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This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.

1.

“तिराहे में तिगुना भय है” यह वाक्य कौन बोलता है?(क) संन्यासी(ख) सुरसंग(ग) सरस्वतीचंद्र(घ) बैलगाड़ीवाला

Answer»

सही विकल्प है (घ) बैलगाड़ीवाला

2.

बैलगाड़ी कहाँ से गुजरी और तिराहे पर क्यों रुकी?

Answer»

बैलगाड़ी आम्रवन और ताड़वन दोनों के बीचवाले रास्ते से गुजरी। फिर उस सिवान में पूर्व-पश्चिम की ओर जानेवाले रास्ते से चली। वहां दक्षिण ओर के बंद रास्ते पर पहंची, जहाँ तीन दिशाओं के मार्ग मिलते थे। वहाँ तिराहा बनता था। उस समय अंधकार हो गया था और रात्रि हो चली थी। इसलिए गाड़ी तिराहे के पास आकर रुक गई।

3.

बैलगाड़ी के पीछे भेजे गए तीन सवारों के क्या नाम थे?

Answer»

बैलगाड़ी के पीछे भेजे गए तीन सवारों के नाम थे – अब्दुल्ला, फतेहसंग और हरभमजी।

4.

भूपसिंह की गद्दी कौन हचमचा रहा था?

Answer»

भूपसिंह की गद्दी सुरसंग हचमचा रहा था।

5.

सुरसंग ने राजा खाचर के प्रति श्रद्धा किन शब्दों में प्रगट की?

Answer»

सुरसंग के मन में राजा खाचर के प्रति बहुत श्रद्धा है। वह कहता है कि राजा खाचर की हम पर बड़ी कृपा है। सरकार से वह चाहे जो बोलेगा, कागज में चाहे जो लिखेगा, किंतु वह उसका (सुरसंग का) बाल बांका नहीं होने देगा।

6.

‘पड़ाव को ही समझे मंजिल’ का क्या आशय है ?

Answer»

जीवन में किसी मोड़ पर जहाँ हमें कोई उपलब्धि मिल जाती है तो हम उसी को मंजिल मानकर, ठहर जाते हैं, जबकि यदि हम चलते रहें तो ऐसी अनेक उपलब्धियाँ हासिल करते रहेंगे।

7.

कवि बुझी हुई बाती को कैसे सुलगाने को कह रहा है ?

Answer»

कवि अंतरतम के नेह को निचोड़कर बुझी हुई बाती को सुलगाने को कह रहा है।

8.

भरी हुई दुपहरी से कवि का क्या आशय है ?

Answer»

भरी हुई दुपहरी से कवि का आशय युवावस्था से है।

9.

तुम तो मुक्त हो, पर मेरा तो घर-बार जाएगा।

Answer»

प्रस्तुत वाक्य बैलगाड़ीवाला एक दंडी संन्यासी से कहता है। उसकी बैलगाड़ी में संदिग्ध अवस्था में संन्यासी सफर कर रहा है और उसके मन में इस बात को लेकर भय है। इसलिए वह उससे कहता है कि उसे तो दीन-दुनिया से कुछ लेना-देना है नहीं, पर उसका तो परिवार है, घर है। उसके साथ कुछ हो गया, तो उसका सब कुछ चला जागा। वह बरबाट हो जागा।

10.

वह कौन-सी प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति पहले से सीखे हुए व्यवहारों को भुला देता है?

Answer»

व्यक्ति द्वारा पहले से सीखे हुए व्यवहारों को भुला देने की प्रक्रिया को वि-समाजीकरण कहा जाता है।

11.

निम्नलिखित शब्दसमूहों के लिए एक-एक शब्द लिखिए :मौसी का घर पत्नी के पिता का घर ईश्वर द्वारा विशेष रूप से दिया गया जो खून से लथपथ हो स्वीकृति के रूप में हकारात्मक स्वरजहाँ तीन रास्ते मिलते हो पैरों के चलने की आवाज़ 

Answer»
  1. मौसी का घर – मौसियान
  2. पत्नी के पिता का घर – पीहर, मायका
  3. ईश्वर द्वारा विशेष रूप से दिया गया – ईश्वर-प्रदत्त
  4. जो खून से लथपथ हो – रक्तरंजित
  5. स्वीकृति के रूप में हकारात्मक स्वर – हुंकारी
  6. जहाँ तीन रास्ते मिलते हो – त्रिराहा
  7. पैरों के चलने की आवाज़ – आहट
12.

आम्रवन और ताइवन किन राज्यों में थे?

Answer»

आमवन अंग्रेजी राज्य में था और ताड़वन सुवर्णपुर के राज्य में था।

13.

चिलम की आग का प्रकाश कैसा स्पष्ट होता था?

Answer»

चिलम में आग जली, तो ऐसा लगा, मानो ऊपर की डालों में उस तेज का प्रतिबिंब पड़ा हो। तब जुगनू के पंखों की तरह प्रकाश पार टोना शा।

14.

भद्रानदी की सुभद्रा शाखा समुद्र में कैसे मिलती है ?

Answer»

भद्रा नदी की सुभद्रा शाखा पूर्व से चलती थी और दक्षिण में आती थी। यह टेढ़ी-मेढ़ी गति से चलती थी। यह सारे बनों के पत्तों तथा फल-फूलों को अपने साथ बहाकर लाती थी। यह मंद किंतु स्थिर मंद-मधुर स्वर करती-करती मूल के पास आकर समुद्र में मिलती थी।

15.

मनोहरपुरी का सीवान किन तीन राज्यों के सिवान से मिलता था?

Answer»

मनोहरपुरी का सिवान सुवर्णपुर, रत्ननगरी और अंग्रेजी राज्य के राज्यों के सिवान से मिलता है।

16.

मनोहरपुरी सुवर्णपुर से कितनी दूर है?

Answer»

मनोहरपुरी सुवर्णपुर से लगभग दस कोस दूर है।

17.

वर्तमान के मोह जाल’ से कवि का क्या आशय है ?

Answer»

वर्तमान के मोहजाल से कवि का आशय है कि मनुष्य अपने जीवन के वर्तमान समय में मिलने वाली खुशियों के कारण भविष्य की अनदेखी करता है। वह भविष्य के विषय में सोच ही नहीं पाता।

18.

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा’ से कवि का क्या आशय है ?

Answer»

कवि कहता है कि मानव जीवन का जो लक्ष्य है, अभी वह पूरा नहीं हुआ है। अभी हमें अपने कर्मों से जीवन रूपी इस हवन कुंड में और आहुति देनी होगी।

19.

अगर भरी हुई दुपहरी में अचानक अँधेरा हो जाय तो क्या-क्या कठिनाइयाँ होंगी ?

Answer»

अगर भरी दोपहरी में अचानक अँधेरा हो जाए तो सर्वत्र त्राहि-त्राहि मच जाएगी। लोग जहाँ होंगे वहीं रुक जाएँगे और बहुत सारी परेशानियाँ खड़ी हो जाएँगी।

20.

यदि आने वाले कल को भुला दिया जाय तो हमारे वर्तमान पर उसका क्या प्रभाव पड़ेगा ?

Answer»

यदि आने वाले कल को भुला दिया जाए तो हमारे वर्तमान पर उसका बुरा प्रभाव पड़ सकता है। क्योंकि वर्तमान मे जीते हुए ही आने वाले कल को सुखद बनाने हेतु कार्य किए जाते हैं और वही आनेवाला कल एक दिन हमारा या हमारी पीढ़ियों का वर्तमान बन जाता है।

21.

कवि द्वारा ‘नव दधीचि की बात क्यों की जा रही है ?

Answer»

दधीचि ने एक राक्षस के वध एवं मानवता के कल्याण हेतु वज्र बनाने हेतु अपनी हडियाँ देवताओं को दान कर दी थी। कवि कहता है. आज के समय में भी ऐसे ही नव दधीचियों की आवश्यकता है जो संपूर्ण मानवता के कल्याण हेतु स्वयं को बलिदान करने को तत्पर हों।

22.

उच्चस्तरीय मानदंडों को क्या कहा जाता है?

Answer»

उच्चस्तरीय मानदंडों को सामाजिक मूल्य कहा जाता है।

23.

मनोहरपुरी किसकी राजधानी है?

Answer»

मनोहरपुरी प्रतापी राजाओं की राजधानी है।

24.

मनोहरपुरी गाँव की दृष्टिसीमा कैसे कँध गई थी?

Answer»

मनोहरपुरी गाँव के उत्तर में सुंदरगिरि नाम का छोटा पर्वत था। दोनों ओर बड़े-बड़े वन थे। पूर्व में आम के वन थे। इसके अलावा बड़े हिस्से में असंख्य बरगदों को घटाएं तथा गन्ने के खेत थे। इन सब से इस गाँव की दृष्टि सीमा रुंध गई थी।

25.

विद्याचतुर ने मनोहरपुरी का जीर्णोद्धार क्यों किया?

Answer»

मनोहरपुरी से विद्याचतुर का जन्म का रिश्ता था। विद्याचतुर का जन्म मनोहरपुरी में ही हुआ था। इसके अतिरिक्त विद्याचतुर का मौसियान भी यहीं था। विद्याचतुर की बाल्यावस्था और युवावस्था का प्रारंभिक काल इसी गांव में बीता था। इसलिए विद्याचतुर को मनोहरपुरी मनोहर लगती थी। इसलिए विद्याचतुर ने मनोहरपुरी का जीर्णोद्धार किया।

26.

सुवर्णपुर का रास्ता मनोहरपुरी की ओर कैसे मुड़ता था?

Answer»

सुवर्णपुर से निकलनेवाला रास्ता नदी की तरह आम और – ताड़ के बनों को अलगकर दोनों के बीच से गुजरता था। यह रास्ता मनोहरपुरी की ओर मुड़ता था।

27.

किन कारणों से मनोहरपुरी लोगों को प्रिय थी?

Answer»

यद्यपि मनोहरपुरी का सारा कृत्रिम वैभव नष्ट हो चुका था, फिर भी ईश्वर-प्रदत्त सुंदरता इस गांव में अब भी थी। इसके अलावा कुछ लोगों का इस गाँव से भावनात्मक लगाव था। इन कारणों से मनोहरपुरी लोगों को प्रिय थी।

28.

बैलगाड़ी दो वनों के बीच से कैसे चल रही थी?(क) धीरे-धीरे(ख) लड़खड़ाती(ग) तेजगति से(घ) चरमराती

Answer»

सही विकल्प है (घ) चरमराती

29.

बिजली का आविष्कार होने के पूर्व प्रकाश के लिए किन-किन साधनों का प्रयोग किया जाता था।

Answer»

बिजली का आविष्कार होने से पूर्व प्रकाश के लिए मशाल, दीपक, मोमबत्ती, लालटेन, लैम्प आदि का प्रयोग किया जाता था।

30.

“सभ्यता संस्कृति का वाहक हैं” किसने कहा है?

Answer»

यह कथन मैकाइवर और पेज का है।

31.

मनोहरपुरी को किसने जीत लिया?(क) हूणों ने(ख) द्रविड़ों ने(ग) म्लेच्छों ने(घ) आयों ने

Answer»

सही विकल्प है (ग) म्लेच्छों ने

32.

‘मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।’ यह कथन है-(क) रूसो का(ख) हरबर्ट स्पेन्सर का(ग) मैकाइवर व पेज का(घ) अरस्तू को

Answer»

सही विकल्प है (घ) अरस्तू का

33.

ह्यूमन नेचर एंड दि सोशल ऑर्डर’ पुस्तक के लेखक कौन हैं?(क) फ्रॉयड(ख) कूले(ग) मैकाइवर एवं पेजं(घ) मीड

Answer»

सही विकल्प है (ख) कुले

34.

किसके अनुसार सामाजिक मूल्य प्रत्यक्ष रूप से सामाजिक संगठन व सामाजिक व्यवस्था से संबंधित होते हैं?(क) इलियट एवं मैरिल(ख) सी०एम०केस(ग) राधाकमल मुखर्जी(घ) जॉनसन

Answer»

 सही विकल्प है (ग) राधाकमल मुखर्जी

35.

रॉबर्ट बीरस्टीड ने सामाजिक आदर्शों को कितनी श्रेणियों में विभाजित किया है?(क) दो।(ख) तीन(ग) चार(घ) पाँच

Answer»

सही विकल्प है (ख) तीन

36.

सामाजिक मूल्य क्या हैं? सामाजिक मूल्यों के प्रकार तथा महत्त्व की विवेचना कीजिए।यासामाजिक मूल्यों की संकल्पना स्पष्ट कीजिए तथा सामाजिक मूल्यों की विशेषताएँ बताइएं।

Answer»

सामाजिक मूल्य समाज के प्रमुख तत्त्व हैं तथा इन्हीं मूल्यों के आधार पर हम किसी समाज की प्रगति, उन्नति, अवनति अथवा परिवर्तन की दिशा निर्धारित करते हैं। इन्हीं मूल्यों द्वारा व्यक्तियों की क्रियाएँ निर्धारित की जाती हैं तथा इससे समाज का प्रत्येक पक्ष प्रभावित होता है। सामाजिक मूल्यों के बिना न तो समाज की प्रगति की कल्पना की जा सकती है और न ही भविष्य में प्रगतिशील क्रियाओं का निर्धारण ही संभव है। मूल्यों के आधार पर ही हमें यह पता चलता है कि समाज में किस चीज को अच्छा अथवा बुरा समझा जाता है। अतः सामाजिक मूल्य मूल्यांकन का भी प्रमुख आधार हैं। विभिन्न समाजों की आवश्यकताएँ तथा आदर्श भिन्न-भिन्न होते हैं; अतः सामाजिक मूल्यों के मापदंड भी भिन्न-भिन्न होते हैं।

किसी भी समाज में सामाजिक मूल्य उन उद्देश्यों, सिद्धांतों अथवा विचारों को कहते हैं जिनको समाज के अधिकांश सदस्य अपने अस्तित्व के लिए आवश्यक समझते हैं और जिनकी रक्षा के लिए बड़े-से-बड़ा बलिदान करने को तत्पर रहते हैं। मातृभूमि, राष्ट्रगान, धर्म निरपेक्षता, प्रजातंत्र इत्यादि हमारे सामाजिक मूल्यों को ही व्यक्त करते हैं।

सामाजिक मूल्यों का अर्थ तथा परिभाषाएँ
सामाजिक मूल्य प्रत्येक समाज के वातावरण और परिस्थितियों के वैभिन्न्य के कारण अलग-अलग होते हैं। ये मानव मस्तिष्क को विशिष्ट दृष्टिकोण प्रदान करते हैं, जो सामाजिक मूल्यों के निर्माता होते हैं। प्रत्येक समाज की सांस्कृतिक विशेषताएँ अपने समाज के सदस्यों में विशिष्ट मनोवृत्तियों उत्पन्न कर देती हैं जिनके आधार पर भिन्न-भिन्न विषयों और परिस्थितियों का मूल्यांकन किया जाता है। यह संभव है कि जो ‘आदर्श’ और ‘मूल्य एक समाज के लिए मान्य हैं, वे ही दूसरे समाज में अक्षम्य अपराध माने जाते हों। उदाहरणार्थ-भारत के सभ्य समाजों में विवाहेतर यौन संबंध मूल्यों की दृष्टि से घातक हैं किंतु जनजातियों के ये सर्वोच्च लाभदायी मूल्य हैं। अतः मूल्यों का निर्धारण समाज की विशेषता पर आधारित है। प्रमुख विद्वानों ने सामाजिक मूल्यों की परिभाषाएँ निम्न प्रकार से दी हैं–

⦁    राधाकमल मुखर्जी (R.K. Mukherjee) के अनुसार-“मूल्य समाज द्वारा मान्यता प्राप्त वे। इच्छाएँ तथा लक्ष्य हैं जिनका आंतरीकरण समाजीकरण की प्रक्रिया क माध्यम से होता है और जो व्यक्पितरक अधिमान्यताएँ, मानदंड (मानक) तथा अभिलाषाएँ बन जाती हैं।”
⦁    रॉबर्ट बीरस्टीड (Robert Bierstedt) के अनुसार-“जब किसी समाज के स्त्री-पुरुष अपने ही तरह के लोगों के साथ मिलते हैं, काम करते हैं या बात करते हैं, तब मूल्य ही उनके क्रमबद्ध सामाजिक संसर्ग को संभव बनाते हैं।”
⦁    एच० एम० जॉनसन (H.M. Johnson) के अनुसार-“मूल्य को एक धारणा या मानक के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। यह सांस्कृतिक हो सकता है या केवल व्यक्तिगत और इसके द्वारा चीजों की एक-दूसरे के साथ तुलना की जाती है, इसे स्वीकृत या अस्वीकृति प्राप्त । होती है, एक-दूसरे की तुलना में उचित अनुचित, अच्छा या बुरा, ठीक अथवा गलत माना जाता है।”
⦁    वुड्स (Woods) के अनुसार-“मूल्य दैनिक जीवन के व्यवहार को नियंत्रित करने के सामान्य सिद्धांत हैं। मूल्य न केवल मानव व्यवहार को दिशा प्रदान करते हैं अपितु वे अपने आप में आदर्श एवं उद्देश्य भी हैं। जहाँ मूल्य होते हैं वहाँ न केवल यह देखा जाता है कि क्या चीज होनी चाहिए बल्कि यह भी देखा जाता है कि वह सही है या गलत है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर यह स्पष्ट हो होता है कि मूल्य का एक सामाजिक आधार होता है। और वे समाज द्वारा मान्यता प्राप्त लक्ष्यों की अभिव्यक्ति करते हैं। मूल्य हमारे व्यवहार का सामान्य तरीका है। मूल्यों द्वारा ही हम अच्छे या बुरे, सही या गलत में अंतर करना सीखते हैं।

मूल्यों का समाजशास्त्रीय महत्त्व
सामाजिक मूल्य समाज के सदस्यों की आंतरिक तथा मनोवैज्ञानिक भावनाओं पर आधारित होते हैं। इसीलिए समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से मूल्यों का अत्यधिक महत्त्व होता है। इनके आधार पर ही सामाजिक घटनाओं एवं समस्याओं का मूल्यांकन किया जाता है। मूल्य व्यक्तिगत, सामाजिक और अंतर्राष्ट्रीय जीवन को भी अपने अनुरूप बनाने का प्रयास करते हैं।

सामाजिक मूल्य सामाजिक एकरूपता के जनक हैं, क्योंकि मूल्य व्यवहार के प्रतिमान अथवा मानकों को प्रस्तुत करते हुए समाज के सदस्यों से अपेक्षा करते हैं कि वे अपने आचरण द्वारा मूल्यों का स्तर बनाए रखेंगे। इस तरह सामाजिक प्रतिमानों के रूप में मूल्यों का निर्धारण होता है।

सामाजिक मूल्यों से ही विभिन्न प्रकार की मनोवृत्तियों का निर्धारण होता है तथा व्यक्ति को उचित एवं अनुचित का ज्ञान होता है। शिल्स तथा पारसन्स (Shils and Parsons) के अनुसार, सामाजिक मूल्य सामाजिक व्यवहार के कठोर नियंत्रक हैं। इनके अनुसार, सामाजिक मूल्यों के बिना सामाजिक जीवन असंभव है, सामाजिक व्यवस्था सामूहिक लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर सकती तथा व्यक्ति अन्य व्यक्तियों को अपनी आवश्यकताओं एवं जरूरतों को भावात्मक रूप से नहीं बता पाएँगे। संक्षेप में सामाजिक मूल्यों का निम्नलिखित महत्त्व हैं-

⦁    मानव समाज में व्यक्ति इन मूल्यों के आधार पर समाज द्वारा स्वीकृत नियमों का पालो करता | है। वह उनके अनुकूल अपने व्यवहार को ढालकर अपना जीवन व्यतीत करता है।
⦁    सामाजिक मूल्यों के आधार पर सामाजिक तथ्यों और घटनाओं; जैसे-विचार, अनुभव तथा क्रियाओं आदि का ज्ञान प्राप्त होता है। अतः सामाजिक तथ्यों को समझने के लिए सामाजिक मूल्यों का ज्ञान होना आवश्यक है।
⦁    समाज के सदस्यों की प्रवृत्तियाँ व मनोवृत्तियाँ सामाजिक मूल्यों के आधार पर निर्धारित की जाती
⦁    मनुष्य अपनी अनंत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सतत प्रयत्न करता रहता है। इन आवश्यकताओं की पूर्ति में उसे सामाजिक मूल्यों से पर्याप्त सहायता प्राप्त होती है।
⦁    सामाजिक मूल्य व्यक्तियों को अपनी इच्छाओं, आकांक्षाओं व उद्देश्यों को वास्तविकता प्रदान करने का आधार प्रस्तुत करते हैं।
⦁    समाज सामाजिक संबंधों का जाल है। सामाजिक मूल्य संबंधों के इस जाल को संतुलित करने व समाज़ के सदस्यों में सामंजस्य बनाए रखने में सहयोग प्रदान करते हैं।
⦁    सामाजिक मूल्य व्यक्ति के समाजीकरण एवं विकास में सहायक होते हैं।
⦁    सामाजिक मूल्यों के आधार पर ही सामाजिक क्रियाओं एवं कार्यकलापों का ज्ञान होता है।

सामाजिक मूल्यों की प्रमुख विशेषताएँ
सामाजिक मूल्यों की प्रमुख विशेषताएँ अथवा लक्षण निम्नलिखित हैं-

⦁    किसी भी समाज के मूल्य वहाँ की संस्कृति द्वारा निर्धारित होते हैं; अत: मूल्य संस्कृति की उपज हैं तथा वे संस्कृति को बनाए रखने में भी सहायक होते हैं।
⦁    सामाजिक मूल्य मानसिक धारणाएँ हैं; अतः जिस प्रकार समाज अमूर्त है उसी प्रकार मूल्य भी अमूर्त होते हैं। अन्य शब्दों में, सामाजिक मूल्यों को न तो देखा जा सकता है और न ही इनको स्पर्श किया जा सकता है, इनका केवल अनुभव किया जा सकता है।
⦁    मूल्य व्यवहार करने के विस्तृत तरीके ही नहीं है अपितु समाज द्वारा वांछित तरीकों के प्रति व्यक्त की जाने वाली प्रतिबद्धता भी है।
⦁    प्रत्येक व्यक्ति सामाजिक मूल्यों को अपने ढंग से लेता है और उनका निर्वाचन करता है। एक सन्यासी एवं व्यापारी के लिए ईमानदारी’ (जो कि एक सामाजिक मूल्य है) का अर्थ भिन्न-भिन्न हो सकता है।
⦁    सामाजिक मूल्य मानव व्यवहार के प्रेरक अथवा चालक के रूप में कार्य करते हैं।
⦁    सामाजिक मूल्य व्यक्ति पर थोपे नहीं जाते अपितु वह समाजीकरण द्वारा स्वयं इनका अंतरीकरण कर लेता है और इस प्रकार वे उसके व्यक्तित्व के ही अंग बन जाते हैं।
⦁    सामाजिक मूल्य व्यक्ति के लक्ष्यों, साधनों व तरीकों के चयन के पैमाने हैं। हम सामाजिक मूल्यों के आधार पर ही किसी एक लक्ष्य को अन्य की अपेक्षा अधिक प्राथमिकता देते हैं।
⦁    सामाजिक मूल्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होते रहते हैं और इसलिए इनमें परिवर्तन करना कठिन होता है। व्यक्तियों की इनके प्रति प्रतिबद्धता या वचनबद्धता के कारण भी इनमें परिवर्तन करना कठिन होता है।
⦁    सामाजिक मूल्यों में संज्ञानात्मक, आदर्शात्मक तथा भौतिक तीनों प्रकार के तत्त्व निहित होते हैं।
⦁    किसी भी समाज की प्रगति का मूल्यांकन सामाजिक मूल्यों के आधार पर ही किया जाता है।
⦁    सामाजिक मूल्य ही नैतिकता-अनैतिकता अथवा उचित-अनुचित के मापंदड होते हैं।

सामाजिक मूल्यों के प्रकार
सामाजिक मूल्य विभिन्न प्रकार के होते हैं तथा विद्वानों ने इनका वर्गीकरण विविध प्रकार से किया है। प्रमुख विद्वानों द्वारा प्रस्तुत वर्गीकरण इस प्रकार हैं—

(अ) राधाकमल मुखर्जी (Radhakamal Mukherjee) के अनुसार सामाजिक मूल्य प्रत्यक्ष रूप से सामाजिक संगठन व सामाजिक व्यवस्था से संबंधित होते हैं। इन्होंने चार प्रकार के मूल्यों का उल्लेख किया है-

⦁    वे मूल्य जिनका संबंध आदान-प्रदान व सहयोग आदि से होता है। इन मूल्यों के आधार पर आर्थिक जीवन की उन्नति होती है व आर्थिक जीवन संतुलित होता है।
⦁    वे मूल्य जिनके आधार पर सामान्य सामाजिक जीवन के प्रतिमानों व आदर्शों का निर्धारण होता है। इन मूल्यों के अंतर्गत एकता व उत्तरदायित्व भी भावना आदि समाहित होती है।
⦁    वे मूल्य जो सामाजिक संगठन व व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए समाज में समानता व सामाजिक न्याय का प्रतिपादन करते हैं।
⦁    वे मूल्य जो समाज में उच्चता लाने व नैतिकतों को विकसित करने में सहायता प्रदान करते हैं।

(ब) इलियट एवं मैरिल (Elliott and Merrill) ने अमेरिकी समाज के संदर्भ में तीन प्रकार के सामाजिक मूल्यों का उल्लेख किया है-
⦁    आर्थिक सफलता
⦁    मानवीय स्नेह तथा
⦁    देशभक्ति या राष्ट्रीयता की भावना।

(स) सी० एम० केस (C.M. Case) ने सामाजिक मूल्यों को चार भागों में विभाजित किया है–
⦁    सामाजिक मूल्य-ये मूल्य सामाजिक जीवन से संबंधित होते हैं। सहयोग, दान, सेवा, निवास, भूमि, समूह इत्यादि के निर्धारित मूल्य इस कोटि में आते हैं।
⦁    सांस्कृतिक मूल्य-इन मूल्यों की उत्पत्ति व्यक्ति के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में नियमितता और नियंत्रण के लिए हुई। परंपरा, लोक कला, रीति-रिवाज, धार्मिक क्रियाएँ, गायन, नृत्य सभी सांस्कृतिक मूल्य कहे जाते हैं।
⦁    विशिष्ट मूल्य–इनका निर्धारण परिस्थितियों के लिए किया जाता है। अवसर-विशेष के लिए जिन मूल्यों का प्रचलन किया जाता है वे ही विशिष्ट मूल्य कहलाते हैं, जैसे—ब्रिटिश सत्ता को | उखाड़ फेंकने के लिए भारतीय जनता एक साथ कृत संकल्प हुई थी।
⦁    जैविक या सावयवी मूल्य–ये मूल्य व्यक्ति की शरीर रक्षा के लिए निर्धारित किए जाते हैं। जैसे-‘शराब मत पियो’ सावयवी मूल्य ही है क्योंकि शराब के परिणाम खराब स्वास्थ्य, विभिन्न बीमारियों तथा मानसिक असमर्थता आदि हैं जिनको प्रभाव व्यक्ति के शरीर के साथ ही भावी संतान पर भी पड़ता है तथा समाज में भी शराब के दुष्परिणाम देखे जा सकते हैं।

37.

संस्कृति और सभ्यता में दो प्रमुख अंतर बताइए।

Answer»

संस्कृति और सभ्यता में पाए जाने वाले दो प्रमुख अंतर निम्नलिखित हैं-

⦁    उपयोगिता के आधार पर अंतर-सभ्यता के अंतर्गत मनुष्य द्वारा निर्मित वे सभी वस्तुएँ आ जाती हैं जिनका इनकी उपयोगिता द्वारा मूल्यांकन किया जाता है, किंतु संस्कृति का संबंध उस ज्ञाने से है जिसके आधार पर वस्तुओं का निर्माण किया जाता है।
⦁    स्वरूप में अंतर-सभ्यता का संबंध व्यक्ति की बाहरी दशा से होता है जो व्यक्ति की आवश्यकता की पूर्ति करती है, किंतु संस्कृति का संबंध व्यक्ति की आंतरिक अवस्था से है जो व्यक्ति के व्यवहार को नियंत्रित करती है। संस्कृति से व्यक्ति सर्वांग रूप से प्रभावित होता है।

38.

सामाजिक आदर्श की परिभाषा दीजिए तथा सामाजिक आदर्शों के प्रमुख प्रकार एवं विशेषताएँ बताइए।यासामाजिक आदर्श से आप क्या समझते हैं? सामाजिक आदर्शों का महत्त्व बताइए।

Answer»

किसी समाज में व्यवहार करने के जो नियम हैं उन्हें सामाजिक आदर्श कहा जाता है। इन्हीं आदर्शो से हमें उचित-अनुचित का पता चलता है और इन्हीं से समाज की आचरण संबंधी प्रत्याक्षाएँ विकसित होती हैं। सामाजिक आदर्शों से ही हमें पता चलता है किससे, किन परिस्थितियों में, किसके द्वारा, क्या कार्य करने या न करने की आशा की जाती है तथा इनको पालन न करने पर क्या दंड दिया जाता है।

सामाजिक आदर्शों का अर्थ एवं परिभाषाएँ

सामाजिक आदर्श व्यवहार के वे नियम हैं जो समाज द्वारा स्वीकृति के कारण संस्थागत हो जाते हैं तथा स्वीकृत व्यवहार के नियम आदर्श कहलाते हैं। इन्हें निम्न प्रकार से परिभाषित किया जा सकता हैं-

⦁    रॉबर्ट बीरस्टीड (Robert Bierstedt) के अनुसार-“एक आदर्श, संक्षेप में प्रक्रिया को मानकी प्रतिरूप है। अपने समाज के लिए स्वीकार करने योग्य कुछ करने का तरीका है।”
⦁    किंग्स्ले डेविस (Kingsley Davis) के अनुसार–“आदर्श नियंत्रण हैं। ये वे तत्त्व हैं जिनके द्वारा मानव समाज अपने सदस्यों के व्यवहारों का नियमन इस प्रकार करता है कि वे सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए अपनी क्रियाओं का संपादन करते रहें और कभी-कभी सावयवी आवश्यकताओं के मूल्य पर भी।”
⦁    ग्रीन (Green) के अनुसार-“सामाजिक आदर्श मानकीकृत सामान्यीकरण है जिनके परिणामस्वरूप सदस्यों से एक निश्चित व्ययवहार करने की आशा की जाती है।”
⦁    शेरिफ एवं शेरिफ (Sheriff and Sheriff) के अनुसार-“जीवन और उसके उन्नयन के विविध कार्यों में संलग्न व्यक्तियों की अंतक्रिया के बीच समूह की संरचना का जन्म होता है, व्यक्ति विभिन्न कार्य करते हैं और प्रत्येक की एक सापेक्ष परिस्थिति हो जाती है। कार्य संचालन का क्रम और उनके नियमों का स्वरूप स्थिर हो जाता है। इस प्रकार नियम, व्यवहार के तरीके तथा अनुकरणीय जीवन मूल्य आदि सामूहिक अंतःक्रिया के ही सह-उत्पादन हैं, नियमों, मानकों और मूल्यों के इस विशिष्ट गठन को समूह के सामाजिक आदर्शों के रूप में जाना जाता है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि सामाजिक आदर्श समाज के वे नियम हैं जो सदस्यों के व्यवहार को नियंत्रित करते हैं तथा समाज द्वारा अनुमोदित होते हैं।

सामाजिक आदर्शों की विशेषताएँ
सामाजिक आदर्श की संकल्पना को इसकी निम्नलिखित विशेषताओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-

⦁    संस्कृति के प्रतिनिधि–सामाजिक आदर्शों को संबंधित संस्कृति अथवा समूह का प्रतिनिधि माना जाता है। इन आदर्शों की प्रकृति से हम उस समाज या समूह की प्रकृति के बारे में अनुमान लगा सकते हैं।
⦁    सामाजिक अनुमोदन–सामाजिक आदर्शों की दूसरी विशेषता समाज अथवा संबंधित समूह द्वारा इनको प्राप्त स्वीकृति है। सामूहिक स्वीकृति के कारण ही इनमें स्थायित्व का गुण पाया जाता है। अतः आदर्श में वे व्यवहार नियम नहीं आते जिनको सामूहिक अनुमोदन प्राप्त नहीं है।
⦁    स्थायी प्रकृति-सामाजिक आदर्शों की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि इनमें स्थायित्व पाया जाता है, क्योंकि इनका विकास शनैःशनैः होता है और ये एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित होते रहते हैं। इसलिए इनमें परिवर्तन लाना कठिन है। इस स्थायी प्रकृति के कारण ही आदर्श समूह के सदस्यों का अंग बन जाते हैं।
⦁    लिखित व अलिखित स्वरूप-सामाजिक आदर्शों का स्वरूप लिखित एवं अलिखित दोनों प्रकार का हो सकता है। अधिकांशतः आदर्श दोनों ही रूपों में समाज में विद्यमान होते हैं तथा व्यक्ति के व्यवहार को नियंत्रित करते हैं।
⦁    कर्तव्य की भावना–सामाजिक आदर्शों का पालन इसलिए किया जाता है क्योंकि इनके साथ । कर्त्तव्य की भावना जुड़ी होती है। सामान्यतः इनका पालन करना सदस्य अपना गौरव समझते
⦁    रूढ़िवादी प्रकृति-यद्यपि सामाजिक आदर्श हमारे व्यवहार के प्रमुख आधार हैं फिर भी इनकी । प्रकृति रूढ़िवादी होती है। इस रूढ़िवादी प्रकृति के कारण ही इनमें परिवर्तन सरलता से नहीं किया जा सकता है।
⦁    दोहरी प्रकृति-सामाजिक आदर्शों की प्रकृति दोहरी होती है। ये एक ओर व्यक्तियों को प्रभावित करते हैं और उन पर नियंत्रण रखते हैं तो दूसरी ओर स्वयं व्यक्तियों से प्रभावित होते रहते हैं।
⦁     कल्याणकारी प्रकृति–सामाजिक आदर्श सामूहिक होते हैं तथा इनकी प्रकृति कल्याणकारी होती है। इसी प्रकृति के कारण इनमें स्थायित्व होता है और सदस्य इन्हें अपने व्यक्तित्व का अंग बना लेते हैं।

सामाजिक आदर्शों के प्रकार
सामाजिक आदर्श सामाजिक परिस्थितियों की देन हैं, समाज द्वारा अनुमोदित होते हैं तथा व्यक्तियों के व्यवहार को नियंत्रित करते हैं। आदर्श अनेक प्रकार के होते हैं। रॉबर्ट बीरस्टीड (Robert Bierstedt) ने सामाजिक आदर्शों को निम्नलिखित तीन श्रेणियों में विभाजित किया है–

⦁    जनरीतियाँ (Folkways),
⦁    रूढ़ियाँ (Mores) तथा
⦁    कानून (Law)
किंग्स्ले डेविस (Kingsley Davis) ने सामाजिक आदर्शों के अग्रलिखित प्रकारों का उल्लेख किया है–
⦁    रूढ़ियाँ (Mores),
⦁    प्रथागत कानून (Customary law),
⦁    जनरीतियाँ (Folkways),
⦁    फैशन तथा सनक (Fashion and fad),
⦁    संस्थाएँ (Institutions),
⦁    परिपाटी एवं शिष्टाचार (Convention and etiquette) तथा
⦁    प्रथा, नैतिकता तथा धर्म (Custom, morality and religion)।
आदर्शों को सकारात्मक एवं नकारात्मक में भी विभाजित किया गया है। प्रथम प्रकार के आदर्श व्यक्तियों के अनुपालन हेतु निर्देश देते हैं, जबकि दूसरे प्रकार के आदर्श किसी व्यवहार का न करने पर बल देते हैं।

सामाजिक आदर्शों का महत्त्व
सामाजिक आदर्श समाज द्वारा अनुमोदित व्यवहार के वे नियम होते हैं जिनका पालन करना व्यक्ति अपना कर्तव्य मानते हैं; अत: समाज में इनका महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। इनके महत्त्व को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है-

⦁    सामाजिक आदर्श समाज के सदस्यों के व्यवहार में अनुरूपता लाने में सहायक है।
⦁    सामाजिक आदर्श समाज के सदस्यों को उचित तथा अनुचित का ज्ञान कराते हैं और इस प्रकार उनका मार्गदर्शन करते हैं।
⦁    सामाजिक आदर्श समाज को संगठित करने तथा इस प्रकार समाज की व्यवस्था को बनाए रखने ‘ व एकता लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
⦁    सामाजिक आदर्श नागरिक नियंत्रण के प्रमुख साधन हैं तथा वे केवल व्यक्तियों के व्यवहार को ही नियंत्रित नहीं करते अपितु समूहों के व्यवहार को भी नियंत्रित करते हैं।
⦁    सामाजिक आदर्श सामाजिक विरात के रूप में संस्कृति की रक्षा करते हैं तथा इसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित करते हैं।
⦁    सामाजिक आदर्श व्यक्तित्व के विकास की प्रक्रिया में सहायक होते हैं।
⦁    सामाजिक आदर्श सामाजिक प्रतिष्ठा का निर्धारण करते हैं तथा साथ ही इसकी रक्षा करते हैं।

39.

संस्कृति को परिभाषित कीजिए तथा इसकी प्रमुख विशेषताएँ बताइए।यासंस्कृति का अर्थ समझाते हुये, संस्कृति की संकल्पना को स्पष्ट कीजिए।

Answer»

संस्कृति समाजशास्त्र की प्रमुख संकल्पना है। समाजशास्त्र में संस्कृति को सीखे हुए व्यवहार प्रतिमानों तथा सामाजिक विरासत के आधार पर समझाने का प्रयास किया जाता है। प्रत्येक समाज की अपनी भिन्न संस्कृति होती है। संस्कृति में समाजशास्त्रियों की रुचि इसलिए है क्योंकि संस्कृति तथा सांस्कृतिक परिवर्तन समाज और सामाजिक परिवर्तन को प्रभावित करते हैं। इसलिए, संस्कृति की संकल्पना इसके आयामों तथा भेदों का अध्ययन समाजशास्त्र की विषय-वस्तु में सम्मिलित किया जाता है। वैसे संस्कृति का अध्ययन मानवशास्त्र में किया जाता है। संस्कृति का समाजशास्त्र में अध्ययन करने का एक अन्य कारण इसका व्यक्तित्व पर पड़ने वाला गहरा प्रभाव है।

संस्कृति का अर्थ तथा परिभाषाएँ
मनुष्य प्राकृतिक वातावरण में अनेक सुविधाओं का उपभोग करता है तो दूसरी ओर उसे अनेक असुविधाओं का सामना करना पड़ता है। परंतु मनुष्य ने आदिकाल से प्राकृतिक बाधाओं को दूर करने के लिए वे अपनी विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अनेक समाधानों की खोज की है। इन खोजे गए उपायों को मनुष्य ने आगे आने वाली पीढ़ी को भी हस्तांतरित किया। प्रत्येक पीढ़ी ने अपने पूर्वजों से प्राप्त ज्ञान और कला को और अधिक विकास किया है। अन्य शब्दों में, प्रत्येक पीढ़ी ने अपने पूर्वजों के ज्ञान को संचित किया है और इस ज्ञान के आधार पर नवीन ज्ञान और अनुभव का भी ज्ञान अर्जन किया है। इस प्रकार के ज्ञान व अनुभव के अंतर्गत यंत्र, प्रविधियाँ, प्रथाएँ, विचार और मूल्य आदि आते हैं। ये मूर्त और अमूर्त वस्तुएँ संयुक्त रूप से ‘संस्कृति’ कहलाती हैं। इस प्रकार, वर्तमान पीढ़ी ने अपने पूर्वजों तथा स्वयं के प्रयासों से जो अनुभव व व्यवहार सीखा है वही संस्कृति है। प्रमुख विद्वानों ने संस्कृति को निम्नलिखित रूप से परिभाषित किया है-

⦁    हॉबल (Hoebel) के अनुसार-संस्कृति संबंधित सीखे हुए व्यवहार प्रतिमानों का संपूर्ण योग है जो कि एक समाज के सदस्यों की विशेषताओं को बतलाता है और जो इसलिए प्राणिशास्त्रीय विरासत का परिणाम नहीं होता।”
⦁    बीरस्टीड (Bierstedt) के अनुसार-“संस्कृति वह संपूर्ण जटिलता है जिसमें वे सभी वस्तुएँ सम्मिलित हैं जिन पर हम विचार करते हैं, कार्य करते हैं और समाज का सदस्य होने के नाते अपने पास रखते हैं।”
⦁    मैकाइवर एवं पेंज (Maclver and Page) के शब्दों में—“संस्कृति हमारे दैनिक व्यवहार में कला, साहित्य, धर्म, मनोरंजन और आनन्द में पाए जाने वाले रहन-सहन और विचार के ढंगों में हमारी प्रकृति की अभिव्यक्ति है।”
⦁    पिडिंगटन (Piddington) के अनुसार-संस्कृति उन भौतिक एवं बौद्धिक साधनों या उपकरणों का संपूर्ण योग है जिनके द्वारा मानव अपनी जैविक एवं सामाजिक आवश्यकताओं की संतुष्टि तथा अपने पर्यावरण से अनुकूलन करता है।”
⦁    मजूमदार (Mazumdar) के अनुसार-“संस्कृति मानव-उपलब्धियों, भौतिक तथा अभौतिक, * का संपूर्ण योग है जो समाजशास्त्रीय रूप से, अर्थात् परंपरा एवं संचरण द्वारा, क्षितिजीय एवं लंबे रूप में हस्तांतरणीय है।”
⦁    कोनिग (Koenig) के अनुसार-“संस्कृति मनुष्य द्वारा स्वयं को अपने पर्यावरण के साथ अनुकूलित करने एवं अपने जीवन के ढंगों को उन्नत करने के प्रयत्नों का संपूर्ण योग है।”
⦁     रैडफील्ड (Redfield) के अनुसार-संस्कृति ऐसे परंपरागत विश्वासों के संगठित समूह को कहते हैं जो कला एवं कलाकृतियों में प्रतिबिंबित होते हैं तथा जो परंपरा द्वारा चलते रहते हैं। और किसी मानव समूह की विशेषता को चित्रित करते हैं।”

उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि संस्कृति में दैनिक जीवन में पाई जाने वाली समस्त वस्तुएँ आ जाती हैं। मनुष्य भौतिक, मानसिक तथा प्राणिशास्त्रीय रूप में जो कुछ पर्यावरण से सीखता है उसी को संस्कृति कहा जाता है। यह सीखने की प्रक्रिया (समाजीकरण) द्वारा पूर्व पीढ़ियों से प्राप्त सामाजिक विरासत है जो शुक्राणुओं द्वारा स्वचालित रूप से हस्तांतरित जैविक विरासत से पूर्णतः भिन्न है। वस्तुतः संस्कृति पर्यावरण का मानव-निर्मित भाग है। यह उन तरीकों को कुल योग है जिनके द्वारा मनुष्य अपना जीवन व्यतीत करता है।

संस्कृति की प्रमुख विशेषताएँ
संस्कृति की संकल्पना को इसकी निम्नलिखित विशेषताओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-

1. परिवर्तनशीलता-संस्कृति सदा परिवर्तनशील है। इसमें परिवर्तन होते रहते हैं, चाहे वे परिवर्तन धीरे-धीरे हों या आकस्मिक रूप में। वास्तव में, संस्कृति मनुष्य की विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति की विधियों का नाम हैं। चूंकि समाज में परिस्थितियाँ सदा एक-सी नहीं रहती हैं इसलिए आवश्यकताओं की पूर्ति की विधियों में भी परिवर्तन करना पड़ता है। पहले तलवार से युद्ध किया जाता था, परंतु अब बंदूकों, तोपों, बमों द्वारा यह काम किया जाता हैं। पहले लोग बैलगाड़ियों से और पैदल यात्रा करते थे, अब वे हवाई जहाजे और मोटरों से यात्रा करते हैं। जब इस प्रकार की पद्धतियाँ समाज द्वारा स्वीकृत हो जाती हैं और आने वाली पीढ़ियों में हस्तांतरित कर दी जाती हैं तो संस्कृति में परिवर्तन हो जाता है। यह तो स्पष्ट ही है। कि प्रत्येक समाज के रहन-सहन में कुछ-न-कुछ परिवर्तन होता ही रहता है; अत: यह कहना ठीक ही है कि संस्कृति सदा परिवर्तनशील है।
2. आदर्शात्मक-संस्कृति में सामाजिक विचार, व्यवहार-प्रतिमान आदि आदर्श रूप में होते हैं। इनके अनुसार कार्य करना सुसंस्कृत होने का प्रतीक माना जाता है। सभी मनुष्य संस्कृति के आदर्श प्रतिमानों के अनुसार अपने जीवन को बनाने का प्रयास करते हैं। इसीलिए संस्कृति की प्रकृति आदर्शात्मक होती है।
3. सामाजिकता का गुण-संस्कृति का जन्म समाज में तथा समाज के सदस्यों द्वारा होता है। इसीलिए यह कहा जाता है कि मानव स्वयं अपनी संस्कृति का निर्माता होता है। मानव समाज के बाहर संस्कृति की रक्षा नहीं की जा सकती। पशु समाज संस्कृति-विहीन समाज है क्योंकि इसमें किसी प्रकार की संस्कृति नहीं होती है।
4. सीखा हुआ आचरण-व्यक्ति समाजीकरण की प्रक्रिया में कुछ-न-कुछ सीखता ही रहता है। ये सीखे हुए अनुभव, विचार-प्रतिमान आदि ही संस्कृति के तत्त्व होते हैं। इसलिए संस्कृति को सीखा हुआ व्यवहार कहा जाता है। बाल कटवाना, लाइन में खड़ा होना, अच्छे कपड़े पहनना, अभिवादन करना, नाचना-गाना आदि सीखे हुए व्यवहार के उदाहरण हैं। इस संबंध में ध्यान रखने की एक बात यह है कि मनुष्य समाज में रहकर अज्ञात रूप से भी अनेक बातें सीखता है। जिनको सीखने को वह स्वयं प्रयत्न नहीं करता। परिवार में रहकर व्यक्ति अनेक बातें अपना माता-पिता तथा अन्य व्यक्तियों से धीरे-धीरे सीखती है तथा अनेक बातें ऐसी होती हैं जिनकी उसको समुचित रूप से शिक्षा दी जाती है। मनुष्य जो कुछ भी ज्ञात-अज्ञात से समाज से सीखता। है वह सब संस्कृति में सम्मिलित होता है।
5. संगठित प्रतिमान-संस्कृति में सीखे हुए आचरण संगठित प्रतिमानों के रूप में होते हैं। संस्कृति में प्रत्येक व्यक्ति के आचरणों की इकाइयों में एक व्यवस्था और सबंध होता है। किसी भी मनुष्य का आचरण उसके पृथक्-पृथक् आचरणों की सूची नहीं होता। उदाहरण के लिए-बच्चा परिवार में जन्म लेता है। परिवार में उसे प्रारंभ से ही उसकी संस्कृति का ज्ञान कराया जाता है। बच्चे का बोलना, चलना-फिरना, व्यवहार करना आदि ऐसे प्राथमिक आचरण हैं जो आजीवन चलते रहते हैं। हमारे मस्तिष्क में इन सब वर्गों के व्यवहारों की जो एक संगठित रूपरेखा या स्वरूप है उसी को हम प्रतिमान कहते हैं। संस्कृति के अंतर्गत सीखे हुए व्यवहारों के इसी प्रकार के संगठित प्रतिमान सम्मिलित होते हैं।
6. पार्थिव या अपार्थिव दोनों तत्वों का विद्यमान रहना–संस्कृति के अंतर्गत दो प्रकार के तत्त्व आते हैं-एक, पार्थिव और दूसरे, अपार्थिव। ये दोनों ही तत्त्व संस्कृति का निर्माण करते हैं। अपार्थिव स्वरूप को हम आचरण या क्रिया कह सकते हैं अर्थात् जिन्हें छुआ या देखा न जा सके या जिनका कोई स्वरूप नहीं; जैसे-बोलना, गाना, अभिवादन करना आदि। जिन् पार्थिव या साकार वस्तुओं का मनुष्य सृजन करता है वे पार्थिव तत्त्वों के अंतर्गत आती हैं; जैसे—रेडियो, मोटर, टेलीविजन, सिनेमा आदि।
7. भिन्नता–प्रत्येक समाज की संस्कृति भिन्न होती हैं अर्थात् प्रत्येक समाज की अपनी पृथक् प्रथाएँ, परंपराएँ, धर्म, विश्वास, कला का ज्ञान आदि होते हैं। संस्कृति में भिन्नता के कारण ही विभिन्न समाजों में रहने वाले लोगों का रहन-सहन, खान-पान, मूल्य, विश्वास एवं रीति-रिवाज भिन्न-भिन्न होते हैं।
8. हस्तातंरण की विशेषता-संस्कृति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित हो जाती है। संस्कृति का अस्तित्व हस्तांतरण के कारण स्थायी बना रहता है। हस्तांतरण की यह प्रक्रिया निरंतर होती रहती है। संस्कृति का हस्तांतरण माता-पिता, वयोवृद्धों, अध्यापकों आदि के द्वारा होता है। यहाँ हस्तांतरण का आशय केल यही है कि एक पीढ़ी अपने आचरणों को दूसरी पीढ़ी को सिखा देती है अर्थात् ये एक पीढ़ी से दूसरी में स्वतः हस्तांतरित होते रहते हैं। यह हस्तांतरण या सीखना अज्ञात या आकस्मिक रूप में भी हुआ करता है। इस प्रकार, संस्कृति की यह एक और विशेषता है कि वह युगों से हस्तांतरित होती आती है।

40.

राज्य का दुःख कैसे दूर हो सकता है?

Answer»

राज्य का दु:ख अन्नदाता किसान को देखकर दूर हो सकता है।

41.

राज्य में उत्पन्न उलझनों से कौन निपटता है?

Answer»

राज्य में उत्पन्न उलझनों से राज्य को ही निपटना पड़ता है।

42.

कवि के अनुसार सच्चा राज्य कौन करते हैं ?

Answer»

सच्चा राज्य किसान करते हैं।

43.

‘किसानों के पास गोधन है’-यहाँ गोधन से तात्पर्य है?

Answer»

गोधन से तात्पर्य गायों रूपी धन है। किसान के पास गायें होती हैं, वे ही उनका धन हैं।

44.

किसान किस प्रकार परिश्रम रूपी समुद्र को धीरज से तैर कर पार करते हैं?

Answer»

किसान सहनशील हैं। वे परिश्रम रूपी समुद्र को अपने परिश्रम और धैर्य से तैर कर पार करते हैं।

45.

‘हम राज्य लिए मरते हैं’ कविता का मूलभाव क्या है?

Answer»

इस कविता का मूल भाव यह है कि राजा तो गृह-कलह से दु:खी रहता है परंतु किसान अपने सरल, सहज, शांतिपूर्ण तथा परिश्रमी जीवन से सदा सुखी रहता है।

46.

किसानों के रक्षक कौन हैं ?

Answer»

अयोध्या नरेश किसानों के रक्षक हैं।

47.

किसान का अपने पर गर्व करना कैसे उचित है?

Answer»

किसान का अपने पर गर्व करना इसलिए उचित है क्योंकि वह समस्त संसार का अन्नदाता होता है।

48.

निम्नलिखित पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या करें:होते कहीं वही हम लोग,कौन भोगता फिर ये भोग?उन्हीं अन्नदाताओं के सुख आज दुःख हरते हैं।हम राज्य लिए मरते हैं।

Answer»

उर्मिला कहती है कि यदि कहीं हम भी किसान होते तो फिर राज्य की गृह-कलह के कारण उत्पन्न कष्टों को कौन सहन करता? यदि हम भी किसान होते तो राज्य की उलझनों को सहज करने वाला भी तो कोई होना चाहिए। उन्हीं अन्नदाता किसानों के सुखों को देखकर ही आज हमारे दुःख दूर हो रहे हैं फिर भी हम राज्य के लिए लड़ते-मरते रहते हैं।

49.

निम्नलिखित पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या करें:करके मीन मेख सब ओर,किया करें बुध वाद कठोर,शाखामयी बुद्धि तजकर वे मूल धर्म धरते हैं।हम राज्य लिए मरते हैं।

Answer»

उर्मिला कहती है कि विद्वान् लोग हर बात में दोष निकाल कर व्यर्थ में बहस करते रहते हैं, चाहे उस से कुछ प्राप्त हो या न हो परंतु किसान इन व्यर्थ की बातों को त्यागकर सहज धर्म को अपनाते हैं। वे विद्वानों के चक्कर में न पड़कर धर्म के वास्तविक स्वरूप को सहज रूप से अपनाते हैं जबकि हम राज्य के लिए आपस में ही लड़ते-मरते रहते हैं।

50.

‘साकेत’ में किस की विरह-पीड़ा का सजीव चित्रण किया है?

Answer»

‘साकेत’ के ‘नवम् सर्ग’ में लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला की विरह-पीड़ा का सजीव चित्रण किया गया है क्योंकि वह अपने पति के साथ वनवास के लिए नहीं जा सकी थी और अपने महल में रहकर निरंतर चौदह वर्ष तक विरह-वियोग में आँसू बहाती रही थी।