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“बात सीधी थी पर” नामक कविता में कवि को पसीना क्यों आ गया? स्पष्ट कीजिए।

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‘पसीना पोंछना’ एक मुहावरा है जिसका अर्थ होता है निरंतर प्रयत्न करने पर भी सफलता न मिलने पर घबराहट होना । ऐसा तभी होता है जब कि कोई व्यक्ति जबरन किसी परिणाम को पाने की चेष्टा करता है। कवि ने भी यही किया था। बात और भाषा में सामंजस्य न बिठा पाने पर उसने बात को भाषा में बलपूर्वक ढूंस दिया। ऊपर से तो उसे लगा कि बात बन गई परन्तु वास्तव में ऐसा था नहीं। किसी पेंच की चूड़ियाँ जब ठोक-पीट करने से बेकार हो जाती हैं तो वह वस्तु को मजबूती से कसने में असमर्थ हो जाता है। यही हालत उस समय कवि के प्रयत्न की हो रही थी। अपना हर प्रयास बेकार होते देख कवि अंदर ही अंदर बेचैन हो उठा और उसके माथे पर घबराहट से पसीना आ गया और झेंप मिटाने को वह अपना पसीना पोंछने लगा।



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