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This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.

1.

लेखक के न कहने पर भी ऑटोवाला उनका इन्तजार क्यों करने लगा?

Answer»

लेखक के न कहने पर भी ऑटोवाला उनका इंतजार करता रहा, क्योंकि वह उन्हें होटल तक भी पहुंचाना चाहता था।

2.

निम्नलिखित विधान किसने किससे और क्यों कहा?भाई हर क्षेत्र में कोई न कोई मसीहा दिखाई पड़ ही जाता है।

Answer»

यह विधान लेखक ने मोहन से कहा है, क्योंकि थानेदार ने लड़की की शादी कराने में मदद की थी।

3.

मोहनने ज्यादा पैसे लेने से क्यों इन्कार किया?

Answer»

मोहन ने ज्यादा पैसे लेने से इन्कार किया, क्योंकि लेखकदंपती से मिला प्रेम उसके लिए पैसों से बढ़कर था।

4.

मोहन की पारिवारिक स्थिति क्या थी?

Answer»

मोहन का घर आगरा में था। माँ-बाप के गुजर जाने के बाद बड़े भाई ने उसकी परवरिश की थी। बड़ा भाई वकील था और शादीशुदा था। मोहन बी.ए. पास करने के बाद नौकरी खोज रहा था।

5.

 निम्नलिखित मुहावरों का वाक्य में प्रयोग कीजिए :1. पाला पड़ना2. असमंजस में पड़ना3. दामन थाम लेना

Answer»

पाला पड़ना-संबंध जुड़ना
वाक्य : मुझे पता नहीं था कि तुम जैसे लोगों से मेरा पाला पड़ेगा।

असमंजस में पड़ना – उलझन में पड़ जाना, निर्णय न कर पाना
वाक्य : आप कहां इलाज कराएंगे, ऐसा पूछने पर पिताजी असमंजस में पड़ गए।

दामन थाम लेना-आश्रय लेना
वाक्य : बड़े भाई का दामन थामकर वह शहर में रहने लगा।

6.

निम्नलिखित विधान किसने किससे और क्यों कहा?मुझे इतना पराया न कीजिए, बाबूजी?

Answer»

यह विधान मोहन ने बाबूजी से कहा है, क्योंकि वे मोहन को आग्रह कर पारिश्रमिक दे रहे थे।

7.

बात करते हुए मोहन रुक गया और चुप्पी सी छा गई, क्योंकि…(अ) कोई अवांछित घटना घटी थी।(ब) नौकरी की तलाश में उसे आगरा से भटकते हुए ग्वालियर आना पड़ा।(क) इसे एक लड़की मिल गई।

Answer»

बात करते हुए मोहन रुक गया और चुप्पी-सी छा गई, क्योंकि कोई अवांछित घटना घटी थी।

8.

घंटे भर तक अपना इंतजार करनेवाले ऑटोवाले के बारे में लेखक ने क्या महसूस किया?

Answer»

घंटे भर तक अपना इंतजार करनेवाले ऑटोवाले के बारे में लेखक ने महसूस किया कि, यह ऑटोवाला अन्य ऑटोवाले की अपेक्षा कुछ और है। लेखक को लगा जैसे वह उसके अंदर घर कर गया है।

9.

लेखक ने ऑटोवाले की बात को स्वीकृति क्यों दी?

Answer»

लेखक ने ऑटोवाले की जिद और आवाज में एक प्रकार का आकर्षण महसूस किया। उससे प्रभावित होकर उन्होंने उसके रिक्षा में बैठने की स्वीकृति दी।

10.

मोहनने ज्यादा पैसे लेने से इन्कार कर दिया, क्योंकि…(अ) मोहन चाहता था कि उसे इतना पराया न समजा जाय।(ब) वह परिश्रम से ज्यादा पैसे लेने के पक्ष में नहीं था।(क) वह चाहता था कि लेखक दूबारा ग्वालियर आए तो उसके ही आंदों का उपयोग करें।

Answer»

मोहन ने ज्यादा पैसे लेने से इन्कार कर दिया, क्योंकि मोहन चाहता था कि उसे इतना पराया न समझा जाय।

11.

ऑटोवाले ने लेखक को नई जगह पर पहुँचा दिया, क्योंकि…(अ) लेखक को दूसरी जगह घूमने जाना था।(ब) वहाँ डॉक्टर हाजिर नहीं था।(क) डॉक्टर ने क्लीनिक की जगह बदल दी थी।

Answer»

ऑटोवाले ने लेखक को नई जगह पर पहुंचा दिया, क्योंकि डॉक्टर ने क्लिनिक की जगह बदल दी थी।

12.

गुजराल सिद्धान्त क्या है?

Answer»

गुजराल सिद्धान्त-भारत के पूर्व प्रधानमन्त्री इन्द्रकुमार गुजराल की विदेश नीति सम्बन्धी अवधारणा को गुजराल सिद्धान्त कहा जाता है। यह सिद्धान्त भारत के दक्षिण एशिया के छोटे पड़ोसी देशों पर ध्यान केन्द्रित करता है। यह उनसे अच्छे पड़ोसी बनने पर जोर देता है। इस सिद्धान्त की प्रमुख बातें निम्नलिखित हैं-

⦁    भारत के आकार और क्षमता की असमानताओं की प्रभुत्वकारी प्रवृनियों में प्रकट नहीं होने देता।
⦁    एकतरफा दोस्ताना रियायतें देना।
⦁    पड़ोसी देशों की माँगों तथा चिन्ताओं के प्रति संवेदनशील होना।
⦁    सन्देह तथा विवाद पैदा करने वाली पहलकदमियों से बचना।
⦁    विवादास्पद मुद्दों पर शान्त, लचीली नीति का अनुसरण करना।
⦁    पारस्परिक व्यापार में वृद्धि करना।

13.

निम्नलिखित अवतरण को पढ़ें और इसके आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए-गुटनिरपेक्षता का व्यापक अर्थ है अपने को किसी भी सैन्य गुट में शामिल नहीं करना…. इसका अर्थ होता है चीजों को यथासम्भव सैन्य दृष्टिकोण से नदेखना और इसकी कभी जरूरत आन पड़े तब भी किसी सैन्य गुट के नजरिए को अपनाने की जगह स्वतन्त्र रूप से स्थिति पर विचार करना तथा सभी देशों के साथ दोस्ताना रिश्ते कायम करना। -जवाहरलाल नेहरू(क) नेहरू सैन्य गुटों से दूरी क्यों बनाना चाहते थे।(ख) क्या आप मानते हैं कि भारत-सोवियत मैत्री की सन्धि से गुटनिरपेक्षता के सिद्धान्तों का उल्लंघन हुआ? अपने उत्तर के समर्थन में तर्क दीजिए।(ग) अगर सैन्य-गुट न होते तो क्या गुटनिरपेक्षता की नीति बेमानी होती?

Answer»

(क) नेहरू सैन्य गुटों से दूरी बनाना चाहते थे क्योंकि वे किसी भी सैन्य गुट में शामिल न होकर एक स्वतन्त्र विदेश नीति का संचालन करना चाहते थे।
(ख) भारत-सोवियत मैत्री सन्धि से गुटनिरपेक्षता के सिद्धान्तों का उल्लंघन नहीं हुआ क्योंकि इस सन्धि के पश्चात् भी भारत गुटनिरपेक्षता के मौलिक सिद्धान्तों पर कायम रहा तथा जब सोवियत संघ की सेनाएँ अफगानिस्तान में पहुँची तो भारत ने इसकी आलोचना की।
(ग) यदि विश्व में सैन्य गुट नहीं होते तो भी गुटनिरपेक्षता की प्रासंगिकता बनी रहती क्योंकि गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की स्थापना शान्ति एवं विकास के लिए की गई थी तथा शान्ति एवं विकास के लिए चलाया गया कोई भी आन्दोलन कभी भी अप्रासंगिक नहीं हो सकता।

14.

ताशकन्द समझौता कब हुआ? इसके प्रमुख प्रावधान लिखिए। 

Answer»

ताशकन्द समझौता-23 सितम्बर, 1965 को भारत-पाक में युद्ध विराम होने के बाद सोवियत संघ के तत्कालीन प्रधानमन्त्री कोसीगिन ने पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान एवं भारत के तत्कालीन प्रधानमन्त्री लालबहादुर शास्त्री को वार्ता के लिए ताशकन्द आमन्त्रित किया और 10 जनवरी, 1966 को ताशकन्द समझौता सम्पन्न हुआ। इस समझौते के प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित थे-

⦁    भारत एवं पाकिस्तान अच्छे पड़ोसियों की भाँति सम्बन्ध स्थापित करेंगे और विवादों को शान्तिपूर्ण ढंग से सुलझाएँगे।
⦁    दोनों देश के सैनिक युद्ध से पूर्व की ही स्थिति में चले जाएँगे। दोनों युद्ध-विराम की शर्तों का पालन करेंगे।
⦁    दोनों एक-दूसरे के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे।
⦁    दोनों राजनीतिक सम्बन्धों को पुन: सामान्य रूप से स्थापित करेंगे।
⦁    दोनों आर्थिक एवं व्यापारिक सम्बन्धों को पुन: सामान्य रूप से स्थापित करेंगे।
⦁    दोनों देश सन्धि की शर्तों का पालन करने के लिए सर्वोच्च स्तर पर आपस में मिलते रहेंगे।

15.

किसी राष्ट्र का राजनीतिक नेतृत्व किस तरह उस राष्ट्र की विदेश नीति पर असर डालता है? भारत की विदेश नीति के उदाहरण देते हुए इस प्रश्न पर विचार कीजिए।

Answer»

किसी भी देश की विदेश नीति के निर्धारण में उस देश के राजनीतिक नेतृत्व की विशेष भूमिका होती है। उदाहरण के लिए, भारत की विदेश नीति पर इसके महान् नेताओं के व्यक्तित्व का व्यापक प्रभाव पड़ा।

पण्डित नेहरू के विचारों से भारत की विदेश नीति पर्याप्त प्रभावित हुई। पण्डित नेहरू साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद व फासिस्टवाद के घोर विरोधी थे और वे समस्याओं का समाधान करने के लिए शान्तिपूर्ण मार्ग के समर्थक थे। वह मैत्री, सहयोग व सह-अस्तित्व के प्रबल समर्थक थे। साथ ही अन्याय का विरोध करने के लिए शक्ति प्रयोग के समर्थक थे। पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने अपने विचारों द्वारा भारत की विदेश नीति के ढाँचे को ढाला।

इसी प्रकार श्रीमती इन्दिरा गांधी, राजीव गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व व व्यक्तित्व की भी भारत की विदेश नीति पर स्पष्ट छाप दिखाई देती है। श्रीमती इन्दिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया, गरीबी हटाओ का नारा दिया और रूस के साथ दीर्घ अनाक्रमण सन्धि की।
राजीव गांधी के काल में चीन, पाकिस्तान सहित अनेक देशों से सम्बन्ध सुधारने के प्रयास किए गए तथा श्रीलंका के देशद्रोहियों को दबाने में वहाँ की सरकार को सहायता देकर यह बताया कि भारत छोटे देशों की अखण्डता का सम्मान करता है।

इसी तरह अटल बिहारी वाजपेयी की विदेश नीति नेहरू जी की विदेश नीति से अलग न होकर लोगों को अधिक अच्छी लगी क्योंकि देश में परमाणु शक्ति का विकास हुआ। उन्होंने जय जवान, जय किसान और जय विज्ञान का नारा दिया।

16.

चौथे अध्याय में एक बार फिर से जवाहरलाल नेहरू। क्या वे कोई सुपरमैन थे, या उनकी भूमिका महिमा-मण्डित कर दी गई है?

Answer»

जवाहरलाल नेहरू वास्तव में एक सुपरमैन की भूमिका में ही थे। उन्होंने न केवल भारत के स्वाधीनता आन्दोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी बल्कि स्वतन्त्रता के बाद भी उन्होंने राष्ट्रीय एजेण्डा तय करने में निर्णायक भूमिका निभायी। नेहरू जी प्रधानमन्त्री के साथ-साथ विदेशमन्त्री भी थे। उन्होंने भारत की विदेश नीति की रचना और उसके क्रियान्वयन में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। नेहरू जी की विदेश नीति के तीन बड़े उद्देश्य थे-

⦁    कठिन संघर्ष से प्राप्त सम्प्रभुता को बनाए रखना,
⦁    क्षेत्रीय अखण्डता को बनाए रखना, तथा
⦁    तेज रफ्तार से आर्थिक विकास करना। नेहरू जी इन उद्देश्यों को गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाकर हासिल करना चाहते थे।

इसके अलावा पण्डित नेहरू द्वारा अपनायी गई राष्ट्रवाद, अन्तर्राष्ट्रीयवाद व पंचशील की अवधारणा आज . भी भारतीय विदेश नीति के आधार स्तम्भ माने जाते हैं।

17.

भारत और चीन के मध्य तनाव के कोई दो कारण बताइए।

Answer»

⦁    भारत और चीन में महत्त्वपूर्ण विवाद सीमा का विवाद है। चीन ने भारत की भूमि पर कब्जा कर रखा है।
⦁    चीन का तिब्बत पर कब्जा और भारत द्वारा दलाई लामा को राजनीतिक शरण देना।

18.

भारतीय विदेश नीति की प्रमुख विशेषता है-(a) पंचशील(b) सैन्य गुट(c) गुटबन्दी(d) उदासीनता।

Answer»

सही विकल्प है (a) पंचशील।

19.

सन् 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के क्या कारण थे?

Answer»

सन् 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे-

⦁    सन् 1962 में चीन से हार जाने से पाकिस्तान ने भारत को कमजोर माना।
⦁    सन् 1964 में नेहरू की मृत्यु के बाद नए नेतृत्व को पाकिस्तान ने कमजोर माना।
⦁    पाकिस्तान में सत्ता प्राप्ति की राजनीति।
⦁    1963-64 में कश्मीर में मुस्लिम विरोधी गतिविधियाँ पाकिस्तान की विजय में सहायक होंगी।

20.

गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के प्रणेता हैं-(a) पं० नेहरू(b) नासिर(c) मार्शल टीटो(d) उपर्युक्त सभी।

Answer»

सही विकल्प है (d) उपर्युक्त सभी।

21.

सहायक संधि क्या थी?

Answer»

सहायक संधि के अंतर्गत देशी राजाओं पर यह दबाव डाला गया कि वे अंग्रेजों के संरक्षण में आ जाएँ और उसके बदले में अंग्रेजी राज्य उनकी आंतरिक सुरक्षा एवं वाह्य शक्तियों से रक्षा करने का उत्तरदायित् अपने ऊपर लेगा।

22.

पानीपत के तृतीय युद्ध में मराठा संघ को पराजित किया-(क) अहमदशाह अब्दाली ने(ख) नादिरशाह ने(ग) शाहशुजा ने(घ) जमाल खाँ ने

Answer»

सही विकल्प है (क) अहमदशाह अब्दाली ने

23.

टीपू सुल्तान ने श्री रंग पट्ट्टम की संधि किस सन् में की?

Answer»

टीपू सुल्तान ने श्री रंग पट्टम की संधि सन् 1792 में की थी।

24.

प्रथम आंग्ल मैसूर युद्ध किसके बीच हुआ?

Answer»

प्रथम आंग्ल मैसूर युद्ध हैदरअली और अंग्रेजों के बीच हुआ।

25.

1996 में आणविक निःशस्त्रीकरण के क्षेत्र में कौन-सी सन्धि सम्पन्न हुई है?

Answer»

1996 में व्यापक परमाणु परीक्षण निषेध सन्धि’ सम्पन्न हुई है। यह सन्धि भेदभावपूर्ण है, इसलिए भारत ने इस सन्धि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।

26.

“विदेश नीति का निर्धारण घरेलू जरूरत और अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में दोहरे दबाव में होता है।” 1960 के दशक में भारत द्वारा अपनाई गई विदेश नीति से एक उदाहरण देते हुए अपने उत्तर की पुष्टि करें।

Answer»

जिस तरह किसी व्यक्ति या परिवार के व्यवहारों को अन्दरूनी और बाहरी कारक निर्देशित करते हैं उसी तरह एक देश की विदेश नीति पर भी घरेलू और अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण का असर पड़ता है। विकासशील देशों के पास अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था के भीतर अपने सरोकारों को पूरा करने के लिए जरूरी संसाधनों का अभाव होता है। इसके चलते वे बढे-चढे देशों की अपेक्षा बड़े सीधे-सादे लक्ष्यों को लेकर अपनी विदेश नीति तय करते हैं। ऐसे देशों का जोर इस बात पर होता है कि उनके पड़ोस में अमन-चैन कायम रहे और विकास होता रहे।

भारत ने 1960 के दशक में जो विदेश नीति निर्धारित की उस पर चीन एवं पाकिस्तान के युद्ध, अकाल, राजनीतिक परिस्थितियाँ तथा शीतयुद्ध का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है। भारत द्वारा गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाना भी इसका उदाहरण माना जा सकता है। उदाहरणार्थ-तत्कालीन समय में भारत की आर्थिक स्थिति अत्यधिक दयनीय थी, इसलिए उसने शीतयुद्ध के काल में किसी भी गुट का समर्थन नहीं किया और दोनों ही गुटों से आर्थिक सहायता प्राप्त करता रहा।

27.

भारत द्वारा परमाणु नीति अपनाने के मुख्य कारण बताइए।

Answer»

⦁    भारत परमाणु नीति एवं परमाणु हथियार बनाकर दूसरे देशों के आक्रमण से बचने के लिए न्यूनतम अवरोध की स्थिति प्राप्त करना चाहता है।
⦁    भारत के दो पड़ोसी देशों चीन एवं पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार हैं और इन दोनों देशों से भारत युद्ध भी लड़ चुका है।

28.

भारतीय विदेश नीति किन कारकों से प्रभावित है-(a) सांस्कृतिक कारक(b) घरेलू कारक(c) अन्तर्राष्ट्रीय कारक(d) घरेलू तथा अन्तर्राष्ट्रीय कारक।

Answer»

सही विकल्प है (d) घरेलू तथा अन्तर्राष्ट्रीय कारक।

29.

गुटनिरपेक्षता की नीति किन-किन सिद्धान्तों पर आधारित है? संक्षेप में बताइए।

Answer»

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति को अपनाया। भारत ने यह नीति अपने देश की राजनीतिक, आर्थिक तथा भौगोलिक स्थितियों को देखते हुए अपनाई है। गुटनिरपेक्ष आन्दोलन को जन्म देने तथा उसको बनाए रखने में भारत की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। गुटनिरपेक्षता की नीति मुख्य रूप से निम्नलिखित सिद्धान्तों पर आधारित है-

⦁    गुटनिरपेक्ष राष्ट्र दोनों गुटों से अलग रहकर अपनी स्वतन्त्र नीति अपनाते हैं और गुण-दोषों के आधार पर दोनों गुटों का समर्थन या आलोचना करते हैं।
⦁    गुटनिरपेक्ष राष्ट्र सभी राष्ट्रों से मैत्री सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयत्न करते है इन्हें तटस्थ रहने की कोई विधिवत् औपचारिक घोषणा नहीं करनी पड़ती।
⦁    गुटनिरपेक्ष राष्ट्र युद्धरत किसी पक्ष से सहानुभूति अवश्य रख सकते हैं ऐसी स्थिति में वे सैन्य सहायता के स्थान पर घायलों के लिए दवाइयाँ व चिकित्सा-सुविधाएँ उपलब्ध करा सकते हैं।
⦁    गुटनिरपेक्ष राष्ट्र निष्पक्ष रहते हैं, वे युद्धरत देशों को अपने क्षेत्र में युद्ध करने की अनुमति नहीं देते तथा न ही उन्हें किसी अन्य देश के साथ युद्ध करने हेतु सामरिक सुविधा प्रदान करते हैं।
⦁    गुटनिरपेक्ष राष्ट्र किसी प्रकार की सैन्य सन्धि या गुप्त समझौता करके किसी भी गुटबन्दी में शामिल नहीं होते हैं।

30.

इण्डिया, ब्राजील, साउथ अफ्रीका (IBSA) ‘इब्सा’ की स्थापना किस वर्ष हुई थी?

Answer»

इब्सा’ की स्थापना वर्ष 2003 में हुई थी।

31.

भारत ने विश्व के विभिन्न देशों के साथ अपने सम्बन्धों के निर्धारण के लिए किन सिद्धान्तों का अनुसरण किया है?

Answer»

भारत ने विश्व के विभिन्न देशों के साथ अपने सम्बन्धों के निर्धारण के लिए निम्नलिखित सिद्धान्तों के अनुसरण का सदैव ध्यान रखा है –

⦁    सम्पूर्ण विश्व में शान्ति और सुरक्षा का वातावरण बनाये रखने में हर सम्भव सहयोग देना।
⦁    विश्व के सभी देशों से सम्मानजनक सम्बन्ध न्यायसंगत आधार पर बनाये रखना।
⦁    विश्व के सभी देशों से मित्रतापूर्ण सम्बन्ध बनाये रखने के साथ अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों और सन्धियों का पूर्ण निष्ठा से पालन करने की दिशा में प्रयासरत रहना।

32.

निम्नलिखित में से कौन राजनैतिक कार्यपालिका का हिस्सा होता है?(क) जिलाधीश(ख) गृह मंत्रालय का सचिव(ग) गृहमंत्री(घ) पुलिस महानिदेशक

Answer»

सही विकल्प है (ग) गृहमंत्री

33.

प्रथम मराठा युद्ध के बारे में लिखिए?

Answer»

अंग्रेजों और मराठों के बीच प्रथम मराठा युद्ध (1775 से 1782 ई०) हुआ जो 7 वर्षों तक चला। किंतु नाना फड़नवीस के कुशल नेतृत्व तथा मराठों की सैन्य शक्ति के आगे अंग्रेजों को अधिक सफलता न मिल सकी। अंत में सालबाई नामक स्थान पर सन् 1782 ई० में दोनों पक्षों के बीच संधि हो गई।

34.

अगर आपको भारत का राष्ट्रपति चुना जाए तो आप निम्नलिखित में से कौन-सा फैसला खुद कर सकते हैं?(क) अपनी पसंद के व्यक्ति को प्रधानमंत्री चुन सकते हैं।(ख) लोकसभा में बहुमत वाले प्रधानमंत्री को उसके पद से हटा सकते हैं।(ग) दोनों सदनों द्वारा पारित विधेयक पर पुनर्विचार के लिए कह सकते हैं।(घ) मंत्रीपरिषद् में अपनी पसंद के नेताओं का चयन कर सकते हैं।

Answer»

(ग) दोनों सदनों द्वारा पारित विधेयक पर पुनर्विचार के लिए कह सकते हैं।

35.

पंचशील के दो सिद्धान्तों के नाम लिखिए।

Answer»

⦁    प्रादेशिक अखण्डता और प्रभुसत्ता का पारस्परिक सम्मान एवं
⦁    समानता और पारस्परिक हित में सहयोग।

36.

किसी भी देश की विदेश नीति की मूल आधारशिला क्या होती है?

Answer»

किसी भी देश की विदेश नीति का सबसे प्रमुख आधार होता है-‘राष्ट्रीय हित’।

37.

पंचशील के सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए। 

Answer»

पंचशील के सिद्धान्त
भारत की विदेश नीति का एक प्रमुख तत्त्व पंचशील या शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व के पाँच सिद्धान्त रहे। ये पाँच सिद्धान्त निम्नलिखित हैं –

⦁    एक-दूसरे की प्रादेशिक अखण्डता और सर्वोच्च सत्ता के प्रति पारस्परिक सम्मान की भावना।
⦁    एक-दूसरे के क्षेत्र पर आक्रमण का परित्याग।
⦁    एक-दूसरे के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का संकल्प।
⦁    समानती और पारस्परिक लाभ के सिद्धान्तों के आधार पर मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों की स्थापना। .
⦁    शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व।
भारत इस बात के लिए प्रयत्नशील है कि विश्व के विभिन्न राज्यों के द्वारा अपने पारस्परिक व्यवहार में पंचशील के इन पाँचों सिद्धान्तों को स्वीकार कर लिया जाए। पंचशील के सिद्धान्तों को सबसे पहले अपनाने वाले देश चीन के द्वारा इन सिद्धान्तों का खुला उल्लंघन किया गया, किन्तु इससे पंचशील के सिद्धान्तों का महत्त्व कम नहीं हो जाता।

38.

भारत की विदेश नीति के उददेश्य बताइए।

Answer»

भारत की विदेश नीति के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं –

⦁    अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा बनाये रखना।
⦁    सभी राज्यों और राष्ट्रों के बीच शान्तिपूर्ण और सम्मानपूर्ण सम्बन्ध बनाये रखना।
⦁    अन्तर्राष्ट्रीय कानून के प्रति और विभिन्न राष्ट्रों के पारस्परिक सम्बन्धों में सन्धियों के पालन के प्रति आस्था बनाये रखना।
⦁    सैनिक गुटबन्दियों और समझौते से अपने आपको अलग रखना तथा ऐसी गुटबन्दियों को निरुत्साहित करना।
⦁    उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद का विरोध करना।

39.

पंचशील सिद्धान्त के प्रवर्तक कौन थे?

Answer»

स्व० पण्डित जवाहरलाल नेहरू।

40.

भारत व एशियान के मध्य मुक्त व्यापार समझौता कब लागू हुआ?

Answer»

भारत व एशियान मुक्त व्यापार समझौता वर्ष 2010 में लागू हुआ। इस समझौते पर हस्ताक्षर वर्ष 2009 में किए गए थे।

41.

भारत की विदेश नीति का सबसे मुख्य लक्षण क्या है?

Answer»

असंलग्नता या गुट-निरपेक्षता भारत की विदेश नीति का सबसे प्रमुख लक्षण है। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद ही भारत के द्वारा निश्चित कर लिया गया कि भारत इन दोनों विरोधी गुटों में से किसी में भी शामिल न होते हुए विश्व के सभी देशों के साथ मित्रतापूर्ण सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयत्न करेगा और इस दृष्टि से भारत के द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में असंलग्नता या गुट-निरपेक्षता की विदेश नीति का पालन किया जाएगा। वास्तव में भारत के द्वारा असंलग्नता की विदेश नीति को अपनाने के कुछ विशेष कारण थे। प्रथमतः यदि भारत किसी गुट की सदस्यता को स्वीकार कर लेता तो अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में उसकी स्वतन्त्रता समाप्त हो जाती। वह विश्व राजनीति में स्वतन्त्र रूप से भाग नहीं ले सकता था। दूसरे पक्ष के अनुसार ही अपनी विदेश नीति तय करनी पड़ती, अत: अपने सम्मान को बनाए रखने के लिए असंलग्नता की नीति ही श्रेयस्कर थी। द्वितीयतः सैकड़ों वर्षों के साम्राज्यवादी शोषण से मुक्ति के बाद भारत के सम्मुख सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न आर्थिक पुनर्निर्माण का था और आर्थिक पुनर्निर्माण का यह कार्य विश्व शान्ति के वातावरण में ही सम्भव था। अत: भारत के लिए यही स्वाभाविक था कि वह सैनिक गुटों से अलग रहते हुए अन्तर्राष्ट्रीय तनाव को कम करने का प्रयत्न करे। इस प्रकार राष्ट्रीय हितों और विश्व शान्ति के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए गुट-निरपेक्षता की विदेश नीति अपनायी गयी है।

42.

भारत का प्रधानमंत्री सीधे जनता द्वारा क्यों नहीं चुना जाता? निम्नलिखित चार जवाबों में सबसे सही को चुनकर अपनी पसंद के पक्ष में कारण दीजिए।(क) संसदीय लोकतंत्र में लोकसभा में बहुमत वाली पार्टी का नेता ही ‘प्रधानमंत्री बन सकती है।(ख) लोकसभा, प्रधानमंत्री और मंत्रीपरिषद् का कार्यकाल पूरा होने से पहले ही उन्हें हटा सकती है।(ग) चूंकि प्रधानमंत्री को राष्ट्रपति नियुक्त करता है लिहाजा उसे जनता द्वारा चुने जाने की जरूरत ही नहीं है।(घ) प्रधानमंत्री के सीधे चुनाव में बहुत ज्यादा खर्च आएगा।

Answer»

(क) संसदीय लोकतंत्र में लोकसभा में बहुमत वाले दल का नेता ही प्रधानमंत्री बन सकता है। यदि एक प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित व्यक्ति जिसे लोकसभा में बहुमत का समर्थन प्राप्त नहीं है को प्रधानमंत्री बना दिया जाता है, तो उसके लिए लोकसभा में अपनी मर्जी के बिल, नीतियाँ पास कराना कठिन होगा। ऐसी स्थिति में सरकार ठीक ढंग से नहीं चल सकेगी। इसके अलावा भारत जैसे विशाल देश में जहाँ पर मतदाताओं की संख्या करोड़ों में है, किसी भी साधारण व्यक्ति चाहे वह कितना ही ईमानदार तथा बुद्धिमान क्यों न हो, चुनाव का खर्च सहन करना संभव नहीं होगा।

43.

भारतीय विदेश नीति की विशेषताएँ बताइए। याभारतीय विदेश नीति के प्रमुख लक्षणों को संक्षेप में स्पष्ट कीजिए। याभारत की विदेश नीति के मूल (आधारभूत) सिद्धान्तों की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।याभारत की विदेशी नीति के प्रमुख तत्त्वों का परीक्षण कीजिए।याभारत की विदेशी नति के चार सिद्धान्तों को बताइए एवं पंचशील की व्याख्या कीजिए। भारतीय विदेश नीति के प्रमुख मूल सिद्धान्त क्या हैं? याभारत की विदेश नीति के आधारभूत तत्त्वों (लक्षणों) का वर्णन कीजिए। 

Answer»

भारतीय विदेश नीति की प्रमुख विशेषताएँ (लक्षण) निम्नलिखित हैं –

1. राष्ट्रीय हित – किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति का प्रमुख आधार राष्ट्रीय हित होता है। भारतीय विदेश नीति के निर्धारण में भी इस तत्त्व का विशेष महत्त्व है। भारतीय विदेश नीति में राष्ट्रीय हित के महत्व को स्पष्ट करते हुए विदेश नीति के सृजनकर्ता कहे जाने वाले भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री नेहरू का मत था कि “हम चाहे कोई भी नीति निर्धारित करें, देश की वैदेशिक नीति से सम्बन्धित की गयी चतुरता राष्ट्रीय हित को सुरक्षित रखने में ही निहित है। भारत की प्रत्येक सरकार अपने राष्ट्रीय हितों को ही प्राथमिकता और सर्वोपरिता देगी। कोई भी सरकार ऐसे आचरण का खतरा नहीं उठा सकती जो राष्ट्रीय हितों के प्रतिकूल हो।’
2. गुट-निरपेक्षता की नीति – गुट-निरपेक्षता अथवा असंलग्नता की नीति भारतीय विदेश नीति की प्रमुख विशेषता है। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के समय सम्पूर्ण विश्व को दो गुटों में बँटा देख भारतीय प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू ने नव स्वतन्त्र राष्ट्रों के लिए एक पृथक् सिद्धान्त का प्रतिपादन किया, जिसके अन्तर्गत नवे स्वतन्त्र राष्ट्रों द्वारा दोनों गुटों से पृथक् रहने की नीति को अपनाया गया। गुटों से पृथक् रहने की इसी नीति को गुट-निरपेक्षता की नीति के नाम से जाना जाता है।
3. मैत्री और सह-अस्तित्व की नीति – भारतीय विदेश नीति की एक अन्य प्रमुख विशेषता मैत्री और शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व पर बल देती है। भारत विश्व के सभी देशों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों को बनाने में विश्वास रखता है।
4. विरोधी गुटों के मध्य सामंजस्य स्थापित करने पर बल – भारतीय विदेश नीति द्वारा विश्व के दोनों विरोधी गुटों के मध्य सामंजस्य स्थापित करने के महत्त्वपूर्ण प्रयास किये गये हैं। इस सम्बन्ध में भारत ने विश्व राजनीति में शक्ति का सन्तुलन बनाये रखने में दोनों गुटों के मध्य कड़ी का कार्य किया है।
5. साधनों की पवित्रता की नीति – भारतीय विदेश नीति साधनों की पवित्रता पर विशेष बल देती है। यह नैतिकता व आदर्शवादिता का समर्थन करती है तथा अनैतिकता व अवसरवादिता का घोरें विरोध करती है।
6. पंचशील – भारत शान्ति का पुजारी है, इसलिए उसने विश्व शान्ति स्थापित करने की नीति अपनायी है। 1954 ई० में उसने पंचशील को अपनी विदेश नीति का अंग बनाया। पंचशील का सिद्धान्त महात्मा बुद्ध के उन पाँच सिद्धान्तों पर आधारित है जो उन्होंने व्यक्तिगत आचरण के लिए निर्धारित किये थे। पंचशील के सिद्धान्तों का सूत्रपात पं० जवाहरलाल नेहरू व चीन के प्रधानमन्त्री चाऊ-एन-लाई के मध्य तिब्बत समझौते के समय हुआ था। पंचशील के पाँच सिद्धान्त निम्नलिखित हैं –

⦁    सभी राष्ट्र एक-दूसरे की प्रादेशिक अखण्डता और प्रभुसत्ता का सम्मान करें।
⦁    कोई राष्ट्र दूसरे राष्ट्र पर आक्रमण न करे और सभी राष्ट्र एक-दूसरे की स्वतन्त्रता का आदर करें।
⦁    एक-दूसरे के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न किया जाए।
⦁    प्रत्येक राष्ट्र एक-दूसरे के साथ समानता का व्यवहार करे तथा पारस्परिक हित में सहयोग करे।
⦁    शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व की नीति का सभी राष्ट्र पालन करें।

7. निःशस्त्रीकरण में आस्था – भारत हमेशा विश्व-शान्ति का समर्थक रहा है, इसलिए भारत ने सदैव नि:शस्त्रीकरण की प्रक्रिया का समर्थन किया है। भारत का मत है विश्व-शान्ति तभी स्थापित की जा सकती है जब भय और आतंक का वातावरण उत्पन्न करने वाली शस्त्रों की दौड़ से दूर रहा जाए और सभी राष्ट्र संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रतिज्ञा-पत्र का पूर्ण ईमानदारी एवं सच्चाई से पालन करें।
8. संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ सहयोग – भारत ने सदा ही विश्व-हितों को प्रमुखता दी है। प्रारम्भ से ही भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ सहयोग किया है। इसके महत्त्व के विषय में पं० नेहरू ने कहा था कि, “हम संयुक्त राष्ट्र संघ के बिना आधुनिक विश्व की कल्पना नहीं कर सकते।’ कोरिया, हिन्दचीन, साइप्रस एवं कांगो की समस्याओं के समाधान में भारत ने अपनी रुचि दिखलाई थी और संयुक्त राष्ट्र संघ के आदेश पर भारत ने यहाँ अपनी सेनाएँ भेजकर शान्ति-स्थापना में महत्त्वपूर्ण योग दिया था। भारत ने कभी अन्तर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन नहीं किया और संयुक्त राष्ट्र संघ के आदेशों का यथोचित सम्मान किया। भारत के यथोचित सम्मान दिये जाने के कारण ही भारत चार बार सुरक्षा परिषद् का अस्थायी सदस्य चुना गया। डॉ० राधाकृष्णन यूनेस्को के सर्वोच्च पद पर रहे। श्रीमती विजयलक्ष्मी पण्डित साधारण सभा की सभापति रह चुकी हैं। प्रो० बी० ए० राव ने अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में कार्य किया।
9. साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का विरोध – साम्राज्यवादी शोषण से त्रस्त भारत ने अपनी विदेश नीति में साम्राज्यवाद के प्रत्येक रूप का कटु विरोध किया है। भारत इस प्रकार की प्रवृत्तियों को विश्व-शान्ति एवं विश्व-व्यवस्था के लिए घातक एवं कलंकमय मानता है। 1956 ई० में जब इंग्लैण्ड व फ्रांस मिलकर मिस्र पर आक्रमण कर स्वेज नहर को हड़पना चाहते थे तो भारत ने इसे नवीन साम्राज्यवाद का घोर विरोध किया। भारत ने लीबिया, ट्यूनीशिया, मोरक्को, मलाया, अल्जीरिया आदि देशों के स्वतन्त्रता संग्राम का पूरा समर्थन किया। दक्षिणी अफ्रीका व रोडेशिया के प्रजातीय विभेद का भारत ने जोरदार विरोध किया और संयुक्त राष्ट्र संघ में यह प्रश्न उठाता रहा। के० एम० पणिक्कर के अनुसार, “भारत की नीति हमेशा से यही रही है कि यह पराधीन लोगों की स्वतन्त्रता के प्रति आवाज उठाता रहा है एवं भारत का दृढ़ विश्वास रहा है कि साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद हमेशा से आधुनिक युद्धों का कारण रहा है।”

इस प्रकार भारत की विदेश नीति ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ सिद्धान्त का पालन कर रही है।

44.

किन परिस्थितियों में राष्ट्रपति स्वविवेक का प्रयोग कर सकता है?

Answer»

लोकसभा के चुनावों में जब कोई राजनीतिक दल अथवा गठबन्धन बहुमत के लिए आवश्यक सीटें जीत लेता है। तो राष्ट्रपति उस दल या गठबन्धन के नेता को प्रधानमंत्री नियुक्ति करता है। लेकिन जब किसी दल अथवा गठबंधन के नेता को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है तो राष्ट्रपति अपने विवेक का प्रयोग करता है। तब राष्ट्रपति ऐसे दल अथवा गठबंधन के नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त करता है जो उसके विचार में लोकसभा में बहुमत प्राप्त कर सकता हो। ऐसे मामले में, राष्ट्रपति नवनियुक्त प्रधानमंत्री को निर्धारित समय सीमा में लोकसभा में बहुमत सिद्ध करने के लिए कह सकता है।

45.

भारत द्वारा परमाणु नीति अपनाए जाने के प्रमुख कारणों का विस्तार से वर्णन कीजिए।

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भारत ने शीतयुद्ध के दौरान गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के विकास पर बहुत अधिक बल दिया। इसके अलावा भारत नि:शस्त्रीकरण का समर्थन करता रहा लेकिन सन् 1962 में चीन से युद्ध में हार तथा सन् 1965 व 1971 में पाकिस्तान से युद्ध के बाद भारत को अपनी विदेश नीति पर सोचना पड़ा। 1970 के दशक में भारत ने प्रथम बार अनुभव किया कि अन्य राष्ट्रों की तरह उसे भी परमाणु सम्पन्न बनना चाहिए। भारत ने सन् 1974 में एवं सन् 1998 में परमाणु परीक्षण किए। वर्तमान में भारत एक परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र है। भारत द्वारा परमाणु नीति अपनाए जाने के निम्नलिखित कारण हैं-

1. आत्मनिर्भर राष्ट्र के रूप में विश्व स्तर पर अपनी पहचान बनाना—विश्व में जिन देशों के पास भी परमाणु हथियार उपलब्ध हैं वे सभी आत्मनिर्भर देश माने जाते हैं। भारत परमाणु नीति एवं परमाणु हथियार बनाकर एक आत्मनिर्भर राष्ट्र बनना चाहता है जिससे कि उसकी पहचान विश्व स्तर पर स्थापित हो।
2. शक्तिशाली राष्ट्र बनने की इच्छा-विश्व में जितने भी देश परमाणु शक्ति सम्पन्न हैं; वे सभी शक्तिशाली राष्ट्र माने जाते हैं। भारत भी उसी राह पर चलना चाहता है। भारत भी परमाणु नीति एवं परमाणु हथियार बनाकर विश्व में एक शक्तिशाली राष्ट्र बनना चाहता है ताकि कोई देश उस पर बुरी नजर न डाले।
3. विश्वव्यापी प्रतिष्ठा प्राप्त करना-सम्पूर्ण विश्व में सभी परमाणु सम्पन्न राष्ट्रों को आदर और सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। भारत भी परमाणु नीति एवं परमाणु हथियार बनाकर विश्व स्तर पर अपनी प्रतिष्ठा स्थापित करना चाहता है।
4. शान्तिपूर्ण कार्यों हेतु परमाणु हथियारों का उपयोग–भारत का मत है कि उसने शान्तिपूर्ण कार्यों के लिए परमाणु नीति को अपनाया है। भारत ने जब अपना प्रथम परमाणु परीक्षण किया तो उसे शान्तिपूर्ण परीक्षण करार दिया। भारत का मत है कि वह अणु-शक्ति को केवल शान्तिपूर्ण उद्देश्यों में प्रयोग करने की अपनी नीति के प्रति दृढ़ संकल्प है।
5. भारत द्वारा लड़े गए युद्ध-भारत ने सन् 1962 में चीन के साथ युद्ध किया तथा सन् 1965 व 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध किया। इन युद्धों में भारत को बहुत जन-धन की हानि उठानी पड़ी। अब भारत युद्धों में होने वाली अधिक हानि से बचने के लिए परमाणु हथियार प्राप्त करना चाहता है।
6. पड़ोसी देशों के पास परमाणु हथियार होना-भारत में पड़ोसी देशों चीन व पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार हैं। इन देशों के साथ भारत के युद्ध भी हो चुके हैं। अत: भारत को इन देशों से अपने को सुरक्षित महसूस करने के लिए परमाणु हथियार बनाना अति आवश्यक है।
7. न्यूनतम अवरोध की स्थिति प्राप्त करना—भारत परमाणु नीति एवं परमाणु हथियार बनाकर दूसरे देशों के आक्रमण से स्वयं को बचाने के लिए न्यूनतम अवरोध की स्थिति प्राप्त करना चाहता है। भारत ने सदैव ही विश्व समुदाय को यह आश्वस्त किया है कि वह किसी भी परिस्थिति में परमाणु हथियारों के प्रयोग की पहल नहीं करेगा। परमाणु शक्ति सम्पन्न होने के बाद आज भारत इस स्थिति में पहुंच चुका है कि कोई भी देश भारत पर हमला करने से पहले सोचेगा।
8. परमाणु सम्पन्न राष्ट्रों की भेदपूर्ण नीति-विश्व के परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्रों ने परमाणु अप्रसार सन्धिं एवं व्यापक परमाणु परीक्षण सन्धि को इस प्रकार लागू करना चाहा कि उनके अलावा कोई अन्य देश परमाणु हथियार का निर्माण न कर सके। भारत ने इन दोनों सन्धियों को भेदभाव मानते हुए उन पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया तथा यह घोषणा की कि वह अपनी रक्षा के लिए परमाणु हथियार रखेगा लेकिन इन हथियारों के प्रयोग की पहल नहीं करेगा। भारत की परमाणु नीति में यह बात स्पष्ट की गयी है कि भारत वैश्विक स्तर पर लागू एवं भेदभावरहित परमाणु निःशस्त्रीकरण के लिए वचनबद्ध है ताकि परमाणु हथियारों से मुक्त विश्व की रचना हो।

46.

शिमला समझौता कब एवं किनके बीच हुआ था?

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शिमला समझौता जुलाई, 1972 ई० में भारत की प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी तथा पाकिस्तान के राष्ट्रपति श्री जैड० ए० भुट्टो के बीच हुआ था।

47.

भारतीय विदेश नीति का मुख्य लक्ष्य क्या है?

Answer»

भारत की विदेश नीति का मुख्य लक्ष्य अपने राष्ट्रीय हितों में अभिवृद्धि करना है।

48.

‘अविश्वास प्रस्ताव’ किसे कहते हैं?

Answer»

कोई भी मंत्रिपरिषद् तभी तक अपने पद पर बनी रह सकती है, जब तक उसे लोकसभा में बहुमत का समर्थन प्राप्त रहता है। विपक्षी दल जब यह अनुभव करें कि सरकार की नीतियाँ ठीक नहीं हैं या सरकार अपना कार्य ठीक प्रकार से नहीं कर रही है, तो वह संसद में सरकार के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव पेश करते हैं। इस प्रस्ताव पर संसद में वाद-विवाद किया जाता है और फिर उस पर मतदान कराया जाता है। यदि सदस्यों का बहुमत अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में मतदान करता है तो सरकार (मंत्रिपरिषद्) को अपना त्याग-पत्र देना पड़ता है। यदि संसद में अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में मत प्राप्त नहीं होते, तो वह रद्द हो जाता है और सरकार पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

49.

लोकसभा और राज्यसभा में अंतर स्पष्ट कीजिए।

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लोकसभा और राज्यसभा में अंतर-

लोकसभाराज्यसभा
1. धन संबंधी बिल केवल लोकसभा में पेश किए जा सकते हैं। यह लोकसभा ही है जो देश का प्रशासन चलाने के लिए धन प्रदान करती है।1. राज्यसभा के पास धन संबंधी मामलों में अधिक शक्ति प्राप्त नहीं है।
2. लोकसभा राज्यसभा की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली है।2. लोकसभा की अपेक्षा राज्यसभा कम शक्तिशाली है।
3. लोकसभा के सदस्य सीधे जनता द्वारा चुने जाते है।3. राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव राज्य विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा किया जाता है।
4. प्रत्येक लोकसभा को सामान्य कार्यकाल 5 वर्ष होता है। 5 वर्ष के बाद निर्वाचित किए गए सभी सदस्यों का कार्यकाल समाप्त हो जाता है। लोकसभा भंग हो जाती है।4. राज्यसभा एक स्थायी निकाय है। यह कभी भंग नहीं होता किन्तु इसके एक तिहाई सदस्य प्रत्येक 2 वर्ष के बाद सेवानिवृत्त हो जाते हैं।
5. लोकसभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या 552  है।5. राज्यसभा के सदस्यों की संख्या 250 से अधिक नहीं होती।

50.

राष्ट्रपति की शक्तियों पर प्रकाश डालिए।

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राष्ट्रपति की प्रमुख शक्तियों का विवरण इस प्रकार हैं-

⦁    सभी प्रमुख नियुक्तियाँ राष्ट्रपति के नाम से की जाती हैं। इनमें भारत के मुख्य न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों तथा राज्यों के उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों, राज्यों के राज्यपालों, चुनाव आयुक्तों और अन्य देशों में राजदूतों की नियुक्तियाँ शामिल हैं किन्तु राष्ट्रपति इन शक्तियों का प्रयोग केवल मंत्रीमंडल की सलाह से करता है।

⦁    सभी अंतर्राष्ट्रीय समझौते तथा संधियाँ उसी के नाम पर किए जाते हैं।

⦁    वह भारत के रक्षा बलों का सुप्रीम कमांडर होता है।

⦁    राष्ट्रपति देश का मुखिया होता है।

⦁    वह केवल नाममात्र की शक्तियों का प्रयोग करता है। वह ब्रिटेन की महारानी के समान है जिसके कार्य अधिकतर आलंकारिक होते हैं।

⦁    वह देश की सभी राजनैतिक संस्थाओं के कार्य की निगरानी करता है।

⦁    सरकार के सभी क्रियाकलाप राष्ट्रपति के नाम पर किए जाते हैं।

⦁    सरकार के सभी कानून तथा प्रमुख नीतिगत निर्णय राष्ट्रपति के नाम जारी किए जाते हैं।