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मीरा श्रीकृष्ण के प्रेम में दीवानी भक्तिन कही जाती है। वह उन्हें ‘गिरिधर,’ ‘गोपाल’ आदि नामों से पुकारती थी। श्री कृष्ण को गिरिधर इसलिए कहते हैं क्योंकि उन्होंने इंद्र के प्रकोप से वृंदावन के लोगों की रक्षा करने के लिए गोवर्धन पर्वत को छतरी के समान अपनी उंगली पर धारण कर लिया था और वृंदावनवासियों को घनघोर वर्षा से बचाया था। वे ‘गोपाल’ इसलिए कहलाते हैं क्योंकि वे गौओं को चराया करते थे।1. श्रीकृष्ण की आकृति तथा वर्ण कैसा है?2. श्रीकृष्ण के माथे की शोभा में वृद्धि किस से हो रही है?3. श्रीकृष्ण की कौन-सी ध्वनि मन को आकर्षित करती है?4. मीरा ने किसे अपना पति कहा है/5. ‘तात मात भ्रात बंधु, आपनो न कोई ‘ से मीरा का क्या आशय है?6. मीरा की प्रेम बेलि पर कैसा फल लगा है?7. मीरा ने श्रीकृष्ण की कैसी छवि को अपने मन में कल्पित किया था ?8. मीराबाई ने श्रीकृष्ण के प्रति अपने कैसे भावों को अभिव्यक्त किया था ?

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1. श्रीकृष्ण की मन को मोहित करने वाली आकृति तथा सांवले वर्ण की शारीरिक छवि है।

2. श्रीकृष्ण के माथे की शोभा में वृद्धि उनके माथे पर लगे हुए लाल रंग के तिलक से हो रही है।

3. श्रीकृष्ण की कौन-सी ध्वनि मन को आकर्षित करती है?

4. मीरा ने मोर पंखों का मुकुट धारण करने वाले श्रीकृष्ण को अपना पति कहा है।

5. मीरा का मानना है कि अब इस संसार में श्रीकृष्ण के अतिरिक्त उसका अपना कोई पिता, माता, भाई-बंधु नहीं

6. मीरा की प्रेम-बेलि पर श्रीकृष्ण से मिलन रूपी आनंद का फल लगा है।

7. मीरा ने अपने मन में कल्पित किया था कि श्रीकृष्ण अपार शोभावान थे। उनकी छवि शोभा से युक्त थी। उनका सांवला रंग था। उनकी आँखें अति संदर और बड़ी-बड़ी थीं। उनके सिर पर मोर-मुकुट शोभा देता था। कानों में कुंडल और माथे पर लाल रंग का तिलक अपार शोभा देता था। उनके होठों पर बाँसुरी अति सुंदर लगती है। वैजन्ती माला उनकी छाती की शोभा बढ़ाती है।

8. मीरा ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया था कि श्रीकृष्ण ही उसके स्वामी थे। उनके अतिरिक्त कोई भी दूसरा उसका नहीं था। वे ही उसके पति थे। उन्हीं के कारण उसने अपने सारे सांसारिक रिश्ते-नाते त्याग दिए थे। उन्हीं के लिए उसने सभी सामाजिक और दुनियादारी के बंधन सदा के लिए छोड़ दिए थे। उसने अपने आँसुओं से ही अपने प्रेम को पोषित किया था।



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