This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.
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इंग्लैण्ड की क्रान्ति को ‘गौरवमयी क्रान्ति’ क्यों कहा जाता है ? |
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Answer» रक्त की एक बूंद बहाये बिना ही राजसत्ता में परिवर्तन होने के कारण इंग्लैण्ड की क्रान्ति को गौरवमयी, रक्तहीन या शानदार क्रान्ति कहा जाता है। |
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मैग्नाकार्टा कब और किसके शासनकाल में तैयार हुआ ? |
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Answer» ‘मैग्नाकार्टा’ घोषणा-पत्र 15 जून, 1215 ई० को इंग्लैण्ड के राजा जॉन के शासनकाल में तैयार हुआ। |
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सन् 1688 ई० में हुई इंग्लैण्ड की क्रान्तिको किन अन्य नामों से सम्बोधित किया जाता है? |
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Answer» सन् 1688 ई० में हुई इंग्लैण्ड की क्रान्ति को ‘गौरवपूर्ण क्रान्ति’, ‘शानदार क्रान्ति’, ‘रक्तहीन क्रान्ति’, ‘महान् क्रान्ति’ आदि नामों से सम्बोधित किया जाता है। |
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उच्च स्तरीय सेवाओं के दो उदाहरण दीजिए। |
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Answer» (1) परामर्शदाता एवं (2) चिकित्सक। |
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सशक्त कर्मी से क्या आशय है? |
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Answer» सशक्त कर्मी वे श्रमिक हैं जो आत्म यथार्थीकरण द्वारा प्रेरित होते हैं न कि धन द्वारा। ये जीवन की गुणवत्ता, रचनात्मकता व व्यक्तिगत मूल्यों में विश्वास रखते हैं। |
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पर्यटन उद्योग द्वारा पोषित दो उद्योगों के नाम लिखिए। |
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Answer» ⦁ फुटकर व्यापार एवं ⦁ शिल्प उद्योग। |
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इंग्लैण्ड की गौरवपूर्ण क्रान्ति किस राजा के समय में हुई?(क) जेम्स प्रथम(ख) जेम्स द्वितीय(ग) चार्ल्स प्रथम(घ) हेनरी द्वितीय |
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Answer» सही विकल्प है (ख) जेम्स द्वितीय |
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विश्व में चिकित्सा पर्यटन के क्षेत्र में तेजी से उभरते हुए देशों के नाम लिखिए। |
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Answer» भारत, थाईलैण्ड, सिंगापुर, मलयेशिया, स्विट्जरलैण्ड, ऑस्ट्रेलिया तथा मॉरीशस आदि। |
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भारत का प्रमुख पर्वतीय पर्यटन स्थल है(a) मसूरी(b) शिमला(c) मनाली(d) उपर्युक्त सभी। |
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Answer» (d) उपर्युक्त सभी। |
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चिकित्सा पर्यटन क्या है? |
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Answer» जब चिकित्सा उपचार को अन्तर्राष्ट्रीय पर्यटन गतिविधि से सम्बद्ध कर दिया जाता है तो इसे सामान्यतः ‘चिकित्सा पर्यटन’ कहा जाता है। |
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पर्यटन को प्रोत्साहित/प्रभावित करने वाले कारक समझाइए। |
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Answer» पर्यटन को प्रोत्साहित/प्रभावित करने वाले कारक 1. पर्यटन की माँग में वृद्धि – पिछले 50-60 वर्षों में छुट्टियाँ बिताने के लिए पर्यटन की माँग में वृद्धि हुई है। लोगों के जीवन स्तर के ऊँचा उठने और खाली समय में वृद्धि के कारण अनेकानेक लोगों को छुट्टियाँ बिताने की प्रेरणा मिली है। 2. अधिक समृद्धि – संसार के अनेक देशों में काफी बड़े वर्ग की आय में भारी वृद्धि हुई है। ऐसे लोग दूर-दूर देशों में पर्यटन के लिए जाने में समर्थ हैं। 3. परिवहन के सस्ते तीव्रगामी साधन – सड़क, रेल और वायु परिवहन में विकास तथा वायु परिवहन के सस्ते होने के कारण पर्यटन को प्रोत्साहन मिलता है। 4. अधिक छुट्टियाँ-काम के नए तौर – तरीकों से लोगों को काफी खाली समय मिलता है। कुछ लोग घर पर बैठकर कम्प्यूटर के माध्यम से काम करते या कुछ अंशकालिक कामगार हैं। ऐसे लोगों के पास पर्यटन के लिए काफी समय होता है। |
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पर्यटन से क्या तात्पर्य है? |
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Answer» पर्यटन एक यात्रा है जो व्यापार के स्थान पर प्रमोद के उद्देश्यों के लिए की जाती है। |
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कुपोषण से आप क्या समझते हैं ? विटामिन्स की कमी से होने वाले रोगों के नाम लिखिए ? |
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Answer» शरीर में आवश्यक पोषक तत्वों की कमी या अधिकता कुपोषण है जिसके कारण बच्चे कई बीमारियों से ग्रसित हो जाते हैं। शरीर में विभिन्न प्रकार के विटामिन्स की कमी के कारण रतौंधी, बेरी-बेरी, स्कर्वी, रिकेट्स, आदि रोग होते हैं। |
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भोजन के प्रमुख कार्य क्या है ? |
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Answer» भोजन के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं- 1. भोजन शरीर को शक्ति प्रदान करता है। 2. भोजन के द्वारा शरीर का निर्माण और मरम्मत का कार्य होता है। | 3. भोजन के द्वारा रोगों से सुरक्षा होती है। 4. भोज्य तत्वों से एन्जाइम तथा हार्मोन्स बनता है जो शरीर के लिए लाभकारी होता है। |
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चार्ल्स प्रथम को फाँसी कब दी गयी ? |
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Answer» इंग्लैण्ड के राजा चार्ल्स प्रथम को 30 जनवरी, 1649 ई० को फाँसी दी गयी थी। |
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अमेरिकी स्वतन्त्रता संग्राम का नेतृत्व किसने किया?(क) अब्राहम लिंकन ने(ख) थॉमस जेफरसन ने(ग) जॉन लॉक ने(घ) जॉर्ज वाशिंगटन ने |
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Answer» सही विकल्प है (घ) जॉर्ज वाशिंगटन ने |
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संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति कौन थे?(क) अब्राहम लिंकन(ख) वुडरो विल्सन(ग) जॉर्ज वाशिंगटन(घ) जेफरसन |
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Answer» सही विकल्प है (ग) जॉर्ज वाशिंगटन |
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सन्तुलित भोजन किसे कहते हैं ? |
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Answer» हमारे शरीर की वृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए हमारे भोजन में वे सभी पोषक तत्व उचित मात्रा में होने चाहिए जिनकी आवश्यकता हमारे शरीर को है। कोई भी पोषक तत्व न अधिक हो न कम। हमारे भोजन में पोषक तत्त्व, विटामिन्स एवं खनिज के साथ पर्याप्त मात्रा में रेशे युक्त खाद्य तणि जल भी होना चाहिए। इस प्रकार के आहार को संतुलित आहार’ कहते हैं। |
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बिल ऑफ राइट्स कब पारित किया गया ? |
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Answer» इंग्लैण्ड में बिल ऑफ राइट्स सन् 1689 ई० में पारित किया गया। |
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अमेरिका की क्रान्ति कब हुई थी?(क) 1775 ई० में(ख) 1776 ई० में(ग) 1875 ई० में(घ) 1765 ई० में |
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Answer» सही विकल्प है (ख) 1776 ई० में |
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अंग्रेजों ने भारतीय उद्योगों को किस प्रकार नष्ट किया? |
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Answer» अंग्रेजों ने भारत से कच्चा माल- सूत और कपास ले जाकर अपने यहाँ मशीनों द्वारा वस्त्र निर्माण करके भारत में लाकर बेचना आरंभ कर दिया। इस सस्ते और अच्छे कपड़े का सामना भारतीय उद्योग नहीं कर सके और यहाँ के कारीगर बेकार हो गए। इस प्रकार अंग्रेजों ने भारतीय उद्योगों को नष्ट किया। |
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अमेरिका में ब्रिटेन के कितने उपनिवेश थे? अमेरिका की क्रान्ति किसके नेतृत्व में हुई ? |
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Answer» अमेरिका में ब्रिटेन के कुल तेरह उपनिवेश थे तथा इसकी क्रान्ति जॉर्ज वाशिंगटन के नेतृत्व में हुई। |
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स्थायी बंदोबस्त क्या था? |
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Answer» अधिक मालगुजारी वसूल करके देने वाले को नीलामी बोली के आधार पर उन्हें तथा उनके पुत्रों को आजीवन उस गाँव का जमींदार घोषित कर दिया। यही जमींदारी प्रथा या स्थायी बंदोबस्त कहलाता है। |
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पिट्स इण्डिया एक्ट के बारे में लिखिए? |
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Answer» ब्रिटिश संसद ने 1784 ई० में एक नया कानून पारित किया जो पिट्स इण्डिया एक्ट कहलाया। इस अधिनियम के द्वारा ब्रिटेन में एक नियंत्रण परिषद (बोर्ड ऑफ कंट्रोल) की स्थापना हुई। इस परिषद के द्वारा ब्रिटिश सरकार को भारत में कंपनी के सैनिक, असैनिक तथा राजस्व संबंधी मामलों में एकाधिकार प्राप्त हो गया। गर्वनर जनरल को भारत स्थित सभी ब्रिटिश फौजों का मुख्य सेनापति बनाया गया। |
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सुप्रीम कोर्ट की स्थापना किस गर्वनर जनरल के समय में हुई? |
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Answer» सुप्रीम कोर्ट की स्थापना गर्वनर जनरल वारेन हेस्टिंग्स के समय में हुई। |
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डलहौजी की राज्य हड़पने की नीति क्या थी? इस नीति के क्या उद्देश्य थे? |
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Answer» लॉर्ड हार्डिंग के पश्चात् 1848 ई० में लॉर्ड डलहौजी भारत का गवर्नर-जनरल नियुक्त हुआ। उसका उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य को बढ़ाना था। वह उस कार्य को पूरा करना चाहता था, जिसे राबर्ट क्लाइव ने शुरू किया था। ब्रिटिश साम्राज्य को बढ़ाने के लिए अधिक-से-अधिक देशी राज्यों को ब्रिटिश साम्राज्य में सम्मिलित करने लगा। उसकी इस नीति की प्रमुख बात यह थी कि यदि कोई राजा नि:सन्तान मर जाता था तो उसका राज्य कम्पनी के अधीन हो जाया करता था। यद्यपि गोद लेने की स्वीकृति भी दी गई थी परन्तु इसमें भी शर्त यह थी कि बिना कम्पनी सरकार की पूर्व स्वीकृति के गोद नहीं लिया जा सकता था। साथ ही कम्पनी स्वीकृति देने के लिए बाध्य भी नहीं थी। यह अनुमति दे भी सकती थी और नहीं भी दे सकती थी। इस प्रकार अँग्रेजों को अनेक राज्यों को हड़पने का बहाना मिल गया। लॉर्ड डलहौजी की इसी नीति को ‘राज्य हड़पने की नीति’ कहा जाता है। उसकी यह नीति अँग्रेजों के लिए बहुत लाभकारी सिद्ध हुई। इसी नीति के परिणामस्वरूप पूरे भारतवर्ष में ब्रिटिश साम्राज्य स्थापित हो गया। लॉर्ड डलहौजी की राज्य हड़पने की नीति के निम्नलिखित उद्देश्य थे- 1. इनका सर्वप्रथम उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य को बढ़ाना था। 2. व्यापार में मनमानी करना तथा सस्ते दरों पर कच्चा माल खरीदना। 3. अपना सामान भारत के बाजारों में ऊँची कीमतों पर बेचना। 4. भारत की जनता के बीच फूट डालकर एक-दूसरे के बीच भेदभाव पैदा करना तथा अपनी महत्त्वाकांक्षा को पूरा करना। |
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एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना की-(क) राजाराम मोहन राय ने(ख) विलियम जोन्स ने(ग) क्लाइव ने(घ) लार्ड मैकॉले ने |
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Answer» सही विकल्प है (ख) विलियम जोन्स ने |
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रेग्यूलेटिंग एक्ट बनाया गया(क) 1773 ई० में(ख) 1784 ई० में(ग) 1857 ई० में(घ) 1770 ई. में |
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Answer» सही विकल्प है (क) 1773 ई० में |
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अमेरिकावासी इंग्लैण्ड से क्यों सम्बन्ध विच्छेद करना चाहते थे? उनके असन्तोष के तीन कारण लिखिए।याअमेरिका के स्वतन्त्रता-संग्राम के प्रमुख कारणों का वर्णन कीजिए।याअमेरिका की क्रान्ति के क्या कारण थे ? विवेचना कीजिए। |
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Answer» इंग्लैण्ड की शानदार क्रान्ति ने ब्रिटिश उपनिवेशों की जनता में स्वतन्त्रता और अधिकार-प्राप्ति की भावना की लहर उत्पन्न कर दी। इसे लहर का तूफान सर्वप्रथम अमेरिका के ब्रिटिश उपनिवेशों में उठा। 1942 ई० में जब कोलम्बस ने अमेरिका की खोज करके यूरोप में सनसनी फैला दी तो यूरोप के व्यापारी इस महाद्वीप की प्राकृतिक सम्पदा को लूटने तथा यहाँ के निवासियों को गुलाम बनाने के लिए परस्पर प्रतिस्पर्धा करने लगे। व्यापारियों को प्रोत्साहन देने के लिए स्पेन, हॉलैण्ड, फ्रांस तथा इंग्लैण्ड के राजाओं ने अमेरिका में अपने उपनिवेश बसाने शुरू कर दिये। 150 वर्षों के अन्दर ही अंग्रेजों ने अमेरिका में 13 उपनिवेश स्थापित करने में सफलता प्राप्त कर ली। ट्यूडर तथा स्टुअर्ट राजाओं के काल में अंग्रेजों ने अमेरिकी उपनिवेशों का जमकर शोषण किया, परन्तु पुनर्जागरण की लहर के कारण अमेरिकियों में राष्ट्रीयता की भावना विकसित होने लगी। दूसरी ओर इंग्लैण्ड के सम्राट जॉर्ज तृतीय की अयोग्यता तथा ब्रिटिश प्रधानमन्त्रियों (लॉर्ड चैथम आदि) की उपेक्षापूर्ण नीतियों ने अमेरिकी उपनिवेशों की जनता के असन्तोष को अत्यधिक बढ़ा दिया। टॉमस पेन, एडमण्ड बर्क तथा थॉमस जेफरसन जैसे विद्वानों, लेखकों तथा वक्ताओं ने अपने विचारों से अमेरिका में क्रान्ति की पृष्ठभूमि तैयार कर दी। अमेरिका की क्रान्ति (असन्तोष) के कारण सम्राट जॉर्ज द्वितीय की अयोग्यता एवं ब्रिटिश प्रधानमन्त्रियों की उपेक्षापूर्ण नीतियों के कारण अमेरिकियों ने 1775 ई० में जॉर्ज वाशिंगटन के नेतृत्व में फ्रांस तथा स्पेन की सहायता से अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया, जिसे अमेरिका का स्वतन्त्रता संग्राम कहते हैं। इस स्वतन्त्रता-संग्राम के निम्नलिखित कारण थे 1. दोषपूर्ण शासन – अमेरिका में इंग्लैण्ड के 13 उपनिवेश थे। इन उपनिवेशों में इंग्लैण्ड का शासन बहुत दोषपूर्ण था। प्रत्येक उपनिवेश में एक अंग्रेज गवर्नर होता था तथा एक विधानसभा होती थी, जिसमें उपनिवेश के निर्वाचित सदस्य होते थे। यह सभा स्थानीय मामलों सम्बन्धी कानून बनाती तथा कर लगाती थी। उनके ऊपर इंग्लैण्ड की सरकार जो भी नियम लागू करती थी, उनमें इंग्लैण्ड का हित निहित होता था। परस्पर विरोधी हितों के कारण अंग्रेज गवर्नर तथा निर्वाचित सभा के मध्य संघर्ष चलता रहता था। अमेरिकावासियों को उच्च पदों के लिए अयोग्य माना जाता था और अंग्रेजों को उच्च पदों पर नियुक्त किया जाता था; अतः अमेरिका की जनता अंग्रेजों के दोषपूर्ण शासन के विरुद्ध एकजुट होकर स्वतन्त्रता पाने के लिए लालायित हो उठी। 2. आर्थिक शोषण – इंग्लैण्ड की सरकार उपनिवेशों का बुरी तरह से शोषण कर रही थी। ब्रिटिश शासन ने उपनिवेशों में ऐसे व्यापारिक नियम लागू कर रखे थे, जिनसे इंग्लैण्ड को तो अधिकाधिक लाभ पहुँच रहा था, किन्तु ऐसे नियम उपनिवेशों के विकास में बाधक सिद्ध हो रहे थे। उदाहरण के लिए, उपनिवेशों की मुख्य उपज कपास, तम्बाकू तथा चीनी का निर्यात केवल इंग्लैण्ड को ही किया जा सकता था। उपनिवेशों में लोहे व ऊन के सामान, ईंट आदि के उत्पादन पर प्रतिबन्ध था। इन वस्तुओं को केवल इंग्लैण्ड से ही आयात किया जा सकता था। उपनिवेशों से अन्य देशों को माल केवल इंग्लैण्ड के जहाजों द्वारा ही भेजा जा सकता था। उपनिवेशों के निवासी इस आर्थिक शोषण को अधिक दिन तक सहन न कर सके; अत: उन्होंने स्वतन्त्रता संग्राम छेड़ दिया। 3. स्टाम्प ऐक्ट लगाना – इंग्लैण्ड की सरकार ने उपनिवेश के निवासियों के व्यापारिक सौदों पर भारी कर लगा रखे थे, जिनसे जनता बहुत असन्तुष्ट थी। उपनिवेशों की सुरक्षा के लिए इंग्लैण्ड की सरकार ने यह निश्चय किया कि उपनिवेशों की एक स्थायी सेना रखी जाए, जिसका व्यय उपनिवेशों द्वारा ही वहन किया जाए। धन की प्राप्ति के लिए ब्रिटेन की संसद ने स्टाम्प ऐक्ट पारित करके उपनिवेशों पर अतिरिक्त कर लगा दिया। इसके अनुसार अदालती कागजों पर स्टाम्प लगाने पड़ते थे। उपनिवेशवासियों ने इस ऐक्ट का कड़ा विरोध किया और कहा कि यदि ‘प्रतिनिधित्व नहीं, तो कर भी नहीं। 4. दार्शनिकों का प्रभाव – इस काल में अमेरिका के लोगों को लॉक, हेरिंगटन, टॉमस पेन, जेफरसन, मिल्टन आदि दार्शनिकों के विचारों ने बहुत प्रभावित किया। इनके विचारों से अमेरिकियों में राजनीतिक चेतना जाग उठी, जिसने क्रान्ति का रूप धारण कर लिया। इन दार्शनिकों ने अपने लेखों में लोगों की भावनाओं को स्वतन्त्रता के प्रति जाग्रत किया। उपनिवेशों के लोगों ने इनसे प्रभावित होकर स्वतन्त्र होने के लिए संग्राम छेड़ दिया। 5. अन्य देशों के लोगों को बसना- इन उपनिवेशों में धीरे-धीरे यूरोप के अन्य देशों के लोग भी आकर बसने लगे थे, जिनमें प्रमुख रूप से आयरलैण्ड और हॉलैण्ड के लोग थे, जो इंग्लैण्ड से नाराज होकर अमेरिका आये थे। इस समय अमेरिका में रहने वाले ऐसे लोगों की संख्या अधिक थी, जिनका इंग्लैण्ड से कोई लगाव नहीं था। 6. स्वावलम्बन की इच्छा – अमेरिका में उपनिवेश स्थापित करने वाले लोग लगभग 150 वर्षों से रह रहे थे। प्रारम्भ में अनेक कठिनाइयों का सामना करने के बाद वे अब अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आत्म-निर्भर हो गये थे। उपनिवेशवासियों ने यह अनुभव किया कि अब उनके लिए इंग्लैण्ड के संरक्षण में रहना लाभदायक नहीं है; अतः वे इंग्लैण्ड के साथ अपने सम्बन्ध विच्छेद करने के लिए प्रयत्नशील हो गये। 7. धार्मिक मतभेद – इंग्लैण्ड छोड़कर अमेरिका में बसने वाले अंग्रेज वहाँ होने वाले धार्मिक अत्याचारों से दु:खी होकर यहाँ आये। उनके साथ ही कुछ लोग आर्थिक लाभ हेतु भी यहाँ आ बसे। इनमें से अधिकांश लोग ऐसे थे जो ‘आंग्ल चर्च’ को नहीं मानते थे, जबकि इंग्लैण्ड में उन दिनों केवल ‘आंग्ल चर्च’ को ही मान्यता प्राप्त थी। इस प्रकार इंग्लैण्ड तथा उपनिवेशवासियों में गहरा धार्मिक मतभेद था। 8. फ्रांसीसी आक्रमण का भय समाप्त – फ्रांस तथा अमेरिका क्रमशः रोमन कैथोलिक धर्म तथा प्रोटेस्टेण्ट धर्म के समर्थक एवं अनुयायी थे। इसलिए दोनों वर्गों में आपस में कटुता के कारण सम्बन्ध तनावपूर्ण थे। आरम्भ में तो अमेरिकावासी अंग्रेजों को भय था कि यदि उन्होंने इंग्लैण्ड से झगड़ा किया तो उस अवसर का लाभ उठाकर कनाडा के फ्रांसीसी उन पर आक्रमण कर सकते हैं। लेकिन जब सप्तवर्षीय युद्ध के बाद कनाडा भी अंग्रेजों के अधिकार में आ गया तब उपनिवेशवासी अंग्रेजों को कनाडा में बसे फ्रांसीसियों के आक्रमण का भय समाप्त हो गया। अतः उन्होंने निडर होकर अंग्रेजों से युद्ध करने के लिए अपनी तैयारी शुरू कर दी। |
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इंग्लैण्ड की क्रान्ति के परिणामों का वर्णन कीजिए।याइंग्लैण्ड की क्रान्ति ने विश्व इतिहास को कहाँ तक प्रभावित किया ?याइंग्लैण्ड की गौरवपूर्ण क्रान्ति (1688 ई०) के दो परिणाम लिखिए।याइंग्लैण्ड की क्रान्ति को गौरवपूर्ण क्रान्ति’ की संज्ञा क्यों दी गयी है ? इसके प्रमुख परिणामों को वर्णित कीजिए।याइंग्लैण्ड के इतिहास में रक्तहीन क्रान्ति किस प्रकार एक युगान्तकारी घटना थी ? |
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Answer» इंग्लैण्ड की क्रान्ति इतिहास में गौरवपूर्ण क्रान्ति के नाम से इसलिए प्रसिद्ध है, क्योंकि बिना खून की एक बूंद बहाये तथा बिना युद्ध लड़े इंग्लैण्ड में जेम्स द्वितीय के निरंकुश शासन का अन्त करके संसद की सत्ता स्थापित कर दी गयी। इंग्लैण्ड की क्रान्ति के परिणाम (प्रभाव) इंग्लैण्ड के इतिहास में इस क्रान्ति का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस क्रान्ति के विश्व-इतिहास पर भी बड़े दूरगामी व व्यापक परिणाम हुए, जो निम्नवत् हैं – 1. राजा के दैवी अधिकारों का अन्त – क्रान्ति से पूर्व इंग्लैण्ड के अधिकांश सम्राट ‘राजा के दैवी अधिकारों के सिद्धान्त में विश्वास करते आ रहे थे। वे अपने को पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि मानने के साथ-साथ यह भी मानते थे कि राजा को अपनी स्वेच्छा से शासन करने का अधिकार था। इस क्रान्ति ने यह स्पष्ट कर दिया कि राजा का पद जनता की इच्छा पर निर्भर करता है, न कि दैवी अधिकार पर। 2. संसद की सर्वोच्चता की स्थापना – इंग्लैण्ड में गौरवपूर्ण क्रान्ति की सफलता के पश्चात् संसद की सर्वोच्चता स्थापित हो गयी। इससे यह सिद्ध हो गया कि जनता की प्रतिनिधि संसद की शक्ति अधिक है और राजा को संसद की इच्छा के अनुसार ही शासन करना चाहिए। 3. राजा और संसद के संघर्ष का अन्त – गौरवपूर्ण क्रान्ति के पश्चात् राजा और संसद के संघर्ष का अन्त हो गया, जिससे इंग्लैण्ड के आर्थिक विकास की गति में तेजी आ गयी। 4. राजा की निरंकुशता पर प्रतिबन्ध – संसद ने 1689 ई० में बिल ऑफ राइट्स पारित करके राजा की निरंकुशता पर अंकुश लगा दिया। निरंकुशता समाप्त होने पर स्वतन्त्रता और समानता के आदर्शों की स्थापना की गयी। इस बिल के द्वारा यह निश्चित कर दिया गया कि इंग्लैण्ड में प्रोटेस्टेण्ट धर्म का अनुयायी ही राजा बन सकेगा। 5. स्वतन्त्र न्यायपालिका की स्थापना – इंग्लैण्ड में क्रान्ति की सफलता के पश्चात् न्यायपालिका की स्थापना की गयी। अब न्यायाधीश स्वतन्त्र हो गये थे, क्योंकि न्यायाधीशों पर राजा का कोई नियन्त्रण नहीं रहा। 6. यूरोप में क्रान्तियों का प्रचलन – इंग्लैण्ड की गौरवपूर्ण क्रान्ति की सफलता से प्रोत्साहित होकर यूरोप में राजनीतिक क्रान्तियों की एक श्रृंखला प्रारम्भ हो गयी। 7. इंग्लैण्ड और फ्रांस में विरोध – फ्रांस यूरोप में कैथोलिक धर्म का नेतृत्व कर रहा था; अतः जेम्स द्वितीय के साथ फ्रांस के मधुर सम्बन्ध थे, परन्तु इंग्लैण्ड में प्रोटेस्टेण्ट धर्म की मान्यता स्थापित हो जाने से इंग्लैण्ड और फ्रांस के सम्बन्धों में कटुता उत्पन्न हो गयी। 8. इंग्लैण्ड की विभिन्न क्षेत्रों में प्रगति – गौरवपूर्ण क्रान्ति के पश्चात् इंग्लैण्ड ने औपनिवेशिक, राजनीतिक आदि क्षेत्रों में पर्याप्त प्रगति की। प्रशासन ने देश के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास की ओर ध्यान दिया। 9. इंग्लैण्ड में संसदीय शासन का विकास – उन्नीसवीं सदी में इंग्लैण्ड में संसदीय शासन प्रणाली का तेजी से विकास हुआ। सन् 1832 ई० में पहला सुधार अधिनियम पारित हुआ, जिससे लोगों को मताधिकार प्राप्त हुआ। सन् 1867 ई०, 1884-85 ई० तथा 1911 ई० में इंग्लैण्ड में सभी वयस्क पुरुषों को मताधिकार मिल गया। सन् 1918 ई० में इंग्लैण्ड में महिलाओं को भी मताधिकार प्राप्त हो गया। इस प्रकार इंग्लैण्ड में संसदीय शासन मजबूती से स्थापित हो गया और ब्रिटिश संसद संसार की ‘संसदों की जननी’ कही जाने लगी। |
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इंग्लैण्ड की क्रान्ति के प्रमुख कारणों पर प्रकाश डालिए।याइंग्लैण्ड में 1688 ई० में होने वाली गौरवपूर्ण अथवा रक्तहीन क्रान्ति के प्रमुख कारण क्या थे ? वर्णन कीजिए।याइंग्लैण्ड की क्रान्ति के क्या कारण थे ? |
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Answer» इंग्लैण्ड की क्रान्ति के कारण इंग्लैण्ड की क्रान्ति विश्व इतिहास में ‘गौरवपूर्ण क्रान्ति’, ‘शानदार क्रान्ति’, ‘रक्तहीन क्रान्ति तथा महान् क्रान्ति’ नामों से प्रसिद्ध है। इसे शानदार क्रान्ति’ इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसके द्वारा बिना खून की एक बूंद बहाये तथा बिना युद्ध लड़े इंग्लैण्ड में निरंकुश शासन का अन्त करके संसद की सत्ता स्थापित कर दी गयी। इंग्लैण्ड की रक्तहीन क्रान्ति 1688 ई० में राजा जेम्स द्वितीय के शासनकाल (सन् 1685-88 ई०) में हुई थी। जेम्स द्वितीय भी अपने पिता की तरह ही अहंकारी, हठी और निरंकुश शासक था। फलस्वरूप उसके शासनकाल के तीसरे वर्ष में ही क्रान्ति का आरम्भ हो गया।इस क्रान्ति के प्रमुख कारण निम्नलिखित 1. कैथोलिकों के प्रति उदारता – जेम्स द्वितीय कैथोलिक धर्म का अनुयायी था। इसलिए वह प्रोटेस्टेण्ट धर्म के लोगों की अपेक्षा कैथोलिकों के प्रति पक्षपात करता था और उनके प्रति उदारता का व्यवहार करता था। उसने कैथोलिकों को सेना में उच्च पदों पर नियुक्त किया। इन नियुक्तियों को ब्रिटिश संसद ने अवैध घोषित कर दिया। इस पर जेम्स द्वितीय ने संसद को ही भंग कर दिया। संसद को भंग करने के पश्चात् जेम्स द्वितीय का साहस बढ़ता ही गया और उसने मनमाने ढंग से अन्य उच्च सरकारी पदों पर भी कैथोलिकों की नियुक्तियाँ कीं। इससे जनता के मन में जेम्स द्वितीय के विरुद्ध भावना पैदा हुई। 2. कोर्ट ऑफ हाईकमीशन की स्थापना – संसद को भंग करने के बाद जेम्स द्वितीय ने कैथोलिकों की नियुक्तियों को वैधानिक बनाने के लिए कोर्ट ऑफ हाईकमीशन की स्थापना की। संसद ने इस प्रकार की संस्थाओं और न्यायालयों की स्थापना पर रोक लगा रखी थी, क्योंकि ये सभी राजाओं की निरंकुशता की प्रतीक थीं। जेम्स द्वितीय ने संसद की परवाह न करते हुए कोर्ट ऑफ हाई कमीशन के माध्यम से कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के चांसलर और लन्दन के बिशप को पदच्युत करके उनके स्थान पर कैथोलिकों की नियुक्ति करवा दी। जेम्स द्वितीय के इस कार्य से इंग्लैण्ड की प्रोटेस्टेण्ट जनता बहुत असन्तुष्ट हो गयी और राजा को हटाने की सोचने लगी। 3. कानूनों का स्थगन ( रद्द करना) – जेम्स द्वितीय ने 1687 ई० में इंग्लैण्ड के कैथोलिकों पर नियन्त्रण लगाने वाले अन्य अनेक कानूनों को भी रद्द कर दिया। इन कानूनों में क्लैरेण्डन कोड, टेस्ट ऐक्ट तथा चर्च सम्बन्धी कानून प्रमुख थे। इन कानूनों के स्थगन से कैथोलिकों को सरकारी पद प्राप्त करने और धार्मिक कार्यों का सम्पादन करने की पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त हो गयी। जनता को राजा की ये बाते बहुत बुरी लगीं। 4. धार्मिक घोषणा – जेम्स द्वितीय ने 1768 ई० में एक घोषणा करते हुए पादरियों को आदेश दिया कि वे उसके द्वारा की गयी कैथोलिक धर्म सम्बन्धी घोषणाओं को चर्च में पढ़कर सुनायें। जेम्स द्वितीय को यह आदेश इंग्लैण्ड के चर्च के विरुद्ध था; अत: ब्रिटिश जनता में रोष फैल गया और वह उत्तेजित हो उठी।. 5. सात बिशपों पर अभियोग – जेम्स द्वितीय के आदेश की तीखी प्रतिक्रिया हुई। कैण्टरबरी के आर्क बिशप और छह अन्य बिशपों ने राजा के पास एक आवेदन-पत्र भेजा जिसमें उन्होंने राजा से विनती की कि उन्हें अनुचित घोषणाएँ पढ़ने को बाध्य ने किया जाए। इस पर जेम्स द्वितीय ने क्रोधित होकर सातों बिशपों को बन्दी बना लिया और उन पर राजद्रोह के अपराध में मुकदमा चलाया गया। इस घटना ने इंग्लैण्ड में क्रान्ति का वातावरण तैयार कर दिया। 6. हॉलैण्ड के राजा के विचार – हॉलैण्ड के राजा विलियम ऑफ ऑरेन्ज ने अपने एक लेख में विचार प्रकट किया कि कैथोलिकों को धार्मिक स्वतन्त्रता कभी नहीं मिलनी चाहिए। इस विचार से इंग्लैण्ड की जनता बहुत प्रसन्न हुई तथा जेम्स द्वितीय के और अधिक विरुद्ध हो गयी। 7. अन्य कारण – जेम्स द्वितीय के पक्षपातपूर्ण कार्यों तथा दमन-नीति ने इंग्लैण्ड में क्रान्ति की लहर उत्पन्न कर दी। 12 जून, 1688 ई० को राजा जेम्स के यहाँ पुत्र के जन्म की सूचना ने क्रान्ति को अनिवार्य बना दिया; क्योंकि जनता यह सोचने लगी कि अब इंग्लैण्ड में कैथोलिक राजवंश ही सदैव के लिए स्थायी हो जाएगा। |
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इलाहाबाद की संधि क्या थी? उसकी शर्ते का वर्णन कीजिए। |
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Answer» इलाहाबाद की संधि( 1765 ई० )- क्लाइव 1765 ई० में कलकत्ता (कोलकाता) का गर्वनर बनकर पुनः भारत आया। उसने इलाहाबाद जाकर मुगल सम्राट शाहआलम और अवध के नवाब शुजाउद्दौला के साथ अलग-अलग संधि की जो इलाहाबाद की संधि के नाम से प्रसिद्ध है। इस संधि की शर्ते इस प्रकार थीं ⦁ मुगल सम्राट शाहआलम ने बंगाल, बिहार व उड़ीसा (ओडिशा) की दीवानी अंग्रेजों को प्रदान कर दी। |
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कर्नाटक के प्रथम युद्ध का क्या परिणाम हुआ? |
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Answer» अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के मध्य कर्नाटक का प्रथम युद्ध हुआ। इस युद्ध के कारण फ्रांसीसियों के भारत में साम्राज्य स्थापना के सपने को गहरा आघात पहुँचा परन्तु फिर भी भारत में फांसीसियों की धाक जम गई तथा फ्रांसीसी गर्वनर डुप्ले ने और अधिक उत्साह से देश की आन्तरिक समस्याओं में हस्तक्षेप करना आरम्भ कर दिया। इस युद्ध ने विदेशियों पर भारत की दुर्बलता को पुर्णत: प्रकट कर दिया और दोनों शक्तियाँ कर्नाटक के आन्तरिक संघर्षों में हस्तक्षेप करने लगीं। |
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भारत में पुर्तगालियों की असफलता के दो कारण लिखिए। |
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Answer» भारत में पुर्तगालियों की असफलता के दो कारण निम्नलिखित हैं ⦁ मुगलों एवं मराठों द्वारा पुर्तगालियों का विरोध करना। |
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अंग्रेजों ने सूरत पर किस प्रकार अधिकार किया? |
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Answer» अंग्रेजों ने सूरत में व्यापारिक कोठी की स्थापना करके धीरे-धीरे सूरत पर अधिकार किया। |
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डूप्ले की नीति की समीक्षा कीजिए तथा फ्रांसीसियों की असफलता के कारणों का वर्णन कीजिए। |
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Answer» डूप्ले की नीति- डूप्ले की नीति को निम्नलिखित रूप से समझा जा सकता है (i) भारतीय शासकों के मामलों में हस्तक्षेप- डूप्ले ने भारत की राजनीतिक स्थिति के अनुसार अनुमान लगा लिया कि सफलता प्राप्त करने के लिए राजाओं के आपसी झगड़ों में हस्तक्षेप करना, व्यापार व राजनीतिक अधिकारों के लिए लाभकारी है, अतः उसने इस नीति का अनुसरण किया। हैदराबाद और कर्नाटक के झगड़ों में उसे सफलता प्राप्त भी हुई। (ii) फ्रांसीसी साम्राज्य की स्थापना- डूप्ले फ्रांसीसी सरकार तथा फ्रांसीसी व्यापारियों के लाभ हेतु यहाँ पर भारत के अन्य क्षेत्रों में भी साम्राज्य स्थापित करने की नीति में विश्वास करता था और साम्राज्य स्थापना के लिए वह अत्यधिक सक्रिय हो गया था। (iii) व्यापारिक नीति में परिवर्तन- डूप्ले प्रारम्भ में अपने देश की समृद्धि के लिए भारत में व्यापार की वृद्धि करने आया। उसने फ्रांसीसी कम्पनी को भारत में सुदृढ़ नींव पर खड़ा करने का प्रयास किया, परन्तु बाद में वह समझ गया था कि अंग्रेजों के विरुद्ध सफल होने के लिए राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करना भी अनिवार्य है। अतः व्यापार की वृद्धि के लिए वह राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में जुट गया। इस प्रकार डूप्ले ने फ्रांसीसी कम्पनी की व्यापारिक नीति में परिवर्तन किया तथा दक्षिणी भारत में फ्रांस के राजनीतिक प्रभुत्व की स्थापना की ओर ध्यान दिया। (iv) भारतीय सैन्य-बल पर प्रयोग- डूप्ले फ्रांसीसी सेनाओं की दुर्बलताओं से भली-भाँति परिचित था। अत: उसने सैन्य बल का लाभ उठाने की नीति अपनाई थी। उसने भारतीय राजाओं की सेनाओं को पाश्चात्य ढंग से प्रशिक्षण देना शुरू किया। (v) उपहार ग्रहण करना- धन की अभिवृद्धि के लिए डूप्ले ने भारतीय राजाओं से उपहार ग्रहण करने की नीति अपनाई। यह नीति राजनीतिक दृष्टिकोण से डूप्ले द्वारा लिया गया अविवेकपूर्ण निर्णय था। (i) गोपनीयता- डूप्ले अपनी भावी योजना को अन्य समकक्ष अधिकारियों से छिपाकर रखता था। इसका परिणाम यह हुआ कि कम्पनी और फ्रांसीसी सरकार उसकी समय पर सहायता न कर सकी और इस तरह डूप्ले की गोपनीय योजना की यह नीति फ्रांसीसियों के पतन का प्रमुख कारण बन गई। (ii) व्यापार की दयनीय दशा- फ्रांसीसियों का व्यापार भी पतनोन्मुख था। ब्रिटिश व्यापारी बहुत चतुर व दक्ष थे। इनका एकमात्र मुम्बई का व्यापार ही सारे फ्रांसीसी व्यापार की तुलना में पर्याप्त था। व्यापारिक अवनति ने भी फ्रांसीसियों का मनोबल कम कर दिया। यह स्थिति फ्रांसीसियों के लिए अंग्रेजों से बराबरी करने में प्रतिकूल सिद्ध हुई। चारित्रिक दुर्बलता- डूप्ले अहंकारी व्यक्ति था। वह अति महत्वाकांक्षी था तथा उसका स्वभाव षड्यन्त्रप्रिय था। वह एक कुशल राजनीतिज्ञ तथा प्रबन्धक था परन्तु योग्य सेनानायक न था। इसके विपरीत उसका प्रतिद्वन्द्वी क्लाइव योग्य राजनीतिज्ञ तथा प्रबन्धक तो था ही साथ ही कुशल सेनानायक भी था। (iv) फ्रांसीसी सरकार का असहयोग- डूप्ले ने भारतीय राज्यों में अपने हस्तक्षेप की बात कम्पनी के डायेक्टरों से छिपाकर अपनी योजना उनके सामने स्पष्ट नहीं की। इस कारण उसको फ्रांसीसी सरकार से कोई सहायता नहीं मिल सकी बल्कि डायरेक्टर उसकी नीति को शंका की दृष्टि से देखने लगे। मजबूरन डूप्ले को अपनी ही अपर्याप्त शक्ति पर निर्भर रहना पड़ा। फ्रांस की तत्कालीन सरकार ने इन परिस्थितियों में अमेरिका में ही अपने उपनिवेश स्थापित करने की ओर ध्यान दिया भारत की ओर नहीं, क्योंकि भारत की स्थिति को डूप्ले ने छिपाए रखा। (v) फ्रांसीसी सरकार का अपने प्रतिनिधियों से दुर्व्यवहार- फ्रांसीसी सरकार अपने प्रतिनिधियों के प्रति समुचित स्नेह और आदर का व्यवहार नहीं करती थी। इससे उनका मनोबल टूट जाता था, जिससे वे कार्यों को आत्मिक भाव से न करके उसे सरकारी समझकर असावधानी बरतते थे। डूप्ले तथा लैली के प्रति दुर्व्यवहार किया गया था। डूप्ले को वापस बुला लिया गया तथा लैली को बाद में मृत्युदण्ड दिया गया। (vi) चाँदा साहब का पक्ष लेना- डूप्ले को एक भागे हुए तथा मराठों की कैद में वर्षों रहने वाले चाँदा साहब का पक्ष लेना उसकी अदूरदर्शिता थी। चाँदा साहब का कर्नाटक की राजनीति से सम्बन्ध विच्छेद हो चुका था और वहाँ उसका कोई प्रभाव नहीं था। डूप्ले को मुहम्मद अली का पक्ष लेना चाहिए था, जिसका कर्नाटक की जनता पर प्रभाव था और जिसे जनता द्वारा वास्तव में गद्दी का अधिकारी समझा जाता था। (vii) अति महत्वाकांक्षी होना- डूप्ले एक ही समय में हैदराबाद और कर्नाटक दोनों स्थानों पर हस्तक्षेप कर सफलता पाना चाहता था, जबकि फ्रांसीसी साधन दोनों स्थानों पर एक साथ सफलता प्राप्त करने के लिए अपर्याप्त थे। उसने अत्यधिक महत्वाकांक्षी होने के कारण दोनों स्थानों पर एक साथ हस्तक्षेप किया और दोनों ही स्थानों पर वह असफल रहा। |
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बंगाल में ब्रिटिश शासन की शुरुआत पर एक टिप्पणी कीजिए। |
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Answer» बंगाल में ब्रिटिश शासन की शुरुआत- प्लासी और बक्सर के युद्ध भारतीय इतिहास के निर्णायक युद्ध थे, जिसके परिणामस्वरूप बंगाल में ब्रिटिश राज्य की नींव पड़ी और भारतीय इतिहास में एक नए अध्याय का आरम्भ हुआ। बंगाल एक समृद्धिशाली प्रान्त था। उस समय यह मुगलों के अधीन था। व्यापारिक दृष्टिकोण से बंगाल काफी अग्रसर था। अंग्रेजों ने सन् 1651 ई० में अपनी प्रथम व्यापारिक कोठी हुगली में स्थापित की। उस समय वहाँ का सूबेदार शाहजहाँ का पुत्र शाहशुजा था। उसकी स्वीकृति के बाद उन्होंने अपनी कोठियों का विस्तार कासिम बाजार व पटना तक कर लिया। मुगल सम्राट फर्रुखसियार ने 1717 ई० में अंग्रेजों को अत्यधिक सुविधाएँ दीं। उसने उन पर लगे सभी व्यापारिक कर हटा दिए, जिसका अंग्रेजों ने पूर्णरूप से दुरुपयोग किया। उन्होंने कम्पनी के साथ स्वयं का व्यापार भी बिना कर दिए करना शुरू कर दिया। वस्तुत: भारत में अंग्रेजी राज का प्रभुत्व सर्वप्रथम बंगाल से ही शुरू हुआ। मुगलों द्वारा अंग्रेजों को दी गई छूट अन्ततः उन्हीं के साम्राज्य के पतन का कारण बन गई। औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुर्शिदकुली खाँ को बंगाल का सूबेदार बनाया गया। वह एक ईमानदार व योग्य व्यक्ति था। उसके काल के दौरान बंगाल उन्नति की ओर अग्रसर हुआ। उस समय बंगाल मुगल काल का सबसे समृद्धिशाली प्रान्त था। 1727 ई० में मुर्शिदकुली खाँ की मृत्यु हो गई और उसके दामाद शुजाउद्दीन मोहम्मद खान शुजाउद्दौला असदजंग को बंगाल व उड़ीसा का कार्यभार सौंप दिया गया। उसके काल में भी बंगाल ने काफी उन्नति की। शुजाउद्दौला की मृत्यु के उपरान्त 1739 ई० में उसके पुत्र सरफराज ने बंगाल, बिहार व उड़ीसा का राज्य सँभाला। उसने अलाउद्दौला हैदरजंग की उपाधि प्राप्त की। 1739 ई० में बिहार के नाजिम अलीवर्दी खाँ ने अलाउद्दौला की हत्या कर दी और बंगाल का सूबेदार बन बैठा। वह भी योग्य शासक था। उसके काल में मराठों ने बंगाल में छापे मारने शुरू कर दिए, जिससे मुक्ति पाने के लिए उसने मराठों से सन्धि कर ली। मराठों को उड़ीसा व 12 लाख रुपए उसने चौथ के रूप में दे दिए। तदुपरान्त बंगाल की आंतरिक स्थिति को सुधारकर वहाँ पर शान्ति स्थापित कर दी। अलीवर्दी खाँ के कोई पुत्र न था। अत: उसने अपनी सबसे छोटी पुत्री के पुत्र सिराजुद्दौला को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। राज्यारोहण के समय वह 25 वर्ष का अनुभवशून्य युवक था तथा हठी एवं आलसी होने के कारण उसकी कठिनाइयाँ और भी अधिक बढ़ गई थीं। सर शफात अहमद खाँ के अनुसार- ‘‘सिराजुद्दौला अदूरदर्शी, हठी और दृढ़ था। उसको वृद्ध अलीवर्दी खाँ के लाड़-प्यार ने बिलकुल बिगाड़ दिया था। गद्दी पर बैठने पर भी उसमें कोई सुधार न हुआ। वह झूठा था, कायर था, नीच और कृतघ्न था। उसमें अपने पूर्वजों के कोई गुण न थे और अपने जो गुण थे उनको प्रयोग में लाने की शक्ति उसमें नहीं थी। वह भी अंग्रेजों की कुटिल नीति का उसी तरह शिकार बना जिस तरह दक्षिण के नवाब तथा कुछ अन्य राजा बने थे। |
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बक्सर के युद्ध का वर्णन कीजिए तथा उसके परिणामों की विवेचना कीजिए। |
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Answer» बक्सर का युद्ध ( 22 अक्टूबर, 1764 ई० )- अंग्रेजों ने अपदस्थ मीरकासिम के स्थान पर मीरजाफर को पुनः बंगाल का नवाब बना दिया। अंग्रेजों के इस रवैये से असन्तुष्ट होकर मीरकासिम ने मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय एवं नवाब शुजाउद्दौला से मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध एक शक्तिशाली संघ का निर्माण किया। इनकी संयुक्त सेना में 40-50 हजार सैनिक थे। कम्पनी की सेना में 7027 सैनिक थे और उसका नेतृत्व मेजर मुनरो कर रहा था। इतिहास प्रसिद्ध यह लड़ाई बक्सर नामक स्थान पर 22 अक्टूबर, 1764 को हुई। इस युद्ध में अंग्रेज विजयी हुए। पराजित मीरकासिम भाग गया। शाहआलम ने अंग्रेजों की शरण ली। इस युद्ध में अंग्रेजों के 847 सैनिक मरे या हताहत हुए, जबकि तीनों की संयुक्त सेना के लगभग 2000 सैनिक मरे या हताहत हुए। परिणामस्वरूप पराजित मीरकासिम इलाहाबाद पहुँचा। वह 12 वर्षों तक भटकता रहा, अन्ततः 1777 ई० में दिल्ली के निकट उसकी मृत्यु हो गई। बक्सर के युद्ध के कारण- मीरकासिम और अंग्रेजों के मध्य बक्सर युद्ध के निम्नलिखित कारण थे (i) अंग्रेजों की बेईमानी- यद्यपि मीरकासिम ने कम्पनी को यह आज्ञा दी थी कि कलकत्ता (कोलकाता) में ढाली गई मुद्राएँ तौल और धातु में नवाब की मुद्राओं के समान हों परन्तु कम्पनी घटिया मुद्राएँ ढालती रही तथा जब व्यापारियों ने उन मुद्राओं को लेने से इनकार किया तो कम्पनी की प्रार्थना पर नवाब ने व्यापारियों को दण्ड दिया। फलस्वरूप व्यापारी वर्ग भी कासिम से असन्तुष्ट हो गया। (ii) कम्पनी का असंयत व्यवहार- मीरकासिम की इतनी ईमानदारी के व्यवहार से भी कम्पनी सन्तुष्ट नहीं थी क्योंकि वह तो नवाब को कठपुतली के समान नचाना चाहती थी। परन्तु मीरजाफर के विपरीत मीरकासिम स्वतन्त्र प्रकृति का व्यक्ति था, वह अंग्रेजों के प्रभाव से मुक्त होना चाहता था। (iii) राजधानी परिवर्तन- जब मीरकासिम ने देखा कि मुर्शिदाबाद में अंग्रेजों का प्रभाव इतना बढ़ गया है कि वह उनके चंगुल से मुक्त नहीं हो सकता तो उसने अपनी राजधानी मुंगेर बदल ली, यद्यपि इस राजधानी परिवर्तन से अनेक अंग्रेज मीरकासिम से असन्तुष्ट हो गए तथा उसे पदच्युत करने का षड्यन्त्र रचने लगे। (iv) मीरजाफर से अंग्रेजों का समझौता- अंग्रेजों ने पुन: मीरजाफर को गद्दी पर बैठाने का निश्चय किया। मीरजाफर से गुप्त सन्धि की गई जिसके द्वारा मीरकासिम द्वारा दी गई सभी सुविधाएँ कायम रखी गईं परन्तु नवाब की सैनिक संख्या कम कर दी गई। कम्पनी की नमक के अतिरिक्त सभी वस्तुओं पर चुंगी माफ कर दी गई तथा भारतीयों के लिए 25 प्रतिशत चुंगी लगाने का निश्चय किया गया। इसके अतिरिक्त क्षति पूर्ति के लिए भी मीरजाफर ने वचन दिया। (v) दस्तक प्रथा का दुरुपयोग- इस समय तक मीरकासिम तथा अंग्रेजों के सम्बन्ध बिलकुल बिगड़ चुके थे। इसका कारण व्यापार से सम्बन्धित था। मुगल सम्राट द्वारा दी गई व्यापारिक सुविधाओं का अंग्रेज दुरुपयोग कर रहे थे। दस्तक लेकर सम्पूर्ण देश में अंग्रेज व्यापारी बिना चुंगी दिए व्यापार कर रहे थे तथा अनेक ऐसी वस्तुओं का व्यापार उन्होंने आरम्भ कर दिया था, जिसके लिए उन्हें आज्ञा प्राप्त नहीं थी। (vi) भारतीयों के साथ अंग्रेजों का व्यवहार- भारतीय व्यापारियों के प्रति उनका व्यवहार अभद्रतापूर्ण था। उनसे बलपूर्वक माल खरीद लिया जाता था तथा उनसे माल पर चुंगी वसूल की जाती थी। कम्पनी मनमाने मूल्य पर कृषकों की खड़ी फसल तथा व्यापारियों का माल खरीद लेती थी, जिसके कारण भारतीय जनता बहुत दु:खी थी। मीरकासिम ने इस विषय पर कम्पनी को अनेक पत्र लिखे परन्तु उसे कोई उत्तर नहीं मिला। बक्सर के युद्ध के परिणाम- राजनीतिक दृष्टि से बक्सर का युद्ध प्लासी से अधिक महत्वपूर्ण और निर्णायक था और इसके दूरगामी परिणाम हुए (i) सैनिक महत्व- बक्सर के युद्ध ने प्लासी के युद्ध के द्वारा आरम्भ किए गए कार्य को पूर्ण किया। प्लासी के युद्ध में तो युद्ध का अभिनय-मात्र हुआ था तथा अंग्रेजों को विजय सैनिक योग्यता के कारण नहीं बल्कि कूटनीति के कारण मिली थी, परन्तु बक्सर युद्ध ने यह निश्चित कर दिया कि अंग्रेज युद्ध में भी सफलता प्राप्त कर सकते हैं। (ii) अंग्रेजों को दीवानी अधिकार- इस युद्ध के द्वारा बंगाल तथा बिहार अंग्रेजों के पूर्ण नियन्त्रण में आ गए तथा सम्राट शाहआलम द्वितीय ने बंगाल व (iii) कम्पनी की राजनीतिक प्रतिष्ठा- अवध भी कम्पनी के प्रभाव में आ गया। इस विजय से कम्पनी का राजनीतिक महत्व स्थापित हो गया। अब वह मात्र व्यापारिक संस्था ही नहीं थी अपितु शासनकर्ता के रूप में उभरी। (iv) मीरजाफर का पुनः नवाब बनना- बक्सर के युद्ध में विजय प्राप्त करके अंग्रेजों ने पुन: वृद्ध मीरजाफर को बंगाल का नवाब बना दिया। मीरजाफर ने अंग्रेजों को बिना चुंगी दिए तथा भारतीयों को 25 प्रतिशत चुंगी पर व्यापार की पुन: व्यवस्था कर दी। उसकी सेना 6 हजार सवार और 12 हजार पैदल निश्चित कर दी गई। युद्ध की क्षतिपूर्ति के रूप में नवाब ने काफी धन कम्पनी को दिया तथा एक ब्रिटिश रेजीडेण्ट भी अपने दरबार में रखना स्वीकार कर लिया। नवाब को कठपुतली बनाकर अंग्रेजों ने बंगाल की धन-सम्पदा को लूटना जारी रखा। मीरजाफर का कोष रिक्त था तथा वह असहाय नवाब अंग्रेजों के चंगुल में पूर्णतया फँसा हुआ था। उसका अन्तिम समय अत्यन्त दु:खपूर्ण था। अन्त में 5 जनवरी, 1765 ई० को मृत्यु ने ही उसे इन संकटों से मुक्त किया। |
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अंग्रेजों के विरुद्ध फ्रांसीसियों की पराजय के किन्हीं पाँच कारणों का वर्णन कीजिए। |
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Answer» अंग्रेजों के विरुद्ध फ्रांसीसियों की पराजय के पाँच कारण निम्नलिखित हैं ⦁ अंग्रेजी कंपनी का व्यापारिक तथा आर्थिक दृष्टि से श्रेष्ठ होना। |
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अंग्रेज तथा फ्रांसीसियों के मध्य हुए संघर्ष का वर्णन कीजिए। |
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Answer» भारतीय व्यापार की प्रतिद्वन्द्विता एवं उपनिवेश स्थापना का प्रयास तथा भारत में राजनीतिक प्रभुत्व स्थापना के प्रश्न पर अंग्रेजों और फ्रांसीसियों में संघर्ष हो गया। 16वीं तथा 17वीं शताब्दियों में जब मुगलों का चरम उत्कर्ष का काल था तथा केन्द्रीय शक्ति सुदृढ़ थी, यूरोप के व्यापारी विभिन्न छोटे तथा बड़े भारतीय शासकों के दरबारों में प्रार्थी के रूप में आते थे परन्तु अनुकूल परिस्थितियों में उनकी व्यावसायिक प्रवृत्ति धीरे-धीरे साम्राज्यवादी मनोवृत्ति में बदल गई। औरंगजेब की मृत्यु के कुछ समय उपरान्त ही मुगल साम्राज्य, केन्द्र में होने वाले राजमहलों के षड्यन्त्रों तथा अपने सूबेदारों की स्वार्थपूर्ण देशद्रोहिता के कारण पतनोत्मुख हो चला था। इसके अतिरिक्त 1739 ई० में नादिरशाह तथा 1761 ई० में अहमदशाह अब्दाली के भयंकर आक्रमणों ने दिल्ली के शाही दरबार की दुर्बलता सबके सामने स्पष्ट कर दी। पेशवाओं के नेतृत्व में मराठे अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहे थे जिससे देश की शिथिल केन्द्रीय व्यवस्था नष्ट होने के निकट पहुँच गई थी। (i) व्यापारिक एकाधिकार की स्थापना का प्रयास- फ्रांसीसी तथा अंग्रेज दोनों ही प्रारम्भ में व्यापारिक एकाधिकार स्थापित करने में संलग्न थे। दक्षिण भारत में दोनों विदेशी जातियों ने अपनी-अपनी बस्तियाँ स्थापित कर ली थीं। अत: अंग्रेज तथा फ्रांसीसी संघर्ष अनिवार्य हो गया। दोनों ही राष्ट्रों ने पूर्व में आक्रामक नीति का अनुसरण किया। प्रारम्भ में इन्होंने आत्मरक्षा की भावना से प्रेरित होकर सेना का निर्माण किया और किलेबन्दी भी की। फिर भारतीय राजाओं और नबाबों के पारस्परिक झगड़ों में हस्तक्षेप किया तथा अपने हित की पूर्ति के लिए अपनी सेना से उनकी सहायता करने लगे। इन संघर्षों में फ्रांसीसी यदि एक ओर होते थे तो अंग्रेज ठीक उसके विपक्षी की ओर। इस प्रकार वे दोनों आपस में लड़ने लगते थे और अपनी-अपनी शक्ति एवं क्षमता का प्रदर्शन करते थे। (ii) डूप्ले की महत्वाकांक्षा- भारतीय राजनीति में प्रथम राजनीतिक हस्तक्षेप का श्रीगणेश फ्रांसीसियों के गवर्नर डूप्ले ने किया। डूप्ले फ्रांसीसी गवर्नरों में सर्वाधिक साम्राज्यवादी एवं महत्वाकांक्षी था। उसने भारत में फ्रांसीसी व्यापार को उन्नत करने के लिए देशी राजाओं की राजनीति में हस्तक्षेप करना और उन्हें अपने प्रभाव में लाना आवश्यक समझा। अंग्रेज डूप्ले की इस नीति को सहन न कर सके और वे भी भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप करने लगे। परिणामस्वरूप दोनों शक्तियों के बीच संघर्ष हुआ। (iii) यूरोप में ऑस्ट्रिया का उत्तराधिकार युद्ध-1742 ई० में यूरोप में अंग्रेज और फ्रांसीसी परस्पर संघर्षरत थे। दोनों के बीच संघर्ष का मुख्य कारण 1740 ई० में ऑस्ट्रिया और प्रशा के मध्य युद्ध का होना था। इस युद्ध में अंग्रेज ऑस्ट्रिया की ओर तथा फ्रांसीसी प्रशा की ओर थे। यूरोप में हुए दोनों के बीच संघर्ष का प्रभाव भारत में भी पड़ा, जिससे भारत में दोनों के बीच संघर्ष हुआ।। (iv) भारत की राजनीतिक दशा- औरंगजेब के पतन के पश्चात् भारत में अनेक नवीन राज्य एवं शक्तियों का उदय हुआ। इनमें से कोई भी राज्य अथवा शक्ति ऐसी न थी, जो सम्पूर्ण भारत पर अपना नियन्त्रण कायम रखने में सक्षम हो। अत: ऐसी स्थिति में अंग्रेज और फ्रांसीसी दोनों को ही व्यापार के साथ-साथ भारत में अपनी राजनीतिक स्थिति सुदृढ़ करने का अवसर प्राप्त हुआ। (v) उत्तराधिकार के संघर्ष में कम्पनी की भागीदारी- हैदराबाद के निजाम-उल-हक की मृत्यु के पश्चात् उत्तराधिकार हेतु नासिरजंग और मुजफ्फरजंग के मध्य संघर्ष हुआ। इस संघर्ष में व्यापारिक लाभ की कामना से अंग्रेजों ने नासिरजंग और फ्रांसीसियों ने मुजफ्फरजंग का साथ दिया। अत: कहा जा सकता है कि उत्तराधिकार के संघर्ष में दोनों कम्पनियों का भाग लेना दोनों के बीच संघर्ष का मुख्य कारण था। |
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अंग्रेजों एवं फ्रांसीसियों के बीच लड़े गये युद्धों को किस नाम से जाना जाता है ? |
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Answer» अंग्रेजों तथा फ्रांसीसियों के मध्य लड़े गये युद्धों को ‘कर्नाटक युद्ध’ के नाम से जाना जाता है। |
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फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना कहाँ हुई थी? |
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Answer» 1801 में कोलकाता में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थान हुई थी। |
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बंगाल में दोहरी शासन व्यवस्था किसने शुरू की? |
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Answer» बंगाल पर नियंत्रण होने के बाद क्लाइव ने बंगाल में दोहरी शासन व्यवस्था शूरू की। |
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क्लाइवे पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। |
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Answer» रॉबर्ट क्लाइव अंग्रेजी सेना में एक मामूली सैनिक था। अपनी योग्यता के बल पर वह अंग्रेजी सेना का सेनापति बन गया। वह एक सफल कूटनीतिज्ञ भी था। कर्नाटक के तीनों युद्धों में उसने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी तथा अंग्रेजों को विजय दिलाकर फ्रांसीसियों के प्रभाव को क्षीण कर दिया। इससे समस्त दक्षिण भारत पर अंग्रेजों का प्रभुत्व कायम हो गया। सन् 1757 ई० में प्लासी के युद्ध में विजय प्राप्त करके बंगाल में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव डाली। बक्सर के युद्ध (1764 ई०) के बाद बंगाल में अंग्रेजों की राजनीतिक सत्ता स्थापित करने में भी क्लाइव का ही हाथ था। |
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अंग्रेजों एवं बंगाल के नवाब के बीच टकराव के क्या कारण थे ? संक्षेप में लिखिए। |
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Answer» ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला के बीच टकराव के निम्नलिखित कारण थे – 1. बंगाल का नवाब सिराजुद्दौला एक शक्तिशाली शासक था। उसकी शक्ति से अंग्रेज घबरा रहे थे और वह सिराजुद्दौला के स्थान पर किसी अन्य व्यक्ति को बंगाल का नवाब बनाना चाहते थे। 2. अंग्रेजों को नवाब सिराजुद्दौला से भरपूर व्यापारिक सुविधाएँ नहीं मिल पा रही थीं, क्योंकि नवाब अंग्रेजों को किसी प्रकार की रियायत देने के पक्ष में नहीं था। इसलिए अंग्रेज एक ऐसे व्यक्ति को बंगाल का नवाब बनाना चाहते थे जो उन्हें अधिक-से-अधिक व्यापारिक सुविधाएँ एवं रियायतें दे सके। 3. सिराजुद्दौला ने कम्पनी को किलेबन्दी रोकने तथा बकाया राजस्व चुकाने का आदेश दिया। कम्पनी के ऐसा न करने पर नवाब ने कलकत्ता (कोलकाता) स्थित कम्पनी के किले पर कब्जा कर लिया। |
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डूप्ले की उपलब्धियों का वर्णन कीजिए। |
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Answer» डूप्ले एक महत्त्वाकांक्षी, योग्य तथा कूटनीतिक व्यक्ति था, जिसे फ्रांसीसी सरकार ने भारत में पॉण्डिचेरी (पुदुचेरी) का गवर्नर नियुक्त किया था। उसने स्थानीय भारतीय सैनिकों को अपनी सेना में नियुक्त करके उन्हें आधुनिक युद्ध रणनीति एवं प्रणाली में प्रशिक्षण देना आरम्भ कर दिया। इस सेना की सहायता से डूप्ले ने अपने चिर प्रतिद्वन्द्वी इंग्लैण्ड तथा स्थानीय शासकों के विरुद्ध संघर्ष किये। किन्तु फ्रांसीसी कम्पनी की आर्थिक दशा अच्छी न होने के कारण डुप्ले ने मॉरीशस के फ्रेंच गवर्नर से सहायता प्राप्त करके मद्रास (चेन्नई) पर घेरा डाल दिया तथा प्रथम कर्नाटक युद्ध के दौरान 1746 ई० में मद्रास पर अधिकार कर लिया। अंग्रेजों ने जब पॉण्डिचेरी (पुदुचेरी) पर कब्जा करने का प्रयत्न किया तो डूप्ले ने सफलतापूर्वक इसकी रक्षा की। द्वितीय कर्नाटक युद्ध के दौरान डूप्ले ने हैदराबाद के निजाम की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार के युद्ध में मुजफ्फरजंग का साथ दिया, फिर चॉदा साहब से मिलकर 1749 ई० में अनवरुद्दीन को हराकर चाँदा साहब को कर्नाटक का नवाब बनाया, जिसने फ्रांसीसियों को पॉण्डिचेरी (पुदुचेरी) के निकट 80 गाँव जागीर के रूप में उपहारस्वरूप प्रदान किये। उधर, मुजफ्फरजंग (हैदराबाद के निजाम) ने भी फ्रांसीसियों को पर्याप्त उपहार दिये। डूप्ले की सफल कूटनीति के कारण ही दक्षिण भारत में फ्रांसीसियों के पैर जम सके, किन्तु जब फ्रांसीसी शक्ति भारत में अपने शिखर पर थी, तभी डूप्ले को यूरोप वापस बुला लिया गया। |
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लाइव की दो उपलब्धियों का उल्लेख कीजिए। |
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Answer» क्लाइव की दो उपलब्धियाँ थीं 1. तृतीय कर्नाटक युद्ध में फ्रांसीसियों के विरुद्ध विजय। 2. प्लासी-युद्ध में विजय के साथ. बंगाल में अंग्रेजों की सत्ता की नींव डालना। |
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भारत में डच व्यापारी एकाधिकार स्थापित करने में क्यों असफल रहे ? |
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Answer» सन् 1595 ई० में डच व्यापारी हाउटमैन ने भारत में प्रवेश किया और दो वर्षों बाद वह बहुत-सा माल लेकर हॉलैण्ड वापस पहुँचा। उसकी यात्रा ने डचों के लिए भारत से व्यापार करने का मार्ग खोल दिया। सन् 1602 ई० में डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना हुई, जिसका मुख्य उद्देश्य व्यापार करना था। इस कम्पनी ने पहले मसाले के द्वीपों पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया, फिर भारत में पुर्तगालियों को हराकर सूरत, चिनसुरा, कासिम बाजार, नेगापट्टम, कालीकट आदि स्थानों पर अपनी बस्तियाँ स्थापित कीं। अन्त में 1759 ई० में अंग्रेजों ने डचों को पराजित कर भारत में डच शासन का अन्त कर दिया। डच लोग भारत में अपना प्रभुत्व स्थापित न कर सके, क्योंकि अंग्रेज या फ्रेंच कम्पनी की भाँति उनके पास कोई सेना या यूरोप की डचे सरकार का समर्थन न था। |
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प्लासी के युद्ध में निम्नलिखित में से किसकी पराजय हुई थी?(क) लॉर्ड क्लाइव(ख) सिराजुद्दौला(ग) मीरजाफर(घ) मीरकासिम |
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Answer» सही विकल्प है (ख) सिराजुद्दौला |
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यूरोपीय कम्पनियों के भारत आने के क्या कारण थे ? |
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Answer» भारत की समृद्धि की चर्चाओं से प्रेरित होकर व्यापार के उद्देश्य से अनेक यूरोपीय व्यापारी पन्द्रहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दी के मध्य भारत आये। उनके भारत आगमन का देश के भावी इतिहास पर गहरा प्रभाव पड़ा। इनमें पुर्तगाली, अंग्रेज, डच, डेनिश एवं फ्रांसीसी जातियाँ मुख्य थीं। इनके भारत-आगमन के मुख्य कारण निम्नवत् थे – 1. भारत आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न देश था। यहाँ की आर्थिक सम्पन्नता ने यूरोपीय व्यापारियों को आकर्षित किया। 2. यूरोपीय बाजार में भारतीय मसालों की प्रचुर मात्रा में माँग थी। यहाँ के मसाले यूरोप में अधिकाधिक मात्रा में बिकते थे। 3. वेनिस और जेनेवा के व्यापारियों ने यूरोप व एशिया के व्यापार पर अपना अधिकार कर लिया था। वे स्पेन व पुर्तगाली व्यापारियों को हिस्सा देने के लिए तैयार न थे। 4. वास्कोडिगामा द्वारा भारत आने का सुगम जलमार्ग खोज लेना यूरोपीय व्यापारियों के लिए लाभकर रहा। 5. भारत में निर्मित मिट्टी के बर्तनों की यूरोपीय देशों में व्यापक माँग थी। 6. भारत में कुटीर उद्योग एवं कच्चे माल की अत्यधिक सम्भावना व्याप्त थी। |
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