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पद्यांशों की सन्दर्भ एवं प्रसंग सहित व्याख्याएँ ।बहुत दिनन की जोवती, बाट तुम्हारी राम।जिव तरसै तुझ मिलन कें, मनि नाहीं विश्राम।।मूरिख संग न कीजिए, लोहा जल न तिराह।कदली सीप भुवंग मुख, एक बूंद तिहूँ भाइ।। |
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Answer» कठिन शब्दार्थ – जोवती = देखती हूँ, प्रतीक्षा करती हूँ। बाट = मार्ग। राम = परमात्मा। जिव = जीव, प्राण, मन। तुझ = तुमसे। विश्राम= चैन, धैर्य। मूरिख = मूर्ख। तिराइ = तैरता है। कदली = केले का वृक्ष।सीप = सीपी, जिसमें मोती बनता है। भुजंग = सर्प। तिहूँ = तीन। भाइ = प्रकार, रूप। संदर्भ तथा प्रसंग – प्रस्तुत दोहे हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कबीर के दोहों से लिए गए हैं। प्रथम दोहे में कबीर परमात्मारूपी प्रियतम के वियोग में व्याकुल विरहिणी आत्मा बनकर अपनी अधीरता का वर्णन कर रहे हैं। द्वितीय दोहे में कबीर मूर्खा का संग न करने का संदेश दे रहे हैं। संगति के प्रभाव को टाला नहीं जा सकता। अत: अज्ञानियों से दूर रहना ही अच्छा है। व्याख्या – परमात्मारूपी प्रियतम से आत्मारूपिणी प्रेयसी या पत्नी बिछुड़ी हुई है। वह निवेदन कर रही है कि उसे प्रियतम की बाट देखते-देखते बहुत दिन बीत गए हैं। किन्तु अभी तक प्रिय-मिलन की पावन घड़ी नहीं आई। आत्मा कहती है-हे राम! मेरा मन बड़ा व्याकुल और अधीर हो रहा है। वह तुमसे मिलने को तरस रहा है। अत: आप मुझे अपनाकर विरह वेदना से मुक्त कर दीजिए। संगति का प्रभाव पड़ना अनिवार्य है। अत: साधक या भक्त को उन लोगों से दूर रहना चाहिए जो मूर्खतावश मनुष्य जीवन को सांसारिक सुखों-विषयों के भोग में नष्ट कर रहे हैं। जैसे लोहा कभी जल पर नहीं तैर सकता, उसी प्रकार हठी अज्ञानियों को भी परमात्मा का प्रेमी नहीं बनाया जा सकता। संगति का फल स्वाति नक्षत्र की बूंद से प्रमाणित होता है। जब वह केले पर पड़ती है तो कपूर बन जाती है। सीप में गिरने पर मोती बन जाती है और सर्प के मुख में पड़ने पर वही बूंद प्राणघातक विष बन जाती है। अत: कदली और सीप जैसे सज्जनों और प्रभु भक्तों की संगति करना ही कल्याणकारी हो सकता है।
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