1.

विभ्रम में संवेगों की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।

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सामान्यजनों में विभ्रम की उत्पत्ति संवेगों की प्रबलता के कारण होती है। कोई शक्तिशाली भय का संवेग हमारे अन्दर विभ्रम उत्पन्न कर सकता है; जैसे-श्मशान या कब्रिस्तान के मार्ग से गुजरते हुए हमें प्रेत या जिन्न को विभ्रम हो सकता है। संवेगावस्था में अयथार्थ तथा आत्मनिष्ठ प्रत्यक्षीकरण होता है और इस कारण विभ्रम उत्पन्न हो सकता है। इसके अतिरिक्त संवेग की दशा में आन्तरिक उद्दीपन होते हैं तथा अनायास ही शारीरिक परिवर्तन आते हैं जिनके कारण व्यक्तियों में विभ्रम की सम्भावना रहती है। संवेग की दशा में सामान्य कार्य-व्यापार अवरुद्ध हो जाते हैं तथा व्यक्ति का जीवन असन्तुलित हो जाता है जिसके फलस्वरूप उत्पन्न होने वाले विभ्रम असामान्य व्यवहार द्वारा अभिव्यक्त होते हैं। कभी-कभी यह असामान्यता पागलपन की दशा में बदल जाती है; अतः इसे दूर करने के लिए तत्काल उपाय वांछित हैं।



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