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अकबर की राजपूत नीति का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए एवं मुगल साम्राज्य पर इसके प्रभावों का परीक्षण कीजिए।

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अकबर की राजपूत नीति – अकबर एक दूरदर्शी सम्राट था। उसने शीघ्र समझ लिया कि राजपूतों की सहायता के बिना हिन्दुस्तान में मुस्लिम साम्राज्य स्थायी नहीं रह सकता तथा उनके सक्रिय सहयोग के बिना कोई सामाजिक अथवा राजनैतिक एकता सम्भव नहीं हो सकती। अत: उसने प्रेम, सहानुभूति तथा उदारता से राजपूतों के हृदय को जीतकर उनसे मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित किए। इस नीति के परिणामस्वरूप अकबर मुगल साम्राज्य की नींव को सुदृढ़ कर सका। अकबर की उदार राजपूत नीति अपनाने के कारण- अकबर द्वारा राजपूतों के प्रति उदार दृष्टिकोण रखने के निम्नलिखित कारण थे

(i) व्यक्तिगत कारण – राजनीतिक एवं साम्राज्यवादी दृष्टिकोण के अतिरिक्त अकबर की राजपूत नीति के व्यक्तिगत कारण भी थे। अकबर ने अनुभव किया था कि उसके बड़े-से-बड़े पदाधिकारी अत्यन्त स्वार्थी हैं तथा वे समय पड़ने पर सदा विद्रोह करने को तत्पर रहते हैं। राज्यारोहण के बाद ही उसने देखा कि उसके सम्बन्धी तथा संरक्षक विश्वसनीय नहीं हैं। उसका भाई मिर्जा मुहम्मद हकीम, उसका संरक्षक बैरम खाँ, उसकी धाय माँ माहम अनगा तथा उसका (माहम अनगा का) पुत्र आधम खाँ सभी शक्ति हस्तगत करने को इच्छुक थे और उन्हें अकबर की कोई चिन्ता न थी। इसी प्रकार भारतीय मुसलमानों पर भी अकबर विश्वास नहीं कर सकता था।

अतः एक कुशल एवं दूरदर्शी राजनीतिज्ञ होने के नाते अकबर इस निर्णय पर पहुँचा कि राजपूत ही सबसे अधिक विश्वस्त एवं वीर जाति है, जो एक बार वचनबद्ध होकर कभी धोखा नहीं देती है और उस पर पूरा विश्वास किया जा सकता है। वीरता में भी राजपूत जाति अद्वितीय थी, जिसका उपयोग अकबर अपने हित के लिए कर सकता था। अत: अन्त में उसने राजपूतों एवं मुगलों की शत्रुता का अन्त करने का निश्चय किया, जो कि उसके पिता एवं पितामह के समय से चली आ रही थी। अकबर का यह विश्वास था कि राजपूतों के सहयोग के बिना न तो कोई सुदृढ़ साम्राज्य भारत में स्थापित किया जा सकता है। और न ही उसे स्थायी बनाया जा सकता है; अतः उसने निश्चय किया कि उसका साम्राज्य हिन्दू एवं मुसलमान दोनों जातियों के सहयोग से तथा दोनों के हित पर आधारित होगा। वह चाहता था कि राजपूत तथा हिन्दू मुगलों को विदेशी न समझकर भारतीय समझे।

इस कारण उसने प्रमुख राजपूत राज्यों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किए, जिससे राजपूतों तथा मुगलों के सम्बन्ध दृढ़ हो जाएँ। राजपूतों तथा हिन्दुओं के लिए उसने उच्च से उच्च पदों के द्वार खोल दिए। योग्यता के अनुसार पदों का वितरण किया गया, धर्म अथवा जाति के आधार पर नहीं। हिन्दुओं की प्रतिष्ठा, सम्पत्ति एवं जीवन की सुरक्षा का भार राज्य ने सँभालने का निश्चय किया तथा हिन्दुओं की पूर्ण सहानुभूति प्राप्त करने के लिए अकबर ने उन्हें धार्मिक स्वतन्त्रता भी प्रदान की। उसके हरम में उसकी हिन्दू रानियों को अपने धर्म का पालन करने की पूरी स्वतन्त्रता थी। अकबर स्वयं भी कभी-कभी तिलक लगाता एवं सूर्य की उपासना करता था। इस प्रकार उसने राजपूतों के साथ सम्मानपूर्ण व्यवहार करके उनका पूरा सहयोग प्राप्त किया।

(ii) राजनीति तथा साम्राज्यवादी दृष्टिकोण – अकबर एक दूरदर्शी तथा साम्राज्यवादी सम्राट था। वह यह भली प्रकार जानता था कि उसके पूर्व के मुस्लिम सुल्तानों के वंशों का अल्पकालीन होने का एक प्रमुख कारण राजपूतों की शत्रुता थी। वीर राजपूत जाति अभी तक मुसलमानों को अपना शत्रु समझती थी तथा उनको देश के बाहर निकालने के लिए प्रयत्नशील थी। खानवा के युद्ध में राणा साँगा के नेतृत्व में राजपूतों ने एक महान् किन्तु असफल प्रयास इसीलिए किया था। अकबर यह भी जानता था कि राजपूत स्वभाव के सच्चे, ईमानदार एवं स्वामिभक्त होते हैं और उनको मित्र बनाकर भारी लाभ प्राप्त किया जा सकता है, अत: एक कुशल कूटनीतिज्ञ की दृष्टि से अकबर ने राजपूतों को मुगलों का मित्र बनाने में अपने तथा अपने वंश का कल्याण समझा। इसी उद्देश्य को लेकर उसने ‘राजपूत नीति’ को जन्म दिया। किन्तु अकबर की राजपूत नीति का केवल यही एकमात्र कारण नहीं था जैसा कि कुछ पाश्चात्य विद्वानों ने सिद्ध करने का प्रयास किया है। वास्तव में यदि यही एक कारण रहा होता तो अकबर के पाखण्ड का भण्डाफोड़ उसके जीवनकाल में कभी-न-कभी अवश्य हो गया होता और राजपूतों के सहयोग को प्राप्त करने में वह असफल रहता। अकबर यह जानता था कि बलबन, अलाउद्दीन खिलजी तथा मुहम्मद तुगलक जैसे वीर एवं योग्य सुल्तान भी भारत में स्थायी राज्य स्थापित नहीं कर सके थे। इसका प्रमख कारण राजपत थे, जिनके साथ सल्तानों का व्यवहार हमेशा शत्रतापर्ण रहा था। अतः यदि इन रा मैत्रीपर्ण व्यवहार किया जाए तो इनकी शक्ति का उपयोग मगल साम्राज्य को दृढ़ बनाने के लिए किया जा सकता है। इस दृष्टिकोण से अकबर ने राजपूतों के प्रति सहृदयता एवं मैत्रीपूर्ण व्यवहार का नीति को जन्म दिया।
राजपूत नीति सम्बन्धी कार्य – अकबर ने राजपूतों से निकट का सम्बन्ध स्थापित करने तथा उन्हें प्रेमपूर्वक तथा सद्भावना सहित अपनी अधीनता स्वीकार करने हेतु जो ढंग अपनाए वे प्रधानतया चार प्रकार के थे

(i) धार्मिक सहिष्णुता की नीति – अकबर ने हिन्दुओं को पूर्णत: धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान की, यहाँ तक कि उसके हरम की हिन्दू स्त्रियों को मूर्ति पूजा करने की पूरी स्वतन्त्रता थी। अकबर स्वयं भी कभी-कभी हिन्दुओं के रीति-रिवाजों को मनाता था। उसने तीर्थ यात्रा कर तथा जजिया कर हटा दिया, अत: राजपूत ऐसे सम्राट को सहयोग देने को सहर्ष प्रस्तुत हो गए, जो उनके धर्म तथा गुणों को मान्यता एवं प्रतिष्ठा प्रदान करता था।

(ii) उच्च पदों पर नियुक्ति – अकबर ने उच्च पदों के द्वार सबके लिए खोल दिए। उसने योग्यता के आधार पर, धार्मिक भेदभाव किए बिना, पदों का वितरण किया। उसके नवरत्नों में हिन्दू और मुसलमान दोनों ही धर्मावलम्बी सम्मिलित थे। उसने कछवाहा-नरेश बिहारीमल को पंचहजारी मनसबदार बनाया तथा उसके पुत्र भगवानदास और पौत्र मानसिंह को भी सेना एवं प्रशासन सम्बन्धी उच्च पद प्रदान किए। अकबर के अन्य हिन्दू पदाधिकारियों में राजा टोडरमल तथा राजा बीबरल के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। अकबर ने 1582 ई० में राजा टोडरमल को दीवान-ए-अशरफ अर्थात भू-विभाग का अध्यक्ष बना दिया। राजा बीरबल को उसने अपने नवरत्नों में स्थान दिया और उन्हें सेनापति का भार सौंपकर अपनी साथ नीति को आगे बढ़ाया। जनता ने बीरबल को विनोदप्रियता का प्रतीक मानकर अकबर-बीरबल सम्बन्धी हजारों-लाखों किंवदन्तियाँ गढ़ लीं। इस प्रकार उसकी लोकप्रियता में वृद्धि हुई। यही नहीं, अकबर की सेना में भी आधे हिन्दू थे तथा उनमें से अनेक सेना में उच्च पदों पर आसीन थे। अकबर ने बाद में यह अनुभव किया कि हिन्दुओं एवं राजपूतों पर विश्वास करके उसने कोई भूल नहीं की थी।

(iii) वैवाहिक सम्बन्ध – अकबर ने प्रमुख राजपूत राजवंशों की राजकुमारियों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किए, जिससे राजपूतों के साथ अपने सम्बन्ध सुदृढ़ करने में अकबर को सहायता प्राप्त हुई। नार्मन जीग्लर तथा डिक हर्बर्ट आरनॉल्ड कोफ के अनुसार, राजस्थान तथा अन्य स्थानों पर राजपूत सरदारों के साथ राजनीतिक सम्बन्धों को निश्चित रूप प्रदान करने में इन वैवाहिक सम्बन्धों का विशिष्ट योगदान था। डॉ० बेनी प्रसाद के शब्दों में- “इन वैवाहिक सम्बन्धों से भारत के राजनीतिक इतिहास में एक नए युग का प्रादुर्भाव हुआ। इससे देश को प्रसिद्ध सम्राटों की एक परम्परा प्राप्त हुई और मुगल साम्राज्य की चारों पीढ़ियों को मध्यकालीन भारत के कुछ सर्वश्रेष्ठ सेनापतियों और योग्य राजनीतिज्ञों की सेवाएँ प्राप्त होती रही।

(iv) अनाक्रमण तथा सामाजिक सुधार – अकबर ने अन्य राज्यों को आत्मसात करने तथा उन पर आक्रमण करने की नीति का परित्याग कर दिया। उसने अपने धन व शक्ति को जनता के कल्याण में लगा दिया। अकबर ने मुस्लिम समाज के साथसाथ हिन्दू समाज के दोषों के निराकरण का भी प्रयास किया, जिससे वह हिन्दुओं के और भी निकट आ गया। उसने अन्तर्जातीय विवाह को प्रोत्साहन देकर देहज प्रथा, सती प्रथा, जाति की जटिलता, बाल-विवाह, शिशु हत्या आदि का विरोध किया तथा इनको सुधारने के लिए नियम भी बनाए। उसने विधवा पुनर्विवाह को भी प्रोत्साहन प्रदान किया। 1562 ई० के आरम्भ से ही उसने राजाज्ञा देकर युद्धबन्दियों को गुलाम बनाने की प्रथा पर रोक लगा दी। मथुरा के तीर्थयात्रियों पर कर लगाना उसे अनुचित लगा, अतः 1563 ई० में उसने सर्वत्र यात्री-कर समाप्त करने का आदेश दिया। फिर 1564 ई० में उसने जजिया कर को बन्द करवा दिया। इस प्रकार सम्पूर्ण देश के एक विशाल बहुमत की सहानुभूति और शुभकामनाएँ उसे प्राप्त हो गई। अबुल फजल ने लिखा है – “इस प्रकार सम्राट ने लोगों के आचरण को सुधारने का प्रयास किया।

अकबर की राजपूत नीति के परिणाम – अकबर की राजपूत नीति से मुगल साम्राज्य की बहुमुखी उन्नति हुई। राज्य का विस्तार हुआ, शासन व्यवस्था सुदृढ़ हुई, व्यापार को प्रोत्साहन मिला और सैनिक सम्मान में वृद्धि हुई। इन सबके परिणामस्वरूप देश समृद्ध हुआ और सम्राट को राष्ट्र के निर्माण में राजपूतों का पूर्ण सहयोग प्राप्त हुआ।

(i) मुगलों की शक्ति में वृद्धि – अकबर की सहिष्णुतापूर्ण नीति मुगल वंश के लिए अत्यधिक लाभकारी सिद्ध हुई। युद्ध कौशल में दक्ष राजपूतों से मैत्री-सम्बन्ध जोड़कर अकबर ने एक बहुत बड़ा लाभ यह उठाया कि अब उसे कुशल सैनिकों की भर्ती के लिए पश्चिमोत्तर प्रान्तों का मुँह नहीं ताकना पड़ता था। इससे मुगल साम्राज्य की नींव सुदृढ़ हो गई तथा अकबर के उत्तराधिकारी जब तक इस सहिष्णतापर्ण नीति का अनसरण करते रहे तब तक मगल चलता रहा। इस नीति का परित्याग करते ही मगल वंश का पतन आरम्भ हो गया।

(ii) सद्भावना की प्राप्ति – अकबर की राजपूत नीति का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह हुआ कि राजपूत, जो अभी तक मुसलमानों के शत्रु रहे थे तथा जिनसे सभी मुस्लिम सुल्तानों को युद्ध करने पड़ते थे, अब मुगल साम्राज्य के आधार स्तम्भ बन गए। अकबर ने अपनी उदार राजपूत नीति के फलस्वरूप न केवल राजस्थान पर अपना सुदृढ़ अधिकार स्थापित कर लिया, वरन् राजपूतों की सहायता से उसने भारत के विभिन्न मुस्लिम राज्यों तथा पश्चिमोत्तर सीमा के कुछ राज्यों को पराजित करने में भी अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की।

(iii) विद्रोह दमन में सहायता – इतना ही नहीं; विद्रोही राजपूत राज्यों को दबाने में भी उसने मित्र राजपूत राज्यों से पूरी-पूरी सहायता प्राप्त की। पूर्वी और दक्षिणी विजयों में भी अकबर को राजपूतों से पर्याप्त सहायता प्राप्त हुई।

(iv) राज्य–विस्तार – मेवाड़ के अतिरिक्त राजस्थान के सभी राज्य अकबर के अधीन हो गए। मेड़ता और रणथम्भौर जैसे राज्यों ने भी युद्ध के उपरान्त मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली। आमेर, जोधपुर, जैसलमेर, बीकानेर आदि राज्यों ने अकबर से मित्रता कर ली, जिनको देखकर छोटे-छोटे राज्य जैसे प्रतापगढ़, बाँसवाड़ा, दुर्गापुर आदि बिना युद्ध के ही अकबर के अधीन हो गए। मेवाड़ के महाराणा प्रताप को इन्हीं राजपूतों की सहायता से अकबर ने 1576 ई० में पराजित किया। अन्य छोटे-छोटे राज्यों को मुगल साम्राज्य में सम्मिलित कराने का श्रेय भी मुख्यत: उन्हीं राजपूतों को है, जो अकबर के सेनापति के रूप में कार्य कर रहे थे, अतः यथाशीघ्र सम्पूर्ण उत्तर भारत में अकबर की वीरता की धाक जम गई और दूसरी और उसकी उदारता का भी व्यापक प्रचार हो गया। अकबर ने राजपूतों की सहायता से केवल एक विशाल साम्राज्य ही अर्जित नहीं किया वरन् उसकी सुव्यवस्थित शासनव्यवस्था भी राजपूतों के सहयोग का ही परिणाम थी। उसने हिन्दुओं को योग्यतानुसार उच्च पदों पर आसीन किया तथा उनकी योग्यता का पूरा लाभ उठाया। राजा टोडरमल उसकी भूमि-व्यवस्था के लिए उत्तरदायी थे, जिनके द्वारा शासक तथा शासित दोनों वर्गों को भारी लाभ पहुँचा। इस प्रकार उसका जाज्वल्यमान युग राजपूतों के सहयोग से ही निर्मित हो सका। डॉ० ईश्वरी प्रसाद के अनुसार- “राजपूतों के माध्यम से उत्तर भारत के लाखों हिन्दू, अकबर के शुभचिन्तक बन गए और उसकी उन्नति तथा सफलता की प्रार्थना करने लगे।



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