This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.
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जैव विविधता के तीन आवश्यक घटकों (कंपोनेंट) के नाम लिखिए। |
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Answer» जैव विविधता के तीन आवश्यक घटक निम्नवत् हैं – 1. आनुवंशिक विविधता 2. जातीय विविधता 3. पारिस्थितिकिय विविधता प्रश्न |
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पारितन्त्र सेवा के अन्तर्गत बाढ़ व भू- अपरदन (सॉयल इरोजन) नियन्त्रण आते हैं। यह किस प्रकार पारितन्त्र के जीवीय घटकों (बायोटिक कम्पोनेंट) द्वारा पूर्ण होते हैं? |
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Answer» पारितन्त्र को संरक्षित कर बाढ़, सूखा व भू-अपरदन (soil erosion) जैसी समस्याओं पर नियन्त्रण पाया जा सकता है। वृक्षों की जड़ें मृदा कणों को जकड़े रहती हैं, जिससे जल तथा वायु प्रवाह में अवरोध उत्पन्न होते हैं। वृक्षों के कटान से यह अवरोध समाप्त हो जाता है। मृदा की ऊपरी उपजाऊ परत तीव्र वायु या वर्षा के जल के साथ बहकर नष्ट हो जाती है। इसे मृदा अपरदन कहते हैं। पहाड़ों में जल ग्रहण क्षेत्रों के वृक्षों को काटने से मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ आ जाती है और यह अधिक गम्भीर रूप धारण कर लेती है। बाढ़ के समय नदियों का पानी किनारों से तेज गति से टकराता है और इन्हें काटता रहता है। इसके फलस्वरूप नदी का प्रवाह सामान्य दिशा के अतिरिक्त अन्य दिशाओं में भी होने लगता है। वृक्षारोपण, बाढ़ नियन्त्रण तथा मृदा अपरदन को रोकने का प्रमुख उपाय है। वृक्ष मरुस्थलों में वातीय अपरदन (wind erosion) को रोकने में उपयोगी होते हैं। वृक्ष वायु गति की तीव्रता को कम करने में सहायक होते हैं जिससे अपरदन की दर कम हो जाती है। |
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पवित्र उपवन क्या हैं ? उनकी संरक्षण में क्या भूमिका है? |
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Answer» अलौकिक ग्रूव्स या पवित्र उपवन पूजा स्थलों के चारों ओर पाये जाने वाले वनखण्ड हैं। ये जातीय समुदायों/राज्य या केन्द्र सरकार द्वारा स्थापित किये जाते हैं। पवित्र उपवनों से विभिन्न प्रकार के वन्य जन्तुओं और वनस्पतियों को संरक्षण प्राप्त होता है क्योंकि इनके आस-पास हानिकारक मानव गतिविधियाँ बहुत कम होती हैं। इस प्रकार ये वन्य जीव संरक्षण में धनात्मक योगदान प्रदान करते हैं। |
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पारितन्त्र के कार्यों के लिए जैवविविधता कैसे उपयोगी है? |
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Answer» जैव विविधता की पारितन्त्र के कार्यों के लिए उपयोगिता (Utility of Biodiveristy for Ecosystem Functioning) – अनेक दशकों तक पारिस्थितिकविदों का विश्वास था कि जिस समुदाय में अधिक जातियाँ होती हैं वह पारितन्त्र कम जाति वाले समुदाय से अधिक स्थिर रहता है। डेविड टिलमैन (David Tilman) ने प्रयोगशाला के बाहर के भूखण्डों पर लम्बे समय तक पारितन्त्र के प्रयोग के बाद पाया कि उन भूखण्डों में जिन पर अधिक जातियाँ थीं, साल दर साल कुल जैवभार में कम विभिन्नता दर्शाई। उन्होंने अपने प्रयोगों में यह भी दर्शाया कि विविधता में वृद्धि से उत्पादकता बढ़ती है। हम यह महसूस करते हैं कि समृद्ध जैव विविधता अच्छे पारितन्त्र के लिए जितनी आवश्यक है, उतनी ही मानव को जीवित रखने के लिए भी आवश्यक है। प्रकृति द्वारा प्रदान की गई जैव विविधता की अनेक पारितन्त्र सेवाओं में मुख्य भूमिका है। तीव्र गति से नष्ट हो रही अमेजन वन पृथ्वी के वायुमण्डल को लगभग 20 प्रतिशत ऑक्सीजन, प्रकाश संश्लेषण द्वारा प्रदान करता है। पारितन्त्र की दूसरी सेवा परागणकारियों; जैसे- मधुमक्खी, गुंजन मक्षिका पक्षी तथा चमगादड़ द्वारा की जाने वाली परागण क्रिया है जिसके बिना पौधों पर फल तथा बीज नहीं बन सकते। हम प्रकृति से अन्ये अप्रत्यक्ष सौन्दर्यात्मक लाभ उठाते हैं। पारितन्त्र पर्यावरण को शुद्ध बनाता है। सूखा तथा बाढ़ आदि को नियन्त्रित करने में हमारी मदद करता है। |
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किसी भौगोलिक क्षेत्र में जाति क्षति के मुख्य कारण क्या हैं? |
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Answer» जाति क्षति के कारण (Causes of Species Loss) – विभिन्न समुदायों में जीवों की संख्या घटती-बढ़ती रहती है। जब तक किसी पारितन्त्र में मौलिक जाति उपस्थित रहती है तब तक प्रजाति के सदस्यों की संख्या में वृद्धि होती रहती है। मौलिक जाति के विलुप्त होने पर इसके जीनपूल में उपस्थित महत्त्वपूर्ण लक्षण विलुप्त हो जाते हैं। यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन मानव हस्तक्षेप के कारण सम्पूर्ण विश्व जाति क्षति की बढ़ती हुई दर का सामना कर रहा है। जाति क्षति के मुख्य कारण निम्नवत् हैं – (i) आवासीय क्षति तथा विखण्डन (Habitat Loss and Fragmentation) – मानवीय हस्तक्षेप के कारण जीवों के प्राकृतिक आवासों का नाश हुआ है। जिसके कारण जातियों का विनाश गत 150 वर्षों में अत्यन्त तीव्र गति से हुआ है। मानव हितों के कारण औद्योगिक क्षेत्रों, कृषि क्षेत्रों, आवासीय क्षेत्रों में निरन्तर वृद्धि हो रही है जिससे वनों का क्षेत्रफल 18% से घटकर लगभग 9% रह गया है। आवासीय क्षति जन्तु व पौधे के विलुप्तीकरण का मुख्य कारण है। विशाल अमेजन वर्षा वन को सोयाबीन की खेती तथा जानवरों के चरागाहों के लिए काट कर साफ कर दिया गया है। इसमें निवास करने वाली करोड़ों जातियाँ प्रभावित हुई हैं और उनके जीवन को खतरा उत्पन्न हो गया है। आवासीय क्षति के अतिरिक्त प्रदूषण भी जातियों के लिए एक बहुत बड़ा खतरा है। मानव क्रियाकलाप भी जातीय आवासों को प्रभावित करते हैं। जब मानव क्रियाकलापों द्वारा बड़े आवासों को छोटे-छोटे खण्डों में विभक्त कर दिया जाता है, तब जिन स्तनधारियों और पक्षियों को अधिक आवास चाहिए वह बुरी तरह प्रभावित होते हैं जिससे समष्टि में कमी होती है। (ii) अतिदोहन (Over Exploitation) – मानव हमेशा से भोजन तथा आवास के लिए प्रकृति पर निर्भर रहा है, परन्तु लालच के वशीभूत होकर मानव प्राकृतिक सम्पदा का अत्यधिक दोहन कर रहा है जिसके कारण बहुत-सी जातियाँ विलुप्त हो रही हैं। अतिदोहन के कारण गत 500 वर्षों में अनेक प्रजातियाँ विलुप्त हो गई हैं। अनेक समुद्री मछलियों की प्रजातियाँ शिकार के कारण कम होती जा रही हैं जिसके कारण व्यावसायिक महत्त्व की अनेक जातियाँ खतरे में हैं। (iii) विदेशी जातियों का आक्रमण (Alien Species Invasions) – जब बाहरी जातियाँ अनजाने में या जान बूझकर किसी भी उद्देश्य से एक क्षेत्र में लाई जाती हैं, तब उनमें से कुछ आक्रामक होकर स्थानीय जातियों में कमी या उनकी विलुप्ति का कारण बन जाती हैं। गाजर घास (पार्थेनियम) लैंटाना और हायसिंथ ( आइकॉर्निया) जैसी आक्रामक खरपतवार जातियाँ पर्यावरण तथा अन्य देशज जातियों के लिए खतरा बन गई हैं। इसी प्रकार मत्स्य पालन के उद्देश्य से अफ्रीकन कैटफिश क्लेरियस गैरीपाइनस मछली को हमारी नदियों में लाया गया, लेकिन अब ये मछली हमारी नदियों की मूल अशल्कमीन (कैटफिश) जातियों के लिए खतरा पैदा कर रही हैं। (iv) सहविलुप्तता (Co-extinctions) – एक जाति के विलुप्त होने से उस पर आधारित दूसरी जन्तु व पादप जातियाँ भी विलुप्त होने लगती हैं। उदाहरण के लिए– एक परपोषी मत्स्य जाति विलुप्त होती है, तब उसके विशिष्ट परजीवी भी विलुप्त होने लगते हैं। (v) स्थानान्तरी अथवा झूम कृषि (Shifting or Jhum Cultivation) – जंगलों में रहने वाली जन जातियाँ विभिन्न जन्तुओं का शिकार करके भोजन प्राप्त करती हैं। इनका कोई निश्चित आवास नहीं होता। ये जीवनयापन के लिए एक स्थान से दूसरे स्थानों पर स्थानान्तरित होती रहती हैं। ये जंगल की भूमि पर खेती करते हैं, इसके लिए ये जनजातियाँ प्राय: जंगल के पेड़-पौधों, घास फूस को जलाकर नष्ट कर देते हैं। इस प्रकार की कृषि को झूम कृषि कहते हैं। इसके कारण वन्य प्रजातियाँ स्थानाभाव के कारण प्रभावित होती हैं। |
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क्या आप ऐसी स्थिति के बारे में सोच सकते हैं, जहाँ पर हम जान-बूझकर किसी जाति को विलुप्त करना चाहते हैं? क्या आप इसे उचित समझते हैं? |
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Answer» जब बाहरी जातियाँ अनजाने में या जान-बूझकर किसी भी उद्देश्य से एक क्षेत्र में लाई जाती हैं, तब उनमें से कुछ आक्रामक होकर स्थानीय जातियों में कमी या उनकी विलुप्ति का कारण बन जाती हैं। गाजर घास लैंटाना और हायसिंथ (आइकॉर्निया) जैसी आक्रामक खरपतवार जातियाँ पर्यावरण तथा अन्य देशज जातियों के लिए खतरा बन गई हैं। इसी प्रकार मत्स्य पालन के उद्देश्य से अफ्रीकन कैटफिश क्लेरियस गैरीपाइनस मछली को हमारी नदियों में लाया गया, लेकिन अब ये मछली हमारी नदियों की मूल अशल्कमीन (कैटफिश जातियों) के लिए खतरा पैदा कर रही हैं। इन हानिकारक प्रजातियों को हमें जान-बूझकर विलुप्त करना होगा। इसी प्रकार अनेक विषाणु जैसे-पोलियो विषाणु को विलुप्त करके दुनिया को पोलियो मुक्त करना चाहते हैं। |
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‘तप्त स्थल (हॉट स्पॉट) क्या हैं? भारत में स्थित दो तप्त स्थलों के नाम लिखिए। |
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Answer» वह भौगोलिक क्षेत्र जहाँ की जैव विविधता संकट में होती है, तप्त स्थल कहलाता है। हिमालय (पूर्वी हिमालय) तथा पश्चिमी घाट भारत में स्थित प्रमुख तप्त स्थल हैं। |
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रेड डाटा बुक से आप क्या समझते हैं? इसकी उपयोगिता बताइए।या रेड डाटा बुक किसे कहते हैं। इसमें उल्लिखित किन्हीं चार स्तनियों के नाम लिखिए। |
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Answer» विश्व संरक्षण संघ (World Conservation Union- WCU) – जिसे अन्तर्राष्ट्रीय प्राकृतिक संरक्षण संघ (International Union of Conservation of Nature and Natural Resources- IUCN या IUCNNR) भी कहा जाता है, के अध्ययन से ज्ञात हुआ कि जैव विविधता को विश्व के सभी भागों में अति संकट से गुजरना पड़ रहा है। इस सम्बन्ध में wCU ने अध्ययन द्वारा संकटग्रस्त जीवों की सूची लिपिबद्ध की जिसे रेड डाटा बुक कहा जाता है। इस सूची में उन जातियों एवं उपजातियों को सम्मिलित किया गया जो विलोपन के खतरे से गुजर रही हैं। इसका प्रकाशन पहली बार सन् 1963 में स्विट्जरलैण्ड में किया गया जहाँ WCU का मुख्यालय है। WCU ने रेड डाटा बुक में संकटग्रस्त जातियों को विभिन्न श्रेणियों में बाँटकर विभाजित किया और उन्हें सूचीबद्ध किया। रेड डाटा बुक की सहायता से हमें संकटग्रस्त जीवों की जानकारी आसानी से उपलब्ध हो जाती है। इस जानकारी की सहायता से हम उन संकटग्रस्त जीवों के संरक्षण के लिए प्रयास कर सकते हैं और उन्हें विलुप्त होने से बचा सकते हैं। इसमें उल्लिखित चार स्तनी इस प्रकार हैं- 1. काला हिरण 2. चीतल 3. चिंकारा तथा 4. तेन्दुआ। |
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भारत का प्रथम राष्ट्रीय उद्यान है –(क) दुधवा राष्ट्रीय उद्यान (ख) काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान (ग) कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान (घ) कान्हा राष्ट्रीय उद्यान |
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Answer» (ग) कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान |
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वन्य प्राणी उत्पादों के लिए मनुष्य का लोभ’ शीर्षक पर टिप्पणी लिखिए। |
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Answer» स्वतन्त्रता के बाद, क्रीड़ा आखेट (game hunting) का स्थान फर, चमड़े, मांस, हाथीदाँत, औषधियों, प्रसाधनों, सुगन्ध-द्रव्यों, साज-सज्जा, स्मृति चिन्हों, संग्रहालयी निदर्शो (museum specimens) आदि के लिए, वन्य प्राणियों के चोरी और सीनाजोरी से शिकार ने ले लिया। इस प्रकार, वन्य प्राणियों का विनाश व्यापक और तीव्र गति से होने लगा। उदाहरणार्थ, एक कामोत्तेजक औषधि (aphrodisiac) के संश्लेषण में प्रयुक्त सींग के लिए गैंडे (rhinoceros) का विगत 40-50 वर्षों में व्यापक वध हुआ है। इसी प्रकार, हाथीदाँत (ivory) के लिए हाथियों का, कस्तूरी (musk-एक अत्यधिक सुगन्धित द्रव्य जो नर की नाभि के निकट स्थित एक पुटी में भरा होता है) के लिए कस्तूरी मृग (musk deer) का, चर्बी, मांस, खाल, आदि के लिए ह्वेल का, फर के लिए हिमालयी हिमचीते (Himalayan snow-leopard) का, चमड़े के लिये बाघों, लोमड़ियों, घड़ियालों, साँभर, साँपों आदि का व्यापक वध हुआ है और अब भी हो रहा है। |
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जीवमण्डल आरक्षित क्षेत्र से आप क्या समझते हैं? भारत में कितने जीव-मण्डल आरक्षित क्षेत्र हैं?यासंरक्षित जैवमण्डल क्या है? किन्हीं दो भारतीय संरक्षित जैवमण्डल के नाम लिखिए। |
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Answer» जीवमण्डल आरक्षित क्षेत्र (Biosphere Reserve) – सन् 1971 में यूनेस्को की मनुष्य एवं जीव-मण्डल परियोजना के अन्तर्गत मानव कल्याण हेतु जीवमण्डल के संरक्षण की दृष्टि से जीवमण्डल आरक्षित क्षेत्रों की स्थापना का शुभारम्भ किया गया। भारत में कुल 18 जीवमण्डल आरक्षित क्षेत्र हैं जिनमें से हिमालय प्रदेश का शीत मरुस्थल क्षेत्र तथा शेशाचालम प्रमुख हैं। |
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सिद्ध कीजिए कि “मानव-कल्याण, वन्य प्राणियों के साथ सहअस्तित्व में छिपा हुआ है।” |
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Answer» हजारों-लाखों वर्ष पूर्व का आदिमानव (primitive man) स्वयं एक वन्य प्राणि था जो भोजन के लिए अन्य वन्य प्राणियों का शिकार करता था। सभ्यता (civilization) और संस्कृति (culture) के उदय के साथ-साथ, प्रागैतिहासिक (prehistoric) मानव में वन्य प्राणियों के प्रति प्रेम और इनके साथ सहअस्तित्व की भावना का भी उदय हुआ। प्रारम्भ में प्रागैतिहासिक मानव ने, शिकार में सहायता हेतु, कुत्तों को पाला। भूवैज्ञानिक (geological) प्रमाणों से पता चलता है कि बाद में, लगभग 5000 वर्ष पूर्व की सिन्धु घाटी सभ्यता (Indus valley civilization) तक, गाय एवं बैल, भैंस, हाथी, बकरी, मछलियाँ, मगरमच्छ आदि कई प्रकार के वन्य प्राणी मानव-जीवन से सम्बद्ध हो गये। इनके अतिरिक्त भी, भित्ति-चित्रणों में और सिक्कों, बर्तनों आदि पर खुदाई में शेर, बाघ, गैंडे, सर्प, बन्दर आदि कुछ ऐसे वन्य प्राणियों का समावेश हो गया जिनसे कि मानव घबराता या डरता था। इसके बाद, ईसापूर्व के धार्मिक दर्शनों (religious philosophies), जैसे कि हिन्दू धर्म (Hinduism), बौद्ध-धर्म (Budhhism), जैन- धर्म (Jainism) आदि में, वन्य प्राणियों के वध को रोकने हेतु, ‘अहिंसा (Ahimsa or non-violence) धार्मिक सिद्धान्त (sacred tenet) के रूप में अपनाया गया। आर्यों (Aryans) ने शेर, मृग, सारस, मोर, हाथी, बकरी, घड़ियाल, बैल, गरुड़ (eagle), बत्तख आदि को देवी-देवताओं की सवारियाँ (mounts) मानकर इनका सम्मान किया। इस प्रकार उपर्युक्त वर्णन से सिद्ध होता है कि मानव-कल्याण वन्य प्राणियों के साथ सहअस्तित्व में छिपा हुआ है अर्थात् यदि मानव वन्य प्राणियों के साथ प्रेमभाव से रहेगा तो उनका कल्याण निश्चित है। परन्तु यदि वह उनका विनाश करता है तो कुछ समय पश्चात्, उनकी हानि परिलक्षित होने लगेगी। |
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प्राणि विहार क्या है? भारत के दो प्राणि विहारों के नाम लिखिए। |
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Answer» अभयारण (प्राणि विहार, Sanctuaries) – अभयारण्यों का उद्देश्य केवल वन्य जीवन का संरक्षण करना होता है। अतः इसमें व्यक्तिगत स्वामित्व, लकड़ी काटने, पशुओं को चराने आदि की अनुमति इस प्रतिबन्ध के साथ दी जाती है कि इन क्रिया-कलापों से वन्य प्राणी प्रभावित न हों। इनकी स्थापना एवं नियन्त्रण सम्बन्धित राज्य सरकार के अधीन होती है। भारत में लगभग 520 अभयारण हैं। भारत के दो प्राणि विहार- 1. जलदापारा जन्तु विहार, मदारीहाट-पश्चिमी बंगाल 2. घाना पक्षी विहार, भरतपुर-राजस्थान। |
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“बाघ परियोजना का वर्णन कीजिए। |
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Answer» बाघ परियोजना (Project Tiger) – इस परियोजना का आरम्भ सन् 1973 में किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य विभिन्न राष्ट्रीय उद्यानों में बाघों का संरक्षण करना है। इससे सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय उद्यान, कॉर्बेट नेशनल पार्क, नैनीताल (उत्तराखण्ड), रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान, सवाई माधोपुर (राजस्थान) एवं सुन्दरवन चीता अभयारण्य (पं बंगाल) हैं। |
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आइ०यू०सी०एन० (IUCN) तथा डब्लूडब्लू०एफ० (WWF) का पूरा नाम लिखिए। |
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Answer» IUCN – अन्तर्राष्ट्रीय प्राकृतिक संरक्षण संघ (International Union of Conservation of Nature and Natural Resources) WWF – World Wide Fund. |
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भारत के राष्ट्रीय जन्तु का नाम लिखिए। इसके संरक्षण के लिए कौन-सी परियोजना प्रारम्भ की गई है? |
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Answer» भारत के राष्ट्रीय जन्तु का नाम ‘बाघ’ है। इसके संरक्षण के लिए प्रोजेक्ट टाइगर’ परियोजना प्रारम्भ की गई है। |
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निम्नलिखित प्राणी कहाँ पाये जाते हैं?1. बबर शेर 2. बाघ |
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Answer» 1. बबर शेर – गुजरात के काठियावाड में स्थित गिर जंगल में। 2. बाघ – पश्चिम बंगाल में स्थित सुन्दरवन में। |
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