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Answer» गृह-कार्य-व्यवस्था के सिद्धान्त पारिवारिक सुख-शान्ति, प्रगति एवं समृद्धि के दृष्टिकोण से गृह-कार्य-व्यवस्था का विशेष महत्त्व है। गृह-कार्य-व्यवस्था को सफल व सुचारू बनाए रखने के लिए गृह-कार्य-व्यवस्था का सैद्धान्तिक ज्ञान होना आवश्यक होता है। गृह-कार्य-व्यवस्था के मुख्य सिद्धान्तों का सामान्य परिचय निम्नवर्णित है (1) गृह-कार्य-सुनियोजन: गृह-कार्य-व्यवस्था को सुचारू रूप से लागू करने के लिए आवश्यक है कि समस्त कार्यों का पूर्व नियोजन किया जाए। इसके लिए आवश्यक है कि समस्त कार्यों को ध्यान में रखकर उनका विभाजन परिवार के सभी सदस्यों में कर देना चाहिए। कार्यों को सौंपते समय परिवार के सभी सदस्यों की योग्यता, क्षमता तथा सुविधा को ध्यान में रखना आवश्यक है। कार्यों का व्यवस्थित बँटवारा करने के साथ-ही-साथ कार्यों को करने का समय भी निर्धारित कर देना चाहिए। इस प्रकार गृह-कार्यों की जितनी अच्छी तथा व्यावहारिक योजना तैयार कर ली जाएगी, उतनी ही गृह-कार्य-व्यवस्था में सफलता प्राप्ति की सम्भावना बढ़ जाएगी। (2) निर्धारित कार्य-योजना का नियन्त्रण: गृह-कार्य-व्यवस्था का दूसरा सिद्धान्त सूझ-बूझ द्वारा तैयार की गई योजना को व्यावहारिक रूप से लागू करना है। इस सिद्धान्त को कार्य-योजना का नियन्त्रण कहा जाता है। कार्य-योजना के नियन्त्रण के अन्तर्गत यह देखना आवश्यक होता है कि परिवार , के विभिन्न सदस्यों को सौंपे गए कार्य ठीक ढंग से तथा ठीक समय पर किए जा रहे हैं या नहीं। परिवार के सदस्यों को समय-समय पर अपने-अपने कार्य करने के लिए निर्देश देना कार्य-योजना का नियन्त्रण ही है। कार्य-योजना के नियन्त्रण का दायित्व भी परिवार के मुखिया या गृहिणी को ही होता है। नियन्त्रित ढंग से गृह-कार्य होने पर अव्यवस्था की सम्भावना प्रायः नहीं रहती। (3) कार्य-मूल्यांकन: निर्धारित योजना के अनुसार सौंपे गए कार्यों को समय-समय पर मूल्यांकन भी किया जाना आवश्यक होता है। यह देखना होता है कि कौन-कौन से गृह-कार्य पूरे किए जा रहे हैं और कौन-कौन से कार्य समय पर नहीं हो पा रहे हैं? कार्य ठीक ढंग से हो रहे हैं या नहीं? गृह-कार्य-व्यवस्था में कार्य-मूल्यांकन का विशेष महत्त्व है। लेविन के अनुसार, मूल्यांकन के मुख्य रूप से चार उद्देश्य हैं ⦁ उपलब्धियों की जाँच, ⦁ आगामी योजना के लिए आधार प्राप्त करना, ⦁ निर्धारित योजना में यदि कुछ कमी है, तो उसमें सुधार के लिए आधार प्रस्तुत करना तथा ⦁ नए उपाय सुझाना। (4) कुशलता: गृह-कार्य-व्यवस्था के लिए आवश्यक है कि समस्त कार्य कुशलतापूर्वक किए जाएँ। कुशलता से आशय यह है कि समस्त गृह-कार्य सही ढंग से तथा सही समय पर पूरे किए जाएँ। कुशलतापूर्वक कार्य करना ही कार्य-व्यवस्था की मुख्य कसौटी है। भले ही योजना कितनी भी अच्छी क्यों न हो, यदि निर्धारित कार्य कुशलतापूर्वक न किए जाएं तो कार्य व्यवस्था दोषपूर्ण ही कहलाएगी। उदाहरण के लिए-बच्चे के जन्म-दिवस के अवसर पर योजना के अनुसार परिवार के सभी सदस्यों को भिन्न-भिन्न कार्य सौंप दिए जाते हैं। यदि निर्धारित समय तक सजावट पूरी नहीं हो पाती या मेहमानों के आ जाने के उपरान्त भी केक नहीं आता तो कहा जाएगा कि कार्य-कुशलता का अभाव है। यदि केक भी आ गया हो तथा मेज पर रख दिया गया हो परन्तु उस पर लगाने वाली मोमबत्तियाँ उपलब्ध न हों, तो भी कहा जाएगा कि कार्य-कुशलता का अभाव है। इस प्रकार कार्य-कुशलता का सर्वाधिक महत्त्व है। कुशलतापूर्वक किया गया प्रत्येक कार्य सन्तोष, आनन्द तथा प्रशंसा प्रदान करता है। यही गृह-कार्य-व्यवस्था का अन्तिम लक्ष्य है।
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