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गृह-कार्य-व्यवस्था में सहायक कारकों का उल्लेख कीजिए।याउत्तम गृह-कार्य-व्यवस्था को लागू करने के लिए किन-किन कारकों को ध्यान में रखना आवश्यक होता है ? स्पष्ट कीजिए।

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गृह-कार्य-व्यवस्था में सहायक कारक
यह सत्य है कि प्रत्येक परिवार चाहता है कि उसकी कार्य-व्यवस्था उत्तम हो। कार्य-व्यवस्था के उत्तम होने के लिए आवश्यक है कि कार्य-व्यवस्था के लिए अनुकूल कारकों का प्रभावपूर्ण ढंग से उपयोग किया जाए तथा कार्य-व्यवस्था के लिए प्रतिकूल कारकों को उन्मूलन किया जाए। कार्य-व्यवस्था के लिए अनुकूल कारक उन कारकों को कहा जाता है जो कार्य-व्यवस्था को बनाए रखने में सहायक होते हैं। गृह-कार्य-व्यवस्था सुचारू रूप बनाए रखने में सहायक मुख्य कारकों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित हैं

(1) उचित योजना का निर्धारण:
गृह-कार्य-व्यवस्था की सफलता के लिए आवश्यक है कि घर-परिवार से सम्बन्धित समस्त कार्यों को सम्पन्न करने के लिए उचित योजना का पूर्व-निर्धारण कर लिया जाए। इस कारक के अन्तर्गत व्यावहारिक दृष्टिकोण से निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना
आवश्यक होता है
⦁ सभी महत्त्वपूर्ण कार्यों की सूची बना लेनी चाहिए और उनका व्यवस्थित वर्गीकरण कर लेना चाहिए। दैनिक कार्यों, साप्ताहिक कार्यों, मासिक कायों तथा वार्षिक कार्यों की अलग-अलग सूची बना लेनी चाहिए। इसके अतिरिक्त आकस्मिक कार्यों के लिए भी अलग से प्रावधान होना चाहिए।
⦁ प्रत्येक कार्य को करने का समय निश्चित कर लेना चाहिए। प्रत्येक कार्य में लगने वाला समय भी निर्धारित कर लेना चाहिए।
⦁ परिवार के समस्त कार्यों को व्यवस्थित रीति से परिवार के सभी सदस्यों में बाँट देना चाहिए। कार्यों के इस बँटवारे के समय परिवार के सभी सदस्यों से विचार-विमर्श भी करना चाहिए तथा उनकी योग्यताओं, क्षमताओं, रुचियों आदि को भी ध्यान में रखना चाहिए।
⦁ कार्यों को करने में कार्यों के महत्त्व एवं अनिवार्यता को ध्यान में रखकर उनको प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
⦁ गृह-कार्यों की योजना लचीली होनी चाहिए अर्थात् परिस्थितियों के परिवर्तित होने की दशा में कार्यों के क्रम, प्राथमिकता आदि में परिवर्तन किया जा सकता है।

(2) कार्य-व्यवस्था में परिवार के सभी सदस्यों का सहयोग:
गृह-कार्य-व्यवस्था की सफलता के लिए अति आवश्यक कारक है-कार्य-व्यवस्था में परिवार के सभी सदस्यों का सहयोग प्राप्त करना। यदि परिवार के सभी सदस्य गृह-कार्यों की व्यवस्था में अपना-अपना सहयोग प्रदान करते हैं, तो सभी कार्य ठीक समय पर तथा सही ढंग से पूरे हो जाते हैं। इससे न तो गृह-कार्य अधूरे ही रह पाते हैं और न ही परिवार के किसी एक या दो सदस्यों पर अतिरिक्त बोझ ही पड़ता है। परिवार के सभी सदस्यों में यदि गृह-कार्यों का उचित बँटवारा कर दिया जाए, तो गृहिणी को भी लाभ होता है तथा परिवार के सदस्य भी पारिवारिक कार्यों में सहयोग देकर सन्तोष का अनुभव करते हैं। बिना विचार-विमर्श किए अथवा क्षमता और रुचि के विपरीत सौंपे गए कार्य थोपे गए लगते हैं, उन्हें पूर्ण करना भार महसूस होता है, घर का कार्य प्रत्येक व्यक्ति को सौंपने से उन्हें परिवार में अपने महत्त्व का अनुमान हो जाता है तथा वह अपने को उपेक्षित अनुभव नहीं करते परिवार में बड़ी-बूढ़ी स्त्रियाँ या पुरुष भी गृह-कार्यों में महत्वपूर्ण सहयोग दे सकते हैं।

अनाज तथा दालें साफ करना, साग बीनना या सब्जी काटने का कार्य बड़ी-बूढ़ी औरतें बड़े चाव से करती हैं तथा अच्छे ढंग से भी करती हैं। यदि परिवार में कोई वृद्ध पुरुष हो, तो वह निकट के पार्क या बागे में बच्चों को घुमाने ले जा सकते हैं। किशोर बच्चों को घर की वस्तुएँ; जैसे कि कपड़े, किताबें आदि समेटकर यथास्थान रखने का कार्य सौंपा जा सकता है। ये बच्चे ही जूतों को साफ करने, बिस्तर बिछाने तथा झाड़-पोंछ करने का कार्य भी कर सकते हैं। परिवार की कार्य-व्यवस्था को सुचारू एवं सरल बनाने के लिए पति को भी गृह-कार्यों में यथासम्भव सहयोग देना चाहिए।

(3) गृह-कार्य करने की सही विधियों का ज्ञान:
गृह-कार्यों की व्यवस्था में सहायक कारकों में कार्य करने की सही विधियों का ज्ञान भी एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वास्तव में, कार्य करने के परम्परागत ढंग एवं विधियाँ आज के वैज्ञानिक युग के लिए उपयुक्त नहीं रहीं। अब सभी कार्यों को अच्छे ढंग से करने के लिए नई-नई विधियों को अपनाया जा रहा है। कम समय तथा कम श्रम द्वारा कार्यों को पूरा करना ही अभीष्ट समझा जाता है। कार्य करने की यान्त्रिक विधियों को अपनाना चाहिए। सही विधियों को अपनाकर कार्य करने से जहाँ एक ओर समय तथा श्रम की बचत होती है, वहीं कार्य अच्छे ढंग से पूरा होता है तथा घर की वस्तुएँ भी नष्ट होने से बच जाती हैं। उदाहरण के लिए यदि घर पर सही विधि को अपनाकर खाना पकाया जाए तो निश्चित रूप से श्रम तथा समय की बचत होती है तथा पकाए गए भोजन के पोषक तत्त्वों को भी नष्ट होने से बचाया जा सकता है।

(4) अच्छे तथा पर्याप्त भौतिक साधन उपलब्ध होना:
गृह-कार्यों को व्यवस्थित रूप में पूरा करने के लिए अनिवार्य है कि कार्य करने में सहायक अच्छे तथा पर्याप्त साधन उपलब्ध हों। अच्छे साधनों द्वारा कार्य करने से कार्य-कुशलता बढ़ती है तथा समय एवं श्रम की बचत होती है। उदाहरण के लिए-सब्जी काटने तथा छीलने के लिए अच्छा तेज चाकू तथा पिलर आदि का होना आवश्यक है। पर्याप्त संख्या में आवश्यक बर्तन होने भी आवश्यक हैं। यदि घर में एक से अधिक प्रेशर-कुकर हों तो एक के बाद दूसरा व्यंजन बनाने के लिए कुकर को धोना नहीं पड़ता तथा एक साथ ही गैस के दोनों चूल्हों पर दो कुकर चढ़ाए जा सकते हैं। इससे काम शीघ्र पूरा हो जाएगा तथा कुकर को तुरन्त नहीं धोनी पड़ेगा। इसी प्रकार कपड़े धोने की मशीन, मिक्सर-ग्राइण्डर, ओवन, टोस्टर आदि यन्त्रों के उपलब्ध होने पर सभी कार्य शीघ्र, उत्तम तथा सरलता से पूरे हो जाते हैं तथा गृह-कार्य-व्यवस्था बनी रहती है।

(5) अनुभव एवं ज्ञान:
गृह-कार्य-व्यवस्था को सुचारू बनाने में सहायक कारक कार्य-अनुभव भी है। वास्तव में, किसी भी कार्य को स्वयं करने से अनेक बातों की जानकारी प्राप्त हो जाती है। जैसे-जैसे कार्य का अनुभव होता है, वैसे-वैसे उसे करने की त्रुटियाँ कम होती हैं तथा कार्य सही समय पर पूरा होने लगता है।
अनुभव के साथ-ही-साथ ज्ञान का भी विशेष महत्त्व होता है। गृह-कार्यों को समुचित ज्ञान माता-पिता या अन्य अनुभवी व्यक्तियों से भी प्राप्त हो सकता है तथा पुस्तकों से भी आवश्यक ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।



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