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1.

स्वतन्त्र भारत की तात्कालिक समस्याओं पर एक विस्तृत लेख लिखिए।

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भारत की स्वतन्त्रता के साथ ही कठिनाइयों व कष्टों का काल भी प्रारम्भ हो गया था। देश के विभाजन के बाद दंगों, हत्याओं व लूटमार का भयंकर दौर प्रारम्भ हुआ। तत्कालीन भारत में देशी रियासतों की संख्या 600 से अधिक थी। विभाजन की त्रासदी के कारण लाखों की संख्या में शरणार्थी, रियासतों के रूप में बिखरा हुआ अज्ञात भारत का ढाँचा, जर्जर अर्थव्यवस्था, अस्थिर राजनीति यह सब भारत को विरासत के रूप में मिला। परन्तु तत्कालीन भारत के महापुरूषों व राजनीति-वेत्ताओं के अथक परिश्रम ने इन सभी समस्याओं से लोहा लिया और उन्हें एक-एक करके सुलझाना आरम्भ कर दिया। स्वतन्त्र भारत की प्रमुख तात्कालिक समस्याएँ निम्नवत थीं

(1) राजनीतिक एकीकरण- स्वतन्त्रता के पूर्व भारत में लगभग 600 से अधिक देशी रियासतें थीं। स्वतन्त्र होने के उपरान्त भारत की सरकार के सामने देशी रियासतों को भारत संघ में विलय कराने की गम्भीर चुनौती थी। राष्ट्र की सुरक्षा के लिए इन सबको भारत संघ में विलय होना आवश्यक था।। ये रियासतें सम्पूर्ण भारत के क्षेत्रफल का 48 प्रतिशत और जनसंख्या का 20 प्रतिशत थीं। यद्यपि ये रियासतें अपने आन्तरिक मामलों में स्वतन्त्र थीं, किन्तु वास्तविक रूप में इन सभी रियासतों पर अंग्रेजी शासन का नियन्त्रण स्थापित था। भारतीय देशी रियासतों में राजकीय जागरण 1921 ई० में प्रारम्भ हुआ। सरदार पटेल के सुझाव पर एक ‘रियासती मन्त्रालय बनाया गया। सरदार पटेल को ही इस विभाग का मन्त्री बनाया गया।

सरदार पटेल ने बड़ी सूझ-बूझ के साथ देशी रियासतों के विलय के कार्य का संचालन किया। 1926 ई० में अखिल भारतीय देशी राज्य प्रजा परिषद् का जन्म हुआ, जिसका पहला अधिवेशन एलौट के प्रसिद्ध नेता दीवान बहादुर एम० रामचन्द्र राय की अध्यक्षता में 1927 ई० में हुआ। 1934 ई० में डॉ० राजेन्द्र प्रसाद ने रियासतों में उत्तरदायी शासन की बात कही। 1935 ई० के अधिनियम में देशी रियासतों को मिलाकर एक संघ बनाने की बात कही गई। 1936 ई० के बाद देशी रियासतों में जन आन्दोलन तेजी से बढ़ा। कैबिनेट मिशन, एटली की घोषणा और लॉर्ड माउण्टबेटन की योजना में देशी राजाओं के बारे में विचार रखे गए और प्राय: कहा गया कि अंग्रेजों के चले जाने के बाद वे स्वतन्त्र होंगे। अपनी इच्छानुसार वे भारत या पाकिस्तान में सम्मिलित हों अथवा स्वतन्त्र रहें।
उपप्रधानमन्त्री एवं रियासती मन्त्रालय के मन्त्री की हैसियत से सरदार पटेल ने रियासतों से भारत संघ में अपना विलय करने की अपील की और इस मार्मिक अपील का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। देशी राजाओं ने भी राष्ट्र की आवश्यकता का अनुभव किया। अतः 15 अगस्त, 1947 ई० को जूनागढ़, हैदराबाद तथा कश्मीर को छोड़कर छत्तीसगढ़ सहित 562 रियासतों ने भारतीय संघ में विलय की घोषणा कर दी। सरदार वल्लभ भाई पटेल की कूटनीतिज्ञता और दूरदर्शिता का ही परिणाम था कि उन्होंने इस समस्या को सुलझाने का प्रयास किया।

हैदराबाद, जूनागढ़ और कश्मीर का भारत में विलय प्रमुख कठिनाइयों के रूप में उभरकर सामने आया। जूनागढ़ एक छोटी सी रियासत थी और यहाँ नवाब का शासन था। यहाँ की अधिकांश जनता हिन्दू थी और वह जूनागढ़ का भारत में विलय करने के पक्ष में थी, जबकि नवाब जूनागढ़ को पाकिस्तान में मिलाना चाहता था। जब नवाब ने जूनागढ़ को पाकिस्तान में मिलाने की घोषणा की तो वहाँ की जनता ने इसका विरोध किया। इसी समय सरदार पटेल ने जूनागढ़ की जनता की सहायता के लिए सेना भेज दी। भारतीय सेना से भयभीत होकर नवाब पाकिस्तान भाग गया। फरवरी 1948 ई० में जनमत संग्रह के आधार पर जूनागढ़ का भारत में विलय कर लिया गया।

हैदराबाद की जनता भी जूनागढ़ के समान ही हैदराबाद को भारत में सम्मिलित करना चाहती थी, जबकि निजाम सीधे ब्रिटिश साम्राज्य से साँठगाँठ कर एक स्वतन्त्र राज्य का स्वप्न देख रहा था। उसकी पाकिस्तान से भी गुप्त वार्ताएँ चल रही थीं। अक्टूबर, 1947 में उसके साथ एक विशेष समझौता किया गया, जिसमें उसे एक वर्ष तक यथावत् स्थिति की बात कही गई, लेकिन उस पर किसी भी प्रकार की सैन्य वृद्धि या बाहरी मदद लेने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। निजाम की कुटिल चालें चलती रहीं। उसने पाकिस्तान से हथियार मँगवाए तथा रजाकारों की मदद से मनमानी करनी चाही। परिणामतः हैदराबाद की जनता ने निजाम के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। निजाम ने जनता पर अत्याचार करने प्रारम्भ कर दिए। इसी समय

सरदार पटेल ने हैदराबाद की जनता का रुख भारत की ओर देखकर सितम्बर 1948 में निजाम को चेतावनी दी। निजाम के न मानने पर 13 सितम्बर, 1948 को हैदराबाद में कार्यवाही की गई और पाँच दिन में न केवल रजाकारों को खदेड़ दिया गया, बल्कि निजाम ने भी विलय-पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। 18 सितम्बर, 1948 को हैदराबाद का भारत में विलय हो गया। कश्मीर के भारत में विलय पर भी पाकिस्तान से संघर्ष की स्थिति बनी। प्रारम्भ में कश्मीर के राजा हरिसिंह कश्मीर के भारत में सम्मिलित होने में असमंजस की स्थिति में थे। जून, 1947 में माउण्टबेटन कश्मीर गए और उन्होंने वहाँ के महाराजा हरिसिंह से विलय के बारे में शीघ्र आत्मनिर्णय पर जोर दिया और जनमत संग्रह की बात भी कही। महात्मा गाँधी भी महाराजा से मिले, परन्तु अगस्त, 1947 में पाकिस्तानियों ने कबाइलियों के वेश में जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ करनी प्रारम्भ की। पाकिस्तान द्वारा आक्रमण किए जाने से विचलित होकर उन्होंने भी भारतीय संघ में मिलने की घोषणा कर दी।
भारतीय सेना ने उन्हें तुरन्त संरक्षण देना स्वीकार कर लिया। महाराजा हरिसिंह ने 26 अक्टूबर को अपने प्रधानमन्त्री मेहरचन्द महाजन को विलय के पत्रों पर हस्ताक्षर करने दिल्ली भेजा। ये पत्र स्वीकृत कर लिए गए, लेकिन इसी बीच 21-22 अक्टूबर, 1947 को पाकिस्तान ने पठान कबाइलियों सहित कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। 26 अक्टूबर को कश्मीर के महाराजा के कहने पर भारतीय सेनाओं ने 27 अक्टूबर को पाकिस्तान के आक्रमणकारियों को रोका और उन्हें पीछे खदेड़ते हुए जवाबी कार्यवाही की। भारत के प्रधानमन्त्री पं० नेहरू ने पाकिस्तान की इस घुसपैठ के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् में अपील की। सुरक्षा परिषद् ने सोच-विचार में लम्बा समय लिया।

13 अगस्त, 1948 को दोनों सेनाओं को युद्धविराम करने, अपनी-अपनी सेनाएँ हटाने और जनमत संग्रह करने को कहा। अभी तक भी कश्मीर की एक तिहाई भूमि पर पाकिस्तान का अवैध कब्जा है। अर्द्धशताब्दी से अधिक गुजर जाने के पश्चात् भी कश्मीर को लेकर आज भी दोनों में विवाद बना हुआ है। 1954 ई० तक विदेशी फ्रांसीसी उपनिवेशों पाण्डिचेरी, कराईकल, यमन, माही तथा चन्द्रनगर को भारत संघ में शामिल कर लिया गया। गोवा, दमन व दीव जिन पर पुर्तगालियों का प्रभुत्व था, सैनिक कार्यवाही द्वारा 1961 ई० में भारत संघ में सम्मिलित किए जा सके। दादर व नगर हवेली के दोनों स्थलों को जनता ने 1954 में पुर्तगालियों से स्वतन्त्र कराया, लेकिन ये भारत संघ का अंग न बन सके। 1961 तक यहाँ ‘स्वतन्त्र दादर व नगर हवेली प्रशासन ने कार्यभार सँभाला। 11 अगस्त, 1961 को ये दोनों स्थल भारत के केन्द्रशासित प्रदेश बने।

(2) हिन्दू-मुस्लिम दंगे और विस्थापितों की समस्या- भारत के विभाजन से जनसंख्या में हुई अदला-बदली विश्व इतिहास में एक अनूठी और वीभत्स घटना थी। दुनिया के इतिहास में कभी भी जनसंख्या की इतनी बड़ी अदली-बदली पहले कभी नहीं हुई थी। इससे पूर्व 1923 ई० में लोसान की सन्धि में ग्रीक व टर्की में जनसंख्या में अदला-बदली हुई थी, जो लगभग एक लाख पच्चीस हजार की थी और जिसे बदलने में 18 महीने लगे थे, जबकि भारत-पाकिस्तान में लगभग एक करोड़ बीस लाख जनसंख्या का आवागमन हुआ और यह केवल तीन महीने में किया गया। एक अन्य आँकड़े के अनुसार 49 लाख भारतीय पश्चिमी पाकिस्तान से और 25 लाख पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) से उजड़कर भारत आए। स्वभावत: इस जनसंख्या की अदली-बदली में भयंकर रक्तपात, खून-खराबा और साम्प्रदायिक दंगे हुए। सामूहिक हत्याएँ, लूट, अपहरण, बलात्कार की हजारों घटनाएँ हुईं। बंगाल में नोआखाली, यूनाइटेड प्रोविंसेस में गढ़मुक्तेश्वर और पंजाब में लाहौर, रावलपिण्डी, मुल्तान, अमृतसर तथा गुजरात में भयंकर लूटमार हुई, अनेक लोग मारे गए। इसके अतिरिक्त 150 करोड़ से अधिक की सम्पत्ति की हानि हुई।

3. जर्जर आर्थिक व्यवस्था- अंग्रेजों ने लगभग दो सौ साल बाद अगस्त, 1947 में भारत छोड़ा। इस दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था निरन्तर उपेक्षा की शिकार रही थी। शताब्दियों से चले आ रहे आर्थिक शोषण व लूट के कारण भारत की आर्थिक व्यवस्था पहले से ही जर्जर अव्यवस्था में थी, पाकिस्तान के निर्माण के कारण भारत अनेक प्राकृतिक संसाधनों से वंचित हो गया। भारत एक निर्धन देश बन गया और इसकी प्रति व्यक्ति आय विश्व के निम्नतम के समतुल्य हो गई। इसे 1948 ई० में 246 रुपए प्रति व्यक्ति माना गया है, जो ब्रिटेन की आय का कुल 10 प्रतिशत और अमेरिका का केवल 5 प्रतिशत थी।। पाकिस्तान के निर्माण से भारत में आर्थिक असन्तुलन उत्पन्न हो गया। भारतीय उद्योग, कृषि व व्यापार इस विभाजन के कारण अत्यधिक प्रभावित हुए। आर्थिक क्षेत्र के असन्तुलित विभाजन के कारण भारत में कच्चे माल की कमी हो गई, जिससे वस्त्र उद्योग ठप्प और अन्न की कमी हो गई।

1947-48 ई० के भारत-पाक संघर्ष ने भारतीय व्यापार को भी बुरी तरह प्रभावित किया। विस्थापितों के आर्थिक झगड़ों ने इसमें और कटुता ला दी। इस काल में उद्योगों के उत्पादन में लगभग 30 प्रतिशत की कमी हो गई। उत्पादन कम होने से बेकारी और बेरोजगारी तेजी से बढ़ी। भारत की आर्थिक नीति की घोषणा 1948 ई० में की गई थी, इस नीति में कई योजनाएँ रखी गई। श्री जय प्रकाश नारायण द्वारा जनवरी, 1950 ई० में ‘सर्वोदय योजना की घोषणा की गई, जिसका उद्देश्य अहिंसा द्वारा शोषणरहित समाज का निर्माण करना बताया गया। इस योजना आयोग के अध्यक्ष पं० जवाहरलाल नेहरू थे। 1 अप्रैल, 1951 ई० से 31 मार्च 1956 ई० तक के लिए प्रथम पंचवर्षीय योजना बनी। वर्तमान में बारहवीं पंचवर्षीय योजना चल रही है, ऐसी 11 योजनाएँ अब तक पूर्ण हो चुकी हैं।

2.

डॉ० भीमराव अम्बेडकर की भारत के संविधान निर्माण में क्या भूमिका थी?

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डॉ० भीमराव अम्बेडकर संविधान निर्माण प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे। इन्हें संविधान निर्माता कहा जाता है।

3.

राज्य नीति के पाँच निर्देशक तत्व लिखिए।

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राज्य नीति के पाँच निर्देशक तत्व निम्नवत हैं

⦁     कल्याणकारी समाज की रचना

⦁    जन स्वास्थ्य का उन्नयन

⦁    एक ही आचार-संहिता

⦁     बेकारी के अन्त का प्रयास

⦁    अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा का प्रयत्न

4.

“भारत का विकास वस्तुतः पंचवर्षीय योजनाओं से प्रारम्भ हुआ था।” टिप्पणी कीजिए।

Answer»

स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भारत की आर्थिक व्यवस्था अत्यन्त जर्जर थी। भारत की स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् अर्थव्यवस्था की पुननिर्माण प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। इस उद्देश्य से विभिन्न नीतियाँ और योजनाएँ बनाई गईं। और पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से क्रियान्वित की गई। स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की प्राथमिकताओं में से पहली प्राथमिकता भारत के आर्थिक ढाँचे को मजबूत करना था। इसके लिए उन्होंने 1950 ई० में राष्ट्रीय योजना आयोग की स्थापना की। इस आयोग के अन्तर्गत 16 माह के गहन विचार-विमर्श के पश्चात् देश के आर्थिक विकास हेतु पंचवर्षीय योजनाकाल का जन्म हुआ। प्रथम पंचवर्षीय योजना का प्रारम्भ 1 अप्रैल, 1951 ई० को हुआ। अब तक ग्यारह पंचवर्षीय योजनाएँ पूरी हो चुकी हैं। वर्तमान में बारहवीं पंचवर्षीय योजना जारी है जिसका कार्यकाल 2012-2017 है। भारत में विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में रखे गए उद्देश्यों को मुख्य रूप से चार भागों में विभाजित किया जा सकता है-

⦁    विकास

⦁    आधुनिकरण

⦁    आत्मनिर्भरता, तथा

⦁    सामाजिक न्याय।

पंचवर्षीय योजनाओं की विकास सम्बन्धी उपलब्धियाँ- पंचवर्षीय योजनाओं की विकास उपलब्धि को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है

1. विकास दर- आर्थिक प्रगति का महत्त्वपूर्ण मापदण्ड विकास की दर के लक्ष्य की प्राप्ति है। प्रथम योजना में आर्थिक विकास की दर 3.6% थी, जो बढ़कर आठवीं योजना में 6.5% हो गई। नवीं पंचवर्षीय योजना में यह 5.5% रही। दसवीं पंचवर्षीय योजना में विकास दर 9% रही। ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में 12% का लक्ष्य रखा गया तथा 12 वीं योजना (2012-2017) में 9 प्रतिशत का लक्ष्य है।

2. राष्ट्रीय आय एवं प्रति व्यक्ति आय- योजनाकाल में राष्ट्रीय आय एवं प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि हुई है। भारत में 1950 51 ई० में चालू मूल्यों के आधार पर शुद्ध राष्ट्रीय आय 8,525 करोड़ रुपए थी, जो कि 2001-02 में बढ़कर 19,51,935 करोड़ रु०,2002-03 में 19,95,229 करोड़ रु०, 2009-10 में 51,88,361 करोड़ रु० हो गई, जबकि प्रति व्यक्ति आय 237.5 रु० से बढ़कर 2009-10 में 44,345 रु० हो गई।

3. कृषि उत्पाद- योजनाकाल में कृषि उत्पादन में तीव्र गति से वृद्धि हुई है। सन् 1950-51 में खाद्यान्नों का कुल उत्पादन मात्र 50.8 मिलियन टन था, जो 2010-11 में बढ़कर 241.56 मिलियन टन हो गई।

4. औद्योगिक उत्पादन- योजनकाल में औद्योगिक उत्पादन में तीव्र गति से वृद्धि हुई। 1950-51 ई० में, 1993-94 ई० की कीमतों पर औद्योगिक उत्पादन सूचकांक 7.9 था जो बढ़कर 167 हो गया। दसवीं पंचवर्षीय योजना की समाप्ति पर उद्योग उत्पादन क्षेत्र में 8.75% की वृद्धि हो गई।

5. बचत एवं विनियोग- योजनाकाल में भारत में बचत एवं विनियोग की दरों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। चालू मूल्य पर | सकल राष्ट्रीय आय के प्रतिशत के रूप में 1950-51 ई० में सकल विनियोग और बचत की दरें क्रमशः 10.4% और 9.3% थीं, दसवीं पंचवर्षीय योजना के अन्त में ये क्रमश: 7.8% और 26.62% थीं। निवेश 28.10% रहा।

6. यातायात एवं संचार- यातायात एवं संचार के क्षेत्र में योजनाकाल में उल्लेखनीय प्रगति हुई। रेलवे लाइनों की लम्बाई 53,596 किलोमीटर से बढ़कर 31 मार्च, 2010 को 63,974 किलोमीटर हो गई। सड़कों की लम्बाई 1,57,000 किलोमीटर से बढ़कर 32 लाख किलोमीटर हो गई। हवाई परिवहन, बन्दरगाहों की स्थिति एवं आन्तरिक जलमार्ग का भी विकास किया गया। संचार-व्यवस्था के अन्तर्गत विकास के क्षेत्रों में डाकखानों, टेलीग्राफ, रेडियो-स्टेशन एवं प्रसारण केन्द्रों की संख्या में भी पर्याप्त वृद्धि हुई।

7. शिक्षा- योजनाकाल में शिक्षा का भी व्यापक प्रसार हुआ है। इस अवधि में स्कूलों की संख्या 2,30,683 से बढ़कर  8,21,988 तथा विश्वविद्यालयों और समान संस्थाओं की संख्या 27 से बढ़कर 315 हो गई।

8. विद्युत उत्पादन क्षमता- योजनाकाल में विद्युत उत्पादन के क्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। अगस्त 2004 ई० के आँकड़ोंके अनुसार उत्तर प्रदेश में विद्युत की प्रति व्यक्ति वार्षिक खपत केवल 188 यूनिट है, जो राष्ट्रीय औसत का 50 प्रतिशत है। सन् 2012 ई० की समाप्ति तक नाभकीय विद्युत उत्पादन 10 हजार मेगावाट होने की सम्भावना है।

9. बैंकिग संरचना- प्रथम योजना के आरम्भ  में देश में बैंकिग क्षेत्र अपर्याप्त और असन्तुलित था, परन्तु योजनाकाल में और विशेष रूप से बैंकों के राष्ट्रीयकरण के पश्चात् देश की बैंकिग संरचना में उल्लेखनीय परिवर्तन हुआ है। 30 जून, 1969 ई० को व्यापारिक बैंकों की शाखाओं की संख्या 8,262 थी, जो कि 31 मार्च, 2009 ई० में बढ़कर 80,547 हो गई।

10. स्वास्थ्य सुविधाएँ- योजनाकाल में देश में स्वास्थ्य सुविधाओं में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई। टी० बी०, कुछ महामारियों आदि के उन्मूलन तथा परिवार कल्याण कार्यक्रमों में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई।

11. आयात एवं निर्यात- केन्द्र सरकार ने 31 अगस्त, 2004 ई० को विदेशी नीति 2004-09 ई० की घोषणा कर दी है। वर्ष 2010-11 ई० में भारत का निर्यात 11,42,649 करोड़ रुपए तथा आयात 16,83,467 करोड़ रुपए रहा।
पंचवर्षीय योजनाओं द्वारा भारत का आधुनिकीकरण- आधुनिककरण के क्षेत्र में प्रमुख उपलब्धियों को इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

1. कृषि का आधुनिकीकरण- भारत एक कृषि प्रधान देश है; अत: कृषि-संरचना में व्यापक सुधार एवं आधुनिकीकरण पर विशेष ध्यान दिया गया। योजनाकाल में भूमिसुधार कार्यक्रमों का विस्तार किया गया है। रासायनिक खाद व उन्नत बीजों का प्रयोग भी बढ़ा है। कृषि क्षेत्र में आधुनिक कृषि-यन्त्रों एवं उपकरणों को प्रोत्साहन मिला है। इसके अतिरिक्त, सिंचाई सुविधाओं में भी पर्याप्त मात्रा में वृद्धि हुई है। कृषि उपजों की विपणन व्यवस्था तथा कृषि वित्त-व्यवस्था में भी उल्लेखनीय सुधार हुए हैं।

2. राष्ट्रीय आय की संरचना में परिवर्तन- राष्ट्रीय आय की संरचना में योजनाकाल में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। राष्ट्रीय आय में प्राथमिक क्षेत्र का अनुपात निरन्तर घट रहा है, जबकि द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्र का अनुपात निरन्तर बढ़ रहा है।

3. औद्योगिक संरचना में परिवर्तन- योजनाकाल में औद्योगिक संरचना में भी उल्लेखनीय परिवर्तन हुए है। आधारभूत एवं पूँजीगत उद्योगों की स्थापना की गई है, सार्वजनिक उपक्रमों की संख्या में वृद्धि हुई है, उद्योगों का विविधीकरण हुआ है। तथा उत्पादन तकनीक में व्यापक सुधार हुआ है।

4. बैंकिग संरचना में परिवर्तन- योजनाकाल में बैंकिग व्यवस्था को सुव्यवस्थित, सुगठित एवं विस्तृत किया गया है। ग्रामीण और बैंकरहित क्षेत्रों में बैंकिग सुविधाओं का विस्तार किया गया है, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना की गई है, बैंक साख के वितरण में व्यापक सुधार तथा बैंकिग सुविधाओं में गुणात्मक परिवर्तन किए गए हैं।

    आत्मनिर्भरता- हमारा देश आर्थिक नियोजन के काल में आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हुआ है। पहले जिन वस्तुओं का आयात किया जाता था, आज वे वस्तुएँ हमारे ही देश में निर्मित होने लगी हैं तथा उनका निर्यात भी किया जा रहा है। देश में भारी मशीनें व विद्युत उपकरण आदि भी पर्याप्त मात्रा में तैयार होने लगे हैं। खाद्यान्नों के सम्बन्ध में देश आत्मनिर्भरता प्राप्त कर चुका है। विदेशी सहायता भी पहले की अपेक्षा कम ही ली जा रही है।

⦁    सामाजिक न्याय- योजनाकाल में सामाजिक न्याय की दृष्टि से मुख्य रूप से दो पहलुओं पर ध्यान दिया गया है- प्रथम, समाज के निर्धन वर्ग के जीवन-स्तर में सुधार किया जाए तथा द्वितीय, धन एवं सम्पत्ति के वितरण में समानता लाई जाए। इस दृष्टि से विभिन्न प्रेरणात्मक एवं संवैधानिक उपाय किए गए हैं, यद्यपि उनसे आशातीत परिणामो की प्राप्ति तो नहीं हो पाई है, परन्तु कुछ सुधार अवश्य हुए हैं।उपरोक्त विवेचना के आधार पर हम कह सकते हैं कि भारत का विकास वास्तविक रूप से पंचवर्षीय योजनाओं के द्वारा आरम्भ हुआ।

5.

भारतीय संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों का संक्षेप में विश्लेषण कीजिए।

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भारतीय संविधान के तृतीय भाग में अनुच्छेद 12 से 35 तक मौलिक अधिकारों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। मूल अधिकार वे अधिकार होते हैं जिन्हें देश के सर्वोच्च कानून में स्थान प्राप्त होता है तथा जिनका उल्लंघन कार्यपालिका तथा विधायिका भी नहीं कर सकती है। मूलतः संविधान द्वारा नागरिकों को सात मौलिक अधिकार प्रदान किए गये, परन्तु 44 वें संवैधानिक संशोधन के अनुसार ‘सम्पत्ति के अधिकार’ को मौलिक अधिकारों की श्रेणी से निकाल दिया गया है, अब यह अधिकार एक कानूनी अधिकार रह गया है। भारतीय संविधान में निम्नलिखित छ: मौलिक अधिकारों का समावेश है]

⦁    समानता का अधिकार
⦁    स्वतन्त्रता का अधिकार

⦁    शोषण के विरुद्ध अधिकार
⦁    धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार

⦁    संस्कृति और शिक्षा-सम्बन्धी अधिकार ।
⦁    संवैधानिक उपचारों का अधिकार भारतीय संविधान में उपरोक्त मौलिक अधिकारों का समावेश कर एक प्रगतिशील कदम उठाया गया है। इससे सरकार की

निरकुंशता पर नियन्त्रण किया गया है। जहाँ तक मौलिक अधिकारों पर लगे प्रतिबन्धों या आपातकाल में उनके स्थगन का प्रश्न है, हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि वे प्रतिबन्ध राष्ट्र-हित, सार्वजनिक कल्याण तथा भारतीय लोकतंत्र के स्वरूप को विकृतियों से बचाने के लिए लगाये गये हैं। परन्तु न्याय पालिका के स्वतन्त्र होने के कारण नागरिक अपने अधिकारों की रक्षा के लिए इस पर विश्वास कर सकते हैं।” मौलिक अधिकारों का संविधान में उल्लेख कर देने से उनके महत्व और सम्मान में वृद्धि होती है। इससे उन्हें साधारण कानून से अधिक उच्च स्थान और पवित्रता प्राप्त हो जाती है। इससे वे अनुल्लंघनीय होते हैं। व्यवस्थापिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका के लिए उनका पालन आवश्यक हो जाता है।

6.

भारतीय संविधान कितने समय में निर्मित किया गया?

Answer»

भारतीय संविधान के निर्माण में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन का समय लगा।

7.

भारतीय संविधान की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।

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⦁    लिखित, निर्मित और विस्तृत संविधान ।

⦁    सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न लोकतन्त्रात्मक गणराज्य |

8.

स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय की भारत की आर्थिक स्थिति का वर्णन कीजिए।

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अंग्रेजों के लगभग दो सौ साल के शोषण के बाद 15 अगस्त, 1947 ई० को भारत स्वतन्त्र हुआ। इस दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था निरन्तर उपेक्षा का शिकार रही थी। शताब्दियों से चले आ रहे आर्थिक शोषण व लूट के कारण स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भारत की आर्थिक स्थिति पहले से ही जर्जर अवस्था में थी, पाकिस्तान के निर्माण के कारण भारत अनेक प्राकृतिक संसाधनों से वंचित हो गया। भारत एक निर्धन देश बन गया और इसकी प्रति व्यक्ति आय विश्व के निम्नतम के समतुल्य हो गई।

9.

भारतीय संविधान की चार विशेषताएँ लिखिए।

Answer»

भारतीय संविधान की चार विशेषताएँ निम्नवत् हैं

⦁    संविधान की प्रस्तावना

⦁    लिखित, निर्मित और विस्तृत संविधान

⦁    राज्य के नीति-निर्देशक तत्व

⦁    नागरिकों के मूल अधिकार

10.

भारतीय संविधान की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

Answer»

संविधान एक महत्वपूर्ण प्रलेख है, जिसमें ऐसे नियमों का संग्रह होता है जिसके आधार पर किसी देश का शासन संचालित होताहै। संविधान किसी देश में दीपशिखा का काम करता है, जिसके प्रकाश में देश का शासन संचालित होता है। भारत के संविधान की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. संविधान की प्रस्तावना- प्रत्येक देश के संविधान के प्रारम्भ में सामान्यतया एक प्रस्तावना होती है, जिसमें संविधान के मूल उद्देश्यों व लक्ष्यों को स्पष्ट किया जाता है। वास्तव में, प्रस्तावना संविधान का अंग नहीं होता है। बल्कि इसके द्वारा संविधान के स्वरूप का आभास हो जाता है। वस्तुतः इस प्रस्तावना में भारतीय संविधान का मूल दर्शन निहित है। संविधान के 42 वें संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा प्रस्तावना में समाजवादी, पंथनिरपेक्ष तथा अखण्डता शब्द जोड़कर इसकी गरिमा को और भी अधिक बढ़ा दिया गया है।

2. लिखित, निर्मित और विस्तृत संविधान- भारतीय संविधान अनेक प्रगतिशील देशों कनाडा, फ्रांस, अमेरिका आदि की भाँति एक लिखित संविधान है। इसका निर्माण एक संविधान सभा द्वारा किया गया था। यह विश्व का सबसे बड़ा संविधान है। डॉ० जेनिंग्स के अनुसार, “भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा, विशाल और व्यापक संविधान है।

3. सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न लोकतन्त्रात्मक गणराज्य- संविधान की प्रस्तावना में भारत को सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न लोकतन्त्रात्मक गणराज्य घोषित किया गया है। सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न का अर्थ है कि भारत अब बाह्य एवं आन्तरिक क्षेत्र में सभी प्रकार से पूर्ण स्वतन्त्र है। भारतवर्ष में लोकतन्त्रात्मक शासन भी है।

4. संघात्मक संविधान- संविधान द्वारा भारत में संघात्मक शासन की स्थापना की गई है। संविधान के अनुसार, भारत राज्यों का एक संघ है।” अत: इसमें संघात्मक संविधान के सभी तत्व विद्यमान हैं। यद्यपि संविधान का ढाँचा संघात्मक बनाया गया है, परन्तु उसकी आत्मा एकात्मक है, क्योंकि संविधान में अनेक ऐसे एकात्मक तत्व विद्यमान हैं जो एकात्मक शासन-व्यवस्था में ही पाए जाते हैं।

5. धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना- संविधान की प्रस्तावना में 42 वें संवैधानिक संशोधन के द्वारा ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द जोड़ा गया है। धर्मनिरपेक्ष का तात्पर्य है कि राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होगा। जनता के लोग अपना धर्म चुनने या धर्म परिवर्तन करने के लिए स्वतन्त्र होंगे, और किसी भी पूजा-पद्धति को अपना सकेंगे।

6. संसदात्मक शासन-प्रणाली- भारत ने संसदात्मक प्रणाली को अपनाया है। इसमें शासन करने की वास्तविक शक्ति राष्ट्रपति में नहीं अपितु उसके द्वारा नियुक्त मन्त्रिपरिषद् में हित होती है।

7. राज्य के नीति-निदेशक तत्व- ये तत्व सरकार को दिशा-निर्देश देने और उसका मार्गदर्शन करने वाले बिन्दु हैं, जिनका अनुसरण करना प्रजातान्त्रिक सरकारों का दायित्व होता है। ये नीति-निदेशक तत्व आयरलैण्ड के संविधान से ग्रहण किए गए हैं।

8. नागरिकों के मूल अधिकार- भारत के संविधान में नागरिकों के मूल अधिकारों की समुचित रूप से व्यवस्था की गई है। न्यायपालिका (उच्चतम न्यायालय) को इनका संरक्षक बनाया गया है, परन्तु ये अधिकार पूर्णतया असीमित तथा अनियन्त्रित नहीं हैं। संविधान द्वारा नागरिकों को सात मौलिक अधिकार प्रदान किए गए थे, परन्तु 44 वें संविधान संशोधन  द्वारा ‘सम्पत्ति के अधिकार’ को मौलिक अधिकार की श्रेणी से अलग कर दिया गया है और अब सम्पत्ति का अधिकार केवल एक कानूनी अधिकार रह गया है। इस प्रकार नागरिकों को अब छह मौलिक अधिकार प्राप्त हैं।

9. मूल कर्तव्यों का वर्णन- मूल कर्तव्यों की धारणा भारत के संविधान में पूर्व सोवियत संघ के संविधान से ली गई है। इनमें नागरिकों से अपील की गई है कि वे संविधान का पालन करें, देश की रक्षा करें, राष्ट्र-सेवा करें, हिंसा से दूर रहें तथा सार्वजनिक सम्पत्ति को सुरक्षित रखें आदि।

10. अस्पृश्यता का अन्त- संविधान के भाग III अनुच्छेद 17 के आधार पर अस्पृश्यता का अन्त कर दिया गया है। अत: अब छुआछूत की दूषित मनोवृत्ति पर आधारित आचरण करने वाला व्यक्ति अपराधी समझा जाएगा और दण्ड का भागीदार होगा। इस प्रकार संविधान ने देश में सामाजिक समानता स्थापित करने का प्रयत्न किया है।

11. महिलाओं को समान अधिकार- भारतीय संविधान ने नारियों को पुरुषों के समान आदर व सम्मान प्रदान किया है। उन्हें वे समस्त अधिकार प्रदान किए गए हैं, जो पुरुषों को प्राप्त हैं। ऊँचे पदों पर काम करने, मतदान करने, स्वयं चुनाव लड़ने आदि कई अधिकार संविधान ने उन्हें प्रदान किए हैं। सार्वभौमिक अथवा वयस्क मताधिकार- भारतीय संविधान के 61 वें संविधान संशोधन के अनुसार 18 वर्ष की आयु प्राप्त नागरिकों को बिना जाति, धर्म, लिंग, वर्ण के भेदभाव के मतदान का अधिकार प्रदान किया गया है। स्वतन्त्र, निष्पक्ष एवं शक्तिसम्पन्न न्यायपालिका- संविधान में एक सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था की गई है, जो संविधान के रक्षक के रूप में कार्य करता है। स्वतन्त्र और निष्पक्ष न्याय के लिए न्यायपालिका को कार्यपालिका के नियन्त्रण से मुक्त रखा गया है

12.संकटकालीन उपबन्ध- भारतीय संविधान में कुछ आपातकालीन नियम भी उल्लिखित हैं, जिनके आधार पर संकटकाल में समस्त शक्तियाँ केन्द्र के पास आ जाती हैं अर्थात् संघीय शासन एकात्मक शासन में परिवर्तित हो जाता है। इससे देश की असामान्य स्थिति पर शीघ्र नियन्त्रण कर लिया जाता है। कठोर एवं लचीले संविधान का सम्मिश्रण- भारतीय संविधान कठोर तथा लचीलेपन का सुन्दर समन्वय है। भारतीय संविधान के कुछ अनुच्छेद ऐसे हैं, जिनमें अकेले संसद साधारण कानून की भाँति ही संशोधन कर सकती है तथा कुछ अनुच्छेद ऐसे हैं, जिनमें संशोधन करने के लिए संसद के दो-तिहाई बहुमत के साथ-साथ राज्यों के कम-से-कम आधे विधानमण्डलों की सहमति भी आवश्यक है।

13. विश्व- शान्ति व सार्वभौमिक मैत्री का पोषक- संविधान के 51 वें उपबन्ध के अन्तर्गत यह भी उल्लेख किया गया है कि भारत विश्व के अन्य राष्ट्रों के साथ सह-अस्तित्व की भावना रखते हुए विश्व-शान्ति और सुरक्षा में सकारात्मक सहयोग देगा।

14.अल्पसंख्यक वर्गों के हितों की पूरी सुरक्षा- संविधान में अल्पसंख्यकों के हितों तथा जनजातियों और आदिवासियों की उन्नति हेतु भी विशेष संवैधानिक व्यवस्थाएँ की गई हैं। भारतीय संविधान में अनुसूचित जातियों तथा जनजाति के नागरिकों को सेवाओं, विधानसभाओं तथा अन्य क्षेत्रों में विशेष संरक्षण प्रदान किया गया है।

15. कानून का शासन- भारत के संविधान में कानून के शासन की व्यवस्था की गई है। विधि के शासन की अवधारणा ग्रेट ब्रिटेन के संविधान से ली गई है। भारत में कानून के समक्ष सभी नागरिक एकसमान हैं। कानून व दण्ड विधान की पद्धति सभी के लिए एक जैसी है।

16. बहुदलीय संसदीय व्यवस्था- भारत ने द्वि-दलीय पद्धति अथवा एकल-पद्धति को न अपनाकर बहुदलीय पद्धति पर आधारित संसदीय व्यवस्था को अपनाया गया है। बहुदलीय व्यवस्था होने के कारण संसद में समाज के सभी वर्गों के प्रतिनिधित्व की सम्भावनाएँ बढ़ जाती हैं तथा जनता को अपना प्रतिनिधि चुनने के लिए अनेक विकल्प भी मिलते हैं।

11.

भारतीय शिक्षा की चार नवीन प्रवृत्तियों का उल्लेख कीजिए।

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भारतीय शिक्षा की चार नवीन प्रवृत्तियाँ निम्नवत् हैं

⦁    राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली 

⦁    विज्ञान की शिक्षा पर बल

⦁    सैनिक शिक्षा पर बल

⦁    भावनात्मक एवं राष्ट्रीय एकीकरण के लिए पाठ्यक्रम का नवीनीकरण

12.

द्वितीय पंचवर्षीय योजना के दो प्रावधानों का उल्लेख कीजिए।

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द्वितीय पंचवर्षीय योजना का कार्यकाल अप्रैल, 1956 ई० से मार्च 1961 ई० तक था। इस योजना में विकास के ऐसे ढाँचे को बढ़ावा दिया गया जिससे देश में समाजवादी स्वरूप के समाज का निर्माण हो सके। इस योजना के दो प्रमुख प्रावधान रोजगार में वृद्धि एवं उद्योगीकरण थे।

13.

ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के चार प्रमुख उद्देश्य लिखिए।

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ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के चार प्रमुख उद्देश्य निम्नवत् हैं

⦁    2012 ई० तक सभी भूमिहीनों को घर और जमीन उपलब्ध कराना।

⦁    3 वर्ष तक के बच्चों में कुपोषण को घटाकर आधा करना।

⦁    वर्ष 2009 ई० तक सभी को पीने का पानी उपलब्ध कराना।

⦁    5.8 करोड़ नए रोजगार के अवसर पैदा करना।

14.

डॉ० भीमराव अम्बेडकर के कार्यों का उल्लेख कीजिए।

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डॉ० भीमराव अम्बेडकर ‘दलीतों के मसीहा’ के रूप में प्रसिद्ध हैं। आजादी से पूर्व 1942-46 ई० तक डॉ० भीमराव अम्बेडकर वायसराय के एक्जीक्यू काउंसिल के सदस्य रहे। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद उनको भारत सरकार का कानून मंत्री बनाया गया। भारतीय संविधान के निर्माण में डॉ० भीमराव अम्बेडकर ने अविस्मरणीय कार्य किया। वे संविधान सभा के सदस्य और संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष रहे। उन्होंने अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र और राजनीति शास्त्र पर अनेक पुस्तकों की रचना की। ‘द प्राब्लम ऑफ रुपीज’ तथा ‘रिडल्स ऑन हिन्दुइज्म’ इनके द्वारा रचित महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं।

15.

स्वतन्त्र भारत की कोई तीन तात्कालिक समस्याएँ लिखिए?

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स्वतन्त्र भारत की तीन तात्कालिक समस्याएँ निम्न प्रकार हैं

⦁    हिन्दू-मुस्लिम दंगे और विस्थापितों की समस्या

⦁    राजनीतिक एकीकरण की समस्या

⦁    जर्जर आर्थिक स्थिति

16.

स्वतन्त्र भारत की समस्याओं पर सारगर्भित लेख लिखिए।

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भारत की स्वतन्त्रता के साथ ही कठिनाइयों एवं कष्टों का काल भी आरम्भ हो गया था। देश के विभाजन के बाद दंगों, हत्याओं व लूटमार का भयंकर दौर आरम्भ हुआ। विभाजन की त्रासदी के कारण लाखों की संख्या में शरणार्थी, रियासतों के रूप में बिखरा हुआ अज्ञात भारत का ढाँचा, जर्जर अर्थव्यवस्था, अस्थिर राजनीति यह सब स्वतन्त्र भारत को विरासत में मिला। तत्कालीन भारत के महापुरुषों व राजनीति-वेत्ताओं के अथक परिश्रम ने इन सभी समस्याओं से लोहा लिया और उन्हें एक-एक करके सुलझाना आरम्भ किया।

17.

दसवी पंचवर्षीय योजना के बारे में टिप्पणी कीजिए।

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दसवीं पंचवर्षीय योजना का कार्यकाल 1 अप्रैल, 2002 ई० से 31 मार्च, 2007 ई० था। इसमें आर्थिक विकास का लक्ष्य 80% वार्षिक रखा गया, जबकि वर्तमान में विकास दर 5.5% वार्षिक थी। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए दस सूत्रीय एजेण्डा तैयार किया गया। इस एजेण्डे में अन्य बातों के अतिरिक्त विनिवेशीकरण कर एवं श्रम-सुधार और वित्तीय समझदारी वाली बातों पर विशेष बल दिया। दसवीं पंचवर्षीय योजना में सर्वाधिक बल कृषि सुधार व वृद्धि दर पर दिया गया। औद्योगिक क्षेत्र के लिए प्रस्तावित औसत दर 8.5% निर्धारित की गई। सार्वजनिक क्षेत्र के लिए निर्धारित कुल परिव्यय (15,92,300 करोड़ रुपए) में से उद्योग एवं खनिज के लिए 58,939 करोड़ रुपए व्यय करने का प्रावधान था। उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू व कश्मीर तथा पूर्वोत्तर राज्यों के लिए औद्योगिक नीति कारगर साबित हुई। प्रसंस्करण उद्योग काफी आगे बढ़ गया।

18.

“सुनियोजित अर्थतन्त्र( अर्थव्यवस्था) आधुनिक भारत का आधार है।” टिप्पणी कीजिए।

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दो सौ वर्षों तक अंग्रेजी शासन के अधीन रहने के बाद 15 अगस्त, 1947 ई० को भारत स्वतन्त्र हुआ। उस समय भारत काअर्थतन्त्र बहुत ही दयनीय स्थिति में था। जहाँ एक ओर कृषि उत्पादन, भारी और आधारभूत उद्योगों तथा शहरीकरण का निम्न स्तर था, वहीं जनसंख्या भी अत्यधिक थी। स्वतन्त्रता के समय हमारी शिक्षा और अर्थव्यवस्था इतनी पिछड़ी स्थिति में थी कि इनका विकास करना अत्यन्त दुष्कर था। परन्तु स्वतन्त्रता अपने साथ आशा की किरण भी लाई।
स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू की आवश्यक प्राथमिकताओं में से पहली प्राथमिकता आर्थिक तंत्र को सुनियोजित ढंग से मजबूत बनाना था। इसके लिए उन्होंने 1950 ई० में राष्ट्रीय योजना आयोग की स्थापना कर देश के आर्थिक विकास हेतु पंचवर्षीय योजनाओं को आरम्भ किया। उत्पादन की अधिकतम सीमा बढ़ाना, पूर्ण रोजगार प्राप्त करना, आय व सम्पत्ति की असमानताओं को कम करना, तथा सामाजिक न्याय उपलब्ध कराना आदि नीति-निर्माताओं द्वारा पंचवर्षीय योजनाओं को निर्धारित कर आधुनिक भारत का मार्ग प्रशस्त किया। आधुनिक भारत को आधार प्रदान करने के लिए स्वतन्त्रता प्राप्ति से अब

तक ग्यारह पंचवर्षीय योजनाएँ पूर्ण हो चुकी हैं। कुछ प्रमुख पंचवर्षीय योजनाओं के उद्देश्य निम्नवत् हैं-
⦁    प्रथम पंचवर्षीय योजना में कृषि को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई जो अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल रही।

⦁    द्वितीय पंचवर्षीय योजना में औद्योगीकरण पर विशेष बल दिया गया। औद्योगिक उत्पादन में 4.5% वृद्धि हुई तथा लगभग 66 लाख व्यक्तियों को रोजगार प्राप्त हुआ।

⦁    चौथी पंचवर्षीय योजना का लक्ष्य कृषि एवं औद्योगिक उत्पादन बढ़ाना तथा जनसंख्या वृद्धि को रोकना निर्धारित किया।

⦁    पाँचवी एवं छठी पंचवर्षीय योजना में गरीबी उन्मूलन एवं आत्मनिर्भरता प्राप्त करने पर बल दिया गया।
सातवीं एवं आठवीं पंचवर्षीय योजनाओं में क्रमश: ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों में वृद्धि एवं आर्थिक ढाँचे को मजबूत बनाए रखने के लिए क्रियान्वित की गई।

⦁    नवीं व दसवीं पंचवर्षीय योजनाओं में सर्वाधिक जोर क्रमशः सामाजिक व बुनियादी ढाँचे और सूचना तकनीक के विकास तथा खेती में सुधार व वृद्धि दर पर दिया गया।

⦁    ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में कृषि, सिंचाई, जल संसाधनों का विकास एवं दोहन मुख्य लक्ष्य निर्धारित किया। 
⦁    बारहवीं पंचवर्षीय योजना में कृषि, उद्योग एवं सेवा में वृद्धि दर पर विशेष बल दिया गया है। इस प्रकार उपरोक्त पंचवर्षीय योजनाओं के द्वारा सुनियोजित अर्थतन्त्र आधुनिक भारत की आधार शिला है।

19.

“सरदार पटेल भारतीय एकीकरण के स्थापत्यकार थे।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।

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स्वतन्त्रता के पूर्व भारत में लगभग 600 से अधिक देशी रियासतें थीं। स्वतन्त्र होने के उपरान्त भारत की सरकार के सामने देशी रियासतों को भारत संघ में विलय कराने की गम्भीर चुनौती थी। राष्ट्र की सुरक्षा के लिए इन सबको भारत संघ में विलय होना आवश्यक था। ये रियासतें सम्पूर्ण भारत के क्षेत्रफल का 48 प्रतिशत और जनसंख्या का 20 प्रतिशत थीं। यद्यपि ये रियासतें अपने आन्तरिक मामलों में स्वतन्त्र थीं, किन्तु वास्तविक रूप में इन सभी रियासतों पर अंग्रेजी शासन का नियन्त्रण स्थापित था। भारतीय देशी रियासतों में राजकीय जागरण 1921 ई० में प्रारम्भ हुआ। सरदार पटेल के सुझाव पर एक रियासती मन्त्रालय बनाया गया। सरदार पटेल को ही इस विभाग का मन्त्री बनाया गया।

सरदार पटेल ने बड़ी सूझ-बूझ के साथ देशी रियासतों के विलय के कार्य का संचालन किया। 1926 ई० में अखिल भारतीय देशी राज्य प्रजा परिषद का जन्म हुआ, जिसका पहला अधिवेशन एलौट के प्रसिद्ध नेता दीवान बहादुर एम० रामचन्द्र राय की अध्यक्षता में 1927 ई० में हुआ। 1934 ई० में डॉ० राजेन्द्र प्रसाद ने रियासतों में उत्तरदायी शासन की बात कही। 1935 ई० के अधिनियम में देशी रियासतों को मिलाकर एक संघ बनाने की बात कही गई। 1936 ई० के बाद देशी रियासतों में जन आन्दोलन तेजी से बढ़ा। कैबिनेट मिशन, एटली की घोषणा और लॉर्ड माउण्टबेटन की योजना में देशी राजाओं के बारे में विचार रखे गए और प्रायः कहा गया कि अंग्रेजों के चले जाने के बाद वे स्वतन्त्र होंगे। अपनी इच्छानुसार वे भारत या पाकिस्तान में सम्मिलित हों अथवा स्वतन्त्र रहें। उपप्रधानमन्त्री एवं रियासती मन्त्रालय के मन्त्री की हैसियत से सरदार पटेल ने रियासतों से भारत संघ में अपना विलय करने की अपील की और इस मार्मिक अपील का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। देशी राजाओं ने भी राष्ट्र की आवश्यकता का अनुभव किया। अतः 15 अगस्त, 1947 ई० को जूनागढ़, हैदराबाद तथा कश्मीर को छोड़कर छत्तीसगढ़ सहित 562 रियासतों ने भारतीय संघ में विलय की घोषणा कर दी।

सरदार वल्लभ भाई पटेल की कूटनीतिज्ञता और दूरदर्शिता का ही परिणाम था कि उन्होंने इस समस्या को सुलझाने का प्रयास किया। हैदराबाद, जूनागढ़ और कश्मीर का भारत में विलय प्रमुख कठिनाइयों के रूप में उभरकर सामने आया। जूनागढ़ एक छोटी सी रियासत थी और यहाँ नवाब का शासन था। यहाँ की अधिकांश जनता हिन्दू थी और वह जूनागढ़ का भारत में विलय करने के पक्ष में थी, जबकि नवाब जूनागढ़ को पाकिस्तान में मिलाना चाहता था। जब नवाब ने जूनागढ़ को पाकिस्तान में मिलाने की घोषणा की तो वहाँ की जनता ने इसका विरोध किया। इसी समय सरदार पटेल ने जूनागढ़ की जनता की सहायता के लिए सेना भेज दी। भारतीय सेना से भयभीत होकर नवाब पाकिस्तान भाग गया। फरवरी 1948 ई० में जनमत संग्रह के आधार पर जूनागढ़ का भारत में विलय कर लिया गया। हैदराबाद की जनता भी जूनागढ़ के समान ही हैदराबाद को भारत में सम्मिलित करना चाहती थी, जबकि निजाम सीधे ब्रिटिश साम्राज्य से साँठगाँठ कर एक स्वतन्त्र राज्य का स्वप्न देख रहा था। उसकी पाकिस्तान से भी गुप्त वार्ताएँ चल रही थीं।

अक्टूबर, 1947 में उसके साथ एक विशेष समझौता किया गया, जिसमें उसे एक वर्ष तक यथावत् स्थिति की बात कही गई, लेकिन उस पर किसी भी प्रकार की सैन्य वृद्धि या बाहरी मदद लेने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। निजाम की कुटिल चालें चलती रहीं। उसने पाकिस्तान से हथियार मँगवाए तथा रजाकारों की मदद से मनमानी करनी चाही। परिणामत: हैदराबाद की जनता ने निजाम के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। निजाम ने जनता पर अत्याचार करने प्रारम्भ कर दिए। इसी समय सरदार पटेल ने हैदराबाद की जनता का रुख भारत की ओर देखकर सितम्बर 1948 में निजाम को चेतावनी दी। निजाम के न मानने पर 13 सितम्बर, 1948 को हैदराबाद में कार्यवाही की गई और पाँच दिन में न केवल रजाकारों को खदेड़ दिया गया, बल्कि निजाम ने भी विलय-पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। 18 सितम्बर, 1948 को हैदराबाद का भारत में विलय हो गया। इस प्रकार उपरोक्त विवरण के अनुसार सरदार पटेल ने भारतीय एकीकरण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। मृत्यु उपरान्त उन्हें ‘भारत रत्न’ प्रदान किया गया।

20.

देशी रियासतों के विषय में सरदार पटेल के योगदान का मूल्यांकन कीजिए।

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स्वतन्त्र भारत के प्रथम उपप्रधानमन्त्री सरदार पटेल के सुझाव पर एक रियासती मन्त्रालय’ का गठन किया गया। सरदार पटेल को इस मन्त्रालय का मन्त्री बनाया गया। सरदार पटेल ने बड़ी सूझ-बूझ के साथ देशी रियासतों के विलय का संचालन किया। उपप्रधानमन्त्री एवं रियासती मन्त्रालय के मन्त्री की हैसियत से सरदार पटेल ने रियासतों से भारत संघ में अपना विलय करने की अपील की और उनकी मार्मिक अपील का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। देशी राजाओं ने भी राष्ट्र की आवश्यकता का अनुभव किया। 15 अगस्त, 1947 ई० को 562 देशी रियासतों का भारतीय संघ में विलय हो गया। यह पटेल की एकनिष्ठ दृढ़ता का परिचय था कि उन्होंने जूनागढ़, हैदराबाद, और कश्मीर जैसी रियासतों का बुद्धिमता एवं ताकत के बल पर भारत में विलय किया।

21.

“सरदार वल्लभभाई पटेल भारतीय गणतन्त्र के सफल निर्माता थे।” इस कथन के आलोक में उनके द्वारा देशी राज्यों के भारतीय राष्ट्र में विलय के प्रयासों का वर्णन कीजिए।

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स्वतन्त्र भारत के पहले तीन वर्ष सरदार पटेल उप-प्रधानमन्त्री, गृह मन्त्री, सूचना मन्त्री और राज्य मन्त्री रहे। इस सबसे भी बढ़कर  उनकी ख्याति भारत के रजवाड़ों को शान्तिपूर्ण तरीके से भारतीय संघ में शामिल करने तथा भारत के राजनीतिक एकीकरण के कारण है। 5 जुलाई, 1947 को सरदार पटेल ने रियासतों के प्रति नीति को स्पष्ट करते हुए कहा कि- “धीरे-धीरे बहुत-सी देशी रियासतों के शासक भोपाल के नवाब से अलग हो गये और इस तरह नवस्थापित रियासती विभाग की योजना को सफलता मिली। भारत के तत्कालीन गृहमन्त्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने भारतीय संघ में उन रियासतों का विलय किया, जो स्वयं में सम्प्रभुता प्राप्त थीं। उनका अलग झंडा और अलग शासक था।

सरदार पटेल ने आज़ादी के ठीक पूर्व (संक्रमण काल में) ही पी.वी.मेनन के साथ मिलकर कई देशी राज्यों को भारत में मिलाने के लिए कार्य आरम्भ कर दिया था। पटेल और मेनन ने देशी राजाओं को बहुत समझाया कि उन्हें स्वायत्तता देना सम्भव नहीं होगा। इसके परिणामस्वरूप तीन रियासतें- हैदराबाद, कश्मीर और जूनागढ़ को छोड़कर शेष सभी राजवाड़ों ने स्वेच्छा से भारत में विलय का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। 15 अगस्त, 1947 तक हैदराबाद, कश्मीर और जूनागढ़ को छोड़कर शेष भारतीय रियासतें ‘भारत संघ’ में सम्मिलित हो चुकी थीं, जो भारतीय इतिहास की एक बड़ी उपलब्धि थी। जूनागढ़ के नवाब के विरुद्ध जब बहुत विरोध हुआ तो वह भागकर पाकिस्तान चला गया और इस प्रकार जूनागढ़ भी भारत में मिला लिया गया।

जब हैदराबाद के निजाम ने भारत में विलय का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया तो सरदार पटेल ने वहाँ सेना भेजकर निजाम का आत्मसमर्पण करा लिया। भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन को वैचारिक एवं क्रियात्मक रूप में एक नई दिशा देने के कारण सरदार पटेल ने राजनीतिक इतिहास में एक गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त किया। वास्तव में वे आधुनिक भारत के शिल्पी थे। उनके कठोर व्यक्तित्व में विस्मार्क जैसी संगठन कुशलता, कौटिल्य जैसी राजनीति सत्ता तथा राष्ट्रीय एकता के प्रति अब्राहम लिंकन जैसी अटूट निष्ठा थी। जिस अदम्य उत्साह असीम शक्ति से उन्होंने नवजात गणराज्य की प्रारम्भिक कठिनाइयों का समाधान किया, उसके कारण विश्व के राजनीतिक मानचित्र में उन्होंने अमिट स्थान बना लिया। भारत के राजनीतिक इतिहास में सरदार पटेल के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। सरदार पटेल के ऐतिहासिक कार्यों और किये गये राजनीतिक योगदान निम्नवत् हैंद्वीपसमूह भारत के साथ मिलाने में भी पटेल की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।

इस क्षेत्र के लोग देश की मुख्यधारा से कटे हुए थे और उन्हें भारत की आजादी की जानकारी 15 अगस्त, 1947 के कई दिनों बाद मिली। हालांकि यह क्षेत्र पाकिस्तान के नजदीक नहीं था, लेकिन पटेल को लगता था कि इस पर पाकिस्तान दावा कर सकता है। इसलिए ऐसी किसी भी स्थिति को टालने के लिए पटेल ने लक्षद्वीप में राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए भारतीय नौसेना का एक जहाज भेजा। इसके कुछ घंटे बाद ही पाकिस्तान नौसेना के जहाज लक्षद्वीप के पास मंडराते देखे गए, लेकिन वहाँ भारत का झंडा लहराते देख उन्हें वापिस कराची लौटना पड़ा।

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