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This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.

1.

भारत के सीमावर्ती किन्हीं दो राष्ट्रों के नाम लिखिए। या भारत के सीमावर्ती देशों के नाम लिखिए।

Answer»

भारत के सीमावर्ती देशों के नाम हैं

  • पाकिस्तान
  • अफगानिस्तान
  • चीन
  • नेपाल
  • भूटान
  • म्यांमार तथा
  • बांग्लादेश।
2.

गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का 14वाँ शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया था-(क) जकार्ता में(ख) हरारे में(ग) बेलग्रेड में(घ) नयी दिल्ली में

Answer»

सही विकल्प है (ख) हरारे में

3.

पंचशील के सिद्धान्त में निम्नलिखित में से कौन-सा सिद्धान्त शामिल है?(क) अनाक्रमण(ख) समानता एवं पारस्परिक लाभ(ग) शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व(घ) ये सभी

Answer»

सही विकल्प है (घ) ये सभी

4.

भारत के दो संस्थानों के नाम लिखिए जहाँ सैन्य अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया जाता है।

Answer»
  • नेशनल डिफेन्स अकादमी-खड़गवासला।
  • इण्डिया मिलिट्री अकादमी-देहरादून।
5.

पुलिस किस सूची का विषय है ?

Answer»

पुलिस राज्य-सूची का विषय है।

6.

जिले का सबसे बड़ा पुलिस अधिकारी कौन होता है ?

Answer»

वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (Senior Superintendent of Police : S.S.P)।

7.

वायु सेना के मुख्य अधिकारियों के पद (नाम) लिखिए।

Answer»

वायु सेना का सर्वोच्च अधिकारी वायु सेनाध्यक्ष कहलाता है। इसके अधीन सह-सेनाध्यक्ष, उप-सेनाध्यक्ष, एयर ऑफिस-इन-चार्ज (प्रशासन) और ऑफिस इन-चार्ज (रख-रखाव) आदि होते हैं।

8.

उन दो द्वीप-समूहों के नाम लिखिए जो भारत संघ के अभिन्न अंग हैं?

Answer»
  • लक्षद्वीप एवं
  • अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह
9.

1961 ई० में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का प्रथम शिखर सम्मेलन कहाँ हुआ?यागुट-निरपेक्ष आन्दोलन का सर्वप्रथम शिखर सम्मेलन किस नगर में हुआ था?(क) बेलग्रेड (यूगोस्लाविया) में(ख) दिल्ली (भारत) में(ग) काहिरा (मिस्र) में(घ) हवाना (क्यूबा) में

Answer»

सही विकल्प है (क) बेलग्रेड (यूगोस्लाविया) में

10.

गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का प्रथम सम्मेलन कब और कहाँ आयोजित हुआ ?

Answer»

गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का प्रथम सम्मेलन बेलग्रेड (यूगोस्लाविया) में सितम्बर, 1961 ई० में आयोजित हुआ था।

11.

रक्षा विकास एवं अनुसन्धान विभाग की स्थापना कब की गयी ?

Answer»

रक्षा विकास एवं अनुसन्धान विभाग की स्थापना 7 मई, 1980 ई० को हुई थी।

12.

सुदूर दक्षिणी सीमा पर कौन-सा देश स्थित है?

Answer»

सुदूर दक्षिणी सीमा पर श्रीलंका स्थित है।

13.

भारत की स्थल सीमा कितनी लम्बी है ?

Answer»

भारत की स्थल सीमा की लम्बाई 15,200 किमी है।

14.

गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का सातवाँ शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया था-(क) हरारे में(ख) जकार्ता में(ग) नयी दिल्ली में(घ) बेलग्रेड में

Answer»

सही विकल्प है (ग) नयी दिल्ली में

15.

भारतीय नौसेना का मुख्यालय कहाँ स्थित है ? उसमें कितनी कमान होती हैं ?

Answer»

भारतीय नौसेना का मुख्यालय नयी दिल्ली में स्थित है। इसमें तीन कमान होती हैं।

16.

विदेश-नीति का क्या अर्थ है ? भास्तीय विदेश-नीति के निर्धारक तत्त्वों का वर्णन कीजिए।याभारत की विदेश नीति की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं? पंचशील के सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।याभारत की विदेश नीति की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।याभारत की विदेश-नीति की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।याकिसी विदेशी पत्रिका में भारत को एक साम्राज्यवादी देश बताया गया है। इसका खण्डन करने के लिए उस पत्रिका के सम्पादक को क्या लिखेंगे ?याभारतीय विदेश नीति के विशिष्ट लक्षणों की व्याख्या कीजिए।याभारतीय विदेश नीति के किन्हीं तीन सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।यापंचशील तथा भारत की विदेश नीति पर एक लेख लिखिए।याभारतीय विदेश नीति के आधारभूत सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।याभारत की विदेश नीति के मुख्य सिद्धान्त क्या हैं? उनमें से किन्हीं तीन का उल्लेख कीजिए।याभारत की विदेश नीति की किन्हीं चार विशेषताओं की विवेचना कीजिए।

Answer»

विदेश-नीति से तात्पर्य उस नीति से है जो कोई देश अन्य देशों के प्रति अपनाता है।

भारत की विदेश-नीति की विशेषताएँ/लक्षण//सिद्धान्त

भारत की विदेश नीति की प्रमुख विशेषताएँ/लक्षण/तत्त्व/सिद्धान्त निम्नलिखित हैं–

1. गुट-निरपेक्षता– द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सम्पूर्ण विश्व दो सैन्य मुटों में बँट गया था। प्रथम गुट
संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व में तथा दूसरा गुट पूर्ववर्ती सोवियत संघ के नेतृत्व में था। ऐसी स्थिति में भारत ने स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद गुट-निरपेक्ष रहने का निर्णय लिया। गुट-निरपेक्षता भारत की । विदेश-नीति में सर्वोपरि है। गुट-निरपेक्षता की नीति साम्राज्यवाद तथा उपनिवेशवाद की घोर विरोधी है। देश के विकास के लिए किसी विशेष गुट में सम्मिलित होने की अपेक्षा गुट-निरपेक्ष रहकर सभी देशों को सहयोग करना इस नीति का मूल आधार है।

2. पंचशील के सिद्धान्त में आस्थाभारत बौद्ध धर्म के पाँच व्रतों पर आधारित ‘पंचशील’ के सिद्धान्त
में गहन आस्था रखता है। सन् 1954 ई० में भारत तथा चीन ने एक मैत्री सन्धि के अन्तर्गत इस सिद्धान्त की घोषणा की थी। सन् 1955 ई० में बाण्डंग सम्मेलन में तृतीय विश्व के 29 देशों तथा बाद में संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इस सिद्धान्त को स्वीकार किया। इस सिद्धान्त के प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित हैं

·सभी देशों की परस्पर प्रादेशिक अखण्डता और प्रभुसत्ता का सम्मान करना

·दूसरे देशों पर आक्रमण न करना

·दूसरे देशों के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना

·सभी देशों को बराबर समझना तथा

·शान्ति और सौहार्दपूर्वक सह-अस्तित्व की नीति का पालन करना।

3. समस्त राष्ट्रों से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध– भारत की विदेश नीति के निर्धारणकर्ता पं० जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि “भारत की विदेश नीति का मूल उद्देश्य विश्व के समस्त राष्ट्रों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करना है। भारत इस नीति का निरन्तर पालन करता रहा है। वह अपने पड़ोसी देशों से ही नहीं, अपितु सभी राष्ट्रों से राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा व्यापारिक मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाये रखना चाहता है।

4. शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्वशान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व भारत की विदेश नीति का प्रमुख अंग है। यह भी पंचशील के सिद्धान्तों पर आधारित है। इसकी तीन प्रमुख शर्ते हैं-

· प्रत्येक राष्ट्र के स्वतन्त्र अस्तित्व को पूर्ण मान्यता

· प्रत्येक राष्ट्र को अपने भाग्य का निर्माण करने के अधिकार की मान्यता तथा

· पिछड़े हुए राष्ट्रों का विकास एक निष्पक्ष अन्तर्राष्ट्रीय अभिकरण द्वारा किया जाना। इस सिद्धान्त के पीछे यह चिन्तन है कि यदि महाशक्तियाँ कमजोर देशों के भाग्य का निर्धारण करेंगी तो कोई भी देश आर्थिक विकास नहीं कर सकेगा। इसलिए सभी राष्ट्रों को अपने ढंग से आर्थिक विकास करने का अवसर मिलना चाहिए। इस सिद्धान्त का अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों पर अच्छा प्रभाव पड़ा है।

5. रंग-भेद नीति का विरोधभारत रंग-भेद नीति अथवा नस्लवाद का कट्टर विरोधी है। इसलिए | उसने दक्षिण अफ्रीका में 1994 ई० तक स्थापित अल्प मत वाली गोरी सरकार द्वारा अपनायी गयी रंग-भेद’ की नीति का सदैव विरोध किया। वास्तव में रंग-भेद नीति मानवता का घोर अपमान है।

6. विश्व-शान्ति तथा संयुक्त राष्ट्र संघ में सहयोग– भारत अन्तर्राष्ट्रीय विवादों का शान्तिपूर्ण ढंग से निपटारा करने का समर्थक है। इसलिए वह संयुक्त राष्ट्र संघ तथा अन्य अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं के साथ। सहयोग का पक्षधर है। विश्व शान्ति कायम करने के लिए भारत निरस्त्रीकरण पर भी बल देता है।

7. साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का विरोधसाम्राज्यवादी शोषण से त्रस्त भारत ने अपनी विदेश-नीति में साम्राज्यवाद के प्रत्येक रूप का कटु विरोध किया है। भारत इस प्रकार की प्रवृत्तियों को विश्व-शान्ति एवं विश्व-व्यवस्था के लिए घातक एवं कलंकमय मानता है। के० एम० पणिक्कर के अनुसार, “भारत की नीति हमेशा से यही रही है कि यह पराधीन लोगों की स्वतन्त्रता के प्रति आवाज उठाता रहा है; क्योंकि भारत का दृढ़ विश्वास है कि साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद हमेशा से आधुनिक युद्धों का कारण रहा है।

भारत की विदेश नीति के ऊपर उल्लिखित बिन्दुओं के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि भारत एक साम्राज्यवादी देश नहीं है। यदि किसी विदेशी पत्रिका में ऐसा लिखा गया है कि भारत एक साम्राज्यवादी देश है तो यह पूर्णतया असत्य एवं भ्रामक है। इसके लिए सम्बन्धित पत्रिका के सम्पादक के प्रति भारत को कड़ा विरोध जताना चाहिए।

17.

नौ-सेना का प्रधान कौन होता है ?(क) एडमिरल(ख) जनरल(ग) ब्रिगेडियर(घ) मेजर जनरल

Answer»

सही विकल्प है (क) एडमिरल

18.

सीमा सुरक्षा बल की स्थापना कब और कहाँ की गयी थी ?

Answer»

सीमा सुरक्षा बल की स्थापना दिल्ली में दिसम्बर, 1965 ई० में की गयी थी।

19.

वर्ष 2012 में गुट-निरपेक्ष शिखर सम्मेलन किस देश में आयोजित हुआ था ?(क) भारत(ख) पाकिस्तान(ग) ईरान(घ) बांग्लादेश

Answer»

सही विकल्प है (ग) ईरान

20.

भारत में परमाणु विस्फोट के लिए कौन-सा स्थान प्रसिद्ध है?(क) बॉम्बे हाई(ख) पोखरन(ग) हरिकोटा(घ) बंगलुरु

Answer»

सही विकल्प है (ख) पोखरन

21.

भारतीय वायु सेना का मुख्यालय कहाँ स्थित है ?

Answer»

भारतीय वायु सेना का मुख्यालय नयी दिल्ली में स्थित है।

22.

भारत ने प्रथम अणु परीक्षण 1974 ई० में किस स्थान पर किया था ?(क) पोखरन में(ख) खड़गवासला में(ग) नरौरा में(घ) ट्रॉम्बे में

Answer»

सही विकल्प है (क) पोखरन में

23.

इंण्डियन मिलिट्री अकादमी कहाँ स्थित है ?

Answer»

इण्डियन मिलिट्री अकादमी देहरादून में स्थित है।

24.

भारत में रक्षा-मन्त्रालय का प्रधान होता है(क) राष्ट्रपति(ख) प्रधानमन्त्री(ग) रक्षामन्त्री(घ) थल सेनाध्यक्ष

Answer»

सही विकल्प है (ग) रक्षामन्त्री

25.

निम्नलिखित में से कौन-सा एक तत्त्व भारतीय विदेश-नीति का आधार नहीं है ?(क) विश्व शान्ति की स्थापना में सहयोग(ख) अन्तर्राष्ट्रीय कानून का पालन(ग) उपनिवेशवाद का समर्थन(घ) सैनिक गुटबन्दियों से पृथकता

Answer»

सही विकल्प है (ग) उपनिवेशवाद का समर्थन

26.

निःशस्त्रीकरण आवश्यक है(क) विश्व शान्ति के लिए(ख) युद्ध रोकने के लिए(ग) मानव संहार रोकने के लिए(घ) ये सभी

Answer»

सही विकल्प है (घ) ये सभी

27.

रंगभेद से आप क्या समझते हैं?यारंग-भेद की नीति से कौन देश सबसे अधिक प्रभावित हुआ ? इसका तीव्र विरोध क्यों किया गया है? संयुक्त राष्ट्र संघ ने इसके विरुद्ध जनपद निर्माण करने के लिए क्या कदम उठाये हैं ?यामानवाधिकार प्रत्येक मानव के लिए इतने अधिक महत्त्वपूर्ण क्यों हैं ? संयुक्त राष्ट्र संघ ने मानवाधिकार का सार्वभौम घोषणा-पत्र कब निर्गत किया था ?

Answer»

रंगभेद-नीति एक अन्तर्राष्ट्रीय समस्या है। अंग्रेज लोग अश्वेत लोगों के साथ अमानवीय एवं बर्बर व्यवहार करते थे। यह मानवता के विरुद्ध था। अफ्रीकी देशों में इस समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया था। अफ्रीका महाद्वीप की यह प्रमुख समस्या है-जातिवाद अथवा गोरे-काले की। इस समस्या का उदय यूरोपीय शक्तियों द्वारा किया गया। उनके शासनकाल में यहाँ श्वेत लोग आकर बसे तथा प्रशासन एवं उच्चस्तरीय कार्य इन्हीं के हाथों में था। ये शासक थे, अत: स्थानीय निवासियों पर मनमाना अत्याचार करते तथा उनको दास समझते थे। यह क्रम उस समय तक चलता रहा जब तक उनका शासन था यद्यपि अनेक बार इसका विरोध किया गया। किन्तु यूरोपीय अपनी जातीय उच्चता की भावना के कारण स्थानीय जनता का शोषण करते रहे। आज जबकि यहाँ के देश स्वतन्त्र हैं फिर भी जहाँ विदेशी हैं वहाँ यह समस्या वर्तमान है। इसके अतिरिक्त, यहाँ अनेक आदिवासी जातियाँ निवास करती हैं। उनका तथा शेष अफ्रीकियों में सामंजस्य करना इनके विकास के लिए अति आवश्यक है। यह समस्या द० रोडेशिया तथा द० अफ्रीका में उग्र रूप धारण कर चुकी है तथा वहाँ संघर्ष होता रहता है। अफ्रीकी राष्ट्रों ने एकजुट होकर संयुक्त राष्ट्रसंघ के मंच पर बार-बार यह मुद्दा उठाया और इनके साथ ‘मानव अधिकार’ का संदर्भ देकर इसे अन्तर्राष्ट्रीय अभिरुचि का विषय बना दिया। यही कारण था कि संयुक्त महासभा ने रंगभेद की नीति को 1973 में मानवता के प्रति अपराध’ घोषित किया तथा 1978 वर्ष को ‘रंगभेद विरोध वर्ष के रूप में मनाया गया।

28.

भारत की विदेश-नीति के उद्देश्य बताइए।

Answer»

भारतीय विदेश नीति के निम्न उद्देश्य हैं

  • अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा की व्यवस्था में सकारात्मक सहयोग प्रदान करना।
  • साम्राज्यवाद एवं उपनिवेशवाद का वैधानिक विरोध करना।
  • सैनिक गुटबन्दियों से अपने आपको अलग रखना।
  • सभी राष्ट्रों के साथ शान्तिपूर्ण व सम्मानपूर्वक सम्बन्ध स्थापित करना।
  • सैनिक गुटबन्दियों व समझौतों से अपने आपको सर्वथा अलग रखना चाहिए।
29.

निम्नलिखित में से कौन गुट-निरपेक्ष आन्दोलन से सम्बन्धित नहीं है?(क) मिस्र के नासिर(ख) इण्डोनेशिया के सुकणों(ग) भारत के जवाहरलाल नेहरू(घ) चीन के चाऊ-एन-लाई

Answer»

सही विकल्प है (घ) चीन के चाऊ-एन-लाई

30.

नेशनल डिफेन्स अकादमी कहाँ है ?(क) देहरादून में(ख) चेन्नई में(ग) मऊ में।(घ) खड़गवासला में

Answer»

सही विकल्प है (क) देहरादून में

31.

निम्नलिखित में से गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का अग्रदूत कौन था ?(क) मार्शल टीटो(ख) जोसेफ स्टालिन(ग) विंस्टन चर्चिल(घ) फ्रेंकलिन रुजवेल्ट

Answer»

सही विकल्प है (क) मार्शल टीटो

32.

विश्व-शान्ति के लिए निःशस्त्रीकरण क्यों आवश्यक है ? किन्हीं दो कारणों का उल्लेख कीजिए।

Answer»

आधुनिक युग में निःशस्त्रीकरण की आवश्यकता आधुनिक आणविक युग में विश्व के राष्ट्रों के लिए नि:शस्त्रीकरण का मार्ग अपनाना श्रेयस्कर है, क्योंकि इसी रास्ते पर चलकर मानव की उपलब्धियों की रक्षा की जा सकती है। इसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिये जा सकते हैं

1. विश्व-शान्ति की स्थापना के लिए- शस्त्रास्त्र नियन्त्रण में ही विश्व शान्ति निहित है। कोहन के
अनुसार, “नि:शस्त्रीकरण द्वारा राष्ट्रों के भय और मतभेद को कम करके शान्तिपूर्ण समझौतों की प्रक्रिया को सुविधापूर्ण तथा शक्तिशाली बनाया जा सकता है।” प्रो० शूमेन के अनुसार, “संघर्ष की आशंका ही शस्त्रीकरण की होड़ को जन्म देती है और युद्ध की सम्भावना से शस्त्रों में वृद्धि होती है। शस्त्रीकरण युद्ध मनोविज्ञान को जन्म देता है और उससे अविश्वास और भय की अभिव्यक्ति होती है। उससे समाज में एक ऐसे वर्ग का जन्म होता है जिसका युद्ध में निहित स्वार्थ होता है। शस्त्रास्त्र आरम्भ में व्यापक भुखमरी पैदा करते हैं और अन्त में उसकी परिणति व्यापक हत्याओं में होती है।

2. आर्थिक हानि से बचने के लिए- जिस धन का प्रयोग गन्दी बस्तियों को खत्म करने तथा सभी निर्धनों के लिए आवासगृहों को बनाने में व्यय किया जा सकता था उसको उस युद्ध के लिए हथियार बनाने में खर्च किया जाता है, जिसे न लड़ने की कसम अनेक बार खायी जा चुकी है। इससे विश्व में भुखमरी तथा गरीबी बढ़ती है, जो अन्ततोगत्वा विश्व-शान्ति के लिए खतरा पैदा करते हैं। जब तक विश्व में भुखमरी तथा गरीबी है तब तक विश्व शान्ति की स्थापना करना कठिन है।

33.

निःशस्त्रीकरण से आप क्या समझते हैं ? इसके सम्बन्ध में भारत का दृष्टिकोण स्पष्ट कीजिए।

Answer»

निःशस्त्रीकरण

भारत की विदेश नीति शान्ति और अहिंसा की विदेश नीति रही है। फलत: भारत नि:शस्त्रीकरण का प्रबल समर्थक रहा है। नि:शस्त्रीकरण के सम्बन्ध में यह मान्यता रही है कि युद्धों का एक प्रमुख कारण शस्त्रों का अस्तित्व है। अत: नि:शस्त्रीकरण ही अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति को सुदृढ़ बना सकता है। यह शस्त्रों के उत्पादन पर होने वाले बेहिसाब खर्च से छुटकारा दिला सकता है। इसके द्वारा बचाये गये साधनों तथा धन का प्रयोग सभी राष्ट्रों के विकास के लिए किया जा सकता है। इसीलिए भारत की विदेश नीति हथियारों विशेषकर परमाणु हथियारों के नि:शस्त्रीकरण की प्रबल समर्थक रही है। अपनी इस मान्यता के कारण भारत और उसके अन्य सहयोगी देशों ने सन् 1961 ई० में आणविक परीक्षणों को बन्द करने का प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र महासभा में रखा। सन् 1962 ई० में जेनेवा के नि:शस्त्रीकरण सम्मेलन में भारत ने अपने सात अन्य सहयोगी देशों के सहयोग से सम्मेलन में एक स्मरण-पत्र प्रस्तुत किया। सन् 1988 ई० में नि:शस्त्रीकरण के लिए आयोजित संयुक्त राष्ट्र महासभा के तीसरे सत्र में भारत ने एक कार्ययोजना ‘परमाणु शस्त्रमुक्त और अहिंसक विश्व-व्यवस्था प्रस्तुत की थी।

भारत परमाणु अप्रसार सन्धि (NPT) और व्यापक परीक्षण प्रतिबन्ध सन्धि (CTBT) का, उसकी भेदभावपूर्ण नीति के कारण दृढ़ता से विरोध करता रहा है। भारत ने अपने परमाणु कार्यक्रम को शान्तिपूर्ण उद्देश्यों और न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता बनाये रखने तक सीमित रखा है। भारत के इस दृष्टिकोण का समर्थन करते हुए अमेरिका ने भारत के साथ सन् 2008 ई० में परमाणु ऊर्जा से सम्बन्धित एक समझौता किया, जिसका समर्थन परमाणु आपूर्ति कर्ता समूह (NSG) के 45 देशों ने भी किया। भारत अपने परमाणु विकल्प को तब तक छोड़ने पर सहमत नहीं है, जब तक कि अन्य परमाणु शस्त्र सम्पन्न राष्ट्र इसके लिए तैयार नहीं हो जाते।

34.

गुट-निरपेक्षता से आप क्या समझते हैं? क्या यह वर्तमान परिस्थितियों में प्रासंगिक है? उदाहरण दीजिए।

Answer»

गुट-निरपेक्षता की नीति का उद्भव सन् 1961 ई० के बेलग्रेड सम्मेलन में हुआ था। इस सम्मेलन में भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू, इण्डोनेशिया के पूर्व राष्ट्रपति सुकर्णो, मिस्र के राष्ट्रपति गामेल अब्दुल नासिर तथा यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति मार्शल टीटो ने सम्मिलित रूप से गुट-निरपेक्षता की नीति की घोषणा की थी और इस नीति में अपना पूर्ण विश्वास प्रकट किया था। यही इसके प्रवर्तक थे। इस नीति से आशय; विभिन्न देशों के गुटों से तटस्थ रहते हुए अपनी स्वतन्त्र नीति को अपनाना तथा समस्त देशों की अखण्डता में विश्वास प्रकट करना है। इस नीति के अन्तर्गत किसी भी प्रकार के शोषण, साम्राज्यवाद, रंग-भेद, युद्ध अथवा सैनिक गुटबन्दी का कोई स्थान नहीं है।

वर्तमान में गुट-निरपेक्षता की नीति की प्रासंगिकता

वर्तमान में शीत युद्ध की स्थिति नहीं है। इस समय विश्व में एक ही महाशक्ति संयुक्त राज्य अमेरिका है। इस बदली हुई स्थिति में कुछ लोग इस नीति की प्रासंगिकता पर सन्देह करते हैं, किन्तु ऐसी बात है नहीं। गुट-निरपेक्ष देशों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है। यह इसके बढ़ते हुए महत्त्व का प्रतीक है। जर्मनी तथा नीदरलैण्ड तो इसके शिखर सम्मेलन में अतिथि देश के रूप में तथा चीन ने पर्यवेक्षक देश के रूप में भाग लिया। इन देशों का प्रयास है कि संयुक्त राष्ट्र संघ में इनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण रहे। इस प्रकार गुट-निरपेक्षता की नीति वर्तमान में भी प्रासंगिक है।

35.

भारत की विदेश-नीति निम्नलिखित में से किसका समर्थन नहीं करती है?(क) नि:शस्त्रीकरण(ख) उपनिवेशवाद(ग) गुट-निरपेक्षता(घ) पंचशील

Answer»

सही विकल्प है (ख) उपनिवेशवाद

36.

गुट-निरपेक्षता से आप क्या समझते हैं ? इसके बदलते स्वरूप का वर्णन कीजिए।याभारत की गुट-निरपेक्ष नीति को स्पष्ट कीजिए। गुट-निरपेक्षता से आप क्या समझते हैं ?यागुट-निरपेक्षता में भारत के योगदान का वर्णन कीजिए। “भारतीय विदेश नीति का आधार गुटनिरपेक्षता है।” स्पष्ट कीजिए।याविश्व-शान्ति के लिए गुट-निरपेक्षता क्यों आवश्यक है ? इसके महत्व का वर्णन उचित उदाहरणों सहित कीजिए।यागुट-निरपेक्ष आन्दोलन का प्रारम्भ क्यों हुआ ? प्रारम्भ में इसमें भाग लेने वाले दो प्रमुख देशों के नाम लिखिए।यागृट-निरपेक्षता से आप क्या समझते हैं? क्या वर्तमान समय में भी भारत को इसका पालन करना चाहिए?

Answer»

गुट-निरपेक्षता.का अर्थ-शक्ति के किसी भी गुट में सम्मिलित न होना तथा अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में बिना किसी बाह्य दबाव के अच्छाई व बुराई को ध्यान में रखकर स्वतन्त्र निर्णय लेना गुटनिरपेक्षता है।

द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् सम्पूर्ण विश्व दो गुटों में बँट गया। एक गुट का नेतृत्व अमेरिका ने किया और दूसरे गुट का सोवियत संघ (रूस) ने। दोनों गुटों में अनेक कारणों को लेकर भीषण शीतयुद्ध प्रारम्भ हो गया। यूरोप और एशिया के अधिकांश देश इस गुटबन्दी में फँस गये और वे किसी-न-किसी गुट में
सम्मिलित हो गये। स्वतन्त्र भारत की विदेश नीति के निर्माता पं० जवाहरलाल नेहरू ने विदेश नीति का आधार गुट-निरपेक्षता (Non-Alignment) को बनाया। उन्होंने स्पष्ट किया, “हम किसी गुट में सम्मिलित नहीं हो सकते, क्योंकि हमारे देश में आन्तरिक समस्याएँ इतनी अधिक हैं कि हम दोनों गुटों से सम्बन्ध बनाये बिना उन्हें सुलझा नहीं सकते।’ सन् 1961 ई० में बेलग्रेड में हुए गुट-निरपेक्ष देशों के प्रथम शिखर सम्मेलन में केवल 25 देशों ने भाग लिया था, किन्तु धीरे-धीरे गुट-निरपेक्षता की नीति अपनाने वाले देशों की संख्या में वृद्धि होती गयी। अब इनकी संख्या 120 हो गयी है। इसमें भाग लेने वाले दो प्रमुख देश इण्डोनेशिया व मिस्र थे।

गुट-निरपेक्षता में भारत का योगदान

गुट-निरपेक्षता के विकास में भारत का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। भारत की विदेश नीति का प्रमुख सिद्धान्त ही गुट-निरपेक्षता है। सर्वप्रथम, भारत ने ही एशिया तथा अफ्रीका के नवोदित स्वतन्त्र राष्ट्रों को परस्पर एकता और सहयोग के सूत्र में बाँधने का प्रयास किया था। ‘बाण्डंग सम्मेलन में भारत के तत्कालीन प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। इस प्रकार भारत गुट-निरपेक्षता का अग्रणी रहा है। पं० जवाहरलाल नेहरू का कथन था, “चाहे कुछ भी हो जाए, हम किसी भी देश के साथ सैनिक सन्धि नहीं करेंगे। जब हम गुट-निरपेक्षता का विचार छोड़ते हैं तो हम अपना संसार छोड़कर हटने लगते हैं। किसी देश से बँधना अपने आत्म-सम्मान को खोना तथा अपनी बहुमूल्य नीति का अनादर करना है।” पं० नेहरू के बाद श्रीमती इन्दिरा गांधी ने गुट-निरपेक्षता के विकास को अग्रसरित किया। प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने सातवें सम्मेलन (1983 ई०) में नयी दिल्ली में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की अध्यक्षता ग्रहण की थी। श्रीमती इन्दिरा गांधी ने अपने एक भाषण में कहा था कि “गुट-निरपेक्षता स्वयं में एक नीति है। यह केवल एक लक्ष्य ही नहीं, इसके पीछे उद्देश्य यह है कि निर्णयकारी स्वतन्त्रता और राष्ट्र की सच्ची भक्ति तथा बुनियादी हितों की रक्षा की जाए।

प्रधानमन्त्री श्री राजीव गांधी भी गुट-निरपेक्ष आन्दोलन को प्रभावशाली बनाने के लिए कृत-संकल्प थे। 15 अगस्त, 1986 ई० को श्री राजीव गांधी ने कहा था, “भारत की गुट-निरपेक्षता की नीति के कारण ही भारत का विश्व में आदर है। उसके साथ संसार के दो-तिहाई गुट-निरपेक्ष देशों की आवाज होती है।” नवे शिखर सम्मेलन (सितम्बर, 1989 ई०) में प्रधानमन्त्री राजीव गांधी ने कहा था कि “गुट-निरपेक्ष आन्दोलन तभी गतिशील रह सकता है, जब यह उन्हीं सिद्धान्तों पर चले, जिन पर चलने का वायदा यहाँ 1961 ई० में प्रथम सम्मेलन में सदस्यों ने किया था।” ग्यारहवें शिखर सम्मेलन में भारत ने दो बातों के प्रसंग में महत्त्वपूर्ण सफलता प्राप्त की। भारत ने आणविक शस्त्रों पर आणविक शक्तियों के एकाधिकार का विरोध किया। बारहवें सम्मेलन में भारत और पाकिस्तान की आणविक विस्फोट के लिए आलोचना की गयी। सम्मेलन के अध्यक्ष नेल्सन मण्डेला द्वारा कश्मीर समस्या का उल्लेख किये जाने पर भारत द्वारा कड़ी आपत्ति की गयी। भारत की आपत्ति को दृष्टि में रखते हुए नेल्सन मण्डेला ने अपना वक्तव्य वापस ले लिया।

तेरहवें शिखर सम्मेलन में प्रधानमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सुरक्षा परिषद् में भारत की स्थायी सदस्यता हेतु भी पहल की। प्रधानमन्त्री श्री वी० पी० सिंह भी गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के प्रबल समर्थक रहे हैं और तत्पश्चात् प्रधानमन्त्री श्री चन्द्रशेखर भी इस आन्दोलन को सफल बनाने के लिए प्रयत्नशील थे। प्रधानमन्त्री नरसिम्हा राव ने भी इसी नीति को जारी रखा। इसके बाद प्रधानमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार देश की सुरक्षा और अखण्डता के मुद्दे पर समयानुसार विदेश नीति निर्धारित करने के लिए दृढ़ संकल्प थी।

सोवियत रूस के विघटन के बाद गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का राजनीतिक महत्त्व अवश्य कुछ कम हो गया है, परन्तु इसकी आर्थिक भूमिका पहले से भी ज्यादा बढ़ गयी है। औद्योगिक राष्ट्रों द्वारा उदार अर्थव्यवस्था को विश्वस्तरीय आकार देने के कारण बहुसंख्यक गरीब एवं विकासशील देश आज न चाहते हुए भी आर्थिक एवं व्यापारिक क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धी की भूमिका में खड़े हो गये हैं। धनी एवं सम्पन्न राष्ट्रों में संरक्षणवादी प्रवृत्तियाँ बढ़ी हैं और साम्राज्यवाद का एक नया आर्थिक रूप सामने आ रहा है। मुक्त व्यापार के नाम पर अमीर देश विकासशील देशों पर हर प्रकार के प्रतिबन्ध चाहते हैं। अत: विकासशील राष्ट्रों के लिए सामूहिक रूप से अपने आर्थिक एवं व्यापारिक हितों की सुरक्षा करने की आवश्यकता बढ़ गयी है। इस प्रकार गुट-निरपेक्ष आन्दोलन को अपना स्वरूप बदलकर; अर्थात् स्वयं को राजनीतिक मोर्चे से आर्थिक मोर्चे की ओर मोड़कर; अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था में आमूल परिवर्तन लाने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा। निश्चित ही यह गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की नयी भूमिका की शुरुआत होगी।

37.

भारतीय नौसेना का मुख्यालय कहाँ स्थित है?(क) कोचीन में(ख) विशाखापत्तनम में(ग) चेन्नई में(घ) नई दिल्ली में

Answer»

सही विकल्प है (घ) नई दिल्ली में

38.

‘सह-अस्तित्व’ का सिद्धान्त निरूपित किया गया था(क) संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में(ख) पंचशील की घोषणा में(ग) मानवाधिकारों की घोषणा में(घ) भारतीय संविधान की उद्देशिका में

Answer»

सही विकल्प है (ख) पंचशील की घोषणा में

39.

पंचशील से आप क्या समझते हैं ? इसके प्रमुख सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।यापंचशील से आपका क्या अभिप्राय है ? इसके किन्हीं दो सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए। पंचशील के तीन सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।यावर्तमान राजनीतिक स्थिति में पंचशील के कौन-से दो सिद्धान्त अधिक उपयोगी हैं?यापंचशील’ के प्रस्ताव पर सर्वप्रथम किन दो देशों में सहमति बनी थी?यापंचशील के किन्हीं दो बिन्दुओं का उल्लेख कीजिए।

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भारत की विदेश नीति का प्रमुख आदर्श पंचशील रहा है। जून, 1954 ई० में पं० जवाहरलाल नेहरू के द्वारा इस सिद्धान्त की सर्वप्रथम घोषणा तथा प्रतिपादन भारत और चीन के मध्य हुए एक समझौते में की गयी थी। पंचशील का सिद्धान्त महात्मा बुद्ध के उन पाँच सिद्धान्तों पर आधारित है, जो उन्होंने व्यक्तिगत आचरण के लिए निर्धारित किये थे। पंचशील के सिद्धान्तों का सूत्रपात पं० जवाहरलाल नेहरू व चीन के तत्कालीन प्रधानमन्त्री चाऊ-एन-लाई के मध्य तिब्बत सम्बन्धी समझौते के समय में हुआ था। भारत व चीन तथा अनेक एशियाई व अफ्रीकी देशों ने अप्रैल, 1995 ई० में बाण्डंग सम्मेलन में इन्हें स्वीकार किया था, जिससे अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग और सद्भाव में वृद्धि हो। पंचशील के पाँच सिद्धान्त निम्नलिखित हैं|

· सभी राष्ट्र एक-दूसरे की सम्प्रभुता तथा अखण्डता का सम्मान करें।

· कोई भी राष्ट्र दूसरे राष्ट्र पर आक्रमण न करे तथा शान्तिपूर्ण तरीकों से पारस्परिक विवादों का समाधान करें।

· कोई भी राष्ट्र दूसरे राष्ट्र के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करे।

· सभी राष्ट्र पारस्परिक समानता तथा पारस्परिक हितों में अभिवृद्धि के लिए प्रयत्नशील रहें।

· सभी राष्ट्र शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व की भावना के साथ अर्थात् मिल-जुलकर शान्तिपूर्वक रहें और | परस्पर मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध कायम रखें।

भारत और चीन के साथ अन्य राष्ट्रों ने भी इसका समर्थन किया था तथा संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इस सिद्धान्त को स्वीकार कर लिया। यद्यपि पंचशील के सिद्धान्त की घोषणा सर्वप्रथम भारत और चीन के बीच हुई थी; किन्तु फिर भी, चीन ने पंचशील के समझौते और सिद्धान्त का पालन नहीं किया तथा 1962 ई० में भारत पर आक्रमण कर दिया।

भले ही, उस समय चीन ने इस सिद्धान्त के महत्त्व को नहीं समझा; किन्तु आज जब विश्व पर परमाणु युद्ध के बादल मँडरा रहे हैं, यह सिद्धान्त बहुत महत्त्वपूर्ण हो गया है। आज इस बात की आवश्यकता है कि सम्पूर्ण विश्व में शान्ति कायम रहे, जिससे विश्व को तीसरे महायुद्ध की विभीषिका का सामना न करना पड़े। इसके लिए प्रत्येक राष्ट्र को पंचशील के मर्म अर्थात् ‘शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व’ का पालन करना चाहिए। सभी देशों को अपनी स्वतन्त्रता और अखण्डता के साथ पड़ोसी या अन्य देशों की अखण्डता का भी आदर करना चाहिए। वर्तमान अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में पंचशील ही विश्व-शान्ति का एकमात्र मार्ग है।

40.

गुट-निरपेक्षता के तीन सिद्धान्तों को लिखिए।

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गुट-निरपेक्षता के तीन सिद्धान्त निम्नलिखित हैं—

·सैनिक गुटों से अलग रहना तथा महाशक्तियों के साथ समझौता न करना।

·स्वतन्त्र विदेश नीति का निर्धारण करना।

.साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का विरोध करना।

41.

नेशनल कैडेट कोर (एनसीसी) के विषय में आप क्या जानते हैं?यानेशनलं कैडेट कोर का संक्षिप्त विवरण दीजिए।

Answer»

नेशनल कैडेट कोर

यह एक महत्त्वपूर्ण युवा संगठन है। इसमें विद्यार्थियों व स्कूली छात्र-छात्राओं को सैन्य प्रशिक्षण दिया जाता है। एन०सी०सी० में तीन डिवीजन हैं—सीनियर, जूनियर व लड़कियाँ। सीनियर डिवीजन में हाईस्कूल से ऊपर के छात्र प्रशिक्षण लेते हैं। जूनियर डिवीजन में नवीं व हाईस्कूल कक्षा में पढ़ने वाले छात्र भाग लेते हैं। एन०सी०सी० के छात्रों के लिए अनेक प्रकार की परीक्षाओं का आयोजन किया जाता है; जैसे-ए, बी, सी, जी प्रमाण-पत्र आदि की परीक्षाएँ। एन०सी०सी० का उद्देश्य देश के प्रत्येक नवयुवक को सैन्य दृष्टि से प्रशिक्षित करना है। आवश्यकता पड़ने पर ऐसे नवयुवकों को शीघ्र ही पूर्ण सैनिक बनाया जा सकता है। आज एन०सी०सी० के माध्यम से भारतीय सेना को निरन्तर बहुत अच्छे सैनिक अधिकारी प्राप्त हो रहे हैं। इस प्रकार एन०सी०सी० बहुत महत्त्वपूर्ण संगठन है। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि “एन०सी०सी० सुरक्षा सेवाओं की नर्सरी है।”

42.

आन्तरिक सुरक्षा की चुनौतियों पर सविस्तार प्रकाश डालिए।याभारत की आन्तरिक सुरक्षा को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है? किन्हीं दो का उल्लेख कीजिए।

Answer»

देश की सुरक्षा का आशय केवल बाहरी सुरक्षा से नहीं, बल्कि आन्तरिक सुरक्षा से भी है। यह सत्य है कि यदि किसी देश की सीमा में रहने वालों का जीवन सुरक्षित नहीं है, तो बाहरी हमलों से भी सुरक्षा सम्भव नहीं है।

देश की आन्तरिक सुरक्षा की चुनौतियाँ

भारत को अपनी आन्तरिक सुरक्षा के क्षेत्र में भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। जम्मू-कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर राज्यों में अलगाववाद और धार्मिक कट्टरता की कड़ी चुनौती है, वहीं इनसे पैदा हुआ आतंकवाद भारत के लिए एक गम्भीर समस्या बना हुआ है।

अलगाववाद से पीड़ित राज्यों में असम, जम्मू-कश्मीर, नागालैण्ड आदि प्रमुख हैं। इन राज्यों के उग्रवादी समूहों ने क्षेत्रों में विकास न होने का दायित्व भारत सरकार पर थोप दिया है और अलगाववाद को विकास से। जोड़ दिया है। अलगाववाद की प्रकृति भारतीय सुरक्षा के लिए एक प्रमुख चुनौती के रूप में उभरकर सामने आई है।

आतंकवाद भारत के लिए एक गम्भीर चुनौती है। आतंकवाद का अर्थ राजनीतिक खून-खराबे से है। आतंकवादी अपनी बातों को मनवाने के लिए जन-साधारण को निशाना बनाते हैं और नागरिकों के असन्तोष का उपयोग सरकार के विरुद्ध करते हैं। 26 नवम्बर, 2008 ई० को मुम्बई में हुआ आतंकवादी हमला इसका प्रमुख उदाहरण है। आतंकवादी गतिविधियों के मुख्य उदाहरण हैं—विमान अपहरणे अथवा भीड़ भरी जगहों; जैसे—रेलगाड़ी, होटल, बाजार या ऐसी ही अन्य जगहों पर बम विस्फोट कराना आदि।

देश की आन्तरिक सुरक्षा की रणनीति

देश की आन्तरिक सुरक्षा की रणनीति का प्रमुख कारक है—विकास कार्यों को तेजी से पूरा करना। ऐसे कार्यों में समाज के सभी वर्गों, उपवर्गों, सम्प्रदायों को विकास के लाभ में हिस्सेदारी प्रदान की जाती है। इसके साथ-ही-साथ भारत ने राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने के लिए लोकतान्त्रिक व्यवस्था में देश के प्रत्येक व्यक्ति को हिस्सेदार बनाया है। भारत में अर्थव्यवस्था को इस प्रकार से भी विकसित करने का प्रयास किया गया है कि बहुसंख्यक नागरिकों को गरीबी और अभाव से मुक्ति मिले तथा नागरिकों के बीच आर्थिक समानता पैदा हो। इसके अलावा आन्तरिक सुरक्षा व्यवस्था को आधुनिकीकरण और अति आधुनिक हथियारों से लैस करना भी एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारक है।

43.

पंचशील समझौता किस-किसके बीच हुआ ?

Answer»

पंचशील समझौता भारत तथा चीन के बीच हुआ था।

44.

निम्नलिखित में से पंचशील सिद्धान्त के प्रतिपादक कौन थे ?(क) जवाहरलाल नेहरू(ख) महात्मा गाँधी(ग) सुभाषचन्द्र बोस(घ) बी०आर० अम्बेडकर

Answer»

सही विकल्प है (क) जवाहरलाल नेहरू

45.

पंचशील सिद्धान्त के प्रवर्तक कौन थे ?

Answer»

पंचशील सिद्धान्त के प्रवर्तक पं० जवारूलाल नेहरू थे।

46.

भारत की आन्तरिक सुरक्षा से सम्बन्धित किन्हीं तीन समस्याओं का वर्णन कीजिए।

Answer»

कोई भी राष्ट्र विकास के पथ पर तभी अग्रसर हो सकता है जब वहाँ की आन्तरिक सुरक्षा-व्यवस्था सुदृढ़ हो। आन्तरिक सुरक्षा-व्यवस्था को सुदृढ़ बनाये रखने के लिए प्रत्येक सरकार को सतर्क रहना चाहिए जिससे विध्वंसकारी गतिविधियाँ सक्रिय न हो सकें। ये विध्वंसकारी गतिविधियाँ राष्ट्र के अन्दर गतिरोध उत्पन्न करती हैं और विकास में बाधक सिद्ध होती हैं।  देश में आन्तरिक सुरक्षा के वर्तमान समय में निम्नलिखित खतरे हैं

1. आतंकवाद– देश में आतंकवाद गम्भीर समस्या है। पड़ोसी देश पाकिस्तान का राष्ट्रीय लक्ष्य भारत को प्रगति के मार्ग पर रोकने, आर्थिक क्षति पहुँचाने, सामाजिक सद्भाव बिगाड़ने एवं नागरिकों में भय एवं असुरक्षा की भावना पैदा करने के लिए गोलाबारी, बन्दूक, आत्मघाती हमले, सार्वजनिक बम विस्फोट आदि हैं। देश के भीतर सार्वजनिक स्थानों पर बम विस्फोट आन्तरिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करना है। पंजाब एवं जम्मू-कश्मीर में लगी आतंकवादी आग देश के भीतर अन्य प्रान्तों में भी फैलती जा रही है। इन्दिरा गाँधी, राजीव गाँधी की हत्या आतंकवादी घटनाएँ हैं।

2. नक्सली आतंकवाद- नक्सली आतंकवादी राजनीतिक नकाब पहनकर गरीबों का मसीहा बनकर उन्हें बरगलाकर या भयभीत करके उन्हीं की आड़ में आपराधिक गतिविधियाँ चलाते हैं। इनका लक्ष्य आन्तरिक सुरक्षा-व्यवस्था को नष्ट-भ्रष्ट करना होता है। क्षेत्रीय विकास को रोकने के लिए वे आतंकवादी घटनाओं में लिप्त रहते हैं। ऐसा करने के लिए विदेशी शक्तियाँ उन्हें धन एवं शस्त्र उपलब्ध कराती हैं।

3. साम्प्रदायिक दंगे एवं आन्दोलन– स्वाधीनता के बाद विशेष सम्प्रदाय की तुष्टीकरण की भयानक परम्परा स्थापित हो गयी है। यह परम्परा सत्तालोलुप तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनेताओं ने डाली है। इनकी धर्मनिरपेक्षता का अर्थ विशेष सम्प्रदायों को खुश करना हो गया है। अब वे दबाव समूह बन गये हैं। उन्हें संवेदनशील सम्बोधित किया जा रहा है। मामूली हस्तक्षेप भी उनके भड़काने का कारण और दंगा का मूल कारण हो गया है, अत: तुष्टीकरण की नीति त्यागकर राष्ट्रीयता की भावना को उभारकर साम्प्रदायिकता का मुकाबला करना चाहिए।

47.

राष्ट्रीय अखण्डता बनाये रखने के लिए कौन-से कदम उठाने चाहिए? विवेचना कीजिए।

Answer»

देश की एकता अखण्डता बनाए रखने के उपाय

देश की एकता व अखण्डता बनाए रखने के लिए अग्रलिखित उपाय अपनाए जा सकते हैं

  • हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्य; जैसे—शिक्षण संस्थानों की स्थापना, रोजगार के अवसरों का सृजन तथा यातायात की सुविधाएँ आदि विकसित किए जाने चाहिए।
  • संचार के साधनों का विकास किया जाना चाहिए।
  • तार्किक तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण के प्रचार-प्रसार के लिए अभियान चलाया जाना चाहिए।
  • धार्मिक कट्टरती को फैलने से रोकना चाहिए तथा इस प्रकार के संगठनों को उन्मूलन किया जाना चाहिए।
  • धार्मिक, प्रादेशिक, क्षेत्रीयता पर आधारित राजनीति को समाप्त किया जाना चाहिए।
  • साम्प्रदायिक सौहार्द उत्पन्न करने वाले कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए। एक-दूसरे के धर्म के विचारों को जानने के प्रयत्न किए जाने चाहिए।
  • देश में उद्यमशीलता का विकास किया जाना चाहिए, ताकि अधिक-से-अधिक लोग रोजगारत् रहें और उन्हें आर्थिक लाभ का लालच देकर उकसाया न जा सके।
  • सशस्त्र बलों को सुदृढ़ करना चाहिए तथा उनके प्रशिक्षण पर भी विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
48.

राज्य पुलिस का सबसे बड़ा अधिकारी कौन होता है ?

Answer»

पुलिस महानिदेशक या पुलिस महानिरीक्षक (D.G.P)।

49.

‘पूर्वोत्तर का प्रहरी किसे कहा जाता है ?

Answer»

असम राइफल्स’ को पूर्वोत्तर का प्रहरी कहा जाता है।

50.

होमगाई का कोई एक कार्य लिखिए।

Answer»

आपात स्थितियों में पुलिस की सहायता करना।