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अकबर की धार्मिक नीति की विवेचना कीजिए।

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अकबर की धार्मिक नीति- अकबर महान् भारत में ही नहीं, वरन् विश्व के महानतम सम्राटों में प्रमुख स्थान रखता है। उसकी महानता का प्रमुख कारण है उसकी धार्मिक नीति, जिसके द्वारा वह दो परस्पर विरोधी धर्मावलम्बियों में समन्वय स्थापित करने में सफल रहा।
16वीं शताब्दी, जिस शताब्दी में अकबर भारत का शासक था, यूरोप के इतिहास में धर्मान्धता की शताब्दी मानी जाती है। उस समय धर्म के नाम पर अमानुषिक युद्ध एवं लोगों पर अमानवीय अत्याचार किए जाते थे। ऐसे समय में अकबर ने ‘सुलह-कुल की नीति को अपनाया, जिसके द्वारा एक अपूर्व धार्मिक सहिष्णुता को उसने भारत में स्थापित किया। मुस्लिम साम्राज्य के आरम्भ होने से लेकर अकबर के राज्यारोहण तक भारत में धर्म के नाम पर असंख्य अत्याचार किए गए थे किन्तु प्रकृति से ही सहिष्णु एवं उदार सम्राट अकबर ने शासितों को सुरक्षा एवं धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान की। उसकी यह उदार नीति विभिन्न परिस्थितियों की उपज थी।

अकबर की धार्मिक सहिष्णुता के तत्त्व – अकबर आरम्भ से ही धर्मान्ध अथवा अनुदार नहीं था। अपने पूर्वजों से उसे धार्मिक सहिष्णुता उत्तराधिकार में मिली थी। तैमूर, बाबर तथा हुमायूँ दिल्ली के अन्य सुल्तानों के समान धर्मान्ध अथवा अत्याचारी नहीं थे। इसके अतिरिक्त अकबर का संरक्षक बैरम खाँ भी उदार स्वभाव का था। 15वीं एवं 16वीं शताब्दी के भक्ति आन्दोलनों का प्रभाव भी अकबर पर पड़ा था। 1581 ई० में इबादतखाने की स्थापना के पश्चात् अकबर हिन्दू, जैन, सिक्ख, पारसी आदि अनेक धर्मावलम्बियों के सम्पर्क में आया, जिससे उसका धार्मिक दृष्टिकोण उदार होता गया तथा अन्त में उसने एक नवीन धर्म की स्थापना भी की, जिसके अनुसरण के लिए किसी भी धर्म का बन्धन आवश्यक नहीं था। अकबर के धार्मिक विचारों में क्रमिक परिवर्तन हुआ।
आरम्भ से वह उतना उदार एवं सहिष्णु नहीं वरन् इस्लाम में उसे पूरी आस्था थी तथा इस्लाम का वह सच्चा अनुयायी था, किन्तु हिन्दुओं के प्रति उसकी उदार नीति ने उसके धार्मिक दृष्टिकोण में धीरे-धीरे परिवर्तन लाना आरम्भ किया। स्मिथ के मत में उसके धार्मिक विचारों के विकास की तीन प्रमुख सीढ़ियाँ है

(i) 1556 से 1575 ई० तक, जिसमें वह इस्लाम का अनुयायी था।

(ii) 1575 से 1581 ई० तक, जब उसने इबादतखाने में होने वाले वाद-विवादों को ध्यानपूर्वक सुनकर अन्य धर्मों की ओर आकर्षित होना एवं धर्म के विषय में चिन्तन करना आरम्भ कर दिया था। (iii) 1582 ई० के पश्चात् जब उसने ‘दीन-ए-इलाही’ नामक धर्म की स्थापना की तथा सभी धर्मों को समभाव देखना आरम्भ किया।

अकबर के धार्मिक विचारों में परिवर्तन

(i) 1556 से 1575 ई० तक का काल – आरम्भिक काल में अकबर एक सच्चे मुसलमान की भाँति आचरण करता था। वह रोज नमाज पढ़ता था, मुल्ला तथा मौलवियों का आदर करता था और पीरों की दरगाहों के दर्शनार्थ जाता था। उसने कई मसजिदों का भी निर्माण कराया, वह हिन्दुओं से जजिया कर भी लेता था, इस प्रकार वह सच्चे मुसलमान सम्राट का प्रतिरूप था। तब भी हम उसे कट्टर एवं धर्मान्ध मुसलमान नहीं कर सकते, क्योंकि उसने धार्मिक अत्याचार की नीति को कभी भी नहीं अपनाया। परन्तु 15 मार्च, 1564 ई० से उसने जजिया कर लेना बन्द कर दिया था। वह आरम्भ से ही उदार हृदय था, किन्तु पहले उदार नहीं था जितना कि बाद में हो गया। इस प्रकार अपने जीवन के प्रथम काल में अकबर एक मुसलमान होने के नाते इस्लाम में पूरी आस्था रखने वाला तथा अपने धर्म का सच्चा अनुयायी सम्राट था।

(ii) सन् 1575 से 1581 ई० तक का काल – यह अकबर के जीवन का अत्यधिक महत्त्वपूर्ण काल था। वास्वत में इसी काल में उसके धार्मिक विचारों में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुआ।

(क) इबादतखाने की स्थापना – अनेक धर्मों से प्रभावित होकर अकबर ने फतेहपुर सीकरी में, 1575 ई० में एक इबादतखाना अथवा पूजागृह निर्मित करवाया जिसमें सभी धर्मों के अनुयायियों को अपने धर्म के विषय में बतलाने तथा अन्य धर्मावलम्बियों से तर्क करने की स्वतन्त्रता थी। आरम्भ में इस इबादतखाने में केवल मुसलमानों को ही भाग लेने का अधिकार था किन्तु उनकी कट्टरता, धर्मान्धता तथा असहिष्णुता से अकबर असन्तुष्ट हो उठा और सभी धर्मों के विषय में ज्ञान प्राप्त करने की उसकी जिज्ञासा प्रबल हो उठी। इसी समय मुसलमान मौलवियों के दो वर्ग हो गए। एक दल का नेता मखदूम-उल-मुल्क अब्दुल्ला सुल्तानपुरी था तथा दूसरे का शेख अब्दुल नबी था। इसमें परस्पर ईष्र्या, द्वेष होने के कारण संघर्ष आरम्भ हो गया, जिससे अकबर की इस्लाम के प्रति श्रद्धा कम होने लगी और उसने हिन्दू, जैन, सिक्ख, ईसाई तथा पारसी सभी मतावलम्बियों के लिए इबादतखाने के द्वार खोल दिया। सम्राट स्वयं इबादतखाने में होने वाले वाद-विवाद में भाग लेता था। पारसी एवं पुर्तगाली पादरियों से वह काफी प्रभावित हुआ था। एक पारसी पादरी दस्तूर मेहर जी राना ने सम्राट को यह सिखाया कि दरबार में सदैव अग्नि जलती रहनी चाहिए। उसी के प्रभाव से उसने सूर्य की उपासना भी करनी आरम्भ कर दी।

(ख) एक नए धर्म का विचार – निरन्तर धार्मिक चिन्तन एवं मनन के उपरान्त सम्राट इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि सभी धर्मों के मूल तत्त्व समान हैं तथा धर्म के नाम पर झगड़े एवं युद्ध करना व्यर्थ है। उसने यह सोचना आरम्भ किया कि वह एक ऐसा धर्म चलाएगा जिसे संसार के सभी धर्मों के अनुयायी अपना सकें तथा जो सब धर्मों का सार हो। धर्माचार्य बनने के लिए प्रथम कदम सम्राट ने 22 जून, 1579 ई० में उठाया, जब मुहम्मद साहब के जन्मदिन पर उसने स्वयं खुतबा पढ़ा। यद्यपि यह खुतबा पढ़ने का अधिकार केवल मुहम्मद साहब एवं उनके खलीफाओं को ही था। अकबर ने खुतबे के अन्त में ‘अल्ला हो अकबर’ शब्द का उच्चारण किया, जिसका अर्थ है कि अल्लाह सबसे बड़ा है और इस प्रकार उसने अपनी धार्मिक नीति को प्रचलित रखा।
दीन-ए-इलाही – अकबर ने गम्भीर धार्मिक चिन्तन के उपरान्त ‘दीन-ए-इलाही’ का निर्माण किया तथा 1581 ई० में उसने इस धर्म की घोषणा कर दी। इस धर्म के सिद्धान्त सरल थे तथा प्रत्येक व्यक्ति स्वेच्छा से इसका सदस्य बन सकता था। अकबर ने किसी भी व्यक्ति को इस धर्म के अनुसरण के लिए बाध्य नहीं किया और इसलिए उसके प्रमुख दरबारियों में से बहुत ही कम व्यक्तियों ने उसके इस धर्म को अंगीकार किया तथा अकबर की मृत्यु के साथ ही उसका धर्म ‘दीन-एइलाही’ भी लगभग समाप्त हो गया। इस धर्म का अन्तिम अनुयायी शाहजहाँ का पुत्र दारा शिकोह था, जिसके साथ ही दीन-ए-इलाही का पूर्णतया अन्त हो गया। अकबर के काल में केवल 18 व्यक्ति ही इसके सदस्य थे। राजा मानसिंह, भगवानदास, टोडरमल आदि कोई भी इसका सदस्य नहीं था। हिन्दुओं में केवल बीरबल दीन-ए-इलाही के अनुयायी थे। शेख मुबारक, अबुल फजल, फैजी, अजीज कोका आदि इसके महत्वपूर्ण सदस्य थे।

दीन-ए-इलाही के प्रमुख सिद्धान्त – दीन-ए-इलाही के सिद्धान्त अत्यन्त सरल थे

(अ) इसका प्रथम सिद्धान्त यह था कि ईश्वर एक है और अकबर उसका सबसे बड़ा पुजारी एवं पैगम्बर है।

(ब) दीन-ए-इलाही के अनुयायी को सूर्य तथा अग्नि की पूजा करनी पड़ती थी।

(स) इसके सदस्य को अपने जन्म दिन पर दावत देनी पड़ती थी।

(द) जो दावत मनुष्य के मरने के बाद उसके परिजनों को देनी पड़ती है, वह मनुष्य को अपने जीवनकाल में ही देनी पड़ती थी।

(य) प्रत्येक सदस्य के लिए मांस-भक्षण निषिद्ध था।

(र) परस्पर मिलने पर वे ‘अल्ला हो अकबर’ तथा ‘जल्ले-जलाल हू’ कहकर अभिवादन करते थे

(ल) निम्न श्रेणियों के व्यक्तियों के साथ उन्हें भोजन करने का निषेध था।

(व) उन्हें सम्राट को सजदा करना पड़ता था।

(श) दीन-ए-इलाही के अनुयायी चार श्रेणियों में विभक्त थे- प्रथम, जो अपनी सम्पत्ति सम्राट पर न्योछावर करने को प्रस्तुत रहते थे, द्वितीय, जो सम्पत्ति तथा जीवन समर्पित करने को उद्यत रहते थे, तृतीय, जो सम्राट के लिए सम्पत्ति, जीवन एवं सम्मान का बलिदान कर सकते थे तथा चतुर्थ जो सम्पत्ति, जीवन, सम्मान एवं धर्म समर्पित करने के लिए उद्यत रहते थे।

(ष) रविवार के दिन सम्राट धर्म की दीक्षा देता था तथा नए व्यक्तियों के धर्म परिवर्तन के लिए भी यही दिन निश्चित था।



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