रु है। इसलिए भिक्षु और भिक्षुणियों को निश्चित समय में शारीरिक श्रम और निश्चित अवधि में पवित्र पाठ करना होता था।
⦁    मठ का निर्माण इस प्रकार किया जाता था कि आवश्यकता की समस्त वस्तुएँ-जल, चक्की, उद्यान, कार्यशाला आदि उसकी सीमा के अन्दर होते थे।

21.

कैथोलिक धर्म से आप क्या समझते हैं?

Answer»

ईसाई धर्म में दो सम्प्रदाय बन गए थे। पहला सम्प्रदाय रोमन कैथोलिक और दूसरा प्रोटेस्टेण्ट कहलाया। रोमन कैथोलिक सम्प्रदाय ईसाई धर्म के सिद्धान्तों का समर्थक है। इस सम्प्रदाय के अनुयायी रोम के पोप को अपना धर्मगुरु मानते हैं और उसकी प्रत्येक आज्ञा का पालन करना अपना परम कर्तव्य समझते हैं। मध्य युग में रोमन कैथोलिक धर्म की शक्ति चरम सीमा पर पहुँच गई थी। रोमन कैथोलिक धर्म में सुधार कर प्रोटेस्टेण्ट धर्म की नींव रखी गई। प्रोटेस्टैण्ट मत को मानने वाले पोप की सत्ता को स्वीकार नहीं करते हैं। ये अपेक्षाकृत उदारवादी होते हैं।

22.

मध्य युग में नगरों के विकास के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।

Answer»

मध्य युग में यूरोप के सभी देशों-रूस, फ्रांस, इटली, इंग्लैण्ड आदि में अनेक नगरों का विकास हुआ। मध्यकालीन युग में रोम, वेनिस, जेनेवा, कुस्तुनतुनिया, पेरिस, बर्लिन, म्यूनिख, मैनचेस्टर आदि नगरों का तेजी से विकास हुआ। इन नगरों का महत्त्व इस रूप में बढ़ा कि ये । प्रशासकीय दृष्टि से सत्ता के महत्त्वपूर्ण केन्द्र बन गए थे और इन नगरों का सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यधिक महत्त्व था। ये कला, विज्ञान’ धर्म और शिक्षा के उत्थान के केन्द्र बन गए थे। इनमें दुर्ग, सार्वजनिक भवन, चर्च और शिक्षा संस्थान प्रमुख थे। मध्यकाल में नगरों के माध्यम से व्यापार के क्षेत्र में क्रान्तिकारी प्रगति हुई। नए-नए आवागमन के मार्ग विकसित हुए। व्यापारिक जलमार्ग भी खोजे गए तथा बन्दरगाहों की भी स्थापना की गई। नाप-तौल के नए-नए ढंग विकसित हुए। छोटे एवं बड़े उद्योगों की स्थापना हुई। व्यापार का विकास बड़ी तेजी से हुआ। व्यापार के सन्दर्भ में आर्थिक और अन्य प्रकार की सुरक्षाओं के लिए श्रमिक संघों की स्थापना की जाने लगी।

23.

मध्य युग में राज्य और चर्च के मध्य संघर्ष के क्या कारण थे? इसके क्या परिणाम हुए?

Answer»

चर्च और राज्य के मध्य सम्बन्ध

मध्यकालीन यूरोप में चर्च व राज्य के मध्य सम्बन्धों को अग्रलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत स्पष्ट किया जा सकता है
⦁    प्रारम्भ में मधुर सम्बन्ध :
प्रारम्भ में चर्च और राज्य के मध्य मधुर सम्बन्ध थे। दोनों एक-दूसरे का सम्मान करते हुए लोकहितकारी कार्यों से ही जुड़े रहते थे। इनमें किसी प्रकार का पारस्परिक संघर्ष नहीं था।
⦁    आदर्श समन्वय पर आधारित सम्बन्ध :
प्रारम्भ में चर्च और राज्य में अटूट समन्वय था। कभी-कभी कुछ सन्दर्भो में चर्च की उच्चता और सत्ता दिखाई पड़ती थी, जबकि सामान्य रूप से राज्य सर्वोच्च शक्ति के रूप में दृष्टिगोचर होता था। पोप की आज्ञाओं और निर्देशों का पालन करने में राजा धर्मपरायण होकर गौरव का ही अनुभव करते थे। पोप भी राज्य की आज्ञाओं को मानव-समाज के हित के लिए अनिवार्य मानकर उनका सम्मान करते थे। इस अटूट समन्वय की आदर्श समानता को दृष्टिगत रखते हुए एक विद्वान् ने लिखा है कि “यूरोप में चर्च और राज्य पति-पत्नी की भाँति आदर्श दम्पती थे तथा कभी चर्च पति, राज्य पत्नी और कभी राज्य पति तो चर्च पत्नी दिखलाई पड़ता था। दोनों में चोली-दामन का सम्बन्ध था”
⦁    चर्च और राज्य के वैमनस्यपूर्ण सम्बन्ध :
बाद में चर्च और राज्य के सम्बन्ध कटु और वैमनस्यपूर्ण होते चले गए। पोप स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि मानने लगा था और राजा स्वयं को ईश्वर का अंग मानकर तथा उसके द्वारा भेजा गया अग्रदूत मानकर अपने आपको राज्य का सर्वोच्च स्वामी समझता था। उच्चता की भावना को लेकर चर्च और राज्य में वैमनस्य प्रारम्भ हो गया और यूरोप के राजा पोप के महत्त्व को कम करने में सलंग्न हो गए थे; परन्तु व्यवहार में चर्च की ही धार्मिक सत्ता का जनमानस पर छायी रही।

चर्च उस समय धार्मिक, सामाजिक एवं राजनीतिक क्षेत्रों में खुलकर हस्तक्षेप करता था। रोम के चर्च में पोप सर्वशक्तिमान था। चर्च की अपनी सरकार, अपना कानून, अपने न्यायालय एवं अपनी पृथक् धार्मिक व्यवस्था थी। वह कैथोलिक राजाओं के आन्तरिक मामलों में भी हस्तक्षेप कर सकता था। जनता उस समय चर्च एवं राज्य के दोहरे प्रशासन के बीच पिस रही थी। चर्च चौदहवीं शताब्दी तक राज्य पर छाया रहा। उस समय के शासक राज्य को चर्च के नियन्त्रण में मानते थे। चर्च उनकी शक्ति के विस्तार में बाधक बना हुआ था। जैसे ही चर्च के पादरियों में फूट पड़ी, पोप के पाखण्डों के विरुद्ध यूरोप में आवाज उठने लगी। राज्य ने पोप की सत्ता को नकार दिया। सम्पूर्ण यूरोप पोप की सत्ता के विरुद्ध एकजुट हो गया। यूरोप में धर्मयुद्ध आरम्भ हो गए, जिनमें अन्तिम विजय राज्य को प्राप्त हुई। इन युद्धों के फलस्वरूप पोप की सत्ता केवल रोम के वैटिकन सिटी तक ही सीमित हो गई। राजा के दैवी अधिकार सिद्धान्त ने राजा को असीमित अधिकार देकर पोप की सत्ता को कम कर दिया। अतः यूरोप में मध्य युग से निरंकुश राजाओं का बोलबाला हो गया।

24.

मध्यकाल की प्रारम्भिक शताब्दियों के काल को ‘अन्धकार का युग क्यों कहा जाता है?

Answer»

मध्यकाल की प्रारम्भिक शताब्दियों में सामन्तवाद तथा चर्च की सम्प्रभुता के कारण सभ्यता व संस्कृति के विकास की गति बहुत धीमी हो गई थी। इसीलिए इस काल को ‘अन्धकार का युग’ कहा जाता है।

25.

मध्यकाल की प्रारम्भिक शताब्दियाँ पश्चिमी यूरोप में ‘अन्धकार युग क्यों कहलाती हैं?

Answer»

मध्यकाल की प्रारम्भिक शताब्दियों को पश्चिमी यूरोप में ‘अन्धकार युग’ कहे जाने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं
⦁     पोप की निरंकुशता के कारण राजनीति और धर्म के बीच संघर्ष चलता रहता था। इससे लोगों में राष्ट्रीयता की भावना के विकास में बाधा पहुँची।
⦁    इस युग में अधिकांश जनसंख्या अशिक्षा व अज्ञानता के अन्धकार में डूबी हुई थी।
⦁     शासन की निरंकुशता के कारण जनता दुःखी थी।
⦁     इस युग में अराजकता व अव्यवस्था की स्थिति बनी रही।

26.

मध्यकाल में धर्मयुद्ध क्यों हुए?

Answer»

मध्यकाल में ईसाई तथा इस्लाम धर्म के अनुयायियों के बीच सत्ता संघर्ष ने ही धर्म-युद्धों को जन्म दिया था।

27.

एबी एवं उसमें रहने वाले भिक्षुओं के जीवन पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।

Answer»

‘एबी’ चर्च के अतिरिक्त कुछ विशेष श्रद्धालु ईसाइयों की एक दूसरी तरह की संस्था थी। कुछ अत्यधिक धार्मिक व्यक्ति, पादरियों के विपरीत जो लोगों के बीच में नगरों और गाँवों में रहते थे, एकान्त जीवन व्यतीत करना पसन्द करते थे। वे धार्मिक समुदायों में रहते थे जिन्हें एबी या मठ कहते थे। दो सर्वाधिक प्रसिद्ध मठों में एक मठ 529 ई० में इटली में स्थापित सैंट बेनेडिक्टथा और दूसरा 910 ई० में बरगण्डी में स्थापित कलूनी था। भिक्षु अपना सारा जीवन एबी में रहने और समय पर प्रार्थना करने, अध्ययन और कृषि जैसे शारीरिक श्रम में लगाने का व्रत लेते थे। प्रादरी-कार्य के विपरीत भिक्षु का जीवन पुरुष और स्त्रियाँ दोनों ही अपना सकते थे-ऐसे पुरुषों को मॉक (Mauk) तथा महिलाओं को नन (Nun) कहते थे। कुछ अपवादों को छोड़कर सभी एबी में एक ही लिंग के व्यक्ति रह सकते थे। पुरुषों एवं महिलाओं के लिए अलग-अलग एबी थे। पादरियों की तरह, भिक्षु और भिक्षुणियाँ भी विवाह नहीं कर सकती थीं। कालान्तर में दस या बीस पुरुष/स्त्रियों के छोटे समुदाय से बढ़कर मठ सैकड़ों की संख्या के समुदाय बन गए जिसमें बड़ी इमारतें और भू-जागीरों के साथ-साथ स्कूल या कॉलेज और अस्पताल सम्बद्ध थे। इन समुदायों ने कला के विकास में योगदान दिया। तेरहवीं सदी में भिक्षुओं के कुछ समूह जिन्हें ‘फायर’ कहते थे, उन्होंने मठों में न रहने का निर्णय लिया। वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूम-घूमकर लोगों को उपदेश देते और दान से अपनी जीविका चलाते थे।

28.

यूरोप की सामन्तवादी व्यवस्था की क्या विशेषताएँ थीं?

Answer»

मध्यकालीन यूरोप की प्रमुख विशेषता सामन्तवादी प्रथा थी। सामन्तवाद के अन्तर्गत राज्य की सम्पूर्ण भूमि पर राजा का अधिकार होता था। राजा राज्य की भूमि को अपने विश्वासपात्र, स्वाभिमानी और कर्तव्यनिष्ठ सामन्तों को दे देता था। ये सामन्त ड्यूक’ या ‘अर्ल’ कहलाते थे। ड्यूक अपनी भूमि का कुछ भाग ‘छोटे लॉ’ को दे देते थे। इन लॉ को ‘बैरन’ भी कहा जाता था। सामन्तवादी प्रथा में निम्नतम श्रेणी में ‘किसान’ आते थे। कृषकों के एक वर्ग को ‘सर्फ’ (कृषि दास) कहा जाता था। इस प्रकार सामन्तवाद में भूमि सम्बन्धी अधिकार वंश-परम्परा पर आधारित थे।

29.

चर्च और पादरियों की जीवन शैली तथा अधिकारों की विवेचना कीजिए।

Answer»

तत्कालीन कैथोलिक चर्च के अपने विशिष्ट नियम थे। उनके पास राजा द्वारा प्रदत्त भूमि थी जिससे वे कर प्राप्त कर सकते थे। इसीलिए यह एक शक्तिशाली संस्था थी जो राजा पर निर्भर नहीं थी। पश्चिमी चर्च के शीर्ष पर पोप था, जो रोम में रहता था। यूरोप में ईसाई समाज का मार्गदर्शन बिशपों तथा पादरियों द्वारा किया जाता था जो प्रथम वर्ग के अंग थे। अधिकांश गाँवों के अपने चर्च हुआ करते थे, जहाँ प्रत्येक रविवार को लोग पादरी का धर्मोपदेश सुनने तथा सामूहिक प्रार्थना करने के लिए एकत्र होते थे। प्रत्येक व्यक्ति पादरी नहीं बन सकता था। कृषि-दास पर प्रतिबन्ध था। शारीरिक रूप से बाधित व्यक्तियों और स्त्रियों पर प्रतिबन्ध था। जो पुरुष पादरी बनते थे वे शादी नहीं कर सकते थे। धर्म के क्षेत्र में बिशप अभिजात माने जाते थे। बिशपों के पास भी लॉर्ड के समान विस्तृत जागीरें थीं और वे शानदार महलों में निवास करते थे। चर्च को एक वर्ष के अन्तराल में कृषक से उसकी उपज का दसवाँ भाग लेने का अधिकार था जिसे ‘टीथे’ कहते थे। अमीरों द्वारा अपने कल्याण और मरणोपरान्त अपने रिश्तेदारों के कल्याण हेतु दिया जाने वाला दान भी आय का एक प्रमुख स्रोत था। चर्च के औपचारिक रीति-रिवाज की कुछ महत्त्वपूर्ण रस्में, सामन्ती कुलीनों की नकल थी। प्रार्थना करते समय, हाथ जोड़कर और सिर झुकाकर घुटनों के बल झुकना, नाइट द्वारा अपने वरिष्ठ लॉर्ड के प्रति वफादारी की शपथ लेते समय अपनाए गए तरीके की नकल था। इसी प्रकार से ईश्वर के लिए लॉर्ड शब्द का प्रचलन एक उदाहरण था जिसके द्वारा सामन्तवादी संस्कृति चर्च के उपासना कक्षों में प्रवेश करने लगी। इस प्रकार अनेक सांस्कृतिक सामन्तवादी रीति-रिवाजों और तौर-तरीकों को चर्च की दुनिया में यथावत् स्वीकार कर लिया गया था।

30.

मध्यकालीन मठों का क्या कार्य था?

Answer»

मध्यकाल में चर्च के अतिरिक्त धार्मिक गतिविधियों का केन्द्र मठ भी थे। मठ आबादी से दूर स्थापित थे। मठों में भिक्षु रहा करते थे। वे प्रार्थना करते, अध्ययन करते और कृषि का भी कुछ कार्य। करते रहते थे। मठों का मुख्य कार्य धार्मिक प्रचार-प्रसार करना था। मठों ने कला के विकास में भी योगदान दिया।

31.

यूरोप में अभिजात वर्ग की क्या दशा थी?

Answer»

यूरोप में अभिजात वर्ग की दशा निम्न प्रकार थी
⦁    यूरोप में अभिजात वर्ग राजा के अधीन था जिसका समाज में महत्त्वपूर्ण स्थान था। वस्तुत: भूमि पर उनका ही अधिकार होता था।
⦁    अभिजात वर्ग जागीरदार होता था और दास की रक्षा करता था बदले में वह उसके प्रति निष्ठावान रहता था।
⦁    अभिजात वर्ग की एक विशेष स्थिति थी, उसके पास सम्पूर्ण अधिकार होते थे।
⦁     वह अपनी सैन्य क्षमता बढ़ा सकता था और युद्ध के नेतृत्व का भी उसे अधिकार प्राप्त था।
⦁    उसका स्वयं को न्यायालय था। वह अपनी मुद्रा भी प्रचलित कर सकता था।

32.

फ्रांस के सर्फ और रोम के दास के जीवन की दशा की तुलना कीजिए।

Answer»

फ्रांस के सर्फ और रोम के दास के जीवन की दशा की तुलना
⦁     फ्रांस के सर्फ या कृषि दास को अपने लॉर्ड की जागीर का काम करना होता था। काम करने के दिन निश्चित होते थे। रोम का दास अधिक त्रस्त था। उससे कभी भी कोई-सा भी काम कराया जाता था।
⦁    सर्फ प्राय: अपने परिवार के लॉर्ड के यहाँ कार्य करते थे। रोम के दासों के साथ ऐसा नहीं था। उन्हें अन्य स्थानों पर भी काम करना पड़ता था।
⦁    सर्फ के पास गुजारे के लिए लॉर्ड का एक भूखण्ड होता था। रोम के दास के पास इस प्रकार की कोई व्यवस्था नहीं थी।
⦁     सर्फ लॉर्ड की आज्ञा से विवाह कर सकता था किन्तु रोम के दास को विवाह की आज्ञा नहीं थी।
⦁     रोम का दास खरीदा या बेचा जा सकता था किन्तु सर्फ के साथ ऐसा नहीं किया जा सकता था।

33.

जनसंख्या के स्तर में होने वाली लम्बी अवधि के परिवर्तनों ने किस प्रकार यूरोप की अर्थव्यवस्था और समाज को प्रभावित किया?

Answer»

जनसंख्या में हो रही निरन्तर वृद्धि ने तत्कालीन यूरोपीय अर्थव्यवस्था को प्रत्येक दृष्टि से प्रभावित किया। यूरोप की जनसंख्या जो 1000 ई० में लगभग 420 लाख थी बढ़कर 1200 ई० में लगभग 620 लाख और 1300 ई० में 730 लाख हो गई। 13वीं सदी तक एक औसत यूरोपीय आठवीं सदी की अपेक्षा 10 वर्ष अधिक लम्बा जीवन जी सकता था। पुरुषों की तुलना में महिलाओं की जीवन अवधि छोटी होती थी। इसका कारणे आहार था। पुरुषों को महिलाओं की तुलना में अच्छा भोजन मिलता था। ग्यारहवीं सदी में जब कृषि का विस्तार हुआ और वह अधिक जनसंख्या का भार सहने में सक्षम हुई तो नगरों में भी वृद्धि होने लगी। नगरों में हाट बाजार, वाणिज्य केन्द्र विकसित हो गए। अर्थव्यवस्था ने गतिशीलता धारण कर ली। लोग आकर नगरों में रहने लगे। कालान्तर में पश्चिम एशिया के साथ व्यापारिक मार्ग स्थापित हो गए।

34.

फ्रांस के प्रारम्भिक सामन्ती समाज के दो लक्षणों का वर्णन कीजिए।

Answer»

फ्रांस के प्रारम्भिक सामन्ती समाज के दो लक्षण निम्नलिखित हैं
⦁     फ्रांस में सामन्तवाद था। कृषक अपने खेतों के साथ-साथ सामन्त के खेतों पर कार्य करते थे। कृषक लॉर्ड को श्रम सेवा प्रदान करते थे और बदले में वे उन्हें सैनिक सुरक्षा देते थे।
⦁     सामन्त और राजाओं के अच्छे सम्बन्ध होते थे। सामन्तों की कई श्रेणियाँ थी; जैसे-ड्यूक या अर्ल, बैरन और नाइट्स।

35.

आज के युग में सामन्तवाद को बुरा क्यों समझा जाता है?

Answer»

आज के युग में स्वतन्त्रता और समानता की भावना शक्तिशाली बन चुकी है और मानव द्वारा मानव का शोषण किया जाना अनुचित समझा जाता है। इसी कारण आज सामन्तवाद एक बुरा शब्द बन चुका है।

Previous Next