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काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ कविता के बहाने।कविता एक खिलना है फूलों के बहानेकविता का खिलना भला फूल क्या जाने!बाहर भीतर इस घर, उस घर बिनामुरझाए महकने के माने फूल क्या जाने?

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कठिन-शब्दार्थ- खिलना = फूल का खिलना, कविता का आनंदमय प्रभाव। बाहर, भीतर = सीमित स्थान में, (कविता के पक्ष में), सर्वत्र। इस घर, उस घर = अपने देश में और विदेशों में। बिना मुरझाए = सदा एक जैसा आनंद देते हुए। महकना = (फूल के पक्ष में) सुगंध बिखेरना (कविता के पक्ष में) आनंदित करना, प्रभावित करना।

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत.काव्याशं हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित कवि कुँवर नारायण की कविता ‘कविता के बहाने से लिया गया है। कवि कविता की तुलना फूल और उसकी सुगंधि से कर रहा है–

व्याख्या-कविता और फूल दोनों ही खिलते हैं, आनंददायक प्रभाव व्यक्त करते हैं, किन्तु कविता के खिलने की तुलना फूल के खिलने से नहीं की जा सकती। फूल जब खिलता है तो उसकी सुगन्ध उसके निकटवर्ती स्थान तक ही फैलती है। कविता के सरस प्रभाव की कोई सीमा नहीं है। कविता का रसात्मक आनन्द समस्त विश्व को सुख देता है। कुछ दिनों के बाद फूल मुरझा जाता है और उसकी सुगन्ध भी नष्ट हो जाती है, किन्तु कविता की सरसता अनन्त काल तक सम्पूर्ण संसार को आनन्द का अनुभव कराती रहती है।

विशेष-
(i) कवि ने फूल तथा कविता की समानता उनके खिलने में बताई है। फूल डाली पर खिलता है और सुगन्ध बिखेरता है। वैसे ही कविता कवि के हृदय में विकसित होकर जब बाहर प्रकट होती है तो अपने रस से लोगों को आनन्दित करती है। फूल की महक अपने आस-पास के घरों के बाहर तथा भीतर लोगों को आनन्द देती है। उसकी महक दूर के स्थानों तक नहीं पहुँच पाती।
(ii) आशय यह है कि फूल मुरझा जाता है तो उसकी सुगन्ध नष्ट हो जाती है किन्तु कविता कभी भी मुरझाती नहीं अर्थात् कविता की रसात्मकता समय बीतने पर नष्ट नहीं होती। कविता कभी पुरानी नहीं पड़ती, वह हर काल में लोगों को आनन्द देती है।
(iii) काव्यांश की भाषा सरल, किन्तु भाव की गहराई को छिपाए है। शैली में कथन की विचित्रता कवि के काव्य-कौशल का प्रमाण दे रही है।
(iv) काव्यांश में ‘बिना मुरझाए महकने के माने’ में अनुप्रास, खिलना’ में यमक तथा ‘कविता का ….. क्या जाने’ में व्यतिरेक अलंकार है।



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