1.

व्यक्ति की रुचियों के विकास की प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिए।

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यह सत्य है कि व्यक्ति की कुछ रुचियाँ जन्मजात होती हैं, परन्तु रुचियों का समुचित विकास जीवन में धीरे-धीरे तथा क्रमिक रूप से होता है। शिशु की रुचियों का आधार उसकी ज्ञानेन्द्रियाँ होती हैं, अर्थात् शैशवावस्था में रुचियों का विकास ज्ञानेन्द्रियों से सम्बन्धित होता है। बाल्यावस्था में बालक की सक्रियता बढ़ जाती है; अतः इस अवस्था में उसकी रुचियों का विकास क्रियात्मक खेलों के माध्यम से होता है।
बाल्यावस्था के उपरान्त किशोरावस्था में व्यक्ति की रुचियों का विकास कल्पनाओं, संवेगों तथा जिज्ञासा के माध्यम से होता है। इसके उपरान्त प्रौढ़ावस्था में व्यक्ति की नयी रुचियाँ प्रायः उत्पन्न नहीं होती। इस अवस्था में व्यक्ति की रुचियाँ स्थायी रूप ग्रहण करती हैं।



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