Explore topic-wise InterviewSolutions in Current Affairs.

This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.

1.

कच्ची सब्जियों को खाने से शरीर को कौन-से पोषक तत्त्व अधिक मात्रा में मिलते हैं?

Answer»

कच्ची सब्जियों को खाने से शरीर को लोहा तथा विटामिन्स भरपूर मात्रा में मिलते हैं।

2.

रोगी के लिए कार्बोज का सर्वाधिक उपयोगी स्रोत कौन-सा है?याफलों का आहार में क्यमहत्त्व है?

Answer»

सेब, अंगर, केला, अमरूद वे आम आदि फल रोगी के लिए कार्बोज प्राप्ति के मुख्य साधन हैं। इनसे रक्त में शर्करा की आवश्यकता की तुरन्त पूर्ति हो जाती है और शारीरिक अंगों को विशेष श्रम नहीं करना पड़ता।

3.

लू लगने के लक्षण लिखिए। इस रोगी को किस प्रकार का आहार देना चाहिए?

Answer»

लू लग जाने पर व्यक्ति को तेज ज्वर हो जाता है। चेहरा लाल हो जाता है, होंठ सूखने लगते हैं तथा शरीर में पानी की कमी हो जाती है। इस दशा में रोगी को ठण्डे पेय-पदार्थ अधिक मात्रा में दिए जाने चाहिए। कच्चे आम का पना तथा पुदीने का रस भी दिया जाना चाहिए।

4.

निम्न रोगों के रोगियों के रोग की अवधि तथा स्वास्थ्य लाभ के समय का भोजन क्या होगा और वह कैसे बनेगा(क) गैस्ट्रोएण्ट्राइटिस(ख) मियादी बुखारयामियादी बुखार के लक्षण लिखिए। किसी एक रोग से ग्रसित रोगी को क्या भोजन देंगे?यामियादी बुखार में रोगी को क्या आहार दिया जाना चाहिए?

Answer»

(क) गैस्ट्रोएण्ट्राइटिस:
यह दूषित आहार के कारण होने वाला पेट का रोग है जिसमें आँतों में सूजन आ जाने के फलस्वरूप पेट में दर्द अनुभव होता है तथा अम्लीयता बढ़ जाती है; अतः इस रोग की अवधि में शीघ्र पचने वाले तरल भोज्य-पदार्थों का सेवन अधिक कराया जाता है। इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि आहार में अम्लीय पदार्थ न हों। उदाहरण-टोस्ट का पानी, नींबू रहित चावल का पानी तथा पालक, गाजर वे लौकी आदि सब्जियों का सूप।
स्वास्थ्य लाभ के समय रोगी को हल्के एवं सुपाच्य भोजन; जैसे-खिचड़ी, साबूदाना तथा दलिया; देना चाहिए।

(ख) मियादी बुखार:
मियादी बुखार या टायफाइड नामक रोग में आहार का विशेष महत्त्व होता है। यह रोग आहार-नाल में जीवाणुओं के संक्रमण से उत्पन्न होता है। इस रोग में आँतों में सूजन एवं घाव हो जाते हैं तथा पाचन शक्ति अत्यधिक क्षीण हो जाती है। इस रोग की अवधि तथा स्वास्थ्य लाभ की अवधि में दिये जाने वाले क्विरण निम्नलिखित हैं

रोग की अवधि में आहार:
मियादी बुखार या टायफाइड रोग की स्थिति में रोगी के शरीर में प्रोटीन की काफी कमी हो जाती है। इसके अतिरिक्त विभिन्न खनिज लवणों तथा ग्लाइकोजन के संग्रह में भी कमी आ जाती है। इस स्थिति में रोगी को ऐसा आहार दिया जाना चाहिए, जिससे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, जल, सोडियम तथा पोटैशियम क्लोराइड की समुचित मात्रा मिलती रहे। इस रोग में ऊर्जा की आवश्यकता भी अधिक होती है। दिन में लगभग 3500 कैलोरी ऊर्जा आवश्यक होती है। इसके साथ ही प्रतिदिन लगभग 100 ग्राम प्रोटीन भी आवश्यक होती है।

इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए टायफाइड के रोगी के लिए नियोजित खाद्य-सामग्री में विभिन्न भोज्य-पदार्थों का समावेश होना चाहिए। रोगी को दूध, आधा उबला हुआ अण्डा, ब्रेड, मक्खन तथा सूजी की खीर या कॉर्नफ्लैक्स आदि दिया जा सकता है। फलों का रस, भुना हुआ आलू, हल्की चपाती तथा मसूर की दाल भी दी जा सकती है। टायफाइड के रोगी को दिन में तीन बार मुख्य आहार दिया जाना चाहिए तथा साथ ही अल्प-मात्रा में मध्य-आहार भी दिए जा सकते हैं।

5.

क्षय रोग से पीड़ित व्यक्ति को कैसा आहार देना चाहिए?

Answer»

क्षय रोगी को अधिक कैलोरी बाला, प्रोटीनयुक्त, सुपाच्य भोजन देना चाहिए।

6.

हल्के भोजन से क्या तात्पर्य है? यह कब दिया जाता है?

Answer»

हल्के भोजन का अर्थ है अर्द्ध-तरल शीघ्र पचने वाला सुपाच्य भोजन। यह कम तरल पदार्थ देने के पश्चात् तथा ठोस पदार्थ से पूर्व दिया जाता है।

7.

रुग्णावस्था में रोगी को किस प्रकार का आहार दिया जाना चाहिए?

Answer»

साधारणत: रुग्णावस्था में रोगी को हल्का, सुपाच्य एवं पौष्टिक आहार दिया जाना चाहिए।

8.

भोजन पकाने की प्रक्रिया में पौष्टिक तत्त्वों की सुरक्षा के उपाय लिखिए।

Answer»

भोजन पकाने की प्रक्रिया में पौष्टिक तत्त्वों की सुरक्षा हेतु उपाय अग्रलिखित हैं

⦁    भोजन पकाते समय बर्तन को खुला न रखें। बर्तन खुला रखने पर भोजन वायु के सम्पर्क में आने से कीटाणु व धूल का प्रवेश होता है।
⦁    भोजन देर तक न पकाएँ। इससे भोजन के पौष्टिक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं।
⦁    आवश्यकता से अधिक मसालों का प्रयोग कदापि न करें।

9.

रोगी को देने के लिए नरम आहार के कुछ उदाहरण बताइए।

Answer»

दूध, गला हुआ मांस, मछली, अण्डा, कीमा, कस्टर्ड, दही, दलिया, खिचड़ी आदि नरम आहार हैं।

10.

भोजन पकाने की विधि है(क) उबालना(ख) तलनी(ग) भाप द्वारा(घ) ये सभी

Answer»

सही विकल्प है (घ) ये सभी

11.

भोजन को स्वास्थ्यवर्द्धक बनाने के लिए गृहिणी को विशेष जानकारी होनी चाहिए(क) भोजन को पकाने की(ख) भोजन को तलने की(ग) भोजन में पाए जाने वाले तत्त्वों की(घ) भोजन परोसने की

Answer»

सही विकल्प है (ग) भोजन में पाए जाने वाले तत्त्वों की

12.

निम्नलिखित की उपयोगिता एवं बनाने की विधि लिखिए(क) कस्टर्ड(ख) अरारोट(ग) खिचड़ी(घ) दलिया(ङ) साबूदानायारोगी के लिए खिचड़ी बनाने की विधि लिखिए।

Answer»

(क) कस्टर्ड:

यह कम तरल भोजन की श्रेणी में आता है। यह रोगी के लिए सुपाच्य एवं शक्तिवर्द्धक होता है। इसे बनाने के लिए एक ताजे अण्डे को तोड़कर उसकी जर्दी को अच्छी तरह से फेटते हैं। अब इसमें आवश्यकतानुसार चीनी व 250 मिलीलीटर दूध मिलाकर एक कटोरे में डाल देते हैं। एक भगोने में खौलता हुआ पानी लेकर उसके बीच में उपर्युक्त कटोरा रखकर घोल को चम्मच से | तब तक हिलाते हैं जब तक यह गाढ़ा न हो जाए। गाढ़े घोल को हल्का गर्म अथवा ठण्डा करके रोगी को दिया जाता है।

(ख) अरारोट:

दो छोटे चम्मच अरारोट पाउडर को 50 मिलीलीटर पानी में डालकर घोल बनाएँ। अब इस घोल को 250 मिलीलीटर खौलते दूध में थोड़ा-थोड़ा डालें तथा चम्मच से लगातार चलाते रहें जिससे कि इसमें गाँठे न पड़े। गाढ़ा होने पर उतारकर चीनी मिला दें। इसे रोगी को गर्म-गर्म परोसा जाता है। पेचिश एवं अतिसार के रोगी को यह नमक मिलाकर देना चाहिए।

(ग) खिचड़ी:

यह एक सुपाच्य हल्का भोजन है। मूंग की दाल की खिचड़ी मलेरिया व पेचिश के रोगियों के लिए अति उपयोगी रहती है। एक भाग चावल व दो भाग मूंग की दाल लेकर दोनों को बीन कर साफ कर लें तथा स्वच्छ पानी में इन्हें दो-तीन बार धो लें। एक भगोने में पानी उबालें तथा उबलते पानी में उपर्युक्त दाल-चावल डालकर आग पर चढ़ा दें। आवश्यकतानुसार इसमें नमक वे हल्दी डाल दें। जब दाल व चावल अच्छी तरह पक जाए तथा खिचड़ी थोड़ी गाढ़ी हो जाए, तो इसे ठण्डा करके रोगी को दिया जा सकता है।

(घ) दलिया:

दलिये में प्रोटीन, कार्बोज तथा लवण होते हैं। यह हल्का, सुपाच्य तथा पौष्टिक होता है तथा प्रायः सभी प्रकार के रोगियों के लिए उपयोगी रहती है। इसे बनाने के लिए एक बड़ी चम्मच दलिये को दो प्याले पानी में डाल कर उबालें। हल्का गाढ़ा हो जाने पर इसे रोगी की रुचि के अनुसार नमक डालकर परोसे अथवा इसमें चीनी व दूध मिलाकर दें।

(ङ) साबूदाना:

विभिन्न रोगों में पाचन शक्ति कमजोर होने पर साबूदाने का सेवन रोगी के लिए अत्यन्त लाभप्रद रहता है। इसे बनाने के लिए एक बड़ी चम्मच साबूदाना लेकर उसे अच्छी प्रकार से साफ कर लें। अब एक भगोने में 250 मिलीलीटर पानी उबालें। पानी के उबलने पर उसमें साबूदाना डाल दें। थोड़ी देर पकने पर उसमें आवश्यकतानुसार दूध व चीनी डाल दें। इसे रोगी की रुचि के अनुसार गर्म अथवा हल्का गर्म परोसें। यह मलेरिया व टायफाइड के रोगी को दिया जाता है। पेचिश के रोगी को साबूदाना बिना चीनी व दूध डाले देना चाहिए।

13.

कच्ची सब्जियों के खाने से शरीर को कौन-से पोषक तत्त्व अधिक मात्रा में मिलेंगे ?

Answer»

कच्ची सब्जियों के खाने से शरीर को खनिज, विटामिन्स आदि पोषक तत्त्व प्राप्त होते हैं।

14.

पेचिश के रोगी के रोग की अवधि और स्वास्थ्य लाभ के समय का भोजन कैसा होना चाहिए?यापेचिश के रोगी को कैसा भोजन दिया जाना चाहिए और क्यों?

Answer»

पेचिश की स्थिति में आहार

पेचिश में बार-बार दस्त लगते हैं तथा पेट में ऐंठन होती है। मल के साथ श्लेष्मा तथा कभी-कभी रक्त भी विसर्जित होता है। पेचिश दो प्रकार की होती है-एक एमीबिक (Amoebic) जो अमीबा नामक सूक्ष्म रोगाणु द्वारा उत्पन्न होती है और दूसरी बैसिलरी। यह पहले प्रकार की पेचिश से अधिक घातक होती है। इस रोग का उद्भवन काल 1 से 2 दिन होता है। बैसिलरी पेचिश में दस्तों के साथ ज्वर भी रहता है, परन्तु अमीबिक में ज्वर नहीं होता है। ऐंठन के साथ लाल या सफेद आँव वाले दस्त दोनों में ही लगते हैं।

रोगी को दही, उबला चावल, मूंग की दाल की खिचड़ी, पानी में पका साबूदाना या अरारोट, केला दिया जा सकता है। गम्भीर अवस्था में केवल चावल का माँड ही दिया जाना चाहिए। ईसबगोल की भूसी दही में मिलाकर दिन में दो या तीन बार खिलानी चाहिए।जैसे-जैसे पाचन शक्ति ठीक हो जाए रोटी, फल, तरकारी भी खाने को दे सकते हैं।

15.

क्षय रोग से ग्रस्त व्यक्ति को रोग की अवधि तथा स्वास्थ्य लाभ के समय क्या आहार दिया जाना चाहिए?

Answer»

क्षय रोग से ग्रस्त व्यक्ति के फेफड़े कुप्रभावित होते हैं जिससे खाँसी व स्थायी ज्वर बना रहता है। इसके अतिरिक्त रोगी को भूख कम लगती है तथा उसका भार नित्यप्रति कम होता रहता है। अतः उसे अतिरिक्त कैलोरीयुक्त भोजन की आवश्यकता होती है। रोग की अवस्था में उसे हल्का, सुपाच्य एवं पौष्टिक भोजन देना चाहिए। इसके लिए उसे दाल, टमाटर व मांस के सूप दिए जाने चाहिए। शीघ्र स्वास्थ्य लाभ के लिए रोगी को मूंग की दाल की खिचड़ी, दूध का दलिया, दूध, अण्डा, हरी शाक- सब्जियाँ तथा फलों का सेवन कराना उपयुक्त रहता है।

16.

पूर्ण-तरल तथा अर्द्ध-तरल भोजन कौन-से हैं?

Answer»

नींबू, मांस, जौ आदि का पानी पूर्ण-तरल, जबकि टमाटर, मांस, दाल, सब्जी का सूप, चाय, दूध आदि अर्द्ध-तरल भोजन हैं। इनसे भी अधिक ठोस दलिया, साग-सब्जियाँ, खट्टे फल, आधा उबला अण्डा आदि कम-तरल भोजन हैं।

17.

तरल भोजन रोगी के लिए क्यों उपयुक्त रहता है?

Answer»

रोगी को यह सुविधापूर्वक दिया जा सकता है तथा अधिक सुपाच्य होने के कारण शीघ्र ही शरीर में अवशोषित हो जाता है।

18.

किसके प्रयोग से तुरन्त ऊर्जा मिलती है?(क) विटामिन(ख) प्रोटीन(ग) ग्लूकोज(घ) खनिज लवण

Answer»

सही विकल्प है (ग) ग्लूकोज

19.

लार में उपस्थित किण्व का क्या नाम है?(क) लाइपेस(ख) रेनिन(ग) टायलिन(घ) पेप्सिन

Answer»

सही विकल्प है (ग) टायलिन

20.

रोगी को भोजन कराते समय आप किन-किन बातों का ध्यान रखेंगी?

Answer»

रोगी को भोजन कराते समय ध्यान रखने योग्य मुख्य बातें निम्नलिखित हैं

⦁    भोजन सुपाच्य एवं हल्का तथा डॉक्टर की सलाह पर आधारित होना चाहिए।
⦁    रोगी को प्रायः दिन में भोजन कराना उपयुक्त रहता है।
⦁    रोगी को नींद से जगाकर भोजन न कराएँ।
⦁    रोगी को निश्चित कार्यक्रम व समय के अनुसार भोजन कराना चाहिए।
⦁     भोजन सदैव स्वच्छ बर्तनों में देना चाहिए तथा प्रयुक्त बर्तनों को नि:संक्रमित कर साफ करना चाहिए।
⦁    रोगी से सदैव प्रेमपूर्ण व्यवहार करना चाहिए।

21.

हरी शाक-सब्जियों को काटने से पूर्व धोना चाहिए। क्यों?

Answer»

यदि सब्जियों को छीलकर एवं काटकर धोया जाता है, तो उनके कुछ विटामिन एवं खनिज-लवण पानी में बह जाते हैं। अतः इन खनिज तत्त्वों की सुरक्षा के लिए सब्जियों को छीलने एवं काटने से पहले उन्हें धो लेना चाहिए।

22.

रोगी को दिए जाने वाले तरल भोजन कौन-कौन से होते हैं? इन्हें तैयार करने की विधियों का भी वर्णन कीजिए।याफटे दूध का पानी किस रोगी को देते हैं? इसे बनाने की क्या विधि है?याफटे दूध का पानी (whey-water) क्यों उपयोगी है तथा इसे किस रोगी को देंगी?याचार तरल आहारों के नाम बताइए।यातरल आहार से आप क्या समझते हैं?

Answer»

रोगी के लिए आदर्श तरल आहार
तरल भोजन रोगियों का महत्त्वपूर्ण आहार है। यह हल्का एवं सुपाच्य होता है तथा  रोगी में जलअल्पता (डी-हाइड्रेशन) की स्थिति उत्पन्न नहीं होने देता। तरल भोजन के कुछ मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं

⦁    फटे दूध का पानी
⦁     टोस्ट का पानी
⦁    जौ का पानी
⦁    चावल का पानी
⦁    दाल का सूप
⦁    टमाटर का सूप
⦁    फलों का रस
⦁    आम का पना
⦁     मांस का सूप
⦁     अण्डे का फ्लिप।

इन तरल आहारों को तैयार करने की विधि तथा उनके उपयोग का विवरण निम्नलिखित है

(1) फटे दूध का पानी:
यह प्रायः बच्चों तथा मोतीझरा अथवा मियादी ज्वर के रोगियों के लिए उपयुक्त रहता है। लगभग 1/2 लीटर दूध साफ बर्तन में उबालें तथा उबाल आते ही उसमें टाटरी अथवा नींबू के रस की कुछ बूंदें डाल दें। दूध के फटने से पानी व छेना अलग-अलग हो जाता है। बर्तन को अधिक हिलाये बिना पानी को किसी दूसरे साफ बर्तन में छान लेना चाहिए। इसमें स्वाद के अनुसार नमक मिलाया जा सकता है। इसे दिन में 2-3 बार रोगी को देना चाहिए।’

(2) टोस्ट का पानी:
हल्का एवं कार्बोजयुक्त होने के कारण टोस्ट का पानी लगभग सभी प्रकार के रोगियों को दिया जा सकता है। डबल रोटी के टुकड़ों को धीमी आग पर अच्छी तरह सेकिए। अब इन्हें एक बर्तन में रखकर खोलता हुआ पानी इतना डालिए कि टोस्ट पूरी तरह से डूब जाएँ तथा पानी ऊपर रहे। अब लगभग 15-20 मिनट तक इन्हें पानी में पड़ा रहने दीजिए। अब एक स्वच्छ कपड़े में से पानी छान लें। स्वादानुसार नमक अथवा चीनी मिलाकर रोगी को दीजिए।

(3) जौ का पानी:
एक बड़ी चम्मच पिसी हुई जो लेकर अच्छी तरह साफ कर लें। आधा लीटर पानी एक पतीली में लेकर आग पर चढ़ा दें। पानी उबल जाने पर उसमें जौ डालकर धीमी आग पर अच्छी तरह से पकाएँ। अब एक स्वच्छ कपड़े में पानी को छानकर उसमें नींबू का रस, नमक तथा पिसी हुई काली मिर्च डालकर रोगी को दें। जौ का पानी पेचिश तथा गुर्दे के रोगियों को देना लाभप्रद रहता है।

(4) चावल का पानी:
एक बड़ी चम्मच चावल लेकर अच्छी तरह धोकर साफ कर लें। अब इन्हें आधा लीटर पानी में डालकर आग पर चढ़ा दें। चावलों के गलने पर बर्तन को आग पर से उतार लें। एक स्वच्छ कपड़े में से शेष पानी को छान लें। अब इसमें स्वादानुसार नमक व नींबू का रस डालकर रोगी को दें। चावल का पानी पेचिश, अतिसार तथा टायफाइड के रोगियों को देना अत्यन्त लाभप्रद रहता है।

(5) दाल का सूप:
एक बड़ी चम्मच मूंग की दाल को बीनकर व धोकर साफ कर लें। अब इसे किसी बर्तन में आधा लीटर पानी डालकर आग पर चढ़ा दें। धीमी आग पर इसे 15-20 मिनट तक पकाएँ। दाल के अच्छी तरह गल जाने पर शेष पानी को किसी स्वच्छ कपड़े में छान लें। अब इसमें स्वादानुसार नमक डालकर रोगी को दें। मोतीझरा अथवा मियादी ज्वर के रोगी के लिए दाल का सूप सर्वोत्तम रहता है।

(6) टमाटर का सूप:
250 ग्राम पके टमाटर पानी में अच्छी तरह धोकर किसी बर्तन में आधा लीटर पानी डालकर आग पर चढ़ा दें। जब टमाटर गल जाएँ तो उन्हें कुचल व मसलकर किसी बर्तन में छान लें। यदि रोगी को घी लेने की अनुमति हो, तो घी व जीरे का छौंक लगाएँ। अब स्वादानुसार नमक व पिसी हुई काली मिर्च डाल दें। यदि रोगी को घी लेना मना हो, तो बिना छौंक लगाए ही सुप देना उचित रहता है। इसी प्रकार अन्य सब्जियों; जैसे–पालक, गाजर, लौकी आदि; का भी सूप तैयार किया जा सकता है। इस प्रकार के सूप विटामिन तथा खनिज लवणों से भरपूर होते हैं।

(7) फलों का रस:
मौसमी, सन्तरा, अनार व अँगुर आदि के रस रोगियों के लिए अत्यधिक उपयोगी रहते हैं। रोगी को सदैव अच्छे व ताजे फलों का रस देना चाहिए, क्योंकि सड़े-गले फलों का रस बेस्वाद तथा हानिकारक होता है। रस निकालने से पूर्व फलों को अच्छी प्रकार पानी में धो लेना चाहिए। हाथ की अथवा बिजली की मशीन द्वारा फलों का रस निकालकर उसे एक स्वच्छ कपड़े में छन लेना चाहिए। अब इसमें स्वादानुसार नमक एवं पिसी हुई काली मिर्च डालकर रोगी को देना चाहिए।

(8) आम का पना:
कच्चे आम को राख में भूनकर तथा ठण्डा करके उसका छिलका उतार लेते हैं। अब छिले हुए आम को अच्छी तरह मथकर उसका गूदा अलग कर लेते हैं। गूदे को ठण्डे पानी में घोलकर तथा रोगी की रुचि के अनुसार इसमें नमक, पिसी काली मिर्च, भुना हुआ जीरा, हरे पुदीने का रस व चीनी आदि मिला देते हैं। आम का पनी लू से पीड़ित व्यक्तियों के लिए अत्यन्त लाभप्रद रहता है।

(9) मांस (मटन) का सूप:
250 ग्राम बकरे अथवा मुर्गी का मांस अच्छी प्रकार पानी में साफ कर किसी बर्तन में एक लीटर पानी में डालकर धीमी आग पर निरन्तर उबालें। जब यह भली प्रकार न जे.ए, तो बर्तन को ठण्डा करने के लिए रख दें। ठण्डा होने पर पानी की सतह पर आई चिकनाई को दूर कर देना चाहिए। अब इसे ठीक प्रकार से छान लें। इसे रोगी को देने से पूर्व हल्का-सा. गर्म कर लें तथा स्वादानुसार नमक व पिसी काली मिर्च डाल दें।

(10) अण्डे का फ्लिप:
“अण्डे को तोड़कर किसी प्याले में अच्छी तरह से फेंटें। अब एक गिलास दूध गरम करें।दूध में रोगी की रुचि के अनुसार चीनी मिलाकर फेंटा हुआ अण्डा अच्छी तरह से घोल दें। अण्डा मिला गरम दूध रोगी के लिए अत्यन्त लाभप्रद रहता है।

23.

भोज्य पदार्थों में ऊर्जा का प्रमुख साधन है(क) प्रोटीन(ख) विटामिन(ग) कार्बोहाइड्रेट(घ) खनिज लवण

Answer»

सही विकल्प है (ग) कार्बोहाइड्रेट

24.

सब्जियों को कब धोना चाहिए (क) काटने के बाद(ख) छीलने के बाद(ग) छीलने से पहले(घ) कभी भी

Answer»

सही विकल्प है (ग) छीलने से पहले

25.

तले हुए भोजन का अधिक सेवन करने से क्या हानि है?

Answer»

तला हुआ भोजन गरिष्ठ एवं कुपाच्य होता है। अतः अधिक सेवन करने पर अपच एवं कब्ज़ उत्पन्न करता है।

26.

भोजन को बार-बार गर्म करने से क्या हानि होती है?

Answer»

बार-बार गर्म करने से भोजन के पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं।

27.

रोगी के भोजन से क्या तात्पर्य है? रोगी को भोजन देते समय आप किन-किन बातों का ध्यान रखेंगी?यारोगी के स्वास्थ्य-लाभ के समय दिये जाने वाले भोजन का विशेष चुनाव करना चाहिए। क्यों?यारोगी के आहार कितने प्रकार के होते हैं? रोगी के आहार को तैयार करते समय किन बातों को ध्यान में रखना चाहिए?

Answer»

रुग्णावस्था में आहार

रुग्णावस्था के परिणाम हैं
(1) शारीरिक दुर्बलता,
(2) पाचन शक्ति का ह्रास,
(3) पोषक तत्त्वों की कमी तथा
(4) शरीर के विभिन्न अंगों में शिथिलता। इन विशेष परिस्थितियों में रोगी को तला, भुना अथवा मसालों युक्त भोजन दिया जाना अनुपयुक्त रहता है। उसे एक विशिष्ट प्रकार के आहार की आवश्यकता होती है। रोगी को दिया जाने वाला भोजन हल्का, सन्तुलित, ताजा, आवश्यक पोषक तत्वों से युक्त तथा पर्याप्त ऊर्जा एवं ऊष्मा प्रदान करने वाला होना चाहिए। इसके अतिरिक्त रुग्णावस्था में दिया जाने वाला भोजन रोगों पर भी आधारित होता है। सामान्यतः रोगी के आहार में निम्नलिखित

परिवर्तन किए जाने चाहिए

⦁    शुद्ध व गाढ़े दूध के स्थान पर पानी मिला अथवा सप्रेटा दूध उपयोग में लाया जाना चाहिए।
⦁    आहार में वसा कम होनी चाहिए।
⦁     खाद्यान्नों, आलू व अरवी आदि की मात्रा कम-से-कम होनी चाहिए।
⦁    विटामिन व खनिज-लवणयुक्त तरकारियाँ अधिक प्रयोग में लाई जानी चाहिए।
⦁    (फलों का सेवन अधिक कराया जाना चाहिए।
⦁    आहार हर प्रकार से सुपाच्य होना चाहिए।

इस प्रकार रुग्णावस्था में आहार को उतना ही महत्त्व है जितना कि रोगोपचार के लिए दी जाने वाली औषधियों का, क्योंकि औषधियाँ यदि रोगी को रोगमुक्त करती हैं, तो उपयुक्त आहार उसे स्वास्थ्य एवं शक्ति प्रदान करता है।

रोगी को भोजन देते समय ध्यान रखने योग्य बातें
रोगी का भोजन क्या और कैसा हो? इसके लिए निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना अत्यधिक आवश्यक है–

(1) सुपाच्य एवं हल्का भोजन:
रोगी को सहज ही पचने वाला भोजन दिया जाना चाहिए जिससे कि उसका अवशोषण जल्द हो सके। रोगी को सामान्यत: बिस्कुट, साबूदाना, सूजी, दलिया, कस्टर्ड, फल तथा उबली हुई सब्जियाँ दी जानी चाहिए।

(2) उच्च कैलोरीयुक्त आहार:
प्रायः ज्वर की अवस्था में शरीर के तापमान में वृद्धि होती है, जिसके कारण शारीरिक उष्णता एवं शक्ति की हानि होती है; अत: रोगी को 3000-4000 कैलोरी ऊर्जा प्रदान करने वाला आहार देना चाहिए। लम्बी अवधि के रोगी को 2000-3000 कैलोरी ऊर्जा देने वाला भोजन दिया जाना चाहिए। नियमानुसार रोगी को शारीरिक भार की दृष्टि से 80 कैलोरी/किलोग्राम के हिसाब से ऊर्जायुक्त आहार मिलना चाहिए।

(3) अतिरिक्त प्रोटीनयुक्त आहार:
सामान्यत: सभी रोगों में दुर्बलता उत्पन्न होती है तथा आन्तरिक ऊतकों की क्षति होती है जिसका एकमात्र विकल्प प्रोटीनयुक्त आहार है। साधारणत: रोगी को 100-150 ग्राम प्रोटीन प्रतिदिन मिलनी चाहिए। रोगी को भोजन में 300-350 कैलोरी प्रोटीन भोज्यपदार्थों से प्राप्त होनी चाहिए। प्रोटीन-प्राप्त करने के लिए दूध सर्वोत्तम आहार है। यदि वसा की मात्रा कम करनी है तो सप्रेटा दूध प्रयुक्त करना चाहिए। बच्चों को फटे दूध का पानी देना लाभप्रद रहता है। दूध के अतिरिक्त सरलता से पाचनशील दालों के सूप, मटन सूप, अण्डे आदि भी रोगी को दिए जाने । चाहिए। कुछ रोग ऐसे भी होते हैं जिनमें रोगी को बहुत कम प्रोटीनयुक्त आहार ही दिया जाता है।
(4) कार्बोजयुक्त आहार:
सामान्यतः रोगी को वसायुक्त भोज्य-पदार्थ कम-से-कम दिए जाते हैं। अत: रोगी की ऊर्जा पूर्ति के लिए उसके आहार में पर्याप्त कार्बोजयुक्त भोज्य-पदार्थों का होना बहुत आवश्यक है। इसके लिए रोगी को ग्लूकोज वे लैक्टोज के रूप में शक्कर दी जा सकती है। इसका अतिरिक्त लाभ यह है कि यह एन्जाइम क्रिया के बिना ही रक्त प्रवाह में सरलता से अवशोषित
हो जाती है।

(5) विटामिनयुक्त भोजन:
लगभग सभी रोगों में रोगी की पाचन शक्ति कुप्रभावित होती है। चयापचय की क्रिया को प्रोत्साहित करने के लिए विटामिन ‘ए’, ‘बी’ कॉम्पलैक्स तथा एस्कॉर्बिक एसिडयुक्त भोज्य-पदार्थों का सेवन रोगी के लिए आवश्यक होता है। इसके लिए उसे दूध, अण्डा तथा हरी शाक-सब्जियों का दिया जाना लाभप्रद रहता है।

(6) खनिज-लवणयुक्त आहार:
नमकीन सूप व रस तथा नमकीन भोज्य-पदार्थों का सेवन कराकर रोगी की नमक की आवश्यकता की पूर्ति की जा सकती है। दूध, हरी शाक-सब्जियों, दालों व अण्डा आदि को देने से रोगी को कैल्सियम, लोहा तथा फॉस्फोरस आदि प्राप्त हो सकते हैं। पोटैशियम की कमी को दूर करने के लिए फलों के रस तथा दूध उत्तम स्रोत हैं। उच्च रक्त चाप जैसे कुछ रोगों में व्यक्ति को नमक बहुत कम दिया जाता है।

(7) तरल पदार्थ:
पेय पदार्थ; जैसे फलों के रस, सूप, चाय इत्यादि; रोगी को 2500 से 5000 मिलीलीटर तक प्रतिदिन दिए जाने चाहिए। ज्वर आदि के कारण रोगी के शरीर से पसीने के द्वारा तथा अन्य उत्सर्जन क्रियाओं के द्वारा पानी की बहुत हानि होती है। इसके लिए रोगी को उबालकर ठण्डा किया हुआ पानी अथवा जीवाणु-रोधक फिल्टर द्वारा छाना हुआ पानी पर्याप्त मात्रा में देना चाहिए।

28.

खाद्य-पदार्थों का संरक्षण किया जा सकता है(क) सुखाकर(ख) चाशनी में रखकर(ग) तेल व नमक द्वारा(घ) इन सभी के द्वारा

Answer»

सही विकल्प है (घ) इन सभी के द्वारा

29.

भोजन को उबालने से अच्छा भाप द्वारा पकाना होता है क्यों? दो कारण लिखिए।याभोजन पकाने की कौन-सी विधि सर्वोत्तम है और क्यों?

Answer»

भोजन पकाने की सर्वोत्तम विधि उसे भाप द्वारा पकाना होती है। इसके दो मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

⦁    भोजन सुपाच्य तथा स्वादिष्ट रहता है।
⦁    भोजन के पोषक तत्त्व नष्ट नहीं होते।

30.

भोजन पकाने की विधियों के नाम लिखिए।

Answer»

उबालना, तलना, वाष्प द्वारा पकानां तथा भूनना एवं सेंकना भोजन पकाने की मुख्य विधियाँ हैं।

31.

दूध को पकाने से क्या लाभ है?

Answer»

पकाए जाने पर दूध रोगाणुमुक्त तथा सुपाच्य हो जाता है।

32.

भोजन बर्बाद न हो, इसके लिए आप क्या करेंगे?

Answer»

अधिकांशतः देखा जाता है कि अनेक घरों, होटलों, दावतों आदि में अधिक भोजन लेकर उसे फेंक दिया जाता है। ऐसा कदापि न करें। बचे भोजन को गरीबों में बाँट दें तथा पशु-पक्षियों को खिला देना चाहिए। थाली में आवश्यकता से अधिक भोजन न लें।

33.

निर्जलीकरण विधि क्या है?

Answer»

खाद्य-पदार्थों से नमी का हटाना ही निर्जलीकरण है। इस विधि में खाद्य-सामग्री में उपस्थित नमी धूप के माध्यम से सूखकर निकल जाती है। जब खाद्य-पदार्थ में नमी नहीं रहती है तो जीवाणु, कवक एवं एंजाइम सक्रिय नहीं हो पाते हैं। एवं खाद्य पदार्थ सुरक्षित रहती है।

34.

सब्जी को बार-बार गर्म करने से नष्ट हो जाता है, उसका(क) थायमीन(ख) एस्कॉर्बिक एसिड(ग) रिबोफ्लेविन(घ) निकोटिनिक एसिड

Answer»

सही विकल्प है (ख) एस्कॉर्बिक एसिड

35.

घरेलु विधि में पदार्थों को संरक्षण कैसे करते हैं?

Answer»

इस विधि में लाल मिर्च व सूखी नीम की पत्तियों को अनाज में मिलाकर वायुरुद्ध बंद डिब्बे में पैक करके रखें। मसाले, मेवे आदि को सुरक्षित रखने का सबसे अच्छा तरीका है कि उन्हें धूप दिखाकर ऐसे डिब्बे में पैक करके रखें जिनमें नमी या वायु न जा सके।

36.

फ्यूमीगेशन विधि में किस चीज का प्रयोग करते हैं?

Answer»

फ्यूमीगेशन विधि में इथायलीन डाइब्रोमाइड, इथायलीन, ट्राइक्लोराइड एवं कार्बन टेट्राक्लोराइड जैसे रसायनों का प्रयोग करते हैं।

37.

शीघ्र नष्ट होने वाले पदार्थों का नाम लिखिए।

Answer»

इस समूह में ऐसे भोज्य पदार्थ आते हैं, जो अधिक नमीयुक्त होते हैं- दूध, दही, फल, सबियाँ, अंडा, मांस, मछली।

38.

भूनने व सेंकने में क्या अन्तर है?

Answer»

भूनते समय भोज्य वस्तु आग के प्रत्यक्ष सम्पर्क में नहीं आती, जबकि सेंकने में उसे सीधे अंगारों अथवा विद्युत सलाखों के ऊपर सेंका जाता है।

39.

नीचे लिखे कथनों के सामने सत्य/असत्य लिखिए-(क) पानी के स्रोत के स्थान पर बर्तन धोने तथा जानवरों को नहलाने से पेयजल प्रदूषित हो जाता है।(ख) मच्छरों से टायफॉइड रोग होता है।(ग) कूड़ा-करकट घर से बाहर सड़क पर फेंकना चाहिए।(घ) पानी को रोगमुक्त करने के लिए उसे स्वच्छ महीन कपड़े से छानना चाहिए।(च) रुके हुए जल में मच्छर पैदा होते हैं।(छ) हमारा स्वास्थ्य हमारे चारों ओर के परिवेश की सफाई (स्वच्छता) पर, निर्भर नहीं करता।(ज) जलजनित डायरिया, हैजा, पेचिश, टायफॉयड आदि बीमारियों का प्रमुख संक्रमण स्रोत मानव मल एवं संक्रमित अथवा दूषित जल है।

Answer»

(क) सत्य

(ख) असत्य

(ग) असत्य

(घ) असत्य

(ङ) सत्य

(च) असत्य

(छ) सत्य

40.

हरी पत्तेदार सब्जियों में अधिक मात्रा में मिलने वाले पोषक तत्व हैं-(1) प्रोटीन(2) विटामिन तथा खनिज लवण(3) कार्बोहाइड्रेट(4) वसा

Answer»

सही विकल्प है (2) विटामिन तथा खनिज लवण

41.

खून छानकर साफ करता है-(1) फेफड़ा(2) हृदय(3) गुर्दा(4) आँत

Answer»

सही विकल्प है (1) फेफड़ा

42.

हमारे लिए क्यों आवश्यक है?प्रोटीनखनिज लवण और विटामिनकार्बोहाइड्रेट और वसा

Answer»

(1) प्रोटीन-शरीर की वृद्धि के लिए आवश्यक है।
(2) खनिज लवण और विटामिन-शरीर को रोगों से सुरक्षित रखते हैं।
(3) कार्बोहाइड्रेट और वसा-शरीर को शक्ति देने के लिए जरूरी हैं।

43.

हमें प्रतिदिन अपने भोजन में कौन-कौन से पोषक तत्व लेने चाहिए?

Answer»

कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, विटामिन, खनिज लवण संतुलित मात्रा में लेने चाहिए।

44.

हमारे शरीर के अंदर कौन-कौन से अंग हैं? यह कैसे सुरक्षित रहते हैं?

Answer»

हमारे शरीर के अंदर मस्तिष्क, हड्डियाँ, मांसपेशियाँ, हृदय, फेफड़े, आमाशय, छोटी आँत, बड़ी आँत, पित्ताशय, अग्न्याशय, यकृत, गुर्दे आदि हैं। त्वचा तथा अस्थियों के द्वारा इन अंगों को सुरक्षा प्रदान की जाती है।

45.

हमारे परिवेश की सफाई क्यों आवश्यक है?

Answer»

पर्यावरण सुधार करने के लिए परिवेश की सफाई आवश्यक है।

46.

साँस लेने की क्रिया में फेफड़े वायु की कौन-सी गैस ले लेते हैं और कौन-सी गैस बाहर निकालते हैं?

Answer»

फेफड़े ऑक्सीजन लेते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड बाहर निकालते हैं।

47.

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए-(क) हड्डियों से हमारे शरीर का ___ बनता है।(ख) हड्डी और ____ के काम करने से हमारे शरीर में गति होती है।(ग) दालों के सेवन से भोजन की ___ बढ़ जाती है।(घ) खुले एवं नम स्थानों में रखा भोजन ___ लगता है।(ङ) हरी सब्जियों को ____, तब काटना चाहिए।

Answer»

(क) हड्डियों से हमारे शरीर का ढाँचा बनता है।
(ख) हड्डी और मांसपेशियों के काम करने से हमारे शरीर में गति होती है।
(ग) दालों के सेवन से भोजन की पौष्टिकता बढ़ जाती है।
(घ) खुले एवं नम स्थानों में रखा भोजन सड़ने लगता है।
(ङ) हरी सब्जियों को पहले धोना, तब काटना चाहिए।

48.

रिक्त स्थानों की पूर्ति करें (पूर्ति करके) –(क) प्रदूषित जल के प्रयोग से ____ हो सकती है।(ख) लंबे हैंडिल वाले बर्तन से ____ का पानी निकालना हमेशा सुरक्षित रहता है।(ग) ____ से प्रदूषित जल पीने योग्य हो जाता है।

Answer»

(क) प्रदूषित जल के प्रयोग से बीमारी हो सकती है।
(ख) लंबे हैंडिल वाले बर्तन से घड़ों से पीने का पानी निकालना हमेशा सुरक्षित रहता है।
(ग) उबालने से प्रदूषित जल पीने योग्य हो जाता है।

49.

पीने योग्य जल है –(1) झील का(2) तालाब का(3) नदियों का(4) हैंडपंप का

Answer»

सही विकल्प है (4) हैंडपंप का

50.

घड़े से पानी निकालते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

Answer»

घड़े से पानी हमेशा लंबे हैंडिल वाले बर्तनों से निकालना चाहिए।