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कबीरदास ने त्याग को आदर्श स्वरूप कैसा बताया है?

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त्याग करने के लिए मनुष्य का मोह से मुक्त होना आवश्यक होता है। थोड़ा-थोड़ा करके सांसारिक वस्तुओं का त्याग करने की अपेक्षा एक ही बार में दृढ़ निश्चय के साथ सारी सांसारिक वस्तुओं का त्याग कर देना उत्तम होता है। मनुष्य ऐसा तभी कर सकता है जब वह मान लेता है कि सब कुछ भगवान का है, उसका कुछ भी नहीं है। यही त्याग का आदर्श स्वरूप होता है।



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