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प्रत्यक्षीकरण पर संवेग का क्या प्रभाव पड़ता है?

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संवेग एक भावनात्मक मनोवैज्ञानिक अवस्था है और प्रत्यक्षीकरण किसी उत्तेजक (वस्तु, घटना या व्यक्ति) का बाद का ज्ञान है। प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में अनेकानेक संवेगों की अनवरत अनुभूति करती है; जैसे-क्रोध, भय, प्रेम, घृणा, शोक, हर्ष तथा आश्चर्य इत्यादि की अनुभूतियाँ। संवेग मनुष्य के व्यवहार से सम्बन्धित एक जटिल अवस्था है जो मनुष्य के विभिन्न मनोवैज्ञानिक अवयवों को प्रभावित करती है। संवेग का प्रत्यक्षीकरण पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। यदि कोई व्यक्ति किसी विशिष्ट संवेग की अवस्था में है तो वह अपने सम्मुख उपस्थित उत्तेजक अर्थात् वस्तु, घटना या व्यक्ति को यथार्थ एवं सही-सही प्रत्यक्षीकरण नहीं कर सकता। यदि कोई व्यक्ति अत्यधिक शोक संतप्त है तो ऐसी संवेगावस्था में वह शुभ विवाह की मधुर शहनाई का भी कर्कश एवं पीड़ादायक संगीत के रूप में प्रत्यक्षीकरण करेगा। भले ही क्रोधित व्यक्ति के सामने दुनिया के स्वादिष्टतम व्यंजन परोस दिये जाएँ उसे तो वे स्वादहीन ही अनुभव होंगे। कहने का तात्पर्य यह है कि समस्त शक्तिशाली संवेग यथार्थ प्रत्यक्षीकरण के प्रति विपरीत कारक समझे जायेंगे और जितनी ही प्रबल संवेगावस्था होगी उतना ही गलत प्रत्यक्षीकरण भी हो सकता है। वस्तुत: सही प्रत्यक्षीकरण के लिए संवेगमुक्त एवं तटस्थ मानसिक दशा एक पहली शर्त है। मोटे तौर पर, जिस रंग का चश्मा व्यक्ति लगायेगा सामने की वस्तु भी उसी के अनुसार दिखाई देगी। संवेगावस्था तो एक रंगीन चश्मा है और प्रत्यक्षीकरण दीख पड़ने वाली वस्तु। स्पष्ट प्रत्यक्षीकरण के लिए व्यक्ति की भावनाएँ किसी संवेग से रँगी न हों, अन्यथा संवेग प्रत्यक्षीकरण को प्रभावित किये बिना नहीं रह सकेगा।



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