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This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.

1.

ओ० बी० सी० का अर्थ है(क) अन्य पिछड़ा वर्ग(ख) अन्य पिछड़ी जातियाँ(ग) सभी पिछड़ी जातियाँ(घ) इनमें से कोई नहीं

Answer»

(क) अन्य पिछड़ा वर्ग 

2.

संविधान के अनुच्छेद 46 में समाज के दलित, दुर्बल और कमजोर वर्गों के लोगों के सम्बन्ध में क्या कहा गया है ?

Answer»

संवैधानिक दृष्टि से कमजोर, दुर्बल या दलित वर्ग के अन्तर्गत अनुसूचित जातियाँ, अनुसूचित जनजातियाँ तथा कुछ अन्य पिछड़े हुए समूह आते हैं। इसमें समाज के साधन-हीन वर्ग को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संविधान भ्रातृत्व एवं समानता पर जोर देता है। अतः संविधाननिर्माताओं ने सोचा कि यदि समानता को एक वास्तविक रूप प्रदान करना है, तो समाज के इन दलित, दुर्बल और कमजोर वर्गों को ऊँचा उठाना होगा और उन्हें विकास की सुविधाएँ प्रदान करनी होंगी। संविधान के अनुच्छेद 46 में इस सम्बन्ध में स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि राज्य जनता के दुर्बलतर अंगों के, विशेषतः अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के, शिक्षा तथा अर्थ सम्बन्धी (आर्थिक) हितों की विशेष सावधानी से रक्षा करेगा और सामाजिक अन्याय तथा सभी प्रकार के शोषण से उनकी रक्षा करेगा।

3.

अनुसूचित जातियों की प्रगति हेतु अपने सुझाव लिखिए।

Answer»

अनुसूचित जातियों की प्रगति हेतु निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं ।

अनुसूचित जातियों की प्रगति हेतु सुझाव

अनुसूचित जातियों की प्रगति हेतु निम्न कदम उठाए जा सकते हैं।

⦁    अनुसूचित जातियों में शिक्षा के स्तर में सुधार करके उनके दृष्टिकोण व आर्थिक स्थिति को सुधारा जाना चाहिए।
⦁    इनके जीवन स्तर को उठाना चाहिए जिससे इन्हें बेहतर अवसरों की प्राप्ति हो सके।
⦁    अस्पृश्यता निवारण के लिए विभिन्न माध्यमों का प्रयोग कर जनमत का निर्माण किया जाना चाहिए।
⦁    समाज में इनके विरुद्ध असमान नीति अपनाने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही की जानी चाहिए।
⦁    सरकार द्वारा विभिन्न नीतियों के माध्यम से अंतर्जातीय विवाह को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।
⦁    इन्हें अन्य जातियों के समान धार्मिक व सामाजिक स्वतन्त्रता और समानता व्यावहारिक रूप में प्रदान करनी चाहिए।
⦁    सभी जाति के बच्चों को एक समान व्यवहार व शिक्षा प्रदान कर उनमें आपसी सद्भाव की भावना का विकास किया जाना चाहिए।
⦁    राजनीतिक स्तर पर सरकार द्वारा इनको प्रोत्साहन प्रदान करना इनकी राजनीतिक निम्न स्थिति में सुधार के लिए आवश्यक है।

4.

भारत में निर्धनता की समस्या को कम करने के लिए सरकार द्वारा समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम का आरम्भ किया गया।(क) 1972 ई० से(ख) 1978 ई० से(ग) 1981 ई० से(घ) 1986 ई० से

Answer»

(ख) 1978 ई० से 

5.

निम्नलिखित में से कौन-सी दशा निर्धनता-निवारण में बाधक है?(क) शक्ति के साधनों का अधिकतम उपयोग(ख) सामाजिक दुर्व्यसनों पर प्रतिबन्ध(ग) साख-सुविधाओं में वृद्धि(घ) परिवार नियोजन के प्रति उदासीनता

Answer»

(घ) परिवार नियोजन के प्रति उदासीनता

6.

भारत में गरीबी दूर करने का उपाय छाँटिए(क) शिक्षा(ख) नौकरी(ग) आर्थिक सहायता(घ) सरकारी भरण-पोषण

Answer»

सही जवाब है (ख) नौकरी 

7.

भारत एक धनी देश है, जब कि इसके निवासी निर्धन हैं, यह कथन किसका है (क) श्रीमती वीरा एन्स्टे का(ख) वीवर का(ग) गोडार्ड का(घ) स्टुअर्ट राइस का

Answer»

(क) श्रीमती वीरा एन्स्टे का

8.

भानिर्धनता कारण तथा उपचार, class-12-hindi, रत में निर्धनता का कारण बताइए(क) भाषा सम्बन्धी संघर्ष(ख) क्षेत्रीय विवाद(ग) मुकदमों की देर से सुनवाई(घ) खेती का पिछड़ापन

Answer»

(घ) खेती का पिछड़ापन

9.

किसी समाज में निर्धनता के मूल्यांकन के लिए कौन-सी कसौटी सही है ?(क) प्रति व्यक्ति आय(ख) वस्तुओं का बाजार-भाव।(ग) उद्योगों की संख्या(घ) समाज के रहन-सहन का स्तर

Answer»

(क) प्रति व्यक्ति आय

10.

निम्नलिखित में से निर्धनता के परिणाम का चयन कीजिए(क) सती – प्रथा(ख) दहेज-प्रथा(ग) बाल-विवाह(घ) अपराध

Answer»

सही जवाब है (घ) अपराध    

11.

निम्नलिखित में से कौन-सी एक दशा भारत में निर्धनता का प्रमुख कारण है ?(क) औद्योगिक विवाद(ख) भाषायी विवाद(ग) मन्त्रियों और सांसदों पर अत्यधिक व्यय(घ) जनसंख्या विस्फोट

Answer»

(घ) जनसंख्या विस्फोट

12.

कम आय निर्धनता को कब जन्म देती है ?

Answer»

जब कमाने वाले कम और उन पर निर्भर व्यक्तियों की संख्या अधिक होती है, तो कम आय निर्धनता को जन्म देती है।

13.

भारत में सबसे अधिक निर्धन प्रदेश कौन-सा है ?

Answer»

भारत में सबसे अधिक निर्धन प्रदेश उड़ीसा (वर्तमान में ओडिशा) है।

14.

जीवन-स्तर को तय करने वाला मुख्य कारक क्या है ?

Answer»

जीवन-स्तर को तय करने वाला मुख्य कारक आय है।

15.

“पर्यावरण किसी भी उस बाह्य शक्ति को कहते हैं जो हमें प्रभावित करती है।” यह परिभाषा किस विद्वान ने प्रस्तुत की है?(क) जिसबर्ट(ख) रॉस(ग) मैकाइवर(घ) डेविस

Answer»

सही जवाब है (ख) रॉस 

16.

अन्त्योदय योजना पर टिप्पणी लिखिए।

Answer»

अन्त्योदय योजना के अन्तर्गत प्रत्येक गाँव में से पाँच निर्धनतम परिवारों का चयन कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने एवं व्यवसाय करने के लिए ऋण आदि की सहायता दी जाती है। इस योजना का प्रारम्भ 2 अक्टूबर, 1978 में राजस्थान सरकार द्वारा किया गया। इसे उत्तर प्रदेश, बिहार, हिमाचल प्रदेश एवं अन्य राज्यों ने भी अपनाया। इस योजना का उद्देश्य समाज के आर्थिक दृष्टि से कमजोर वर्गों; जैसे – हरिजनों, भूमिहीनों एवं अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के लोगों का आर्थिक स्तर उन्नत करना एवं उन्हें गरीबी से मुक्ति दिलाना है।

17.

भौगोलिक पर्यावरण किन तत्त्वों से बनता है?(क) मनुष्य(ख) प्राकृतिक दशाएँ(ग) धार्मिक विश्वास(घ) प्रथाएँ

Answer»

(ख) प्राकृतिक दशाएँ

18.

प्रकृति द्वारा मनुष्य को प्रदत्त दशाओं से निर्मित पर्यावरण को क्या कहा जाता है?(क) भौगोलिक(ख) सामाजिक(ग) सांस्कृतिक(घ) इनमें से कोई नहीं

Answer»

सही जवाब है (ख) सामाजिक

19.

भौगोलिक पर्यावरण किस प्रकार से सामाजिक जीवन को प्रभावित करता है ?

Answer»

भौगोलिक पर्यावरण सामाजिक जीवन को प्रत्यक्ष एवं परोक्ष दोनों रूपों में प्रभावित करता है। कुछ भौगोलिकविदों का कहना है कि भौगोलिक दशाएँ ही मनुष्य के सम्पूर्ण सामाजिकसांस्कृतिक जीवन, विभिन्न संस्थाओं, मानवीय व्यवहारों एवं सभ्यता के स्वरूप का निर्धारण करती हैं। भौगोलिकविदों के मतानुसार

⦁    जनसंख्या की रचना एवं घनत्व,
⦁    व्यवसाय,
⦁     सामाजिक व्यवहार,
⦁    मकान-निर्माण,
⦁    भोजन,
⦁    वेशभूषा,
⦁    सामाजिक संस्थाओं (अर्थात् विवाह, अधिकार, विश्वास आदि),
⦁    उद्योग-धन्धों,
⦁    आवागमन के साधन,
⦁     कला व साहित्य इत्यादि पर भौगोलिक पर्यावरण का प्रभाव पड़ता है।

इतना ही नहीं; कुछ विद्वानों (हंटिंग्टन, बकल, मॉण्टेस्क्यू, डेक्सटर आदि) ने तो यहाँ तक कहा है कि सभी मानवीय व्यवहारों; जैसे – मनुष्य की कार्यकुशलता, आत्महत्या, सम्पत्ति एवं व्यक्ति के विरुद्ध अपराध, मानसिक सन्तुलन, जन्म एवं मृत्यु-दर इत्यादि पर जलवायु तथा ऋतुओं का प्रभाव पड़ता है।

20.

सामाजिक-सांस्कृतिक पर्यावरण का भारतीय सामाजिक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है ?

Answer»

सामाजिक जीवन केवल भौगोलिक पर्यावरण से ही प्रभावित नहीं होता, वरन् सामाजिकसांस्कृतिक पर्यावरण भी उसे प्रभावित करता है। सामाजिक-सांस्कृतिक पर्यावरण स्वयं मानव द्वारा निर्मित होता है। उसमें मानव द्वारा निर्मित भौतिक वस्तुएँ; जैसे—पेन, घड़ी, रेडियो, मकान, सड़क, मशीनें, कलाकृतियाँ, धार्मिक स्थल और हजारों-लाखों वस्तुएँ सम्मिलित हैं। अभौतिक वस्तुओं में सामाजिक संस्थाएँ, कला, विज्ञान, धर्म, विश्वास, परम्पराएँ, कानून और मानव का ज्ञान आदि आते हैं। भारत इन भौतिक एवं अभौतिक तथ्यों से निर्मित सामाजिक-सांस्कृतिक पर्यावरण की भूमि रहा है। यहाँ समय-समय पर आक्रमणकारियों के रूप में विभिन्न प्रजातियों, धर्मों एवं संस्कृतियों से सम्बन्धित लोग भी आते रहे हैं, जिन्होंने यहाँ के निवासियों की जीवन-विधि को प्रभावित किया है

भारतीयों का खान-पान, रहन-सहन, परिवार, विवाह, नातेदारी की प्रथाएँ, आर्थिक एवं राजनीतिक जीवन सदैव एक-से नहीं रहे हैं, वरन् समय के साथ-साथ बदलते रहे हैं। वैदिक काल, धर्मशास्त्र काल, मुगलकाल, अंग्रेजों के शासन के समय एवं स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद के सामाजिक जीवन में भिन्नताएँ पायी जाती हैं। वैदिक युग में वर्ण एवं आश्रम-व्यवस्था ने भारतीयों के जीवन को प्रभावित किया। उस समय धर्मशास्त्र काल में विभिन्न धर्म-ग्रन्थों की रचना की गयी। जिनमें परिवार, विवाह, शिक्षा, आर्थिक जीवन से सम्बन्धित विभिन्न नियमों का भी उल्लेख किया गया। इसी समय वर्णव्यवस्था ने कठोर जाति-व्यवस्था का रूप ले लिया और जाति ने भारतीय जीवन के प्रत्येक पक्ष को निर्धारित किया। स्त्रियों को भी अनेक अधिकारों से वंचित कर दिया गया।

मुगलकाल में विवाह व सती–प्रथा का प्रचलन बढ़ा तथा विधवा विवाहों पर रोक लगा दी गयी। अन्तर्जातीय एवं अन्तर्वर्गीय विवाहों पर भी रोक लगी। इस्लाम ने भारतीयों के सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक जीवन, खान-पान एवं पहनावे में कई परिवर्तन किये। अंग्रेजी काल में भारतीयों का जीवन पश्चिमी सभ्यता एवं संस्कृति से प्रभावित हुआ। उनके समय में सम्पूर्ण भारत एक राजनीतिक सत्ता के अधीन शासित हुआ, औद्योगीकरण की नींव रखी गयी, अनेक नवीन आविष्कार जो पश्चिम में हुए, उनसे भारतीय भी परिचित हुए। कृषि एवं उत्पादन के नये तरीके अपनाये गये। मशीनों का प्रचलन बढ़ा। अंग्रेजी शिक्षा-प्रणाली प्रचलित हुई, खान-पान एवं पहनावे में परिवर्तन आया। चुकन्दर, शलगम, मांस-मदिरा का प्रयोग बढ़ा। टेबल-कुर्सी पर बैठकर, काँटे-छुरी एवं क्रॉकरी के माध्यम से भोजन किया जाने लगा। पैण्ट, शर्ट, टाई एवं कोट का प्रचलन हुआ।

आजादी के बाद भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक पर्यावरण में एक बार फिर परिवर्तन हुआ। एकाकी परिवार, अन्तर्जातीय विवाह, विलम्ब विवाह का प्रचलन बढ़ा, विधवा पुनर्विवाह होने लगे, नातेदारी का महत्त्व घटने लगा, धर्मनिरपेक्ष मूल्य पनपे। सार्वभौमिक शिक्षा प्रदान की जाने लगी। प्रजातान्त्रिक मूल्य स्थापित हुए। विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं एवं सामुदायिक विकास योजनाओं के माध्यम से ग्रामीण भारत एवं सम्पूर्ण भारत के सामाजिक, आर्थिक व शैक्षणिक जीवन को उन्नत करने का प्रयास किया गया, जिसके फलस्वरूप वर्तमान में भारतीयों का जो सामाजिक जीवन है वह वैदिक काल एवं मध्यकाल से एकदम भिन्न दिशा की ओर अग्रसर हुआ। फिर भी धर्म एवं अध्यात्मवाद की प्रधानता, कर्म एवं पुनर्जन्म का सिद्धान्त, संयुक्त परिवार प्रणाली और जाति-प्रथा आज भी भारतीयों के सामाजिक जीवन का मूलाधार बने हुए हैं। स्पष्ट है कि भारतीयों के सामाजिक जीवन को प्रभावित करने में भौगोलिक एवं सामाजिक-सांस्कृतिक पर्यावरण ने पर्याप्त योगदान दिया।

21.

भौगोलिक पर्यावरण का सामाजिक संगठन पर क्या प्रभाव पड़ता है?

Answer»

भौगोलिक पर्यावरण विविध प्रकार से सामाजिक संगठन को प्रभावित करता है। इसके प्रभाव प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में पड़ते हैं। सामाजिक संगठन पर पड़ने वाले इसके प्रमुख प्रभाव निम्नलिखित हैं

⦁    भौगोलिक पर्यावरण जनसंख्या के घनत्व का निर्धारण करता है। अधिक जनसंख्या अथवा कम जनसंख्या सामाजिक जीवन को प्रभावित करती है।
⦁    भौगोलिक पर्यावरण का खान-पान पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यदि भौगोलिक पर्यावरण अनुकूल होता है तो आर्थिक समृद्धि के कारण व्यक्तियों का खान-पान उच्च स्तर को होता है।
⦁    भौगोलिक पर्यावरण धार्मिक विश्वासों को प्रभावित करता है। उदाहरणार्थ कृषि प्रधान देश होने के कारण यहाँ इन्द्र अर्थात् वर्षा के देवता की पूजा का विशेष महत्त्व होता है।
⦁    भौगोलिक पर्यावरण मानव व्यवहार को प्रभावित करता है। भारत के विभिन्न राज्यों के रीति| रिवाज, खान-पान तथा साहित्य आदि में अन्तर पाए जाने का मूल कारण भौगोलिक पर्यावरण की विभिन्नता ही है।

22.

सांस्कृतिक पर्यावरण की एक परिभाषा लिखिए।

Answer»

हर्सकोविट्स के अनुसार, “सांस्कृतिक पर्यावरण के अन्तर्गत वे सभी भौतिक और अभौतिक वस्तुएँ सम्मिलित हैं जिनका निर्माण मानव ने किया है।

23.

संस्कृति मानव……….वातावरण है।

Answer»

सही जवाब है निर्मित।

24.

“संस्कृति पर्यावरण का मानव निर्मित भाग है।” यह कथन किसका है?

Answer»

हर्सकोविट्स का।  

25.

प्रदूषण की एक परिभाषा दीजिए।

Answer»

प्रदूषण हमारी वायु, मृदा एवं जल के भौतिक, रासायनिक तथा जैविके लक्षणों में अवांछनीय परिवर्तन है जो मानव जीवन तथा अन्य जीवों पर हानिकारक प्रभाव डालता है।

26.

किस विद्वान ने प्राकृतिक परिस्थितियों को धार्मिक व्यवहार से जोड़ने का प्रयास किया है।

Answer»

सही जवाब है मैक्स मूलर।   

27.

‘भूमि सेना से क्या तात्पर्य है ?

Answer»

उत्तर प्रदेश सरकार ने बेरोजगारी समाप्त करने के लिए भूमि सेना’ योजना प्रारम्भ की है। ‘भूमि सैनिक’ को जमीन पर वृक्ष लगाने के लिए सरकार द्वारा बैंक से ऋण दिया जाता है।

28.

भौगोलिक कारकों का मानव के सामाजिक जीवन पर कैसे प्रभाव पड़ता है.?

Answer»

कई भूगोलविदों ने भौगोलिक कारकों एवं सामाजिक संस्थाओं का सम्बन्ध प्रकट किया है। उदाहरण के लिए, जिन स्थानों पर खाने-पीने एवं रहने की सुविधाएँ होती हैं, वहाँ संयुक्त परिवार पाये जाते हैं और जाँ-इनका अभाव होता है, वहाँ एकाकी परिबार। जहाँ प्रकृति से संघर्ष करना होता है, वहाँ पुरुषप्रधान समाज होते हैं। इसी प्रकार से जहाँ जीविकोपार्जन की सुविधाएँ सरलता से मिल जाती हैं और कृषि की प्रधानता होती है, वहाँ बहुपत्नी प्रथा तथा जहाँ जीवन-यापन कठिन होता है, वहाँ बत्तिाप्रथा अथवा एक विवाह की प्रथा पायी जाती है। इसका कारण यह है कि संघर्षपूर्ण पर्यावरण में स्त्रियों का भरण-पोषण सम्भव न होने से कन्या-वध आदि की प्रथा पायी जाती है, जिससे उनकी संख्या घट जाती है। जिन स्थानों पर जीवन-यापन के लिए कठोर श्रम एवं सामूहिक प्रयास करना होता है, वहाँ सामाजिक संगठन सुदृढ़ होता है।

भारत के भौगोलिक पर्यावरण ने यहाँ के सामाजिक जीवन को प्रभावित किया है। खस एवं टोडा जनजातियाँ पहाड़ी भागों में निवास करती हैं, जहाँ परिवार को आर्थिक भरण-पोषण कठिनाई से होता है। उन्हें जीवन-यापन के लिए प्रकृति से घोर संघर्ष करना पड़ता है। इस संघर्ष में स्त्रियाँ और भी कमजोर होती हैं। अत: वहाँ जन्म के समय ही लड़कियों को मार देने की प्रथा पायी जाती है, जिसके कारण इन समाजों में पुरुषों की अधिकता एवं स्त्रियों की कमी पायी जाती है। इस विषम लिंग अनुपात के कारण यहाँ बहुपति विवाह की प्रथा विकसित हुई। दूसरी ओर उत्तरी भारत के मैदानी भागों में जीवन-यापन सरल है; इससे वहाँ लिंग-अनुपात लगभग समान है, अतः वहाँ एक विवाह प्रथा विकसित हुई और सम्पन्न लोग एकाधिक पत्नियाँ भी रखने लगे, जिनसे बहुपत्नी प्रथा का जन्म हुआ।

दक्षिणी भारत के पठारी क्षेत्र होने के कारण लोगों को दूर क्षेत्र तक गमन कठिन था। अत: उनका विवाह एवं नातेदारी का क्षेत्र अपने गाँवों या निकटवर्ती गाँवों तक ही सीमित रहा, जब कि उत्तरी भारत के मैदानी क्षेत्रों में विवाह एवं नातेदारी का विस्तार दूर-दराज के क्षेत्रों तक पाया जाता है। मैदानी क्षेत्रों में पुरुष का दबदबा अधिक होने से पितृसत्तात्मक परिवार व्यवस्था ने जन्म लिया। गारो, खासी और जयन्तिया जनजातियाँ जो कि मातृसत्तात्मक हैं, पहाड़ी क्षेत्रों में निवास करती हैं। इनमें पुरुष जीवन-यापन की सुविधाएँ जुटाने, शिकार करने एवं जंगलों से कन्द-मूल-फल एकत्रित करने एवं कृषि के लिए अधिकांश समय तक घर से बाहर ही रहता है। ऐसी स्थिति में परिवार एवं बच्चों के पालन-पोषण का दायित्व महिलाओं पर आ जाता है, इससे परिवार में महिलाओं को प्रभुत्व स्थापित हुआ एवं मातृसत्तात्मक परिवार पनपे।

29.

भौगोलिक पर्यावरण का मानसिक क्षमता पर क्या प्रभाव पड़ता है ?

Answer»

भौगोलिक पर्यावरण का मानसिक क्षमता पर प्रभाव के सन्दर्भ में हंटिंग्टन का मत है कि जब तापमान बहुत गिर जाता है तो मानसिक योग्यता की अधिक हानि होती है और जलवायु में शीघ्र पुनः परिवर्तन न हो तो इसमें निरन्तर कमी आती जाती है। यदि हवा में कुछ गर्मी आ जाए तो इसमें कुछ सुधार होता है, लेकिन हवी अधिक गर्म हो जाने पर मानसिक क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अत्यधिक गर्मी में शीत ऋतु की तुलना में भारतीयों की मानसिक क्षमता कम हो जाती है।

30.

पर्यावरण के प्रकार अथवा भेद बताइए।

Answer»

पर्यावरण के प्रकारों अथवा भेदों के विषय में विद्वानों ने विभिन्न प्रकार के मत व्यक्त किये हैं; जैसे(क) लैण्डिस (Landis) के अनुसार, पर्यावरण के तीन प्रकार हैं

(i) प्राकृतिक,
(ii) सामाजिक तथा
(iii) सांस्कृतिक।
(ख) ऑगबर्न एवं निमकॉफ के अनुसार पर्यावरण के दो प्रकार हैं
(i) प्राकृतिक तथा
(ii) मनुष्यकृत।।
(ग) गिलिन तथा गिलिन के अनुसार भी पर्यावरण के दो भेद हैं
(i) प्राकृतिक पर्यावरण तथा
(ii) सामाजिक-सांस्कृतिक पर्यावरण।

सामान्य आधार पर पर्यावरण को निम्नलिखित तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है

⦁    भौगोलिक या प्राकृतिक पर्यावरण – इसमें प्रकृति प्रदत्त वस्तुएँ आती हैं; जैसे-स्थलमण्डल, जलमण्डल, वायुमण्डल इत्यादि। ये सभी अपनी-अपनी शक्तियों से अनेक क्रियाएँ करते हैं। जिससे पृथ्वी पर अनेक भौगोलिक दशाओं की उत्पत्ति होती है तथा ये सभी दशाएँ मानव के जीवन पर प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव डालती हैं।

⦁    सामाजिक पर्यावरण – सभी सामाजिक रीति-रिवाज, प्रथाएँ, परम्पराएँ, लोकाचार आदि सामाजिक पर्यावरण के अन्तर्गत आती हैं।

⦁     सांस्कृतिक पर्यावरण – किसी समाज का सांस्कृतिक पक्ष सांस्कृतिक पर्यावरण कहलाता है। इसके अन्तर्गत उन समस्त वस्तुओं का समावेश होता है जिनको निर्माण स्वयं मनुष्य ने किया है; जैसे-धर्म, नैतिकता, भाषा, साहित्य, प्रथाएँ, लोकाचार, कानून, व्यवहार-प्रतिमान इत्यादि। इस प्रकार के पर्यावरण को सामाजिक विरासत’ या ‘संस्कृति’ (Culture) भी कहते हैं।

31.

भौगालिक पर्यावरण मानव के अपराधी व्यवहारों को कैसे प्रभावित करता है ?

Answer»

अनेक अपराधशास्त्रियों का मत है कि भौगोलिक पर्यावरण का अपराधी प्रवृत्ति के व्यक्ति पर भी प्रभाव पड़ता है। गर्मियों में व्यक्ति के विरुद्ध एवं सर्दियों में सम्पत्ति के विरुद्ध अपराध अधिक होते हैं। उपजाऊ भूमि, अनुकूल वर्षा एवं प्राकृतिक साधनों की अधिकता होने पर अपराध कम होंगे और इसके विपरीत स्थितियों में अधिक। उत्तरी भारत के आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न होने के कारण यहाँ जनाधिक्य है। जनसंख्या के दबाव के कारण यहाँ चोरी, डकैती, बलात्कार, हत्या आदि अपराधों की घटनाएँ अधिक पायी जाती हैं। इनकी तुलना में दक्षिणी भारत शान्त क्षेत्र है।
इसी प्रकार जब भारत में अकाल पड़ता है तब भी अपराधों की दर में वृद्धि होती है तथा जब वर्षा पर्याप्त होती है, फसलों की पैदावार अच्छी होती है तो आर्थिक प्रवृत्ति के अपराध घट जाते हैं।

32.

सांस्कृतिक पर्यावरण का मानव जीवन के आर्थिक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है?

Answer»

सांस्कृतिक पर्यावरण व्यक्तियों के आर्थिक जीवन को भी प्रभावित करता है। यदि सांस्कृतिक मूल्य आर्थिक विकास में सहायता देने वाले हैं तो वहाँ व्यक्तियों को आर्थिक जीवन अधिक उन्नत होगा। मैक्स वेबर के अनुसार, प्रोटेस्टेण्ट ईसाइयों की धार्मिक मान्यताएँ पूँजीवादी प्रवृत्ति के विकास में सहायक हुई हैं। इसीलिए प्रोटेस्टेण्ट ईसाइयों के बहुमत वाले देशों में पूँजीवाद अधिक है। यदि सांस्कृतिक मूल्य आर्थिक विकास में बाधक हैं तो व्यक्तियों के आर्थिक जीवन पर इनका कुप्रभाव पड़ता है तथा वे आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हुए रहते हैं।

33.

भौगोलिक पर्यावरण का प्रभाव प्रत्यक्ष भी होता है और …….. भी।

Answer»

सही जवाब है अप्रत्यक्ष

34.

सभ्यता की वृद्धि के साथ भौगोलिक पर्यावरण का प्रभाव भी …….. जाता है।

Answer»

सही जवाब है घटता।

35.

भारतीय सरकार ने गंगा विकास प्राधिकरण’ की स्थापना किस सन में की थी?(क) सन् 1984 में(ख) सन् 1985 में(ग) सन् 1986 में(घ) सन् 1987 में

Answer»

(ख) सन् 1985 में  

36.

नगरीकरण से पर्यावरण प्रभावित होता है। (हाँ/नहीं)

Answer»

सही जवाब है हाँ।

37.

‘पर्यावरण की परिभाषा दीजिए। भारतीय जीवन पर भौगोलिक पर्यावरण के प्रत्यक्ष प्रभावों का विवेचन कीजिए। याभौगोलिक पर्यावरण किस प्रकार से सामाजिक जीवन को प्रभावित करता है? यापर्यावरण की परिभाषा दीजिए। भौगोलिक पर्यावरण के प्रत्यक्ष प्रभावों की विवेचना कीजिए।यापर्यावरण को परिभाषित कीजिए। यापर्यावरण क्या है? सामाजिक जीवन पर पर्यावरण का प्रभाव बताइए। 

Answer»

‘पर्यावरण’एक विस्तृत अवधारणा है, इसे अंग्रेजी में ‘एनवायरनमेण्ट’ (Environment) कहते हैं। पर्यावरण का हमारे जीवन से इतना घनिष्ठ सम्बन्ध है कि पर्यावरण को स्वयं से पृथक् करना एक असम्भव-सी बात लगती है। सामाजिक मानव के विषय में पूर्ण अध्ययन करने के लिए यह आवश्यक है कि उसके पर्यावरण का अध्ययन किया जाये। यही कारण है कि समाजशास्त्र विषय के अन्तर्गत मनुष्य का अध्ययन पर्यावरण के सन्दर्भ में ही किया जाता है।
पर्यावरण का अर्थ एवं परिभाषाएँ

‘पर्यावरण’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है। ये शब्द हैं-‘परि’ और आवरण। ‘परि’ का अर्थ है चारों ओर’ तथा ‘आवरण’ का अर्थ है ‘घिरे हुए’ अथवा ढके हुए। इस प्रकार पर्यावरण का अर्थ हुआ – चारों ओर से घिरे हुए अथवा ढके हुए। दूसरे शब्दों में, ‘पर्यावरण’ शब्द का अर्थ उन वस्तुओं से है जो मनुष्य से अलग होने पर भी उसे चारों ओर से ढके या घेरे रहती है। संक्षेप में, वे सभी परिस्थितियाँ जो एक प्राणी के अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं तथा उसको चारों ओर से घेरे हुए अथवा ढके हुए हैं, उसका पर्यावरण कहलाती हैं। पर्यावरण को विभिन्न विद्वानों ने विभिन्न प्रकार से परिभाषित किया है। कुछ प्रमुख परिभाषाएँ निम्नवत् हैं
इलियट के मतानुसार, “चेतन पदार्थ की इकाई से प्रभावकारी उद्दीपन और अन्तक्रिया के क्षेत्र को पर्यावरण कहते हैं।”

रॉस के अनुसार, “कोई भी बाहरी शक्ति, जो हमें प्रभावित करती है, पर्यावरण होती है।” प्रो० गिलबर्ट के शब्दों में, “वह वस्तु जो किसी वस्तु को चारों ओर से घेरती एवं उस पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालती है, पर्यावरण है।

उपर्युक्त परिभाषाओं द्वारा यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि पर्यावरण से तात्पर्य उस ‘सब कुछ से होता है जिसका अनुभव सामाजिक मनुष्य करता है तथा जिससे वह प्रभावित भी होता है।
भारतीय सामाजिक जीवन पर भौगोलिक पर्यावरण के प्रभाव
भौगोलिक पर्यावरण को प्राकृतिक पर्यावरण’ (Natural Environment) अथवा ‘अनियन्त्रित पर्यावरण’ (Uncontrolled Environment) भी कहते हैं। इस प्रकार के पर्यावरण से तात्पर्य हमारे चारों ओर के प्राकृतिक वातावरण से है। मैकाइवर तथा पेज के अनुसार, “भौगोलिक पर्यावरण उन दशाओं से मिलकर बनता है जिन्हें प्रकृति ने मनुष्य के लिए प्रदान किया।” लैण्डिस ने कहा है कि, “इसमें वे समस्त प्रभाव सम्मिलित होते हैं जो यदि मनुष्य द्वारा पृथ्वी से पूर्ण रूप से हटा दिये जाएँ, तब भी उनका अस्तित्व बनी रहे।” भौगोलिक पर्यावरण का मानव-जीवन पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार से प्रभाव पड़ता है। भारतीय सामाजिक जीवन भी इस नियम का अपवाद नहीं है। भौगोलिक विभिन्नताओं के कारण ही हमारे देशवासियों की जीवन-शैली, प्रथाओं, परम्पराओं, खान-पान, वेशभूषा आदि में भी भिन्नता है। भौगोलिक पर्यावरण के भारतीय सामाजिक जीवन पर पड़ने वाले प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रभावों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(क) प्रत्यक्ष प्रभाव

1. जनसंख्या पर प्रभाव – मनुष्य उन्हीं स्थानों पर रहना अधिक पसन्द करता है, जहाँ की जलवायु ऋतुएँ, भूमि की बनावट व जल इत्यादि की सुविधाएँ उत्तम हैं। बहुत अधिक गर्म और बहुत अधिक ठण्डे तथा अत्यधिक वर्षा वाले भागों में लोग रहना पसन्द नहीं करते। कहने का तात्पर्य यह है कि जहाँ भौगोलिक पर्यावरण अनुकूल होता है वहाँ जनसंख्या का घनत्व भी अधिक होता है तथा प्रतिकूल पर्यावरण वाले स्थानों पर जनसंख्या का घनत्व बहुत कम पाया जाता है। यही कारण है कि हमारे देश में गंगा-यमुना वाले क्षेत्रों में जनसंख्या का घनत्व अधिक होता है और उसकी अपेक्षाकृत रेगिस्तान और हिमालय आदि
क्षेत्रों में जनसंख्या कम पायी जाती है।

2. “आवास की प्रकृति अथवा मानव निवास पर प्रभाव – भौगोलिक पर्यावरण का ‘आवास’ की प्रकृति अथवा मनुष्य के निवास पर भी प्रभाव पड़ता है। बहुत अधिक गर्म प्रदेशों के लोग हवादार मकान बनवाते हैं; जैसे – भारत में बिहार, राजस्थान आदि प्रदेशों में। इसके विपरीत ठण्डे प्रदेशों में मकान ऐसे बनवाये जाते हैं जिनमें ठण्ड से बचाव किया जा सके। भारत के मैदानी प्रदेशों में गारा-मिट्टी और ईंटों के मकान बनाये जाते हैं, जब कि पहाड़ी क्षेत्रों में पत्थरों और लकड़ी के मकान बनाये जाते हैं।

3. वेशभूषा एवं खानपान पर प्रभाव – ठण्डी जलवायु वाले स्थानों के लोग अधिकांशतः मांसाहारी होते हैं तथा ऊनी वस्त्र धारण करते हैं, जब कि गर्म स्थानों के लोग अधिकांशतः शाकाहारी होते हैं और वर्ष में अधिक समय वे सूती वस्त्र धारण करते हैं। उदाहरण के लिए, कश्मीर में रहने वाले लोग मांस, मछली, अण्डा और इसी प्रकार के अन्य गर्म खाद्य-पदार्थों का सेवन अधिक करते हैं तथा चमड़े, खाल और ऊन से बने वस्त्रों का अधिक प्रयोग करते हैं। इसके विपरीत गर्म प्रदेशों; जैसे-राजस्थान, बिहार आदि के लोग सूती, हल्के व ढीले वस्त्रों का अधिक प्रयोग करते हैं तथा ठण्डे व शीघ्र पचने वाले खाद्य-पदार्थों का सेवन करते हैं।

4. व्यवसाय पर प्रभाव – मनुष्य के मूल व्यवसाय भी भौगोलिक पर्यावरण पर आधारित होते हैं। उदाहरणार्थ-भारत के हर प्रदेश में हर प्रकार की फसल उगाना जलवायु की विभिन्नता के कारण सम्भव नहीं है। अत: जिस प्रदेश में जो फसल पैदा नहीं होती, उस प्रदेश से वह कृषि-उपज जहाँ वह खूब पैदा करती हैं मँगाकर अपनी जरूरत पूरी करता है और इस प्रकार विनिमय व्यापार (Exchange Trade) का जन्म होता है।

5. आवागमन के साधनों पर प्रभाव – भौगोलिक पर्यावरण का प्रभाव आवागमन के साधनों पर भी पड़ता है। जिन स्थानों पर अति शीत के कारण भूमि तथा समुद्र बर्फ से ढके रहते हैं। वहाँ पर किसी भी प्रकार के आने-जाने के रास्ते बनाना सम्भव नहीं है। अधिक वर्षा वाले भागों में भी रेलवे ट्रैक या सड़कें नहीं बनायी जा सकतीं। मरुस्थलों में भी रेतीली भूमि होने के कारण सड़कें बनाना बहुत कठिन होता है। कुहरायुक्त वातावरण में वायुयान की उड़ान असम्भव है। इसीलिए समतल भूमि पर जहाँ वर्षा सामान्य होती है, मार्ग (सड़कें, रेलवे ट्रैक) बनाना बहुत आसान होता है। यही कारण है कि भारत के अनेक भागों में (जो कि अधिकांशतः मैदानी क्षेत्र हैं) आवागमन के साधन अधिक हैं। परन्तु पर्वतीय प्रदेशों में ऐसा नहीं है।

(ख) अप्रत्यक्ष प्रभाव

1. उद्योग-धन्धों पर प्रभाव  – अर्थशास्त्रीय उद्योगों के स्थानीयकरण का सिद्धान्त यही स्पष्ट करता है कि किसी भी विशेष उद्योग की स्थापना के लिए विशेष भौगोलिक पर्यावरण की आवश्यकता पड़ती है। लोहे के कारखानों का बिहार में अधिक मात्रा में होने का मुख्य कारण वहाँ कोयले की खानों का अधिक होना है। अहमदाबाद और मुम्बई में कपास की खेती अधिक होने के कारण वहाँ कपड़ा मिलों की अधिकता है। इसी प्रकार फिल्म उद्योग के लिए साफ आसमान, प्रकाश और स्वच्छ मौसम की आवश्यकता होती है। इसीलिए यह उद्योग मुम्बई में सबसे अधिक विकसित है

2. धर्म, साहित्य व कला पर प्रभाव – जिन वस्तुओं से मनुष्य अपने जीवन का निर्वाह करता है उसके प्रति उसके मन में श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है वह उनकी पूजा करने लगता है। उदाहरण के लिए, भारत के लोगों द्वारा गंगा, यमुना, सूर्य आदि की पूजा की जाती है। साहित्य पर भी पर्यावरण का प्रभाव पड़ता है। उदाहरणार्थ-रेगिस्तानी क्षेत्र में रहने वाला साहित्यकार अपने साहित्य में ऊँट’ या खजूर के पेड़ों का वर्णन करते हुए मिलता है। इसी प्रकार समुद्री तट के निकटतम प्रदेश में रहने वाला चित्रकार जितनी अच्छी तरह समुद्र का चित्र चित्रित कर सकता है, उतना पहाड़ी इलाके में रहने वाला नहीं। रामायण, महाभारत आदि रचनाओं पर भी पर्यावरण का ही प्रभाव देखने को मिलता है।

3. समाज-जीवन पर प्रभाव – विभिन्न प्राकृतिक या भौगोलिक परिस्थितियों के कारण ही भिन्न-भिन्न रीति-रिवाजों का जन्म होता है। हमारे देश के विभिन्न प्रदेशों के रीति-रिवाजों, प्रथाओं, भोजन, साहित्य, कला आदि में जो विभिन्नताएँ विद्यमान हैं, उनके पीछे मूल कारण भौगोलिक अथवा प्राकृतिक पर्यावरण की विभिन्नता ही है।

4. सामाजिक संगठन पर प्रभाव – भौगोलिक पर्यावरण का सर्वाधिक प्रभाव सामाजिक संगठन पर पड़ता है। लीप्ले ने लिखा है कि ‘‘ऐसे पर्वतीय प्रदेशों में जहाँ खाद्यान्न की कमी होती है। वहाँ जनसंख्या की वृद्धि अभिशाप मानी जाती है और ऐसी विवाह संस्थाएँ स्थापित की जाती हैं जिनसे जनसंख्या न बढ़ पाये।” यही कारण है कि भारत में जौनसार बाबर में बहुत-से “भाइयों की केवल एक ही पत्नी होती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि भौगोलिक पर्यावरण का भारतीय सामाजिक जीवन के विभिन्न पक्षों पर प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है।

38.

सर्दियों में बर्फ के कारखाने बन्द हो जाने के परिणामस्वरूप बेकार हुए मजदूर किस प्रकार की बेकारी का उदाहरण हैं ?

Answer»

मौसमी बेकारी।

39.

निम्नलिखित में से किस व्यक्ति को आप बेकार कहेंगे ?(क) एक पागल व्यक्ति जो कहीं भी नौकरी नहीं करता(ख) गाँव का एक अशिक्षित किसान जिसे प्रयत्न करने पर भी काम नहीं मिल रहा है।(ग) धनी परिवार का एम० ए० पास पुत्र जिसकी किसी भी काम में कोई रुचि नहीं है।(घ) एक संन्यासी।

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(ख) गाँव का एक अशिक्षित किसान जिसे प्रयत्न करने पर भी काम नहीं मिल रहा है

40.

जब कार्यालयों व कारखानों में आवश्यकता से अधिक व्यक्तियों द्वारा काम करने के कारणउन्हें अपनी योग्यता से कम पारिश्रमिक मिलता है, तब इसे कहा जाता है(क) औद्योगिक बेरोजगारी(ख) अर्द्ध-बेरोजगारी(ग) नगरीय बेरोजगारी(घ) अनियोजित बेरोजगारी

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(ख) अर्द्ध-बेरोजगारी

41.

अत्यधिक निर्धन परिवार के बेरोजगार ग्रामीण युवकों को विभिन्न व्यवसायों का प्रशिक्षण देने तथा इसके लिए आर्थिक सहायता देने वाला सरकार का विशेष कार्यक्रम है(क) सीमान्त कृषक रोजगार कार्यक्रम(ख) रोजगार गारण्टी कार्यक्रम(ग) भूमिहीन श्रमिक रोजगार कार्यक्रम(घ) स्वरोजगार कार्यक्रम

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(घ) स्वरोजगार कार्यक्रम

42.

निम्नलिखित में से कौन-सी दशा भारत में शैक्षिक बेरोजगारी का कारण है ?(क) दोषपूर्ण शिक्षा-प्रणाली(ख) तकनीकी शिक्षा-सुविधाओं की कमी(ग) माँग और पूर्ति का असन्तुलन(घ) शिक्षित युवकों में नौकरी के प्रति अधिक आकर्षण

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(ख), तकनीकी शिक्षा-सुविधाओं की कमी

43.

भारत में शिक्षित बेकारी के कारणों की व्याख्या कीजिए। या। भारत में शिक्षित बेकारी के कारण तथा शिक्षित बेकारी को दूर करने के उपाय बताइए।याशिक्षित बेरोजगारी दूर करने के विभिन्न उपायों का विवेचन कीजिए। 

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भारत में शिक्षित बेकारी के कारण

भारत में शिक्षित बेकारी के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

1. शिक्षा-प्रणाली का दोषपूर्ण होना – विभिन्न शिक्षाशास्त्रियों का मत है कि हमारी वर्तमान शिक्षा-प्रणाली अपने आपमें दोषपूर्ण है। हमारी शिक्षा प्रणाली के प्रारम्भ करने वाले अंग्रेज थे। उस काल में लॉर्ड मैकाले ने भारतीय शिक्षा को इस रूप में गठित किया था कि शिक्षा प्राप्त युवक अंग्रेजी शासन में क्लर्क या बाबू बन सकें। वही शिक्षा आज भी प्रचलित है। शिक्षित युवक कार्यालयों में बाबू बनने के अतिरिक्त और कुछ बन ही नहीं पाते। कार्यालयों में सीमित संख्या में ही भर्ती हो सकती है। इस स्थिति में अनेक शिक्षित नवयुवकों को बेरोजगार रह जाना अनिवार्य ही है।

2. विश्वविद्यालयों में छात्रों की अधिक संख्या – एक सर्वेक्षण के अनुसार, हमारे देश में विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्रों की संख्या बहुत अधिक है। ये छात्र प्रतिवर्ष डिग्रियाँ प्राप्त करके शिक्षित व्यक्तियों की संख्या में वृद्धि करते हैं। इन सबके लिए रोजगार के समुचित अवसर उपलब्ध नहीं होते; अतः शिक्षित बेरोजगारी की समस्या बढ़ती ही जाती है।

3. व्यावसायिक शिक्षा की कमी – भारत में व्यावसायिक शिक्षा की पर्याप्त व्यवस्था एवं | सुविधा उपलब्ध नहीं है। यदि व्यावसायिक एवं तकनीकी शिक्षा की समुचित व्यवस्था हो तो शिक्षित बेरोजगारी की दर को नियन्त्रित किया जा सकता है।

4. शारीरिक श्रम के प्रति उपेक्षा का दृष्टिकोण – हमारे देश में शिक्षित बेरोजगारी की समस्या के दिन-प्रतिदिन बढ़ते जाने का एक कारण यह है कि हमारे अधिकांश शिक्षित नवयुवक, शारीरिक श्रम के प्रति उपेक्षा की दृष्टिकोण रखते हैं। ये नवयुवक इसलिए शारीरिक श्रम करना नहीं चाहते क्योंकि वे उसके प्रति हीनता का भाव रखते हैं। इस दृष्टिकोण के कारण वे उन सभी कार्यों को प्रायः अस्वीकार कर देते हैं, जो शारीरिक श्रम से जुड़े हुए होते हैं इससे बेरोजगारी की दर में वृद्धि होती जाती है।

5. सामान्य निर्धनता – शिक्षित नवयुवकों के बेरोजगार रह जाने का एक कारण हमारे देश में व्याप्त सामान्य निर्धनता भी है। अनेक नवयुवक धन के अभाव के कारण व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त भी अपना व्यवसाय प्रारम्भ नहीं कर पाते। इस बाध्यता के कारण वे निरन्तर नौकरी की ही खोज में रहते हैं व बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि करते हैं।

6. देश में माँग तथा पूर्ति में असन्तुलन – हमारे देश में अनेक कारणों से कुछ इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न हो गई है कि जिन क्षेत्रों में शिक्षित एवं प्रशिक्षित व्यक्तियों की आवश्यकता है, वहाँ इस प्रकार के नवयुवक उपलब्ध नहीं है। इसके विपरीत, कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं जहाँ पर्याप्त संख्या में शिक्षित एवं प्रशिक्षित नवयुवक तो हैं परन्तु उनके लिए नौकरियाँ उपलब्ध नहीं है; अर्थात् उनकी आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार माँग एवं पूर्ति में असन्तुलन के कारण बेरोजगारी की स्थिति बनी रहती है।

भारत में शिक्षित बेकारी दूर करने के उपाय

भारत में शिक्षित बेकारी को दूर करने के प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं

1. शिक्षा प्रणाली में आवश्यक सुधार – अंग्रेजों द्वारा भारत में प्रारम्भ की गयी शिक्षा प्रणाली दोषपूर्ण है। इस शिक्षा प्रणाली का पूर्णतया पुनर्गठन करना चाहिए तथा वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए इसे अधिक-से-अधिक व्यवसायोन्मुख बनाया जाना चाहिए। इस प्रकार की शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् नवयुवक अपने स्वयं के व्यवसाय प्रारम्भ कर पाएँगे तथा
उन्हें नौकरी के लिए विभिन्न कार्यालयों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे।

2. लघु उद्योगों को प्रोत्साहन – शिक्षित बेरोजगारी को नियन्त्रित करने के लिए सरकार को चाहिए कि लघु उद्योगों को प्रोत्साहन दे। इन लघु उद्योगों को स्थापित करने के लिए शिक्षितयुवकों को प्रोत्साहित करना चाहिए तथा उन्हें आवश्यक सुविधाएँ भी उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

3. सरल ऋण व्यवस्था – शिक्षित नवयुवकों को अपना व्यवसाय स्थापित करने के लिए। सरकार द्वारा आसान शर्तों पर ऋण प्रदान करने की सुविधा प्रदान की जानी चाहिए। इससे धनाभाव के कारण शिक्षित नवयुवक व्यवसाय स्थापित करने से वंचित नहीं रह पाएँगे।

4. शारीरिक श्रम के प्रति अनुकूल दृष्टिकोण का विकास – हमारी शिक्षा-प्रणाली एवं पारिवारिक संस्कार इस प्रकार के होने चाहिए कि नवयुवकों में शारीरिक श्रम के प्रति किसी प्रकार की घृणा या उपेक्षा की भावना न हो। शारीरिक श्रम के प्रति अनुकूल दृष्टिकोण का विकास हो जाने पर शिक्षित युवक शारीरिक कार्यों के करने में किसी प्रकार का संकोच नहीं करेंगे; अतः उनका रोजगार-प्राप्ति का दायरा विस्तृत हो जाएगा तथा परिणामस्वरूप बेरोजगारी की दर घटेगी।

5. रोजगार सम्बन्धी विस्तृत जानकारी – शिक्षित नवयुवकों को रोजगारों से सम्बन्धित विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए। युवकों को समस्त सम्भावित रोजगारों की जानकारी होनी चाहिए ताकि वे अपनी योग्यता, रुचि आदि के अनुकूल व्यवसाय को प्राप्त करने के लिए सही दिशा में प्रयास करें।

6. अन्य उपाय – उपर्युक्त उपायों के अतिरिक्त वे समस्त उपाय भी शिक्षित बेरोजगारी के उन्मूलन के लिए किए जाने चाहिए, जो देश में सामान्य बेरोजगारी को नियन्त्रित करने के लिए आवश्यक समझे जाते हैं।

44.

निर्धनता और बेकारी दूर करने के शिक्षा के योगदान पर प्रकाश डालिए।

Answer»

निर्धनता वह दशा है जिसमें व्यक्ति अपर्याप्त आय या अविवेकपूर्ण व्यय के कारण अपने जीवन-स्तर को इतना ऊँचा रखने में असमर्थ होता है कि उसकी शारीरिक व मानसिक कुशलता बनी रह सके और न ही वह व्यक्ति तथा उस पर आश्रित वह समाज जिसका वह सदस्य है, निश्चित स्तर के अनुसार उपयोगी ढंग से कार्य कर पाते हैं। बेकारी या बेरोजगारी व्यक्ति की उस अवस्था का नाम है, जब कि वह काम तो करना चाहता है तथा काम करने के योग्य भी है, परन्तु उसे काम नहीं मिलता।

निर्धनता तथा बेरोजगारी को दूर करने के लिए अथक प्रयास किये जा रहे हैं, परन्तु आशातीत सफलता प्राप्त नहीं हो रही है। इन दोनों दोषों को दूर करने के प्रयासों में शिक्षा का योगदान सराहनीय है, जिसका विवरण निम्नवत् है
 

1. शिक्षा एवं सीमित परिवार की अवधारणा – भारत जैसे देश के सम्मुख प्रमुख रूप से तीन समस्याएँ हैं – निधर्नता, जनसंख्या और बेरोजगारी। जनसंख्या विस्फोट का कारण अधिकांश भारतीयों को अशिक्षित तथा रूढ़िवादी होना है। शिक्षा हमें विवेकी बनाती है तथा सीमित परिवार की आवश्यकता, महत्त्व तथा लाभ को ज्ञान कराती है। आँकड़े बताते हैं कि शिक्षित दम्पति के परिवार छोटे आकार के हैं तथा वे निर्धनता तले दबे हुए नहीं हैं। वे पुत्र-पुत्री दोनों को समान रूप से महत्त्व देते हैं।

2.  शिक्षा एवं कर्मण्यता – अशिक्षित व्यक्ति अकर्मण्य होते हैं। अकर्मण्य व्यक्ति किसी प्रकार का कार्य करना पसन्द नहीं करते और ईश्वर भरोसे जीवन व्यतीत करते हैं। परिणाम होता है। निर्धनता तथा बेरोजगारी। शिक्षा मनुष्य को कर्मण्य बनाती है। कर्मण्य व्यक्ति कर्म में विश्वास करता है जो जीविकोपार्जन के लिए प्रयत्नशील रहता है। वह हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठता और निर्धनता व बेरोजगारी उसके पास नहीं फटकती।

3. शिक्षा एवं ज्ञान – अज्ञानी और अशिक्षित व्यक्ति उचित व अनुचित में अन्तर नहीं कर पाता और अपने उत्तरदायित्व को पहचानने में असमर्थ होता है। ऐसा व्यक्ति अपने पारिवारिक तथा सामाजिक कर्तव्यों का सम्पादन अपने विवेक के आधार पर नहीं बल्कि दूसरे व्यक्तियों के फुसलाने में आकर कर बैठता है। अज्ञानी व्यक्ति भेड़ के समान होता है जिसे कोई भी हाँककर ले जाता है। शिक्षा व्यक्ति को विवेकी और ज्ञानी बनाती है तथा उसे अपने परिवार के पालन-पोषण करने की राह पर ढकेलती है। वह अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करने के लिए प्रयत्नशील रहता है।

4. शिक्षा एवं मितव्ययिता – शिक्षित व्यक्ति जितनी चादर उतने पैर पसारने में विश्वास करते हैं। अशिक्षित व रूढ़िवादी व्यक्ति की तरह वे कर्ज लेकर परिवार में जन्म-मरण या विवाह पर अनाप-शनाप खर्च नहीं करते जो निर्धनता का मुंह देखना पड़े। शिक्षित व्यक्ति सदैव प्राथमिकताएँ निश्चित करने के उपरान्त उपलब्ध धन का सदुपयोग करते हैं। बहुधा निर्धनता
उनसे कोसों दूर रहती है।

45.

निर्धनता और बेकारी दूर करने में आरक्षण नीति कहाँ तक सफल रही है?

Answer»

निर्धनता और बेकारी दूर करने में आरक्षण नीति आंशिक रूप से ही सफल हो पाई है। इसका प्रमुख कारण यह है कि सरकार द्वारा निर्धनता और बेकारी दूर करने हेतु जो आरक्षण नीति बनाई गई है उसका लाभ वांछित लोगों तक नहीं पहुँच पाता है। अनेक अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि सभी अनुसूचित जातियाँ इन नीतियों का लाभ नहीं उठा पाई हैं। कुछ जातियों को इसका लाभ अधिक हुआ है तथा. इसी के परिणामस्वरूप आज निर्धनता एवं बेकारी की स्थिति से निकल कर अपनी सामाजिक-आर्थिक एवं शैक्षिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार कर पाए हैं। आरक्षण नीति की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि इसका लाभ उन लोगों तक पहुँचाने का प्रयास किया जाए जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है।

46.

जल प्रदूषण के दो प्रमुख स्रोत कौन-से हैं?

Answer»

औद्योगिक अपशिष्ट या जहरीले गौण उत्पाद तथा कृषीय कीटनाशक दवाएँ जल प्रदूषण के दो प्रमुख स्रोत हैं।

1) कारखाना। 2 अम्लीय वर्षा 

47.

वह कौन-सा सिद्धांत है जो सम्पूर्ण मानवीय क्रियाओं को भौगोलिक पर्यावरण के आधार पर स्पष्ट करने का प्रयास करता है?(क) भौगोलिक निर्णायकवाद(ख) तकनीकी निर्णायकवाद(ग) सांस्कृतिक निर्णायकवाद(घ) इनमें से कोई नहीं

Answer»

सही विकल्प है  (क) भौगोलिक निर्णायकवाद

48.

मानवीय गतिविधियों द्वारा पर्यावरण में होने वाले असंतुलन को क्या कहा जाता है?

Answer»

मानवीय गतिविधियों द्वारा पर्यावरण में होने वाले अवांछनीय परिवर्तन को ‘पर्यावरणीय प्रदूषण’ कहते हैं।

49.

स्वरोजगार योजना के बारे में आप क्या जानते हैं ?

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यह योजना 15 अगस्त, 1983 को घोषित दूसरी योजना है, जो शहरी पढ़े-लिखे उन बेरोजगारों के लिए है जिनकी उम्र 18 से 35 के मध्य है तथा जो हाईस्कूल या इससे अधिक शिक्षित हैं। इस योजना के अन्तर्गत या शिक्षित बेरोजगारी दूर करने के ₹ 35 हजार तक किसी भी बेरोजगार शहरी पढ़े-लिखे व्यक्ति को बैंकों के माध्यम से दिये जा सकते हैं जो स्वयं कोई काम करना चाहते हैं। इसके लिए चुनाव जिला उद्योग कार्यालयों द्वारा किया जाता है। इस योजना का उद्देश्य 2 से 2.5 लाख बेरोजगार पढ़े-लिखे युवकों को प्रतिवर्ष रोजगार देना है।

50.

जवाहर ग्राम समृद्धि योजना का मुख्य लक्ष्य क्या है ?

Answer»

जवाहर ग्राम समृद्धि योजना का मुख्य लक्ष्य ग्रामीण क्षेत्रों में बेकार और अर्द्ध-बेकार लोगों को रोजगार उपलब्ध कराना है।