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कबीर ने ‘माया का कूड़-कपट’ किसे कहा है और इससे कैसे मुक्ति मिल सकती है? संकलित पाठ के आधार पर लिखिए।

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“संतो भाई आई रे ग्यान की आँधी।” पद में काया अर्थात मन संहिते शरीर का कूड़ा-करकट भ्रम, मायाग्रस्त होना, द्विविधा, मोह तृष्णा, कुबुद्धि आदि विकारों को काया को कूड़े-कपट कहा है। इससे छुटकारा पाने का उपाय भी कबीर ने पद में बताया है। वह कहते हैं- जब व्यक्ति ईश्वर की गति अर्थात् परमात्मा के स्वरूप और स्वभाव को ज्ञान प्राप्त कर लेता है, तो उसके सारे दुर्गुण नष्ट हो जाते हैं। मेन निर्मल हो जाता है। उसका हृदय ईश्वर-प्रेम में सरोबार हो जाता है। ईश्वर की गति ज्ञान के आगमन से ही सम्भव है। अत: ज्ञानोदय से ही समस्त मनोविकार नष्ट हो सकते हैं।



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