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“पर जळती निज पाय, रती न सूझै राजिया” पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।

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इस पंक्ति से सम्बद्ध सोरठे में कवि कृपाराम खिड़िया ने संकेत किया है कि समाज में लोग दूसरों के घरों में लगी आग अर्थात् कलह और विवाद आदि को दूर से देखकर आनन्दित हुआ करते हैं, परन्तु उन्हें अपने घर की कलह और अशान्ति दिखाई नहीं देती। पहाड़ पर लगी आग तो सभी को दिखाई दे जाती है परन्तु अपने पैरों के निकट जलती आग लोगों को दिखाई नहीं देती। दूसरों के दोषों को देखने से पहले व्यक्ति को अपनी कमियों पर ध्यान देना चाहिए।



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