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निम्नलिखित पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए(ख) मेरे तो गिरिधर गोपाल, दूसरो न कोई।जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई।तात मात भ्रात बंधु, आपनो न कोई।छोड़ि दई कुल की कानि, कहा करै कोई।संतन ढिग बैठि बैठि, लोक लाज खोई।अँसुअन जल सींचि सींचि, प्रेम बेलि बोई।अब तो बेलि फैल गई, आनंद फल होई।भगत देखि राजी भई, जगत देखि रोई।दासी मीरा लाल गिरधर, तारौ अब मोही। |
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Answer» मीरा जी कहती हैं कि मेरा तो सर्वस्व गोवर्धन पर्वत धारी श्रीकृष्ण हैं। उनके अतिरिक्त मेरा किसी से कोई संबंध नहीं। मोर-मुकुट धारण करने वाले श्रीकृष्ण ही मेरे पति हैं। पिता, माता, भाई, सगा-संबंधी इनमें अब मेरा अपना कोई नहीं है। मैंने अपने परिवार की मान-मर्यादा को छोड़ कर उन्हें अपना लिया है। इसलिए मेरा अब कोई क्या कर सकता है अर्थात् मुझे किसी की परवाह नहीं है। मैं लोक-लाज की चिंता छोड़कर संतों के पास बैठती हूँ। मैंने आँसुओं के जल से सींच-सींच कर कृष्ण प्रेम की बेल को बोया है। अभिप्राय यह है कि श्रीकृष्ण के प्रति मीरा के मन की प्रेम रूपी बेल का विकास हो चुका है। अतः अब उसे किसी प्रकार से भी नष्ट नहीं किया जा सकता। मीरा जी कहती हैं कि वे प्रभु भक्त को देख कर तो प्रसन्न होती हैं पर संसार को देखकर रो पड़ती हैं। भाव यह है कि माया-मोह में लिप्त प्राणियों के दयनीय अंत की कल्पना मात्र से मीरा का हृदय दुःख से भर जाता है। मीरा स्वयं को श्रीकृष्ण की दासी मानती हुई उनसे अपने उद्धार की प्रार्थना करती है। |
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