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रंग-प्रत्यक्षीकरण से क्या आशय है? |
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Answer» रंगों के प्रत्यक्षीकरण से आशय है–सम्बन्धित विषय-वस्तु के रंग को देखना एवं पहचानना। इस प्रक्रिया के अन्तर्गत रंगों के अन्तर का भी ज्ञान प्राप्त होता है। किसी भी वस्तु के रंग का निर्धारण उससे निगमित ‘प्रकाश-तरंगों द्वारा होता है अर्थात् रंग-प्रत्यक्षीकरण की प्रक्रिया में प्रकाश-तरंगों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। वास्तव में, रंग अपने आप में कोई स्वतन्त्र या अलग। विषय-वस्तु नहीं है, जिसका हम प्रत्यक्षीकरण करते हैं बल्कि रंग का निर्धारण विषय-वस्तु से निकलने वाली प्रकाश-तरंगों की लम्बाई से होता है। भिन्न-भिन्न वस्तुओं से निकलने वाली प्रकाश-तरंगों की लम्बाई भिन्न-भिन्न होती है तथा इसी लम्बाई से ही वस्तु के रंग के स्वरूप का निर्धारण होता है। समस्त प्रकार की तरंगें प्रकाश के किसी मूल स्रोत से सम्बन्धित होती हैं। हमारे विश्व में प्रकाश का मुख्यतम एवं सबसे बड़ा स्रोत सूर्य है। इसके अतिरिक्त चाँद एवं तारे भी प्रकाश के प्राकृतिक स्रोत हैं। कृत्रिम स्रोतों में दीपक की लौ तथा विद्युत बल्ब को भी प्रकाश का स्रोत माना जा सकता है। हम जानते हैं कि जब विद्युत-धारा बल्ब के तार में प्रवाहित होती है तो वह प्रकाश में परिवर्तित हो जाती है। प्रकाश ही वह एकमात्र कारक है, जिसके माध्यम से हम बाहरी वस्तुओं को देखते हैं। बाहरी वस्तुओं को दिखाने वाला प्रकाश हमारी आँखों तक मुख्य रूप से दो प्रकार से पहुँचता है। अपने प्रथम रूप में प्रकाश की किरणें या तरंगें सीधे ही हमारी आँखों तक पहुँचती हैं। दूसरे रूप में प्रकाश की किरणें पहले किसी वस्तु पर पड़ती हैं तथा इसके उपरान्त उस वस्तु से परावर्तित होकर हमारी आँखें पर पड़ती हैं। भौतिक विज्ञान के अध्ययनों द्वारा ज्ञात हो चुका है कि प्रकाश की तरंगों की लम्बाई भिन्न-भिन्न होती है। जहाँ तक हमारी आँखों की प्रकृति का प्रश्न है तो यह सत्य है कि हमारी आँखें 4000 से 7800 8 तक की तरंग दैर्घ्य (1 ऍग्स्ट्रम = 10-10 मीटर) वाली प्रकाश-तरंगों को ही ग्रहण कर सकती हैं। हमारी आँखें इससे अधिक लम्बाई वाली तरंगों को सामान्य रूप से ग्रहण करने की क्षमता नहीं रखती। इसका कारण यह है कि एक सीमा से अधिक लम्बाई वाली प्रकाश-तरंगें प्रकाश के स्थान पर ताप की संवेदना देने लगती हैं। कुछ वस्तुएँ ऐसी होती हैं, जिन पर किसी स्रोत से प्रकाश पड़ने पर वे हमें दिखाई देती हैं तथा उनके प्रभाव से अन्य वस्तुओं को भी देखा जा सकता है। इन वस्तुओं को प्रकाशमान वस्तुएँ कहा जाता है। वास्तव में ये वस्तुएँ प्रकाश का परावर्तन करती हैं। इससे भिन्न कुछ वस्तुएँ ऐसी भी होती हैं जिनमें न तो अपना प्रकाश होता है और न ही वे प्रकाश का परावर्तन ही कर पाती हैं। इन वस्तुओं को प्रकाशहीन वस्तुएँ कहा जाता है। इस प्रकार की वस्तुएँ हर प्रकार के बाहरी प्रकाश को अवशोषित कर लेती हैं। प्रकाश की तरंगों एवं विभिन्न वस्तुओं के गुणों का उल्लेख करने के उपरान्त हम कह सकते हैं कि किसी वस्तु के रंग का निर्धारण एवं प्रत्यक्षीकरण सम्बन्धित वस्तु से परावर्तित होने वाली प्रकाश-तरंगों की लम्बाई के आधार पर होता है। |
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