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This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.

1.

गृह व्यवस्था करने के लिए किन-किन साधनों का प्रयोग किया जाता है तथा इनका महत्त्व क्या है?

Answer»

गृह व्यवस्था में परिवार के मानवीय और भौतिक साधन एक अभिन्न भूमिका निभाते हैं, परिवार की जायदाद, आमदन, भौतिक साधन हैं पर इनका पारिवारिक लक्ष्यों के लिए योग्य प्रयोग परिवार के मानवीय साधन पर निर्भर करता है। एक मेहनती और संयम से चलने वाला परिवार कम साधनों के बावजूद एक बढ़िया ज़िन्दगी व्यतीत कर सकता है जबकि एक नालायक और खर्चीला परिवार अधिक जायदाद और आमदन के बावजूद भी मुश्किल में होता है। इसलिए अच्छी व्यवस्था के लिए अच्छे भौतिक साधनों के साथ-साथ अच्छे मानवीय साधनों का होना भी अति आवश्यक है।

2.

अच्छे प्रबन्धक के किन्हीं छः गुणों के बारे में लिखो।

Answer»

घर की सही व्यवस्था पारिवारिक खुशी का आधार है। इसलिए घर की व्यवस्था चलाने वाले व्यक्ति का गुणवान होना आवश्यक है। एक अच्छे गृह प्रबन्धक में निम्नलिखित गुणों का होना अति आवश्यक है

  1. अच्छा खाना बनाना-एक अच्छी गृहिणी को खाना पकाना आना चाहिए जोकि घर के सभी सदस्यों की आवश्यकता अनुसार हो।
  2. समय की कीमत के बारे जानकारी-आजकल की तेज़ रफ्तार ज़िन्दगी में गृहिणियों को कई काम करने पड़ते हैं, जैसे बच्चों को स्कूल भेजना, पति को दफ्तर भेजना आदि। ये काम समय अनुसार ही होने चाहिएं। इसलिए गृहिणी को समय का ठीक प्रयोग करना चाहिए।
  3. अर्थशास्त्र के बारे में ज्ञान-आजकल महंगाई के ज़माने. में एक समझदार गृहिणी को बजट बनाना और उसके अनुसार चलना चाहिए।
  4. काम करने का उत्साह-एक अच्छे प्रबन्धक को अपने घर के सभी कामों को करने का उत्साह होना चाहिए। इससे घर के शेष सदस्य भी काम करने के लिए उत्साहित होंगे।
  5. सोचने और फैसला लेने की शक्ति-घर के प्रबन्ध में काम करने के साथसाथ सोच शक्ति का होना भी अति आवश्यक है। जो गृहिणी दिमाग से काम लेती है वह कम पैसे और शक्ति से भी बढ़िया घर व्यवस्था चला सकती है।
  6. सहनशीलता और स्व:नियन्त्रण-एक अच्छे गृह प्रबन्धक या गृहिणी में सहनशीलता का होना अति आवश्यक है। जहाँ गृहिणी में सहनशीलता और स्व:नियन्त्रण नहीं होता उन घरों का प्रबन्ध भी अच्छा नहीं होता।
3.

अच्छी गृह व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य लक्ष्यों की पूर्ति करना है। स्पष्टीकरण दें।

Answer»

अच्छी गृह व्यवस्था का उद्देश्य लक्ष्यों की पूर्ति करना ही है। प्रत्येक परिवार के कुछ-न-कुछ लक्ष्य होते हैं। लक्ष्य परिवार के सदस्यों के वे कार्य होते हैं जिनको वह अकेले या मिलकर करते हैं। प्रत्येक परिवार के कुछ-न-कुछ लक्ष्य अवश्य निर्धारित होते हैं जो समय-समय पर बदलते रहते हैं। समय अनुसार इनको दो भागों में विभाजित किया जाता है —

  1. छोटे समय के लक्ष्य (Short Term Goals) जैसे बच्चों को स्कूल भेजना, काम पर जाना और घर के अन्य रोज़ाना कार्य।

दीर्घ समय के लक्ष्य (Long Term Goals) जैसे मकान बनाना, बच्चों के विवाह करने आदि।
इन लक्ष्यों को इनकी किस्म अनुसार दो भागों में बांटा जा सकता है

  1. व्यक्तिगत लक्ष्य
  2. पारिवारिक लक्ष्य।

व्यक्तिगत लक्ष्य जैसे बड़े बच्चे ने डॉक्टर बनना है। पारिवारिक लक्ष्य जैसे परिवार के लिए घर बनाना है।

इन लक्ष्यों की पूर्ति के लिए परिवार के साधनों का योग्य प्रयोग अति आवश्यक है। इसके योग्य प्रयोग के लिए गृह प्रबन्धक की कुशलता योग्यता और ज्ञान पर निर्भर करती है। इसलिए एक अच्छी गृह व्यवस्था से लक्ष्यों की पूर्ति हो सकती है।

4.

अच्छे गृह प्रबन्धक में काम करने का उत्साह क्यों आवश्यक है?

Answer»

इससे परिवार के अन्य सदस्य भी काम करने के लिए उत्साहित होते हैं।

5.

गृह प्रबन्धक के मानसिक गुण बताओ।

Answer»

बुद्धि, ज्ञान, उत्साह, निर्णय लेने की शक्ति, कल्पना शक्ति आदि।

6.

गृह प्रबन्धक को अच्छा खरीददार होना क्यों ज़रूरी है?

Answer»

गृह प्रबन्धक को अच्छा खरीददार होना चाहिए। उसको घर के सदस्यों की आवश्यकताओं का पता होना चाहिए तथा ऐसा सामान खरीदना चाहिए जो सभी के लिए लाभदायक हो। बाज़ार में सर्वे करके बढ़िया तथा सस्ता सामान खरीदना चाहिए। लम्बे समय तक स्टोर की जाने वाली वस्तुओं को, जब वे सस्ती हों, अधिक मात्रा में खरीद लेना चाहिए। केवल वही वस्तुओं को खरीदना चाहिए जिनकी घर में आवश्यकता हो तथा लाभकारी हों।

7.

लक्ष्य से आप क्या समझते हो?

Answer»

लक्ष्य परिवार के सदस्यों के वे कार्य होते हैं जिनको वह अकेले या मिलकर करते हैं। प्रत्येक परिवार के कुछ-न-कुछ लक्ष्य अवश्य निर्धारित होते हैं जो समय-समय पर बदलते रहते हैं।

8.

समय के अनुसार लक्ष्य कैसे बांटा जा सकता है?

Answer»
  1. छोटे समय के लक्ष्य (Short Term Goals) जैसे बच्चों को स्कूल भेजना, काम पर जाना और घर के अन्य रोज़ाना कार्य।
  2. दीर्घ समय के लक्ष्य (Long Term Goals) जैसे मकान बनाना, बच्चों के विवाह करने आदि।
9.

व्यक्ति की योग्यता तथा रुचि कौन-से साधन हैं और कैसे?

Answer»

योग्यता और रुचि महत्त्वपूर्ण मानवीय साधन हैं क्योंकि ये साधन मनुष्य में समाए हुए होते हैं और मनुष्य का ही भाग हैं। इनके अस्तित्व के बिना किसी भी भौतिक साधन का योग्य प्रयोग असम्भव है।

10.

किस गृहिणी को कुशल गृहिणी कहेंगे?

Answer»

वह गृहिणी कुशल गृहिणी कहलाएगी जो पारिवारिक आवश्यकताओं को व्यवस्थित ढंग से पूरा कर सके तथा परिवार के सभी सदस्यों का उचित सहयोग भी प्राप्त कर सके।

11.

गृह-व्यवस्था का वास्तविक उद्देश्य है(क) कार्यों को कुशलतापूर्वक करना(ख) भविष्य के लिए बचत करना(ग) भोजन एवं पोषण का ध्यान रखना(घ) परिवार के सदस्यों को सुखी एवं सन्तुष्ट रखना।

Answer»

सही विकल्प है (घ) परिवार के सदस्यों को सुखी एवं सन्तुष्ट रखना।

12.

उत्तम गृह-व्यवस्था के लिए आवश्यक है(क) पारिवारिक आय का अधिक होना(ख) परिवार के सदस्यों का अधिक होना(ग) विलासिता के साधन उपलब्ध होना (घ) गृह-व्यवस्था का व्यावहारिक ज्ञान होना

Answer»

सही विकल्प है (घ) गृह-व्यवस्था का व्यावहारिक ज्ञान होना

13.

गृह-व्यवस्था के मार्ग में बाधा है(क) उत्तम नियोजन(ख) समुचित ज्ञान का अभाव(ग) उपकरणों का अधिक उपयोग(घ) मकान का अधिक बड़ा होना।

Answer»

सही विकल्प है (ख) समुचित ज्ञान का अभाव

14.

भौतिक साधन है(क) पैसा(ख) जायदाद(ग) घर का सामान(घ) सभी ठीक

Answer»

सही विकल्प है (घ) सभी ठीक

15.

कोई दो विद्वानों द्वारा दी गई गृह विज्ञान की परिभाषाएं दें।

Answer»
  1. पी० निक्कल तथा जे० एम० डोरसी के अनुसार, गृह प्रबन्ध परिवार के उद्देश्यों को प्राप्त करने के इरादे से परिवार में उपलब्ध साधनों को योजनाबद्ध तथा संगठित करके अमल में लाने का नाम है।
  2. गुड्ड जॉनसन के अनुसार, गृह व्यवस्था करना सभी देशों में एक आम व्यवसाय (कार्य) है तथा इस व्यवसाय में अन्य व्यवसायों से अधिक लोग कार्यरत हैं। इसमें धन का प्रयोग भी अधिक होता है तथा यह लोगों के स्वास्थ्य की दृष्टि से सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है।
16.

विज्ञान की प्रगति से गृह व्यवस्था कैसे जुड़ी हुई है?

Answer»

विज्ञान की उन्नति से गृह प्रबन्ध में कई बढ़िया परिवर्तन आए हैं। आजकल बाज़ार में ऐसे उपकरण मिलते हैं जिनसे गृहिणी का समय और शक्ति दोनों की बहुत बचत होती है। जैसे मिक्सी, आटा गूंथने की मशीन, कपड़े धोने वाली मशीन, फ्रिज, माइक्रोवेव ओवन आदि। इन उपकरणों का सही प्रयोग करके गृहिणियां अपने गृह प्रबन्ध को अच्छे ढंग से चला सकती हैं। इसके अतिरिक्त टेलीविज़न और इन्टरनेट जैसे वैज्ञानिक उपकरण भी नई-से-नई जानकारी प्रदान करके गृहिणियों की सहायता करते हैं।

17.

गृह प्रबन्धक के मानसिक गुण हैं(क) बुद्धि(ख) उत्साह(ग) ज्ञान(घ) सभी ठीक

Answer»

सही विकल्प है (घ) सभी ठीक

18.

अच्छे गृह प्रबन्धक में काम करने का उत्साह तथा निर्णय लेने की शक्ति का होना क्यों ज़रूरी है?

Answer»

अच्छे गृह प्रबन्धक में काम करने का उत्साह इसलिए आवश्यक है कि इससे परिवार के शेष सदस्य भी काम करने के लिए उत्साहित होते हैं। गृह प्रबन्धक की फैसला लेने की शक्ति से समय की बचत होती है और परिवार के शेष सदस्यों को प्रतिनिधित्व मिलता है।

19.

अच्छे गृह प्रबन्धक के दो गुण बताओ।

Answer»

अच्छा खाना पकाना, सोचने तथा निर्णय लेने की शक्ति।

20.

गृह-व्यवस्था में पति-पत्नी की भूमिका भी स्पष्ट कीजिए।यास्पष्ट कीजिए कि गृह-व्यवस्था का दायित्व केवल गृहिणी का नहीं बल्कि पति-पत्नी दोनों का होता है।

Answer»

सामान्य रूप से माना जाता है कि गृह-व्यवस्था का दायित्व गृहिणी या पत्नी का है, परन्तु यह धारणा भ्रामक एवं त्रुटिपूर्ण है। वास्तव में, उत्तम गृह-व्यवस्था के लिए पति तथा पत्नी दोनों को पूर्ण सहयोगपूर्वक कार्य करना चाहिए। इस सन्दर्भ में पति-पत्नी प्रायः पूरक की भूमिका निभाते हैं।

आधुनिक एकाकी परिवारों में गृह-व्यवस्था को उत्तम बनाने के लिए पुरुष अर्थात् पति को भी घरेलू कार्यों में यथासम्भव सहयोग प्रदान करना चाहिए। उदाहरण के लिए-पति को अनिवार्य रूप से बच्चों की देख-रेख में पत्नी को सहयोग प्रदान करना चाहिए। बाजार से आवश्यक वस्तुएँ खरीदने तथा घर के विभिन्न बिल आदि जमा करने के कार्य पुरुषों को ही करने चाहिए। इसी प्रकार परिवार की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए पत्नी को भी आर्थिक गतिविधियों में यथासम्भव योगदान देना चाहिए। अब बहुत-सी महिलाएँ नौकरी करती हैं अथवा किसी अन्य व्यवसाय में संलग्न होती हैं। ऐसे परिवारों में पति-पत्नी दोनों ही गृह-व्यवस्था में समान रूप से योगदान देते हैं। ऐसे परिवारों में पति को भी गृह-व्यवस्था में समान रूप से योगदान प्रदान करना चाहिए। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि गृह-व्यवस्था में स्त्री-पुरुष दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। वास्तव में, गृह-व्यवस्था की नीति को निर्धारित करते समय पति-पत्नी को परस्पर विचार-विमर्श अवश्य करना चाहिए। एक-दूसरे के सुझावों को समुचित महत्त्व प्रदान करना चाहिए तथा कोई भी अन्तिम निर्णय लेते समय उनमें मतैक्य होना चाहिए।

21.

अच्छे प्रबन्धक के लिए अर्थशास्त्र का ज्ञान क्यों ज़रूरी है?

Answer»

अच्छे प्रबन्धक को बजट बनाना तथा उसके अनुसार कार्य करना आना चाहिए। उपभोक्तावाद के इस युग में कौन-सी वस्तुओं को अधिक खरीद कर लाभ हो सकता है तथा कुछ वस्तुओं को आवश्यकता के अनुसार खरीदना चाहिए। कुछ पैसे भविष्य के लिए बचा कर रखने चाहिए। आमदनी तथा खर्च में सामंजस्य होना चाहिए। यह तभी सम्भव है यदि गृह प्रबन्धक को अर्थशास्त्र का ज्ञान होगा।

22.

गृह-व्यवस्था का मनुष्य के जीवन में क्या महत्त्व है?

Answer»

व्यक्ति एवं परिवार के जीवन में सर्वाधिक महत्त्व व्यवस्था का है। व्यवस्थित जीवन ही प्रगति एवं सफलता की कुंजी है। पारिवारिक जीवन में व्यवस्था अति आवश्यक है। व्यवस्था द्वारा ही उपलब्ध साधनों का सदुपयोग किया जाता है तथा निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति की जा सकती है। यदि गृह-व्यवस्था का अभाव हो, तो सभी साधन उपलब्ध होते हुए भी लक्ष्यों की प्राप्ति नहीं हो पाती। परिवार के सदस्यों की विविध आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यवस्था अति आवश्यक होती है अन्यथा आवश्यकताओं में आन्तरिक विरोध एवं असन्तुलन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। गृह-व्यवस्था की स्थिति में परिवार के सभी सदस्य परस्पर सहयोग से कार्य करते हैं तथा परिवार में अनुशासन का वातावरण बना रहता है। इसके विपरीत गृह-व्यवस्था के अभाव में परिवार के सदस्यों में न तो आपसी सहयोग रह पाता है और न ही अनुशासन ही बना रहता है। गृह-व्यवस्था का अच्छा प्रभाव परिवार के बच्चों के विकास पर भी पड़ता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि गृह-व्यवस्था परिवार के सभी पक्षों के लिए महत्त्वपूर्ण है। गृह-व्यवस्था के परिणामस्वरूप घर अथवा परिवार प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होता है तथा किसी भी प्रकार के आकस्मिक संकट का सामना भी सरलता से कर लेता है।

23.

समय और शक्ति कौन-से साधन हैं?

Answer»

समय एक भौतिक साधन है और प्रत्येक व्यक्ति के पास रोज़ाना 24 घण्टे का समय होता है। शक्ति एक मानवीय साधन है क्योंकि यह मनुष्य का भाग है जो कि भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न होती है। इन साधनों के सदुपयोग से पारिवारिक लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है।

24.

घर के साधनों में समय और शक्ति की व्यवस्था महत्त्वपूर्ण कैसे है?

Answer»

समय और शक्ति ऐसे साधन हैं जिनको बचाकर नहीं रखा जा सकता। इनकी उपयोगिता इनके सही प्रयोग से जुड़ी हुई है। जिस परिवार में समय और परिवार के सदस्यों की शक्ति को सही ढंग से प्रयोग में लाया जाता है वह परिवार अपने लक्ष्यों की प्राप्ति आसानी से कर लेता है।

25.

शक्ति कैसा साधन है?

Answer»

सही उत्तर है मानवीय साधन

26.

गृह व्यवस्था से क्या अभिप्राय है? इसके महत्त्व के बारे में विस्तारपूर्वक लिखें।

Answer»

गृह प्रबन्ध का महत्त्व (Importance of Home Management) — प्रबन्ध प्रत्येक घर में होता है यद्यपि अमीर हो या ग़रीब। पर इसकी गुणवत्ता में ही अन्तर होता है। पारिवारिक खुशहाली और सुख-शान्ति समूचे गृह प्रबन्ध का निष्कर्ष है। 

निम्नलिखित महत्त्व के कारण यह परिवार के लिए लाभदायक है

  1. रहन-सहन का स्तर ऊंचा होता है । (Rise in standard of living.)
  2. पारिवारिक कार्यों को वैज्ञानिक ढंगों से किया जा सकता है। (Use of scientific methods and appliances for working.)
  3. कुशलता का विकास होता है। (Development of skill.)
  4. सीमित साधनों से बढ़िया जीवन गुज़ारा जा सकता है। (More satisfaction with limited resources.)
  5. जीवन खुशहाल और सुखमयी होता है। (Life becomes pleasant and comfortable.)
  6. बच्चों के लिए शिक्षा और उनका योगदान (Children learn by contributing their share and responsibility.)

रहन-सहन का स्तर ऊंचा होता है — जीवन का स्तर तभी ऊंचा उठ सकता है, यादि सीमित साधनों के योग्य प्रयोग से अधिक-से-अधिक लाभ उठाया जाए और एक अच्छी गृहिणी प्रबन्ध द्वारा अपनी मुख्य आवश्यकताओं और उद्देश्यों को न पहल देकर बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, समय, व्यक्तित्व को पहल देती है और हमेशा परिवार के उद्देश्यों के लिए यत्नशील रहती है। ऐसे परिवार के सदस्य सन्तुष्ट और अच्छे व्यक्तित्व के मालिक होते हैं और वे समाज में अपनी जगह बना लेते हैं। इन सब से ही परिवार का स्तर ऊँचा होता है।

2. पारिवारिक कार्यों को वैज्ञानिक ढंगों से किया जा सकता है — आधुनिक युग की गृहिणी सिर्फ घर तक ही सीमित नहीं रहती बल्कि वह घरों से बाहर भी काम करती है। दोनों ज़िम्मेदारियों को अच्छी तरह निभाने के लिए उसको अधिक समय और शक्ति की आवश्यकता है। वह घरेलू कामों को मशीनी उपकरणों से करने से समय और शक्ति दोनों ही बचा लेती है जैसे मिक्सी, प्रेशर कुक्कर, फ्रिज, कपड़े धोने वाली मशीन और बर्तन साफ़ करने वाली मशीन आदि।

3. कुशलता का विकास होता है — गृह प्रबन्ध करते समय साधनों का उचित प्रयोग गृहिणी की आन्तरिक कला और रुचि का विकास करती है। जैसे कि घर को कम-से-कम व्यय करके कैसे सजाया जाए कि घर की सुन्दरता भी बढ़े और अधिकसे-अधिक सन्तुष्टि भी मिले।

4. सीमित साधनों से बढ़िया जीवन गुजारा जा सकता है — प्रत्येक परिवार में ही आय और साधन सीमित होते हैं आवश्यकताएं असीमित। परिवार की खुशी बनाये रखने के लिए गृह प्रबन्ध द्वारा असीमित आवश्यकताओं को सीमित आय में पूरा करने के लिए गृहिणी को घर के खर्चे का बजट बनाकर और आवश्यकताओं को महत्ता के अनुसार क्रमानुसार कर लेना चाहिए। सबसे ज़रूरी और मुख्य आवश्यकताओं को पहले पूरा करके फिर अगली आवश्यकताओं की ओर ध्यान दिया जा सकता है। इससे कम-से-कम साधनों से अधिक-से-अधिक सन्तुष्टि प्राप्त की जा सकती है।

5. जीवन खुशहाल और सुखमयीं होता है — गृह प्रबन्ध का मुख्य उद्देश्य खुशहाल परिवार का सृजन है। अच्छे प्रबन्ध से परिवार के प्रत्येक सदस्य की आवश्यकताओं, रुचियों और सुविधाओं का ध्यान रखा जाता है; जिससे परिवार खुश और सन्तुष्ट रहता है। इसके अतिरिक्त गृह प्रबन्ध से

  1. पारिवारिक सदस्यों को सन्तुष्टि और मानसिक सन्तुष्टि मिलती है जो एक अच्छे व्यक्तित्व के लिए बहुत आवश्यक है।
  2. परिवार फिजूल खर्ची से बच जाता है क्योंकि यदि बजट बनाकर खर्च किया जाए तो फिजुल खर्ची की सम्भावना ही नहीं रहती।
  3. घरेलू उलझनें हल हो जाती हैं और इससे
  4. परिवार के आराम और मनोरंजन को भी आँखों से ‘ओझल नहीं किया जाता।

6. बच्चों के लिए शिक्षा और उनका योगदान- घर के वातावरण की बच्चे के जीवन पर अमिट छाप रहती है। एक खुशहाल परिवार के बच्चे हमेशा सन्तुष्ट होते हैं। अपने मां-बाप के अच्छे घरेलू प्रबन्ध से प्रभावित होकर बच्चे भी अच्छी शिक्षा लेते हैं और अपनी ज़िन्दगी में सफल होते हैं। जिन परिवारों में सभी सदस्य इकट्ठे होकर अपने उद्देश्य के लिए योजनाबन्दी करते हैं और प्रत्येक अपनी-अपनी योग्यता और ज़िम्मेदारी से सहयोग देता है तो उद्देश्यों की पूर्ति बड़ी आसानी से हो जाती है और परिवार का प्रत्येक सदस्य सन्तुष्ट होता है। भाव गृह प्रबन्ध खुश और सुखी परिवार का आधार है।

27.

अच्छा गृह प्रबन्धक बनने के लिए अपने में क्या सुधार लाये जा सकते हैं ?

Answer»

गृह प्रबन्धक, गृह व्यवस्था का धुरा होता है। घर की पूरी व्यवस्था उसके इर्द-गिर्द घूमती है। पारिवारिक लक्ष्यों की पूर्ति और घर की खुशहाली, सुख-शान्ति उसकी योग्यता पर ही निर्भर करती है। ग्रहणशीलता अर्थात् वातावरण के अनुसार अपने आपको ढालना, घर की आवश्यकताओं के अनुसार अपनी कमज़ोरियों को दूर करना अच्छे गृह प्रबन्धक की निशानियां हैं। 

अच्छे गृह प्रबन्धक को अपने आप में निम्नलिखित सुधार लाने चाहिएं —

1. ज्ञान को बढ़ाना- ज्ञान एक बहुत ही अनमोल मानवीय स्रोत है और ज्ञान प्राप्त करने से ही व्यक्ति समझदार और योग्य बनता है। गृह प्रबन्ध के मसले में ज्ञान का बहुत महत्त्व है। एक अच्छी गृहिणी, घर से सम्बन्धित मामलों में हर समय जानकारी प्राप्त करने के लिए तैयार रहती है। आजकल विज्ञान का युग है और समाज में बहुत तेजी से परिवर्तन आ रहे हैं।
कपड़े, भोजन, स्वास्थ्य, वैज्ञानिक उपकरणों के बारे में ज्ञान होना गृह प्रबन्धक की आवश्यकता है। इसलिए अच्छे गृह प्रबन्धक को अपने ज्ञान का स्तर बढ़ाना चाहिए।

2. कार्य में कुशलता प्राप्त करनी- कार्य में कुशलता एक सफल गृहिणी का महत्त्वपूर्ण गुण है। घर के कार्य ऐसे होते हैं जिनमें कुशलता प्राप्त करने के लिए गृहिणी को लगातार मेहनत करने की आवश्यकता पड़ती है। जैसे पौष्टिक और स्वादिष्ट खाना प्रत्येक घर की आवश्यकता है। समझदार गृहिणी अपनी कोशिश से बढ़िया खाना बनाना सीख सकती है। इस तरह घर के अन्य कार्य जैसे कपड़े सिलना, वैज्ञानिक उपकरणों का सही प्रयोग, घर की सफ़ाई आदि में प्रत्येक गृहिणी को कुशलता प्राप्त करनी चाहिए।

3. सामाजिक और नैतिक गुणों का विकास करना- परिवार समाज की एक प्रारम्भिक इकाई है। कोई भी परिवार समाज से अलग नहीं रह सकता। इसलिए समाज में परिवार का एक इज्जत योग्य स्थान बनाने के लिए गृहिणी को सामाजिक गुणों का विकास करना चाहिए। आस-पड़ोस से बढ़िया सम्बन्ध रखने, सामाजिक जिम्मेदारियों को अच्छी तरह निभाना, दूसरे लोगों से सहयोग करना, मुसीबत के समय किसी के काम आना, ग़रीबों से हमदर्दी रखना आदि गुण विकसित करके एक गृहिणी समाज में परिवार की इज्जत बढ़ा सकती है।

4. परिवार के सदस्यों की मानसिक बनावट को समझना- परिवार के सदस्यों का स्वभाव और मानसिकता भिन्न-भिन्न होती है जो गृहिणी हमारे परिवार के सदस्यों से एक तरह व्यवहार करती है, उसको सफल गृहिणी नहीं कहा जा सकता। इसलिए एक सफल गृहिणी को परिवार के सभी सदस्यों की मानसिकता को ध्यान में रखकर ही उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति के यत्न करने चाहिए ताकि परिवार के सभी सदस्य खुश रह सकें।

5. सहनशीलता और धैर्य- सहनशीलता और धैर्य ऐसे गुण हैं जो प्रत्येक सफल गृह प्रबन्धक में होने चाहिएं। यदि गृहिणी में इनकी कमी है तो उस घर में कभी सुख शान्ति नहीं रह सकती। गृहिणी परिवार का एक धुरा होता है। सारा परिवार अपनी आवश्यकताओं के लिए उसकी ओर देखता है और गृहिणी को प्रत्येक सदस्य की बात धैर्य से सुनकर उसका समाधान ढूंढना चाहिए। इससे घर का वातावरण ठीक रहता है। यदि गृहिणी में ही सहनशीलता की कमी है तो घर में अशान्ति और लड़ाई झगड़े होंगे और घर की बदनामी होगी और परिवार अपने उद्देश्य पूरे नहीं कर सकेगा। ऐसे वातावरण में बच्चों के व्यक्तित्व का विकास बढ़िया नहीं होगा इसलिए एक अच्छी गृहिणी को सहनशीलता और धैर्य रखने के गुण विकसित करने चाहिएं।

6. तकनीकी गुणों का विकास- आजकल विज्ञान का युग है। एक सफल प्रबन्धक के लिए घर में प्रयोग आने वाले उपकरणों की सही प्रयोग की जानकारी बहुत आवश्यक है और यह जानकारी इन उपकरणों के साथ दिए गए निर्देशों में से आसानी से प्राप्त की जा सकती है। इस जानकारी से इन उपकरणों को घर के प्रबन्ध में आसानी से प्रयोग कर सकती है और अपनी शक्ति और समय बचा सकती है।

आजकल की तेज़ रफ्तार ज़िन्दगी में प्रत्येक गृहिणी को कार या स्कूटर की ड्राइविंग भी अवश्य सीखनी चाहिए। इससे उसमें घर की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए दूसरों पर निर्भरता कम होगी। इसके अतिरिक्त बच्चों को पढ़ाने के लिए हर जानकारी प्राप्त करने के लिए कम्प्यूटर और इन्टरनेट के बारे में सीखना चाहिए।

28.

एक कुशल गृहिणी के लिए आवश्यक है(क) पाक विज्ञान का उचित ज्ञान(ख) बच्चों के पालन-पोषण का ज्ञान(ग) समस्त गृह-कार्यों का ज्ञान(घ) प्राथमिक चिकित्सा का ज्ञान।

Answer»

सही विकल्प है (ग) समस्त गृह-कार्यों का ज्ञान

29.

मानवीय साधनों की दो उदाहरण दें।

Answer»

कुशलता, स्वास्थ्य, योग्यता आदि।

30.

गृह व्यवस्था व्यक्तित्व का विकास किस प्रकार करती है?

Answer»

यदि गृह व्यवस्था अच्छी हो तो मनुष्य घर में सुख, आनन्द की प्राप्ति कर लेता है तथा सन्तुलित रहता है। ऐसे आनन्दमयी तथा सुखी वातावरण का प्रभाव बच्चों पर भी अच्छा पड़ता है तथा उसका सर्वपक्षीय विकास होता है। घर में ही बच्चों में कार्य करने सम्बन्धी लगन लगती है। बहुत से महान् कलाकारों को यह वरदान घर से ही प्राप्त हुआ है।

31.

किसी गृहिणी को गृह-व्यवस्था के संचालन में कौन-कौन सी कठिनाइयाँ हो सकती हैं?

Answer»

⦁ लक्ष्य एवं साधनों का ज्ञान न होना
⦁ पारिवारिक समन्वय का अभाव तथा
⦁ समस्याओं के निराकरण की अयोग्यता।

32.

योजनानुसार कार्य करने से क्या लाभ हैं?

Answer»

योजनानुसार कार्य करने से धन, श्रम एवं समय की बचत होती है।

33.

निम्नलिखित में से कौन-सा साधन भौतिक साधनों से सम्बन्धित नहीं है?(क) धन(ख) कुकिंग गैस(ग) कूलर(घ) नौकर

Answer»

सही विकल्प है (घ) नौकर

34.

गृह-व्यवस्था से सम्बन्धित साधन हैं(क) भौतिक साधन(ख) मानवीय साधन(ग) सार्वजनिक साधन(घ) ये सभी साधन

Answer»

सही विकल्प है (घ) ये सभी साधन

35.

गृह प्रबन्धक के सामाजिक तथा नैतिक गुण बताओ।

Answer»

दृढ़ता, सहयोग, प्यार, हमदर्दी, स्वः नियन्त्रण की भावना आदि।

36.

टिप्पणी लिखिए-परिवार में नैतिक मूल्यों की शिक्षा।

Answer»

गृह-व्यवस्था का एक उल्लेखनीय उद्देश्य परिवार के सदस्यों, विशेष रूप से बच्चों एवं किशोरों का नैतिक विकास करना भी है। वास्तव में, नैतिक-विकास के अभाव में गृह-व्यवस्था को सुचारु एवं उत्तम नहीं माना जा सकता। नैतिक विकास के लिए माता-पिता को नियोजित ढंग से प्रयास करने चाहिए तथा स्वयं नैतिक आदर्श प्रस्तुत करने चाहिए। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों को नैतिक मूल्यों की शिक्षा नियोजित रूप से प्रदान करें।

37.

गृह-व्यवस्था की एक स्पष्ट परिभाषा लिखिए।

Answer»

गृह-व्यवस्था के अन्तर्गत परिवार के साधनों का नियोजन, नियन्त्रण तथा मूल्यांकन’ आता है। -निकिल तथा डारसी

38.

गृह-व्यवस्था को प्रभावित करने वाले परिवार सम्बन्धी कारकों का वर्णन कीजिए।यापरिवार के सदस्यों से सम्बन्धित वैयक्तिक कारक भी गृह-व्यवस्था को प्रभावित करते हैं।” इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए गृह-व्यवस्था को प्रभावित करने वाले परिवार सम्बन्धी कारकों का विवरण प्रस्तुत कीजिए।

Answer»

परिवार के सन्दर्भ में व्यवस्था का लक्ष्य आदर्श परिवार का निर्माण करना है। आदर्श परिवार का अर्थ है-परिवार के सब सदस्यों में परस्पर प्रेम, सहयोग और सन्तोष की भावना का व्याप्त होना। परिवार का वातावरण ऐसा होना चाहिए जिसमें परिवार का प्रत्येक सदस्य अर्थात् माता-पिता, पति-पत्नी, भाई-बहन, सन्तान, सास-ससुर अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति समान रूप से सजग रहें। प्रत्येक सदस्य सन्तोष का अनुभव कर सके और प्रत्येक सदस्य को अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक सुविधाएँ मिल सकें। गृह-व्यवस्था को प्रभावित करने वाले परिवार सम्बन्धी कारकों के विवरण निम्नलिखित हैं

(1) परिवार के सदस्यों में सौहार्द एवं समन्वय:
पारिवारिक व्यवस्था में परिवार के सदस्यों की शारीरिक व मानसिक आवश्यकताओं, संवेगों, भावनाओं, विश्वासों, विचारों और मूल्यों का समन्वय होना चाहिए। परिवार में विभिन्न आयु, व्यवसाय, लिंग और रुचियों के सदस्य होते हैं। उनकी मनोविज्ञान, विचारधारा एवं आवश्यकताएँ भी काफी भिन्न होती हैं। उदाहरण के लिए-परिवार के वृद्ध व्यक्तियों की विचारधारा और युवा वर्ग की विचारधारा में स्पष्ट अन्तर होता है। युवकों को अपने विचारों के अनुरूप कार्य करने के लिए वृद्धों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए वरन् समन्वयात्मक प्रवृत्ति का परिचय देना चाहिए। धैर्य और सूझ-बूझ से समयानुसार उनके विचारों में परिवर्तन लाने का प्रयत्न करना चाहिए और जहाँ आवश्यकता हो स्वयं को भी उदार बना लेना चाहिए। पारिवारिक सम्बन्धों में त्याग, उदारता और सहिष्णुता की आवश्यकता होती है। परिवार में भी संघर्ष होता है जो बहुत स्वाभाविक है, लेकिन यह संघर्ष इतना उग्र नहीं होना चाहिए जो पारिवारिक सम्बन्धों में दरार पैदा कर दे। माता-पिता और सन्तान में भी एक पीढ़ी का अन्तर होता है; इसलिए उनके विचारों व कार्य-पद्धति में अन्तर होगा ही। इसी अन्तर को कम करना समन्वय और सौहार्द्र व्यवस्था है।

(2) अच्छा आचरण, व्यवहार तथा आदतें:
बच्चे का मन और मस्तिष्क एक कोरी स्लेट के समान होता है। उसको अच्छी-बुरी आदतें, आचरण और व्यवहार के नियम परिवार में ही सिखाए जाते हैं। बच्चों के आचरण और व्यवहार से उसके परिवार के वातावरण और परिवेश की जानकारी सरलती से ज्ञात की जा सकती है। अच्छा परिवार ही अच्छा व्यवहार और अच्छी आदतें सिखाता है। व्यवस्थित परिवार की पहचान, सदस्यों की व्यवस्थित और अच्छी आदतें हैं। बड़ों का आदर करना चाहिए, बातचीत के समय मधुर वाणी और कोमल शब्दों का प्रयोग होना चाहिए जिससे किसी की भावनाओं को ठेस न पहुँचे। परिवार में सीखी आदतें ही स्कूल और समाज में काम आती हैं। अपनी बात कहना लेकिन धैर्यपूवर्क दूसरे की बात भी सुनना आपस में अच्छे सम्बन्ध बनाता है।

(3) आवश्यकतानुसार अनुकूलन:
विवाह से पूर्व लड़की माता-पिता के लाड़-प्यार में बहुत स्वतन्त्र जीवन व्यतीत करती है तथा प्राय: अपने कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों से भी अनभिज्ञ होती है, किन्तु विवाह के पश्चात् उसे आवश्यकतानुसार और ससुराल के सम्बन्धों के अनुसार त्याग करना होता है, धैर्य और सहनशीलता से काम करना होता है। पति-पत्नी के स्वभाव और रुचियों में अन्तर या विरोध भी हो सकता है, लेकिन आदर्श परिवार के लिए दोनों ही अपने स्वभाव में परिवर्तन करते हैं, एक-दूसरे के अनुकूल बनने का प्रयत्न करते हैं। माता-पिता बच्चों के हितों के अनुरूप अपने स्वतन्त्र और स्वच्छन्द जीवन को नियन्त्रित कर लेते हैं। यह अनुकूलन स्वाभाविक, स्वतन्त्र, स्वेच्छापूर्ण और सन्तोषजनक होता है। इस असन्तुलन के लिए बाहरी प्रयासों की आवश्यकता नहीं होती, यह स्वतः ही होता है। इस प्रकार आवश्यकतानुसार अनुकूलन भी गृह-व्यवस्था को प्रभावित करने वाला एक महत्त्वपूर्ण कारक है।

(4) सुरक्षा की भावना:
परिवार में प्रत्येक व्यक्ति अपने को सुरक्षित अनुभव करता है। यदि परिवार के सदस्य अपने को असुरक्षित और असहाय अनुभव करते हैं, तो उनमें कुण्ठा और हीन भावना पैदा हो जाती है तथा उनका आत्मविश्वास धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि परिवार में उत्तम व्यवस्था बनाए रखने के लिए परिवार के सभी सदस्यों में सुरक्षा की समुचित भावना अवश्य होनी चाहिए।

(5) सामर्थ्य का ज्ञान:
व्यवस्थित परिवार में प्रत्येक सदस्य को उसकी सामर्थ्य और शक्ति का ज्ञान कराया जाता है। छोटा या असहाय समझने से व्यक्ति के आत्म-सम्मान को चोट पहुँचती है, उसका समुचित विकास नहीं हो पाता। धनी परिवारों में या अधिक लाड़-प्यार वश कुछ माता-पिता बच्चों को कोई भी काम नहीं करने देते हैं। अतः न तो बच्चे किसी कार्य के लिए परिश्रम करते हैं, न प्रयत्न। माँगने पर उन्हें हर चीज मिल जाती है। उनके लिए जीवन बड़ा सरल होता है। दूसरी ओर, जिन बच्चों को प्रारम्भ से ही उनकी सामर्थ्य और शक्ति के अनुरूप काम करना सिखाया जाता है, वे अधिक उत्तरदायी होते हैं। संघर्षों का मुकाबला वे अधिक साहस और हिम्मत के साथ करते हैं।

(6) उन्नति:
यदि परिवार में व्यवस्था है, विचारों का समन्वय है, एक-दूसरे के अनुसार अनुकूलन है, सुरक्षा और सामर्थ्य का ज्ञान है, तो उसके परिणामस्वरूप परिवार प्रगति करता है। व्यवस्थित परिवार में पति-पत्नी एक-दूसरे के दुःख-सुख में सहभागी होते हैं, बच्चे माता-पिता की आज्ञा का पालन करते हैं, उनके कार्य में हाथ बंटाते हैं, परीक्षा में अच्छे अंक लेकर उत्तीर्ण होते हैं। घर में सुख, शान्ति और सन्तोष होने से पुरुष पदोन्नति करता है और आय के नए विकल्प खोजता है, जिससे परिवार के सदस्यों का स्वास्थ्य ठीक रहता है तथा परस्पर स्नेह बन्धन मजबूत होते हैं। ऐसे परिवारों को समाज में भी आदर और उचित सम्मान मिलता है तथा अन्य परिवार भी उनकी उन्नति से प्रेरणा लेकर उनका अनुसरण करते हैं। अतः शीघ्रता से बदलते हुए परिवेश से समायोजन के लिए गृह-व्यवस्था बहुत आवश्यक है। जैसे-जैसे वातावरण जटिल बन रहा है, आवश्यकताएँ बढ़ रही हैं और साधनों में वृद्धि हो रही वैसे-वैसे गृह-व्यवस्था का महत्त्व भी बढ़ रहा है।

39.

गृह-व्यवस्था के मूल तत्त्व क्या हैं?

Answer»

गृह-व्यवस्था के मूल तत्त्व हैं-नियोजन, नियन्त्रण तथा मूल्यांकन।

40.

अच्छे प्रबन्धक में काम करने का उत्साह होना क्यों जरूरी है?

Answer»

पारिवारिक लक्ष्यों की पूर्ति के लिए गृह प्रबन्धक में काम करने का उत्साह होना इसलिए आवश्यक है क्योंकि घर में एक प्रबन्धक की भूमिका एक नेता वाली होती है। यदि प्रबन्धक में काम करने का उत्साह होगा तो शेष सदस्य भी घर के काम में योगदान देंगे। एक आलसी गृह प्रबन्धक घर के अन्य सदस्यों को भी आलसी बना देता है जिससे घर का सारा वातावरण खराब हो जाता है और परिवार अपने लक्ष्यों की पूर्ति नहीं कर सकता।

41.

अच्छे प्रबन्धक को गृह व्यवस्था की जानकारी क्यों जरूरी है?

Answer»

अच्छी गृह व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य लक्ष्यों की पूर्ति करना है। इन लक्ष्यों की पूर्ति के लिए गृह प्रबन्धक के पास योग्यता और कुशलता का होना अति आवश्यक है। योग्यता और कुशलता प्राप्त करने के लिए गृह व्यवस्था की प्रारम्भिक जानकारी का होना अति आवश्यक है। इस जानकारी से ही यह गृह प्रबन्धक अपने परिवार के मानवीय और भौतिक साधनों का उचित प्रयोग करने के योग्य हो सकता है। इस तरह वह पारिवारिक लक्ष्यों की पूर्ति कर सकता है।

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गृह-व्यवस्था के अनिवार्य तत्त्व कौन-कौन से हैं ? उनको समुचित परिचय दीजिए।यागृह-व्यवस्था के अनिवार्य तत्त्वों के रूप में नियोजन, नियन्त्रण तथा मूल्यांकन का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा इनके आपसी सम्बन्ध को भी स्पष्ट कीजिए।

Answer»

गृह-व्यवस्था के तत्त्व
गृह-व्यवस्था के मुख्य रूप से तीन तत्त्व हैं। ये तत्त्व हैं–क्रमशः नियोजन, नियन्त्रण तथा मूल्यांकन। ये तीनों तत्त्व परस्पर सम्बद्ध रूप में रहते हैं तथा इन तीनों तत्त्वों के सही रहने पर गृह-व्यवस्था उत्तम रहती है। गृह-व्यवस्था के इन तीनों अनिवार्य तत्त्वों का संक्षिप्त परिचय निम्नवर्णित है

(1) नियोजन:
गृह-व्यवस्था का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं प्रथम चरण नियोजन (Planning) है। नियोजन का महत्त्व जीवन के सभी क्षेत्रों में है। वास्तव में किसी भी कार्य को करने से पूर्व की जाने वाली तैयारी नियोजन ही है। नियोजन के अर्थ को निकिल तथा डारसी ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, ”इच्छित लक्ष्य तक पहुँचने के विभिन्न सम्भावित मार्गों के सम्बन्ध में सोचना, कल्पना में प्रत्येक योजना के पूर्ण होने तक इसका अनुगमन करना और सर्वाधिक आशावादी योजना का चुनाव करना ही नियोजन है। इस प्रकार स्पष्ट है कि नियोजन के अन्तर्गत यह पूर्व-निश्चित कर लिया जाता है कि भविष्य में क्या करना है। इस प्रकार से भविष्य के कार्यक्रम को निश्चित कर लेने से कार्य सरल हो जाता है तथा निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करना सम्भव हो जाता है। नियोजन की प्रक्रिया के अन्तर्गत चिन्तन-शक्ति, स्मरण-शक्ति, अवलोकन, तर्क-शक्ति तथा कल्पना-शक्ति का उपयोग किया जाता है।

(2) नियन्त्रण:
गृह-व्यवस्था की प्रक्रिया का द्वितीय तत्त्व नियन्त्रण (Control) है। केवल उचित नियोजन द्वारा गृह-व्यवस्था की प्रक्रिया हमें लक्ष्य तक नहीं पहुंचा सकती। नियन्त्रण के द्वारा अपनाई गई योजना को पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार अथवा सम्बन्धित परिस्थितियों के अनुकूल परिवर्तित करके कार्य-रूप में लागू किया जाता है। गृह-व्यवस्था के तत्त्व के रूप में नियन्त्रण के अर्थ को डगलस एस० शेरविन ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, ”नियन्त्रण का मूल तत्त्व क्रियान्वयनं है, जिसके द्वारा पूर्व-निर्धारित स्तरों के अनुसार क्रियाओं को समायोजित किया जाता है तथा इसके नियन्त्रण का आधार व्यवस्थापक के पास की सूचनाएँ होती हैं।” यह कहा जा सकता है कि नियन्त्रण के अन्तर्गत चालू योजना की कार्यप्रणाली का अध्ययन किया जाता है। इसके अतिरिक्त पूर्व-निर्धारित कार्य-प्रणाली से वर्तमान कार्य-प्रणाली के विचलनों का सूक्ष्म निरीक्षण किया जाता है। नियन्त्रण के ही अन्तर्गत समय एवं परिस्थितियों के अनुसार पूर्व-निर्धारित योजना में किये जाने वाले परिवर्तनों का निर्णय किया जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि व्यवस्था की प्रक्रिया में नियन्त्रण के तत्त्व का भी विशेष महत्त्व है। यदि किसी व्यवस्थित कार्य में नियोजनकर्ता तथा योजना को कार्यरूप देने वाले व्यक्ति अलग-अलग होते हैं, तो उस स्थिति में नियन्त्रण का महत्त्व और भी अधिक हो जाता है।

(3) मूल्यांकन:
गृह-व्यवस्था का तीसरा तत्त्व मूल्यांकन (Evaluation) है। पूर्व-नियोजन के अनुसार किए गए कार्यों की सफलता-असफलता तथा उचित-अनुचित प्रकृति का निर्णय करने के कार्य को मूल्यांकन कहा जाता है। मूल्यांकन द्वारा पहले हो चुकी त्रुटियों की जानकारी प्राप्त हो जाती है तथा भविष्य में उसी प्रकार की त्रुटियों को पुनः दोहराने की चेतावनी मिल जाती है। इस प्रकार मूल्यांकन को भावी योजनाओं के लिए भी विशेष महत्त्व होता है। गृह-व्यवस्था के दौरान किसी-न-किसी स्तर पर अवश्य ही मूल्यांकन किया जाता है। मूल्यांकन दो प्रकार का होता है–सापेक्ष मूल्यांकन तथा निरपेक्ष मूल्यांकन। मूल्यांकन से विभिन्न लाभ होते हैं। इससे अनेक उद्देश्यों की पूर्ति हो जाती है। मूल्यांकन से ही हमें ज्ञात होता है कि हमने क्या प्राप्त किया है। इसके द्वारा ही आगामी योजना के लिए तथा सम्पूर्ण योजना को संशोधित करने के लिए आधार प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त कार्यों के उचित मूल्यांकन द्वारा हमारी अन्तर्दृष्टि (insight) में भी वृद्धि होती है।

नियोजन, नियन्त्रण तथा मूल्यांकन का सम्बन्ध:

यह कहा गया है कि व्यवस्था या प्रबन्ध के तीन तत्त्व हैं–नियोजन, नियन्त्रण तथा मूल्यांकन। इन तीनों तत्त्वों का हमने अलग-अलग परिचय प्रस्तुत किया है, परन्तु यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि व्यवस्था के सन्दर्भ में ये तीनों तत्त्व अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि घनिष्ठ रूप से परस्पर सम्बद्ध हैं। व्यवस्था की प्रक्रिया में इन तीनों तत्त्वों का एक निश्चित क्रम होता है। व्यवस्था में प्रथम स्थान नियोजन को होता है। नियोजन के उपरान्त नियन्त्रण तथा उसके बाद मूल्यांकन का स्थान होती है। एक निश्चित क्रम के अतिरिक्त, एक-दूसरे पर निर्भरता के रूप में भी तीनों तत्त्व आपस में सम्बद्ध हैं। नियोजन के अभाव में नियन्त्रण का कोई अर्थ ही नहीं। इसी प्रकार समुचित नियन्त्रण के अभाव में नियोजन से लाभ प्राप्त नहीं किया जा सकता। मूल्यांकन का भी विशेष लाभ एवं महत्त्व है। मूल्यांकन के द्वारा नियोजन की उपयुक्तता की जाँच होती है। कोई योजना कितनी सफल रही, यह मूल्यांकन द्वारा ही ज्ञात होता है। इसके अतिरिक्त नियोजन के कार्यान्वयन के बीच-बीच में होने वाले मूल्यांकन के नियन्त्रण को उचित रूप से लागू करने में भी सहायता मिलती है। मूल्यांकन द्वारा आगामी योजनाओं के स्वरूप को निर्धारित करने में भी सहायता मिलती है।

43.

घर के अच्छे प्रबन्ध सम्बन्धी जानकारी कहां से ली जा सकती है?

Answer»

घर का अच्छा प्रबन्ध कोई बच्चों का खेल नहीं है। इसलिए गृहिणी को घर के सभी साधनों को सूझ-बूझ से प्रयोग करने की जानकारी का होना अति आवश्यक है। पुराने समय में यह जानकारी परिवार के बड़े-बूढ़ों से प्राप्त हो जाती थी, परन्तु आजकल इस जानकारी के लिए और साधन भी हैं। स्कूलों और कॉलेजों में गृह विज्ञान का विषय पढ़ाया जाता है जहाँ गृह प्रबन्ध से सम्बन्धित ज्ञान प्रदान किया जाता है। इसके अतिरिक्त रेडियो, टेलीविज़न, समाचार-पत्र, मैगज़ीन आदि से अच्छे गृह प्रबन्ध की जानकारी मिलती है।

44.

गृह व्यवस्था की परिभाषा लिखो।

Answer»

गृह व्यवस्था घर के साधनों का सही ढंग से प्रयोग करके पारिवारिक आवश्यकताओं को पूर्ण करने की कला है। एक अच्छा गृह प्रबन्धक साधनों के कमसे-कम प्रयोग से भी पारिवारिक उद्देश्यों को प्राप्त कर लेता है।

45.

घर एक निजी स्वर्ग का स्थान है क्यों?

Answer»

घर का प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। घर में न केवल मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति होती है, बल्कि उसकी भावनात्मक आवश्यकताएं भी पूर्ण होती हैं। घर का प्रत्येक मनुष्य की खुशियों तथा उसके व्यक्तित्व के विकास में सबसे अधिक योगदान होता है। इसलिये घर को निजी स्वर्ग भी कहा जाता है।

46.

सुचारू गृह-व्यवस्था से प्राप्त होने वाले तीन मुख्य लाभ बताइए।

Answer»

⦁ परिवार के सदस्यों की आवश्यकताएँ पूरी हो जाती हैं,
⦁ परिवार के आय-व्यय का नियोजन हो जाता है तथा
⦁ रहन-सहन का स्तर उन्नत हो सकता है।

47.

गृह-व्यवस्था को लागू करने अथवा उसका पालन करने के मुख्य उद्देश्यों का विवरण प्रस्तुत कीजिए।

Answer»

गृह-व्यवस्था का अध्ययन करते समय यह जानना भी आवश्यक है कि गृह-व्यवस्था को क्यों लागू किया जाना चाहिए? प्रत्येक परिवार के कुछ लक्ष्य होते हैं, जिन्हें सूझ-बूझकर तथा अपने साधनों को ध्यान में रखकर निर्धारित किया जाता है। इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए गृह-व्यवस्था अनिवार्य है। गृह-व्यवस्था द्वारा परिवार के निम्नलिखित लक्ष्यों को प्राप्त किया जाता है तथा इन्हें ही गृह-व्यवस्था का उद्देश्य कहा जा सकता है

गृह-व्यवस्था के प्रमुख उद्देश्य
(1) परिवार के सभी सदस्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति:
प्रत्येक परिवार के सभी सदस्यों की अपनी-अपनी कुछ महत्त्वपूर्ण आवश्यकताएँ होती हैं। ये आवश्यकताएँ सामान्य भी हो सकती हैं तथा विशिष्ट भी। उदाहरण के लिए–रोटी, कपड़ा तथा मकान की आवश्यकता प्रत्येक सदस्य की सामान् आवश्यकताएँ हैं। इसके अतिरिक्त शिक्षा, चिकित्सा तथा विशेष प्रकार का आहार आदि भिन्न-भिन्न रूप में भिन्न-भिन्न सदस्यों की विशिष्ट आवश्यकताएँ हैं। व्यवस्थित गृह में इन सभी सामान्य तथा विशिष्ट आवश्यकताओं की समुचित रूप में पूर्ति होती रहनी चाहिए। गृह-व्यवस्था का यह एक मुख्य तथा महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है।

(2) पारिवारिक आय को उचित प्रकार से खर्च करना:
सभी भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए धन की आवश्यकता होती है। प्रत्येक परिवार की आय सीमित होती है; अतः ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे सीमित आय में ही सभी आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके। इसके लिए पारिवारिक बजट बनाना तथा उसके अनुसार आय-व्यय में सन्तुलन बनाए रखना अनिवार्य है। आय-व्यय के सन्तुलित बजट को बनाकर, कुछ बचत भी की जा सकती है। परिवार के कल्याण एवं समृद्धि के लिए कुछ-न-कुछ बचत का होना अनिवार्य होता है। पारिवारिक आय-व्यय का नियोजन भी गृह-व्यवस्था के ही अन्तर्गत आता है। इस स्थिति में कहा जा सकता है कि गृह-व्यवस्था का एक उद्देश्य पारिवारिक आय को उचित प्रकार से एवं नियोजित रूप से उपभोग में लाना भी है।

(3) पारिवारिक वातावरण को अच्छा बनाना:
गृह-व्यवस्था का उद्देश्य न केवल भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना ही है, बल्कि पारिवारिक वातावरण को भी सौहार्दपूर्ण बनाना है। इसके लिए परिवार के सदस्यों के आपसी सम्बन्धों, अनुशासन एवं पारिवारिक मूल्यों को स्थापित करना भी गृह-व्यवस्था का ही उद्देश्य है। भारतीय समाज में पारिवारिक वातावरण को उत्तम बनाने में गृहिणी की विशेष महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। गृहिणी के विभिन्न कर्तव्य होते हैं, जिनके पालन से परिवार का वातावरण अच्छा बना रहता है तथा सभी सदस्य सन्तुष्ट रहते हैं।

(4) परिवार के सदस्यों का नैतिक विकास:
गृह-व्यवस्था का एक उल्लेखनीय उद्देश्य परिवार के सदस्यों, विशेष रूप से बच्चों एवं किशोरों का समुचित नैतिक विकास करना भी है। वास्तव में, नैतिक विकास के अभाव में गृह-व्यवस्था को सुचारु एवं उत्तम नहीं माना जा सकता। नैतिक विकास के लिए माता-पिता को नियोजित ढंग से प्रयास करने चाहिए तथा स्वयं आदर्श प्रस्तुत करने चाहिए। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों को नैतिक मूल्यों की नियोजित रूप से शिक्षा प्रदान करें।

(5) पारिवारिक स्तर को उन्नत बनाए रखना:
प्रत्येक परिवार के रहन-सहन का एक स्तर होता है, जिसका निर्धारण परिवार के साधनों के आधार पर होता है। गृह-व्यवस्था का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है-सब प्रकार से परिवार का एक समुचित स्तर बनाए रखना। इसके लिए रहन-सहन के एवं धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा दार्शनिक मूल्यों को ध्यान में रखना अत्यन्त आवश्यक है। | गृह-व्यवस्था के उपर्युक्त वर्णित उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि गृहस्थ जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिए तथा परिवार के समस्त सदस्यों के सुख एवं समृद्धि में वृद्धि के लिए गृह-व्यवस्था का विशेष योगदान तथा महत्त्व होता है।

48.

गृह-व्यवस्था के दो मुख्य उद्देश्यों का उल्लेख कीजिए।

Answer»

(i) परिवार के सभी सदस्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति तथा
(ii) पारिवारिक आय को उचित प्रकार से खर्च करना।

49.

गृह-व्यवस्था को प्रभावित करने वाले गृह-सम्बन्धी कारकों का विवरण प्रस्तुत कीजिए।.या‘गृह-सम्बन्धी विभिन्न कारक निश्चित रूप में गृह-व्यवस्था को प्रभावित करते हैं।” इस कथन को ध्यान में रखते हुए गृह-व्यवस्था को प्रभावित करने वाले गृह-सम्बन्धी कारकों का वर्णन कीजिए।

Answer»

गृह-व्यवस्था अपने आप में एक विस्तृत एवं बहु-पक्षीय व्यवस्था है, जिसे अनेक कारक प्रभावित करते हैं। गृह-व्यवस्था में जहाँ एक ओर घर के रख-रखाव आदि का ध्यान रखा जाता है, वहीं दूसरी ओर पारिवारिक सम्बन्धों एवं स्तर आदि को भी उत्तम बनाने के उपाय किए जाते हैं। इस स्थिति में गृह-व्यवस्था को प्रभावित करने वाले कारकों को भी दो वर्गों में बाँटा जाता है अर्थात् गृह-सम्बन्धी कारक तथा परिवार सम्बन्धी कारक। गृह-व्यवस्था को प्रभावित करने वाले गृह-सम्बन्धी मुख्य कारकों का विवरण निम्नलिखित है

गृह-व्यवस्था को प्रभावित करने वाले गृह-सम्बन्धी कारक
(1) घर की सुविधाजनक होना:
घर का निर्माण करते समय अथवा किराए पर लेते समय यह ध्यान में रखना चाहिए कि विभिन्न कक्षों की नियोजन सुविधाजनक हो। उदाहरण के लिए-डाइनिंग रूम और रसोई निकट होने से शक्ति एवं समय की बचत होती है। स्टोर और रसोई भी निकट होनी चाहिए। अध्ययन-कक्ष एवं शयन-कक्ष का ड्राइंग रूम से अन्तर होना चाहिए जिससे विश्राम एवं अध्ययन में बाधा न पड़े। शौचालय और गुसलखाने निकट होने चाहिए। इसी प्रकार ड्राइंग रूम की व्यवस्था इस प्रकार की होनी चाहिए कि मेहमान घर के आन्तरिक हिस्सों में, कम-से-कम प्रवेश करते हुए ड्राइंग रूम तक पहुँच जाएँ। गृह-सम्बन्धी इस विशेषता या तत्त्व को परस्परानुकूलता कंहा जाता है। आवासीय भवन में इस विशेषता के होने पर, गृह-व्यवस्था सरलता से लागू की जा सकती है।

(2) जल, वायु और प्रकाश की उचित व्यवस्था:
शुद्ध वायु, शुद्ध जल एवं प्रकाश की घर में उचित व्यवस्था होनी चाहिए। सभी कमरों में पर्याप्त खिड़कियाँ, दरवाजे और रोशनदान होने चाहिए जिससे स्वच्छ वायु और प्रकाश का प्रवेश हो सके। घर में धूप का आना भी आवश्यक होता है। जिन घरों में सूर्य का प्रकाश नहीं आता, वहाँ सीलन और अनेक कीटाणुओं का साम्राज्य हो जाता है, जो परिवार के सदस्यों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। अध्ययन-कक्ष में प्रकाश की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। शौचालय, स्नानघर और रसोई में जल की उचित व्यवस्था होनी चाहिए। यदि घर में ये समस्त कारक ठीक हैं, तो निश्चित रूप से उत्तम गृह-व्यवस्था के अनुपालन में सरलता होती है।

(3) सफाई की समुचित व्यवस्था:
परिवार का लक्ष्य परिवार के सदस्यों को स्वस्थ रखना है और यह तब तक सम्भव नहीं है, जब तक कि घर की सफाई की व्यवस्था न की जाए। व्यवस्थित और आकर्षक घर के लिए भी सफाई अनिवार्य है। यदि घर में सफाई नहीं है, तो मक्खी , मच्छर, मकड़ियाँ आदि जन्म लेंगे और बीमारियाँ फैलेगी। रसोईघर की सफाई स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है। ड्राइंग रूम की सफाई से गृहिणी की सुरुचि का आभास होता है। बच्चों को काफी समय अध्ययन-कक्ष में बीतता है। यदि अध्ययन-कक्ष साफ-सुथरा है; किताबें करीने से सजी हैं, मेज-कुर्सियों पर धूल नहीं है, तो बच्चे पढ़ने में अधिक रुचि लेंगे। इस प्रकार स्पष्ट है कि गृह-व्यवस्था के लिए घर की हर प्रकार की सफाई भी एक महत्त्वपूर्ण तथा अति आवश्यक तत्त्व एवं कारक है।

(4) भोज्य-सामग्री की व्यवस्था:
समय पर उचित और सन्तुलित भोजन परिवार के सदस्यों को उपलब्ध होना चाहिए। भोजन, अल्पाहार व अतिथि-सत्कार के लिए भोज्य-सामग्री की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए। अतिथियों के आने पर चाय या कॉफी से उनका सत्कार होना चाहिए। यदि समय पर घर में दूध या चाय की पत्ती आदि उपलब्ध नहीं हैं, तो उससे गृहिणी की अकुशलता और अव्यवस्था का पता चलता है। भोज्य-सामग्री की व्यवस्था के अन्तर्गत घर में शुद्ध और पर्याप्त मात्रा में खाद्य सामग्री रहनी चाहिए। समय-समय पर खाद्य पदार्थों की सफाई की जानी चाहिए। खाद्य पदार्थों का संरक्षण भी इसी में सम्मिलित है। खाद्य पदार्थों का अपव्यय नहीं होना चाहिए।

(5) घर की सामग्री की व्यवस्था:
घर की सामग्री अथवा वस्तुओं से तात्पर्य है दैनिक प्रयोग की वस्तुएँ; जैसे – बर्तन, वस्त्र, पुस्तकें, बिस्तर, फर्नीचर आदि। आधुनिक परिवारों में रेडियो, टू-इन-वन, टेलीविजन, फ्रिज, पंखे, कूलर, सिलाई की मशीन, कपड़े धोने की मशीन, रसोई में प्रेशर कुकर, टोस्टर, ओवन, मिक्सर तथा ग्राइण्डर आदि का प्रयोग किया जाता है। इन सबको सुविधाजनक और उचित स्थान पर रखना आवश्यक है। इनके प्रयोग की सही विधि ज्ञात होनी चाहिए जिससे इन उपकरणों की टूट-फूट कम-से-कम हो। आवश्यकतानुसार सफाई की व्यवस्था होनी चाहिए। यदि कोई उपकरण या वस्तु टूट जाती है या खराब हो जाती है, तो उसको ठीक कराने का प्रबन्ध होना चाहिए।

50.

समय, पैसा तथा घर का सामान कैसा साधन है?

Answer»

सही उत्तर है भौतिक साधन

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