1.

भाषा के चक्कर में सीधी-सी बात टेढ़ी हो जाती है। समझाइए।

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जब कवि कविता के बाहरी रूप अर्थात् शिल्प पर अधिक बल देता है, तो कविता का सीधा-सादा कथ्य भी सहज रूप में पाठकों तक नहीं पहुँच पाता। भाषा की साज-सज्जा के चक्कर में कविता की आत्मा-बात-अनकही रह जाती है। कवि ने यही किया। वह अपनी बात या मनोभाव को अत्यन्त प्रभावशाली भाषा में प्रकट करने के चक्कर में फंस गया। भाषा के सुधार और बदलाव पर उसने जितना जोर दिया बात उतनी अस्पष्ट होती गई। भाषा को ही महत्व देने वाले लोगों के उकसाने में आकर स्थिति कवि के नियंत्रण से बाहर हो गई । अधीर होकर, बिना सोचे-समझे उसने बात को भाषा में बलपूर्वक स्थापित करने की कोशिश की और वह अपने उद्देश्य में विफल हो गया।



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