1.

कार्य-व्यवस्था के विभिन्न साधनों का वर्णन कीजिए।

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कार्य-व्यवस्था के निम्नलिखित दो साधन हैं
(1) मानवीय अथवा अमूर्त साधन।
(2) अमानवीय अथवा भौतिक साधन।

(1) मानवीय अथवा अमूर्त साधन:
इन साधनों के अन्तर्गत मनुष्यों में पाए जाने वाले गुण, कौशल एवं विशेषताओं को सम्मिलित किया जाता है। ये निम्नलिखित हैं

(i) रुचि:
रुचि मनुष्य की एक मनोवैज्ञानिक विशेषता है। कुछ रुचियाँ मनुष्यों में जन्म से होती हैं। तो कुछ समय के साथ-साथ विकसित होती हैं। इन मनोवैज्ञानिक साधनों का प्रयोग कर लड़कों को व्यायाम, खेल-कूद तथा अन्य साहसिक कार्यों के लिए तथा लड़कियों को ललित कलाओं के लिए प्रेरित किया जा सकता है।

(ii) ज्ञान:
शिक्षित गृहिणी को कार्य-व्यवस्था का अधिक ज्ञान होता है। वह उत्तम कार्य-व्यवस्था का सरलता से पालन करती है। अच्छी सन्तान के विकास के लिए भी माता का शिक्षित होना आवश्यक है।

(iii) शक्ति:
गृहिणियों में शारीरिक शक्ति शारीरिक कार्यों के लिए तथा मानसिक शक्ति मानसिक कार्यों के लिए कुशलता का साधन है।

(iv) योग्यता एवं प्रवीणता:
प्रायः सभी लड़कियाँ गृह-कार्य (खाना बनाना, सिलाई, कढ़ाई, गृह-परिचर्या आदि) करने की योग्यता रखती हैं, परन्तु उनका इन कार्यों में प्रवीण या दक्ष होना आवश्यक नहीं है। प्रवीणता का गृह-प्रबन्ध में अत्यधिक महत्त्व है। इसका विकास निरन्तर अभ्यास एवं अनुभव द्वारा किया जा सकता है।

(v) समय:
यह अत्यधिक महत्त्वपूर्ण साधन है, क्योंकि इसके अभाव में कार्य योजनाओं का क्रियान्वयन लगभग असम्भव ही है। अतः समय का सदुपयोग करना चाहिए।

(2) अमानवीय अथवा भौतिक साधन
ये निम्नलिखित हैं

(i) धन:
धन का अर्थ विनिमय मूल्य है। हमारे देश में रुपया विनिमय का माध्यम है। धन से लगभग सभी भौतिक साधन प्राप्त किए जा सकते हैं। धन के अन्तर्गत वेतन एवं ब्याज द्वारा अर्जित आय इत्यादि को सम्मिलित किया जाता है।

(ii) भौतिक वस्तुएँ:
मकान, फर्नीचर, गृह-सज्जा की वस्तुएँ, खाद्य पदार्थ, बर्तन, वस्त्र, मशीनें वाहन आदि प्रमुख भौतिक वस्तुएँ हैं। इनका अपना अलग-अलग महत्त्व है। किसी परिवार में इनका . आपेक्षित मात्रा में होना उस परिवार के आर्थिक स्तर पर निर्भर करता है।

(iii) सार्वजनिक गएँ:
ये सुविधाएँ किसी समय केवल बड़े नगरों तक ही सीमित थीं। आज इन सुविधाओं को गाँवों तक पहुँचाने के प्रयास किए जा रहे हैं। स्वास्थ्य केन्द्र, राजकीय अस्पताल व शिक्षा संस्थाएँ, बाजार, जीवन बीमा निगम, डाकखाने, बैंक, यातायात व मनोरंजन के साधन आदि अनेक सार्वजनिक सुविधाएँ हैं, जिनके उपलब्ध होने से परिवार के साधन बढ़ जाते हैं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रायः मानवीय व भौतिक साधनों का आपस में घनिष्ठ सम्बन्ध है तथा इन दोनों प्रकार के साधनों के सन्तुलन, उपलब्धि एवं समायोजन पर ही परिवार एवं समाज की प्रगति निर्भर करती है। उत्तम एवं सुचारू गृह कार्य-व्यवस्था के लिए सभी साधन उपलब्ध होना आवश्यक माना जाता है।



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