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This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.

1.

उच्चावच का क्या अर्थ है?

Answer»

वे धरातलीय स्थलाकृतियाँ जिनकी रचना ऊँचाई एवं ढाल के द्वारा प्रदर्शित की जाती है, उच्चावच कहलाती हैं।

2.

उच्चावच प्रदर्शन की कौन-कौन-सी प्रमुख विधियाँ हैं?

Answer»

उच्चावच प्रदर्शन की प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित हैं –

⦁    चित्र विधि द्वारा प्रदर्शन (Pictorial Methods)
⦁    गणितीय विधियाँ (Mathematical Methods) तथा
⦁    मिश्रित या संयुक्त विधियाँ (MixedorComposite Methods)।

3.

किन्हीं चार मिश्रित विधियों के नाम बताइए।

Answer»

⦁    समोच्च रेखा एवं रंग विधि
⦁    समोच्च रेखा, स्थानांकित ऊँचाई, तल-चिह्न तथा छाया विधि
⦁    समोच्च रेखा एवं हैच्यूर या खण्ड रेखा विधि तथा
⦁    समोच्च रेखा एवं पहाड़ी छायाकरण विधि। 

4.

पंजाकार डेल्टा का एक उदाहरण दीजिए।

Answer»

मिसीसिपी डेल्टा।

5.

निम्नलिखित में से कौन-सा एक कार्य भारतीय रिजर्व बैंक का नहीं है?(क) साख नियन्त्रण(ख) नोटों का निर्गमन(ग) जनता को ऋण देना व उनसे जमा स्वीकार करना(घ) सरकार के बैंक का कार्य करना

Answer»

(ग) जनता को ऋण देना व उनसे जमा स्वीकार करना।

6.

भारतीय रिजर्व बैंक का मुख्यालय कहाँ पर स्थित है? 

Answer»

भारतीय रिजर्व बैंक का मुख्यालय मुम्बई में स्थित है।

7.

डेल्टा और एस्चुअरी में अन्तर बताइए।

Answer»

डेल्टा–त्रिभुजाकार होता है जो नदी मुहाने पर निक्षेपण की क्रिया से बनता है। एस्चुअरी-‘वी’ (V) आकृति में किसी नदी का ज्वारीय मुहाना है।

8.

कन्दरा स्तम्भ कैसे बनते हैं?

Answer»

कन्दरा स्तम्भों का निर्माण घुलनशील शैलों के क्षेत्रों में भूमिगत जल की घुलन क्रिया तथा निक्षेपण के द्वारा होता है।

9.

गंगा-ब्रह्मपुत्र का डेल्टा किस प्रकार की डेल्टा है?

Answer»

गंगा-ब्रह्मपुत्र का डेल्टा चापाकार डेल्टा है।

10.

भारतीय रिजर्व बैंक के स्थानीय प्रधान कार्यालय कहाँ-कहाँ पर स्थित हैं?

Answer»

भारतीय रिजर्व बैंक के चार स्थानीय प्रधान कार्यालय, नई दिल्ली, कोलकाता, मुम्बई तथा चेन्नई में स्थापित किये गये हैं।

11.

घोल रन्ध्र (स्वालो होल्स) से सम्बन्धित स्थलाकृतियों के नाम लिखिए।

Answer»

घोल रन्ध्र से सम्बन्धित स्थलाकृतियों में विलयन रन्ध्र, डोलाइन, घोलपटल, ध्वस्त रन्ध्र, कार्ट खिड़की, कार्ट झील, युवाला, पोलिज आदि प्रमुख हैं।

12.

हिमनद कटक (एस्कर) क्या व कैसे बनते हैं?

Answer»

हिमानी निक्षेप से बने लम्बे किन्तु कम ऊँचाई वाले टेढ़े-मेढ़े कटक हिमानी कटक कहलाते हैं। देखने पर ये कटक प्राकृतिक बाँध जैसे प्रतीत होते हैं। ये बालू, मिट्टी और गोलाश्म से निर्मित होते हैं। इन पदार्थों का निक्षेपण हिमानी के अन्दर बहने वाली जल-धाराओं द्वारा लाए गए अवसाद से होता है।

13.

जलोढ़ पंख से क्या अभिप्राय है?

Answer»

प्रौढ़ावस्था में नदी द्वारा निर्मित भू-आकृतियों में जलोढ़ पंख मुख्य आकृति है। पर्वतपदीय भागों में नदी बजरी, पत्थर, कंकड़, बालू, मिट्टी आदि पदार्थों का निक्षेपण शंकु के रूप में करती है। इनके बीच से अनेक छोटी-छोटी धाराएँ निकलती है। इस प्रकार के अनेक शंकु मिलकर पंखे जैसी आकृति का निर्माण करते हैं जिससे उन्हें जलोढ़ पंख का नाम दिया गया है।

14.

भारतीय सर्वेक्षण विभाग का प्रधान कार्यालय कहाँ पर स्थित है?

Answer»

भारतीय सर्वेक्षण विभाग का मुख्यालय हाथी-बडकला, देहरादून, उत्तराखण्ड राज्य में स्थित है।

15.

स्थानांकित ऊँचाई विधि क्या होती है?

Answer»

यह विधि किसी स्थान की धरातल पर अंकित ऊँचाई को प्रकट करती है। मानचित्र में उस स्थान की ऊँचाई मीटर अथवा फीट में नापी जाती है।

16.

समोच्च रेखा से क्या अभिप्राय है?

Answer»

मानचित्र में समान ऊँचाई वाले स्थानों को मिलाकर प्रदर्शित की जाने वाली रेखा को समोच्च रेखा कहते हैं।

17.

प्रवणता (Gradient) क्या होती है?

Answer»

धरातलीय दूरी एवं लम्बवत् दूरी में जो अनुपात होता है, उसे प्रवणता कहते हैं।

18.

निर्देश चिह्न (Bench Mark) किसे कहा जाता है?

Answer»

सर्वेक्षण में समुद्र-तल से विभिन्न स्थानों की ऊँचाई को अंकित किया जाता है। इसके समीप में निर्देश चिह्न बना दिया जाता है। इस संकेत के द्वारा उस स्थान की ऊँचाई का ज्ञान हो जाता है अथवा इस स्थान के सन्दर्भ में अन्य स्थानों की अपेक्षाकृत ऊँचाई का पता चल जाता है, जिसे निर्देश चिह्न का नाम दिया गया है।

19.

धरातलीय भू-पत्रक से क्या अभिप्राय है?

Answer»

ऐसे मानचित्र जिनमें प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक स्थलाकृतियों का चित्रण सांकेतिक चिह्नों की सहायता से दीर्घमापक पर किया जाता है, धरातलीय भू-पत्रक कहलाते हैं।

20.

धरातलीय भू-पत्रकों का प्रकाशन किस विभाग द्वारा किया जाता है?

Answer»

धरातलीय भू-पत्रक मानचित्रों का प्रकाशन भारतीय सर्वेक्षण विभाग, देहरादून द्वारा किया जाता है।

21.

हिमानी जलोढ़ निक्षेप द्वारा कौन-कौन-सी स्थलाकृतियाँ बनती हैं?

Answer»

हिमानी जलोढ़ निक्षेप द्वारा एस्कर, केम तथा हिमनद अपक्षेप मैदान आदि स्थलाकृतियाँ बनती है।

22.

भारतीय भू-पत्रकों की संख्या कितनी है?

Answer»

भारतीय भू-पत्रकों की संख्या 136 है। म्यांमार को छोड़कर 92 भू-पत्रक भारत के ऊपर से गुजरते हैं।

23.

धरातलीय भू-पत्रकों का विस्तार बताइए।

Answer»

प्रत्येक धरातलीय भू-पत्रक 4° अक्षांश तथा 4° देशान्तरों को प्रकट करता है।

24.

भारतीय भू-पत्रक किस मापक पर बने हैं?

Answer»

भारतीय भू-पत्रक 1 इंच = एक मील के मापक अर्थात् प्र० भि० 1/63, 360 पर निर्मित किये गये हैं।

25.

नदी की प्रौढावस्था का विवरण दीजिए।

Answer»

यह नदी की मैदानी अवस्था होती है। युवावस्था के बाद जैसे ही नदी पर्वत प्रदेश से मैदानों में प्रवेश करती है, उसका वेग एकदम मन्द हो जाता है। इस अवस्था में नदी में सहायक नदियों के मिलने से जल की मात्रा तो बढ़ जाती है परन्तु जल में तेज गति न होने के कारण उसकी वहन शक्ति क्षीण हो जाती है। अतः पर्वतीय क्षेत्रो से लाए गए अवसाद तथा शिलाखण्डों को नदी पर्वतपदीय क्षेत्रों में ही जमा कर देती है, जिसे पर्वतपदीय मैदान कहते हैं। गंगा नदी ऋषिकेश एवं हरिद्वार के निकट ऐसे ही अवसादों का निक्षेप करती है। इस अवस्था में नदी गहरे कटाव की अपेक्षा पाश्विक अपरदन (Lateral Erosion) अधिक करती है। कभी-कभी नदी क्रा एक किनारा खड़े ढाल वाला तथा दूसरा प्रायः समतल होता है। ऐसी दशा में नदी खड़े किनारे की ओर अपरदन तथा समतल किनारे की ओर निक्षेपण का कार्य करती है। इस अवस्था में नदी अपनी घाटी को चौड़ा करने का कार्य ही अधिक करती है।

26.

नदी की जीर्णावस्था (वृद्धावस्था) में बनने वाली किसी एक आकृति का उल्लेख कीजिए।

Answer»

नदी की जीर्णावस्था (वृद्धावस्था) में बनने वाली प्रमुख आकृति डेल्टा है।

27.

नदी की युवावस्था में बनने वाली दो आकृतियों का उल्लेख कीजिए।

Answer»

1. ‘V’ आकार की घाटी तथा 2. जल-प्रपात या झरना।

28.

पाश्विक हिमोढों का आधिक्य कहाँ मिलता है?

Answer»

पाश्विक हिमोढ़ों का आधिक्य ग्रीनलैण्ड एवं अलास्का में अधिक मिलता है। यहाँ इनकी ऊँचाई 300 मीटर तक होती है।

29.

निम्नलिखित में अन्तर स्पष्ट कीजिए –V आकार की घाटी और U आकार की घाटी

Answer»

V आकार की घाटी – नदी पर्वतीय क्षेत्र में अपनी तली को काटकर उसे गहरा करती है। इससे ‘V’ आकार की घाटी का निर्माण होता है।

U आकार की घाटी – ऊँचे पर्वतों पर जब कोई बर्फ का बड़ा टुकड़ा ढाल पर खिसकता है। तो उसे हिमानी कहते हैं। यह हिमानी पहले से बनी ‘V’ आकार की घाटी को ‘U’ आकार की घाटी में बदल देता है जिसका ढाल खड़ा तथा तल सपाट एवं चौड़ा होता है।

30.

निम्नलिखित में अन्तर स्पष्ट कीजिए –अपक्षय और अपरदन

Answer»

अपक्षय – ऋतु और मौसम के प्रभाव द्वारा चट्टानें धीरे-धीरे अपने ही स्थानों पर छोटे-छोटे टुकड़ों में टूटती रहती हैं। चट्टानों के टूटने-फूटने की इस क्रिया को अपक्षय कहते हैं।

अपरदन- अपक्षय द्वारा टूटे हुए चट्टानों का बहता जल, नदी, सागर की लहरें, गतिशील बर्फ (हिमानी), पवन आदि एक स्थान से दूसरे स्थानों पर इकट्ठा कर देते हैं। इस क्रिया को अपरदन कहते हैं।

31.

बरखान का निर्माण किस क्रिया द्वारा होता है ?

Answer»

बरखान का निर्माण पवन की निक्षेपणात्मक क्रिया द्वारा होता है।

32.

भूकम्प उदगम केन्द्र और भूकम्प अधिकेन्द्र में अन्तर स्पष्ट कीजिए।

Answer»

पृथ्वी के अन्दर जहाँ से कम्पन उत्पन्न होता है, उस स्थान को भूकम्प उद्गम केन्द्र कहते हैं। इस उद्गम केन्द्र के ठीक ऊपर धरातल पर स्थित बिन्दु को अधिकेन्द्र कहते हैं।

33.

नदी की प्रौढावस्था में बनने वाली दो आकृतियों का उल्लेख कीजिए।

Answer»

1. जलोढ़ पंख तथा 2. नदी विसर्प।

34.

हिमरेखा क्या होती है?

Answer»

हिमरेखा वह काल्पनिक रेखा है जिससे ऊपर आर्द्रता सदैव हिम के रूप में पाई जाती है।

35.

अन्धी घाटी किसे कहते हैं ?

Answer»

जब धरातलीय नदियाँ घोल रन्ध्र, विलयन रन्ध्र आदि छिद्रों से प्रवेश करती हैं तो आगे चलकर अचानक ही इनका जल समाप्त हो जाता है। इन्हें ही अन्धी घाटियाँ कहते हैं।

36.

पृथ्वी के आन्तरिक बल से आप क्या समझते हैं?

Answer»

ऐसे बल जो पृथ्वी के आंतरिक भाग में उत्पन्न होते हैं, आंतरिक बल कहलाते हैं।

37.

बालुका स्तूप क्या है? इसका निर्माण कैसे होता है?

Answer»

मरुस्थलीय प्रदेशों में जब पवन के मार्ग में कोई बाधा होती है तब पवन का वेग कम हो जाता है, जिससे पवन के साथ उड़ने वाले पदार्थ धरातल पर गिरकर बालू के टीलों का निर्माण करते हैं। इन्हें बालुका स्तूप कहते हैं।

38.

जल प्रपात कैसे बनते हैं?

Answer»

जब नदी का जल ऊँचाई से खड़े ढाल के सहारे अधिक वेग से नीचे गिरता है तो वह जल प्रपात बन जाता है।

39.

छोटे बच्चे को दुर्घटनास्थल से कैसे स्थानान्तरित किया जाता है?

Answer»

छोटे बच्चे को गोद में उठाकर घटनास्थल से स्थानान्तरित किया जा सकता है।

40.

आपातकालीन स्ट्रेचर कैसे बनाया जा सकता है?

Answer»

आपातकालीन स्टेचर बनाने के लिए दो बॉस लेकर उनके बीच किसी दरी, टाट या कोट आदि को कसकर बाँध लिया जाता है।

41.

गाँव में दुर्घटनाग्रस्त हुए व्यक्ति को चिकित्सा केन्द्र तक पहुँचाने के लिए आप कौन-सी विधि अफ्नाएँगी?(क) चारपाई पर लिटाकर(ख) तिहत्थी आसन द्वारा(ग) गोद में उठाकर(घ) पीठ पर लादकर

Answer»

सही विकल्प है (क) चारपाई पर लिटाकर

42.

घायल को दुर्घटनास्थल से स्थानान्तरित करने की आवश्यकता कब होती है?(क) आग में घिर जाने पर(ख) किसी वाहन से टकराने पर(ग) किसी इमारत से गिरने पर(घ) तीनों अवस्थाओं में

Answer»

सही विकल्प है (घ) तीनों अवस्थाओं में

43.

हस्त-आसन विधि कब प्रयुक्त की जाती है?

Answer»

दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति के पैर घुटनों अथवा जाँघ में यदि चोट लगी हो, तो प्रायः हस्त आसन विधि का प्रयोग किया जाता है।

44.

घायल व्यक्ति को कहाँ स्थानान्तरित किया जाता है?

Answer»

घायल व्यक्ति को सुरक्षित तथा आरामदायक स्थान पर स्थानान्तरित किया जाता है।

45.

आग लग जाने पर दुर्घटनाग्रस्त व्यक्तियों का स्थानान्तरण किया जाता है(क) कन्धे पर लादकर(ख) गोद में उठाकर(ग) सहारा देकर(घ) दोहत्थी आसन द्वारा

Answer»

सही विकल्प है (क) कन्धे पर लादकर

46.

मूर्च्छित अवस्था में घायल को स्थानान्तरित करने की विधि है(क) हस्त-आसन विधि(ख) कन्धे पर लादकर ले जाना(ग) सहारा देकर ले जाना(घ) ये सभी

Answer»

सही विकल्प है (ख) कन्धे पर लादकर ले जाना

47.

प्रयोगात्मक विधि का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा इस विधि के गुण-दोषों का उल्लेख कीजिए।याप्रयोग विधि के प्रमुख चरण क्या हैं? उदाहरण देकर लिखिए।याप्रयोगात्मक विधि के गुण-दोषों का विवेचन कीजिए।यामनोविज्ञान में प्रयोग विधि का संक्षिप्त विवरण दीजिए।यास्वतंत्र चर और आश्रित चर का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

Answer»

प्रयोगात्मक विधि(Experimental Method)
आधुनिक मनोविज्ञान की मुख्य अध्ययन विधि प्रयोगात्मक विधि (Experimental Method) है। अब प्रयोगात्मक विधि को मनोविज्ञान की सर्वाधिक उपयोगी, महत्त्वपूर्ण तथा सर्वोत्तम अध्ययन विधि माना जाता है। प्रयोगात्मक विधि प्रयोगशाला में आयोजित प्रयोग के माध्यम से कार्य करती है।

प्रयोगात्मक विधि अन्तर्दर्शन तथा निरीक्षण विधि से अधिक विकसित तथा वैज्ञानिक है। प्रयोग के समय प्रयोगकर्ता का दशाओं या घटनाओं पर नियन्त्रण रहता है, जबकि निरीक्षण के अन्तर्गत ऐसा नहीं होता है। उन्नीसवीं शताब्दी में वुण्ट नामक मनोवैज्ञानिक द्वारा मनोवैज्ञानिक प्रयोगशाला की स्थापना के साथ प्रयोग विधि का श्रीगणेश हुआ था।

प्रयोग का अर्थ-वुडवर्थ के अनुसार प्रयोग का पहला अर्थ है- प्रकृति से प्रश्न करना। इसका अभिप्राय यह है कि प्रयोग करने वाले व्यक्ति के सामने एक स्पष्ट प्रश्न या समस्या होती है, जिसका उचित उत्तर पाने के लिए वह प्रकृति के सामने प्रयोग का आयोजन करता है। यह प्रश्न या समस्या किसी युक्ति से निकली उपकल्पना (सम्भावित उत्तर) पर आधारित होती है। इस उपकल्पना को प्रयोग के माध्यम से सिद्ध अथवा असिद्ध करना होता है। प्रयोग करते समय वस्तुओं को एक निश्चित क्रम में व्यवस्थित किया जाता है जिससे प्राप्त परिणाम उस प्रश्न का उत्तर देते हैं जिसे प्रकृति से पूछा गया था।
अपने दूसरे अर्थ में प्रयोग नियन्त्रित वातावरण में किया गया निरीक्षण है। प्रयोग की आवश्यक शर्त के अनुसार नियन्त्रित एवं उपयुक्त परिस्थितियों में प्राणी की मानसिक क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है तथा परिणाम निकाले जाते हैं। इस प्रक्रिया को बार-बार दोहराने पर भी प्रयोग के परिणाम पहले के समान ही प्राप्त होते हैं। इस प्रकार नियन्त्रित निरीक्षण ही प्रयोग कहलाता है।

प्रयोग की परिभाषा – प्रयोग को निम्न प्रकार परिभाषित किया जा सकता है –
⦁    गैरेट के मतानुसार, “प्रकृति से पूछा गया प्रश्न प्रयोग है।”
⦁    जहोदा के अनुसार, “प्रयोग परिकल्पना के परीक्षण की एक विधि है।”
⦁    जे० सी० टाउनशैण्ड के अनुसार, “नियन्त्रित दशाओं में किये गये निरीक्षण को प्रयोग कहा जाता है।”
⦁    फेस्टिगर के मतानुसार, “प्रयोग का मूल आधार स्वतन्त्र चर में परिवर्तन करने से परतन्त्र चर पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करना है।”

प्रयोगात्मक विधि के चरण(Steps of Experimental Method)
प्रयोगात्मक विधि अपने आप में एक व्यवस्थित अध्ययन विधि है। इस विधि के कुछ निश्चित चरण हैं जो निम्नलिखित हैं

(1) समस्या का निर्धारण – प्रयोगात्मक विधि का प्रथम चरण अध्ययन की समस्या का निर्धारण है। प्रयोग आरम्भ करने से पहले प्रयोगकर्ता समस्या का निर्धारण करता है। इसके लिए वह किसी उपयुक्त मनोवैज्ञानिक समस्या का चुनाव करता है। उदाहरण के लिए, समाज में नशे का व्यसन । बुरा समझा जाता है। प्रायः देखने में आता है कि अधिकांश ट्रक-ड्राइवर नशाखोरी करते हैं। माना जाता है कि नशा न करने वाले ड्राइवर, नशा करने वाले ड्राइवरों से सन्तुलित, विश्वसनीय एवं अच्छी गाड़ी चलाते हैं अथवा नशा करने से चरित्र पर बुरा प्रभाव पड़ता है। कुछ लोगों का कहना है कि नशा करने से ध्यान एकाग्र होता है और इससे गाड़ी चलाने में मदद मिलती है। जो लोग न तो नशाखोरी के पक्ष में हैं और न ही विपक्ष में, उनके अनुसार असन्तुलित एवं अविश्वसनीय गाड़ी चलाने का कारण नशे की आदत न होकर ड्राइवर का व्यक्तित्व है। उच्च जीवन-स्तर यापन करने वाले बहुत-से लोग नशा करते हैं। ये सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित हैं, चरित्रवान समझे जाते हैं और आर्थिक रूप से भी सम्पन्न हैं। इस तर्क-वितर्क से इस समस्या का जन्म होता है कि शारीरिक या मानसिक क्षमता पर नशाखोरी का क्या प्रभाव पड़ता है।
(2) परिकल्पनाका निर्माण – समस्या का निर्धारण करने के उपरान्त प्रयोगकर्ता परिकल्पना (Hypothesis) का निर्माण करता है। परिकल्पना चुनी गयी समस्या का सम्भावित समाधान होता है, जिसकी रचना से प्रयोग को कार्य निश्चित और नियन्त्रित दशाओं में होता है। उपर्युक्त प्रस्तुत किये गये उदाहरण में, शारीरिक तथा मानसिक क्षमता पर नशाखोरी के प्रभाव की समस्या को परिकल्पना के रूप में इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है-“नशा (अफीम का सेवन) करने से शारीरिक तथा मानसिक क्षमता का ह्रास होता है।” इस परिकल्पना को प्रयोगों के आधार पर सिद्ध या असिद्ध किया जाएगा।
(3) स्वतन्त्र तथा आश्रित चरों को पृथक करना – किसी प्रयोग में दो या उससे अधिक ‘चर’ या परिवर्त्य (Variables) हो सकते हैं। ये चर दो प्रकार से वर्णित हैं—स्वतन्त्र चर तथा आश्रित चर। स्वतन्त्र चर (Independent Variable) को सामान्यत: ‘उद्दीपन कहा जाता है और आश्रित चर (Dependent Variable) को प्रतिक्रियाएँ कहा जाता है। स्वतन्त्र चर को प्रयोगकर्ता नियन्त्रित करके प्रस्तुत करता है। इन्हें बिना किसी अन्य चर पर प्रभाव डाले घटाया-बढ़ाया जा सकता है। आश्रित चर स्वतन्त्र ज्वरों के बदले जाने पर बदल जाते हैं और प्रयोगात्मक परिस्थितियों पर आश्रित होते हैं। उपर्युक्त उदाहरण में, नशाखोरी स्वतन्त्र चर है, क्योंकि प्रयाग में नशा करने और न करने के प्रभाव की परीक्षा की जाती है। शारीरिक और मानसिक क्षमता आश्रित चर है क्योंकि यह नशाखोरी की उपस्थिति या अनुपस्थिति के अनुसार परिवर्तित होगा।
(4) परिस्थितियों पर नियन्त्रण – मनोवैज्ञानिक प्रयोग में परिस्थितियों (दशाओं) पर नियन्त्रण एक आवश्यक तत्त्व है। इसके लिए प्रयोगकर्ता को सभी सम्भावित चरों का ज्ञान होना चाहिए। उसे उन अवांछित चरों या उद्दीपनों पर नियन्त्रण रखना पड़ता है जो वातावरण में उत्पन्न हो जाते हैं। और जिनकी प्रयोगकर्ता को आवश्यकता नहीं होती है। प्रस्तुत उदाहरण में सम्भव है कि प्रयोग का पात्र व्यक्ति यह सिद्ध करने की चेष्टा करे कि नशा करने से उसकी शारीरिक-मानसिक क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ता। यह एक अवांछित सम्भावना है जिसे निर्मूल करने के लिए प्रयोग में परिस्थिति पर नियन्त्रण रखना आवश्यक है।
(5) प्रयोगफल का विश्लेषण – प्रयोग द्वारा प्राप्त परिणामों का विश्लेषण प्रयोगात्मक विधि का पाँचवाँ एवं महत्त्वपूर्ण चरण है। विश्लेषण के लिए सांख्यिकीय प्रविधियों का प्रयोग किया जा सकता है। प्रयोग के दौरान अधिक पात्र होने पर उन्हें दो समूहों में विभाजित किया जा सकता है(i) प्रायोगिक समूह (Experimental Group) तथा (ii) नियन्त्रित समूह (Controlled Group)। अक्सर स्वतन्त्र चर, प्रायोगिक समूह कहलाता है और आश्रित चर, नियन्त्रित समूह। इस प्रयोग में नशे की वस्तु (माना अफीम) स्वतन्त्र चर है जिसके प्रयोग से प्राप्त परिणामों की तुलना अफीमरहित परिणामों के साथ की जाएगी।
(6) परिकल्पना की जाँच – प्रयोग के परिणाम यदि निर्माण की गयी परिकल्पना के पक्ष में होते हैं तो परिकल्पना सिद्ध मान ली जाती है, किन्तु विपरीत परिणामों की स्थिति में परिकल्पना को रद्द या अस्वीकृत घोषित कर दिया जाता है तब नयी परिकल्पना का निर्माण किया जाता है। प्रस्तुत प्रयोग के परिणाम यदि परिकल्पना अर्थात् “नशा (अफीम का सेवन करने से शारीरिक तथा मानसिक क्षमता का ह्रास होता है”–के पक्ष में जाते हैं तो हमारी परिकल्पना सिद्ध मानी जाएगी। स्पष्टत: इस दशा में अफीम का सेवन ड्राइवरों की शारीरिक-मानसिक क्षमता में ह्रास लाएगा। यदि परिणामों से यह ज्ञात हो कि अफीम के सेवन से ड्राइवरों की शारीरिक-मानसिक क्षमता पर धनात्मक (अच्छा) प्रभाव पड़ा तो हमारी परिकल्पना रद्द समझी जाएगी।
(7) सामान्यीकरण – एकसमान परिस्थितियों में तथा निरन्तर प्रयोगों के माध्यम से स्वतन्त्र चर का आश्रित चर पर प्रभाव देखकर जो परिणाम प्राप्त होते हैं उनके विश्लेषण एवं व्याख्या के आधार पर सामान्य नियम निकाले जाते हैं। यही सामान्यीकरण है जो प्रयोगात्मक विधि का अन्तिम चरण है।

प्रयोगात्मक विधि के गुण या लाभ (महत्त्व)(Merits of Experimental Method)
प्रयोगात्मक विधि एक वैज्ञानिक विधि है जिसके द्वारा सुचारु रूप से अध्ययन किये जा सकते हैं। और निश्चित पेरिणामों तक पहुँचा जा सकता है। ये परिणाम अधिक शुद्ध और विश्वसनीय होते हैं। इसके अन्य गुणों (विशेषताएँ) या लाभ निम्नलिखित हैं –(1) परिस्थिति सम्बन्धी आत्म-निर्भरता – प्रयोगात्मक विधि में, निरीक्षण विधि की तरह, प्रयोगकर्ता प्राकृतिक परिस्थितियों पर आश्रित नहीं रहता। वह आवश्यकतानुसार कृत्रिम परिस्थितियों का निर्माण कर प्रयोग कर लेता है जिससे समय और शक्ति की बचत होती है।
(2) पूर्ण वैज्ञानिक विधि – यह एक पूर्ण वैज्ञानिक विधि है जिसके अन्तर्गत नियन्त्रित परिस्थितियों में प्रयोग के माध्यम से वांछित परिणाम एवं निष्कर्ष निकाले जाते हैं। अन्य विधियों की तुलना में इस विधि के निष्कर्ष अधिक शुद्ध एवं विश्वसनीय होते हैं।
(3) नियन्त्रित परिस्थितियाँ – इस विधि का सबसे बड़ा गुण यह है कि इसमें प्रयोग की परिस्थितियाँ (दशाएँ) पूरी तरह प्रयोगकर्ता के नियन्त्रण में रहती हैं। प्रयोगशाला में परिस्थितियों पर नियन्त्रण रखकर ही सही निष्कर्ष प्राप्त किये जा सकते हैं।
(4) दोहराना – प्रयाग की एक विशेषता यह है कि इसको सुविधानुसार दोहराया जा सकता है। प्रयोगकर्ता अपनी आवश्यकतानुसार पूरी घटना को दोहरा सकता है या घटना के किसी एक पक्ष की पुनरावृत्ति भी कर सकता है।
(5) उद्देश्यानुसार एवं समुचित प्रयोग योजना – प्रयोगात्मक विधि में प्रयोगकर्ता निर्धारित उद्देश्य के अनुसार आसान प्रयोग योजना तैयार कर सकता है। वह उसमें वांछित परिवर्तन भी कर सकता है। इसके अतिरिक्त, समुचित प्रयोग योजना के माध्यम से मानव स्वभाव के विविध पक्षों का अध्ययन सम्भव है।

(6) पशुओं पर प्रयोग सम्भव – सभी प्रकार के प्रयोगों को मानव-स्वभाव पर लागू करके निष्कर्ष नहीं निकाले जा सकते। पशुओं पर मनोवैज्ञानिक प्रयोग करने में प्रयोग विधि हमारी अत्यधिक सहायता करती है। इससे प्राप्त परिणामों को लागू करने से पूर्व इनकी मानव-स्वभाव से तुलना करके देखा जाता है।
(7) कार्य-कारण सम्बन्धों का अध्ययन – प्रयोग विधि के माध्यम से कार्य और कारण सम्बन्धों का शुद्धतापूर्वक अध्ययन किया जा सकता है। इसके अन्तर्गत समस्या से सम्बन्धित विभिन्न कारकों के प्रभाव को पृथक् से भी जाना जा सकता है। प्रयोग में हम जिस कारक के प्रभाव की जाँच करना चाहते हैं, उसके अतिरिक्त अन्य कारकों को नियन्त्रित रखकर प्रभाव का स्पष्ट एवं शुद्ध ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।
(8) वस्तुनिष्ठ, विश्वसनीय एवं सम्पूर्ण विधि – प्रयोगात्मक विधि से प्राप्त निष्कर्ष वस्तुनिष्ठ, विश्वसनीय, वैध तथा सार्वभौमिक होते हैं। एक ओर जहाँ अन्तर्दर्शन विधि केवल आन्तरिक दशाओं का अध्ययन करती है और निरीक्षण विधि व्यवहार की बाह्य दशाओं का, वहीं दूसरी ओर प्रयोग विधि प्राणी के आन्तरिक एवं बाह्य दोनों पक्षों का अध्ययन करती है। इस प्रकार यह मनोवैज्ञानिक अध्ययन की एक सम्पूर्ण विधि है।

प्रयोगात्मक विधि के दोष अथवा कठिनाइयाँ (कमियाँ)(Demerits of Experimental Method)
भले ही प्रयोगात्मक विधि को मनोवैज्ञानिक अध्ययन के लिए सर्वोत्तम विधि माना जाता है, परन्तु अन्य विधियों के ही समान इस विधि में भी कुछ दोष या कमियाँ हैं, जिनका सामान्य विवरण निम्नवत् है –

(1) प्रयोगशाला की कृत्रिम परिस्थिति – प्रयोग किसी विशेष अध्ययन के लिए प्रयोगशाला की विशिष्ट परिस्थितियों में आयोजित किये जाते हैं। ये विशिष्ट परिस्थितियाँ प्राकृतिक परिस्थितियों के समान न होकर कृत्रिम होती हैं और कृत्रिम व्यवहार से शुद्ध परिणाम प्राप्त करना कठिन है। नियन्त्रित एवं बनावटी परिस्थितियों में कोई भी प्रयोज्य (Subject) या व्यक्ति स्वाभाविक व्यवहार प्रदर्शित नहीं कर सकता। इससे प्रयोग के मध्य त्रुटियाँ उत्पन्न होने लगती हैं।
(2) विषय-पान्न की रुचियों पर नियन्त्रण कठिन – मानव की मन:स्थिति तथा उसकी रुचियाँ परिवर्तनशील होती हैं जिन पर नियन्त्रण यदि असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है। प्रयोग के दौरान ज्यादातर विषय-पात्र अपनी-अपनी मन:स्थिति या रुचियों से प्रेरित होकर ही व्यवहार करते हैं। इससे प्रयोग के परिणाम पक्षपातपूर्ण एवं भ्रामक प्राप्त होते हैं।
(3) विषय-पात्र के सहयोग की समस्या – प्रयोगात्मक पद्धति में विषय-पात्र जब तक प्रयोगकर्ता को अपना पूर्ण सहयोग प्रदान नहीं करता, तब तक प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाती। असहयोग की अवस्था में न केवल अवरोध उत्पन्न होता है, वरन् प्रयोग ही व्यर्थ हो जाता है। यदि किसी प्रयोग में व्यक्ति के व्यक्तित्व का अध्ययन किया जा रहा है तो वह व्यक्ति कभी-कभी ऐसा व्यवहार प्रदर्शित करने लगता है कि उसके व्यक्तित्व का नितान्त त्रुटिपूर्ण स्वरूप प्रस्तुत हो जाता है। कभी-कभी प्रयोगकर्ता पात्र की प्रक्रियाओं की प्रतीक्षा ही करता रह जाता है। इससे समय और शक्ति की हानि होती है।
(4) संदिग्ध परिणाम – यदि प्रयोगकर्ता प्रशिक्षित नहीं है तो वह प्रयोग सम्बन्धी प्रक्रिया में वस्तुनिष्ठता नहीं ला सकता जिससे परिणाम की शुद्धता संदिग्ध हो जाती है।
(5) सामाजिक घटनाओं सम्बन्धी समस्या – समाज का स्वरूप अत्यन्त व्यापक है; अत: सामाजिक घटनाओं को अध्ययन हेतु किसी प्रयोगशाला में उपस्थित नहीं किया जा सकता। वस्तुतः सामाजिक घटनाओं के मनोवैज्ञानिक प्रभाव का अध्ययन करने के लिए प्रयोगकर्ता को समाज की वास्तविक परिस्थितियों में रहकर काम करना होगा। इन परिस्थितियों में प्रयोगशाला एवं उसके उपकरण व्यर्थ ही सिद्ध होते हैं।
(6) सीमित क्षेत्र की कठिनाई – प्रयोगात्मक विधि का कार्य-क्षेत्र अत्यन्त सीमित है। इस विधि का प्रयोग हम उन सभी दशाओं में नहीं कर सकते जिनमें हम करना चाहते हैं। अनेक मनोवैज्ञानिक अध्ययन प्रयोग द्वारा नहीं किये जा सकते। उदाहरण के लिए-स्मृति पर शराब के प्रभाव को समझने के लिए बालकों, स्त्रियों या दूसरे पात्रों को शराब नहीं पिलायी जा सकती है। इसी प्रकार प्रेम, घृणा तथा यौन क्रियाओं सम्बन्धी क्रियाकलापों पर न तो नियन्त्रण रखा जा सकता है और न ही इन्हें प्रयोगशाला में समुचित रूप में आयोजित किया जा सकता है।

मूल्यांकन – वस्तुत: प्रयोगात्मक विधि की उपर्युक्त सीमाओं के ज्ञान से उसके महत्त्व को कम नहीं आँका जा सकता। टी० जी० एण्ड्यू ज का कथन है, “प्रयोग ही मनोविज्ञान का केन्द्रीय आधार है। इस पद्धति की वैज्ञानिकता के परिणामस्वरूप ही मनोविज्ञान एक शुद्ध विज्ञान बन सका है। प्रयोगों की सफलता एवं उपयोगिता ने आधुनिक मनोविज्ञान को ‘परीक्षणशाला मनोविज्ञान का नाम प्रदान कर दिया।

48.

निरीक्षण विधि से आप क्या समझते हैं? निरीक्षण विधि के गुण-दोषों का उल्लेख कीजिए।यानिरीक्षण विधि का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। इस विधि के गुण-दोषों का उल्लेख करते हुए तटस्थ मूल्यांकन कीजिए।याआधुनिक मनोविज्ञान के विकास में निरीक्षण विधि की भूमिका का विवेचन इसके गुण-दोषों के आलोक में कीजिए।

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निरीक्षण विधि(Observation Method)
निरीक्षण का अर्थ – मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के लिए अपनायी जाने वाली एक मुख्य विधि निरीक्षण विधि (Observation Method) भी है। यह विधि मनोविज्ञान एक महत्त्वपूर्ण विधि है। निरीक्षण का अर्थ है-“घटनाओं का बारीकी और क्रमबद्ध तरीके से अवलोकन करना।” अन्य शब्दों में; देखकर तथा सुनकर काम करने अथवा किसी निष्कर्ष तक पहुँचने की विधि को निरीक्षण कहते हैं। निरीक्षण विधि के अन्तर्गत व्यक्ति अथवा किसी अन्य प्राणी के व्यवहार का ज्ञान केवल उसके बाहरी क्रियाकलापों को देखकर ही प्राप्त किया जा सकता है। उदाहरणार्थ-यदि रमेश की आँखें लाल हैं, भौंहें तनी हैं, चेहरा तमतमा रहा है, शरीर काँप रहा है तथा वह चीख-चीखकर हाथों को इधर-उधर फेंक रहा है तो यह देखकर हम समझ जाते हैं कि रमेश क्रोधित है। संक्षेप में, हम कह सकते हैं कि जब प्राणी (जैसे शिशु, असामान्य व्यक्ति या पशु) न तो अपने अनुभवों को प्रकट कर सके और उस पर प्रयोग करना भी कठिन हो तो उसके विषय में तथ्यों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए निरीक्षण विधि ही सर्वोत्तम है।
निरीक्षण की परिभाषा – निरीक्षण को निम्न प्रकार परिभाषित किया जा सकता है –
⦁    ऑक्सफोर्ड कन्साइज डिक्शनरी (Oxford Concise Dictionary) के अनुसार, निरीक्षण से अभिप्राय प्रघटनाओं के, जिस प्रकार कि वे प्रकृति में पाई जाती हैं, कार्य एवं कारण या आपसी सम्बन्ध की दृष्टि से अवलोकन तथा लिख लेने से है।”
⦁    गुडे तथा हाट के अनुसार, “विज्ञान निरीक्षण से प्रारम्भ होता है और अपने तथ्यों की पुष्टि के लिए अन्त में निरीक्षण का ही सहारा लेता है।’
⦁    पी० बी० यंग का मत है, “निरीक्षण स्वाभाविक घटनाओं का, उनके घटित होने के समय, नेत्र के माध्यम से क्रमबद्ध तथा विचारपूर्ण अध्ययन है।”

उपर्युक्त वर्णित परिभाषाओं द्वारा निरीक्षण विधि का अर्थ स्पष्ट हो जाता है। इस विधि के अन्तर्गत व्यक्ति अथवा प्राणी के व्यवहार का अध्ययन मुख्य रूप से देखकर ही किया जाता है। वैसे तो इस विधि को -हर प्रकार के व्यवहार के अध्ययन के लिए अपनाया जा सकता है परन्तु बच्चों, असामान्य व्यक्तियों तथा पशु के व्यवहार के अध्ययन के लिए निरीक्षण विधि को अधिक उपयोगी माना जाता है। निरीक्षण विधि अपने आप में एक व्यवस्थित विधि है जिसके कुछ निश्चित एवं निर्धारित चरण हैं। सर्वप्रथम अध्ययन की निश्चित योजना तैयार की जाती है। इसके उपरान्त योजनानुसार व्यवहार का प्रत्यक्ष अवलोकन किया जाता है। अवलोकित व्यवहार को साथ-साथ नोट कर लिया जाता है। इसके उपरान्त नोट किये गये व्यवहार का विश्लेषण करके उसकी समुचित व्याख्या प्रस्तुत की जाती है। इस समस्त अध्ययन के आधार पर ही अभीष्ट सामान्य सिद्धान्त प्रतिपादित किये जाते हैं।

निरीक्षण विधि के गुण या लाभ (महत्त्व)(Merits of Observation Method)
निरीक्षण विधि एक महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी विधि है। इस विधि के गुणों अथवा लाभ का संक्षिप्त विवरण अग्रलिखित है –

(1) विषय के व्यवहार का दूर से अध्ययन – निरीक्षण विधि में विषय (अर्थात् या श्रेणी जिसका अध्ययन किया जाना है) के व्यवहार का पृथक् एवं दूर से अध्ययन किया जाता है। इस विधि के माध्यम से कोई भी प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिक अन्य व्यक्तियों के व्यवहारों और मानसिक क्रियाओं का सरलता से अध्ययन कर सकता है।
(2) नवजात शिशुओं, पशुओं, मूक तथा पागल लोगों का अध्ययन – नवजात शिशु, पशु, मूक तथा पागल अपने विचारों या अनुभवों को व्यक्त करने में असमर्थ रहते हैं। इनकी क्रियाओं एवं व्यवहार का अध्ययन केवल निरीक्षण विधि के माध्यम से ही सम्भव है।
(3) विविध आन्तरिक दशाओं का ज्ञान – विभिन्न प्रकार की अच्छी या बुरी आन्तरिक दशाओं तथा गुण-दोषों का ज्ञान निरीक्षण विधि के माध्यम से किया जा सकता है। सुख-दु:ख, राग-द्वेष, प्रसन्नता-क्रोध, शत्रु-मित्र, अच्छे-बुरे तथा अपने-पराए का ज्ञान सूक्ष्म एवं प्रत्यक्ष अवलोकन के माध्यम से ही किया जा सकता है।
(4) मानव स्वभाव एवं व्यवहार पर प्रभाव का ज्ञान – मनुष्य के मनोविज्ञान पर पर्यावरण का पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। जलवायु, पर्यावरण, भौतिक तथा प्राकृतिक घटनाएँ मानव स्वभाव एवं व्यवहार को प्रभावित करते हैं। इनके ज्ञान हेतु अध्ययन की निरीक्षण विधि अत्यन्त उपयोगी समझी जाती है।
(5) लोक जीवन के लिए उपयोगी – निरीक्षण विधि की सहायता से लोक जीवन का परिचय प्राप्त किया जा सकता है। लोक गीत, लोक नृत्य, लोक कथाओं, चित्रकला, ललित कलाओं तथा संगीत से सम्बन्धित अध्ययन में मात्र निरीक्षण विधि ही सहायक सिद्ध होती है।
(6) सामूहिक घटनाओं तथा प्रतिक्रियाओं का ज्ञान – समाज के अन्तर्गत घटित होने वाली घटनाओं तथा प्रतिक्रियाओं का अध्ययन निरीक्षण विधि के बिना सम्भव नहीं है। सामूहिक एवं साम्प्रदायिक तनाव, भीड़ का व्यवहार, समूह का स्वभाव; कक्षागत परिस्थितियों में छात्रों का स्वभाव, परीक्षा के दौरान छात्रों का व्यवहार तथा आन्दोलनकारियों की प्रतिक्रियाएँ निरीक्षण विधि द्वारा ज्ञात की जाती हैं।
(7) वस्तुनिष्ठ निरीक्षण – मनोविज्ञान एक विज्ञान है; अतः समस्त मनोवैज्ञानिक अध्ययन वस्तुनिष्ठ होने चाहिए। वस्तुनिष्ठ निरीक्षण से प्राप्त सूचनाएँ विश्वसनीय होती हैं जिनकी जाँच किसी भी विशेषज्ञ के द्वारा कराई जा सकती है। इस भाँति प्राप्त सूचनाओं को वैज्ञानिक प्रक्रिया के सन्दर्भ में प्रयोग किया जा सकता है।

निरीक्षण विधि के दोष एवं कठिनाइयाँ(Demerits of Observation Method)
अनेक गुणों से ओत-प्रोत होते हुए भी निरीक्षण विधि दोष या कठिनाइयों से अछूती नहीं है। इसके प्रमुख दोष इस प्रकार हैं

(1) क्रमबद्धता का अभाव – निरीक्षण विधि में घटनाओं की क्रमबद्धता का अभाव पाया जाता है। अध्ययनकर्ता को घटनाओं के घटित होने के क्रम में निरन्तर रूप से अवलोकन करना पड़ता है। यदि एक बार घटनाओं का प्राकृतिक क्रम टूट जाए तो पुनः घटना का शुद्ध निरीक्षण नहीं हो सकता, न ही वह घटना दोबारा उसी प्रकार घटित हो सकती है।
(2) घटनाओं पर नियन्त्रण नहीं – जिन घटनाओं का अवलोकन किया जाना है, उन पर निरीक्षणकर्ता का कोई नियन्त्रण नहीं होता। वस्तुतः, घटनाएँ तो अपने स्वाभाविक ढंग में घटित होती हैं। जिनके अज्ञात कारणों का पता लगाना कठिन हो जाता है।
(3) पक्षपात की सम्भावना – प्रत्येक निरीक्षणकर्ता किन्हीं पूर्वाग्रहों से ग्रसित होता है जिनके कारण वह किसी विशेष घटना के प्रति आत्मगत (Subjective) हो जाता है। ऐसी परिस्थितियों में पक्षपात की सम्भावना अधिक होती है।
(4) निरीक्षणकर्ता की व्यक्तिगत रुचि – निरीक्षणकर्ता की कुछ विशेष रुचियाँ हो सकती हैं। जिनसे सम्बन्धित बातों पर वह अवलोकन के समय अधिक ध्यान दे सकता है। फलस्वरूप कुछ आवश्यक एवं वांछित तथ्यों की अवलोकन के दौरान उपेक्षा कर दी जाती है। इससे अध्ययन की वस्तुनिष्ठता तथा विश्वसनीयता पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। वस्तुतः किसी भी वैज्ञानिक प्रयोग में तटस्थता (निष्पक्षता) संर्वोपरि मानी जाती है जिस पर निरीक्षणकर्ता की व्यक्तिगत रुचि का गहरा प्रभाव पड़ता है।
(5) प्रशिक्षण एवं अभ्यास का अभाव – साधारणतया निरीक्षण विधि के अन्तर्गत प्रयोगकर्ता न तो पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित होते हैं और न ही उन्हें निरीक्षण के विभिन्न पदों का समुचित अभ्यास ही होता है। सही निष्कर्ष प्राप्त करने के लिए निरीक्षणकर्ता को अनिवार्य रूप से प्रशिक्षित, अभ्यासी एवं कुशल निरीक्षक होना चाहिए।
(6) अप्राकृतिक व्यवहार – जब निरीक्षण के लिए चुने गए प्राणियों को यह जानकारी हो जाती है कि उनका अवलोकन या निरीक्षण किया जा रहा है तो उनका व्यवहार प्राकृतिक नहीं रह जाता है। इस प्रकार के अध्ययन से प्राप्त निष्कर्षों की विश्वसनीयता समाप्त हो जाती है।
उपर्युक्त विवरण द्वारा निरीक्षण विधि के अर्थ एवं गुण-दोषों का सामान्य परिचय प्राप्त हो जाता है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि निरीक्षण विधि मनोविज्ञान की एक उपयोगी विधि है। यदि इस विधि को सावधानीपूर्वक कुशल एवं प्रशिक्षित अध्ययनकर्ताओं द्वारा अपनाया जाए तो निश्चित रूप से पर्याप्त प्रामाणिक निष्कर्ष प्राप्त किये जा सकते हैं।

49.

मनोविज्ञान की पहली प्रयोगशाला स्थापित की गई थी(क) इंग्लैण्ड में(ख) वियना में(ग) जर्मनी में(घ) इनमें से कोई नहीं

Answer»

सही विकल्प है  (ग) जर्मनी में।

50.

मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के लिए अपनायी जाने वाली अन्तर्दर्शन विधि का अर्थ स्पष्ट कीजिए। इस विधि के गुण-दोषों का भी उल्लेख कीजिए।याअन्तर्दर्शन विधि द्वारा अध्ययन करते समय प्रस्तुत होने वाली कठिनाइयों का उल्लेख कीजिए तथा स्पष्ट कीजिए कि इन कठिनाइयों को किस प्रकार दूर किया जा सकता है।यामनोविज्ञान की अध्ययन विधियों से आप क्या समझते हैं? अन्तर्दर्शन विधि के गुण अथवा दोष बताइए।याअन्तर्दर्शन विधि का विस्तार से वर्णन कीजिए तथा वर्तमान में इसकी उपयोगिता स्पष्ट कीजिए।

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मनोविज्ञान के अध्ययन की प्रमुख पद्धतियाँ
(Main Methods of the Study of Psychology)

मनोविज्ञान एके क्रमबद्ध विज्ञान है जिसके अन्तर्गत मानव-व्यवहार को अध्ययन वैज्ञानिक विधियों के आधार पर किया जाता है। गार्डनर मर्फी ने उचित ही कहा है, “मनोविज्ञान अपने अध्ययन (विकास) के लिए बहुत-सी विधियों का प्रयोग करता है।”

आधुनिक मनोविज्ञान अपनी विषय-वस्तु अर्थात् व्यवहार तथा मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन करने के लिए जिन प्रमुख विधियों को अपनाता है, उनमें से चार प्रमुख विधियाँ निम्न प्रकार हैं
⦁    अन्तर्दर्शन विधि (Introspection Method)
⦁    निरीक्षण विधि (Observation Method)
⦁    प्रयोगात्मक विधि (Experimental Method) तथा
⦁    नैदानिक विधि (Clinical Method)

अन्तर्दर्शन विधि (Introspection Method)
अन्तर्दर्शन विधि, मनोवैज्ञानिक अध्ययन की सबसे प्राचीन एवं विशिष्ट विधि है, जिसे ‘अन्तर्निरीक्षण’ या ‘आन्तरिक प्रत्यक्षीकरण के नाम से भी जाना जाता है। इस विधि का प्रयोग प्रारम्भ में मनोवैज्ञानिकों द्वारा किसी नयी मनोवैज्ञानिक घटना की खोज के लिए किया जाता था।

अन्तर्दर्शन का अर्थ – अन्तर्दर्शन का अर्थ है-‘अपने अन्दर झाँककर देखना’ या अपनी मन:-स्थिति को गम्भीरतापूर्वक अध्ययन करना।’ अन्तर्दर्शन विधि के माध्यम से कोई व्यक्ति स्वयं की मानसिक क्रियाओं, अनुभवों अथवा व्यवहारों का आत्म-निरीक्षण कर सकता है तथा उनका वर्णन प्रस्तुत कर सकता है। उदाहरण के लिए—कोई व्यक्ति चिन्ता या शंकाग्रस्त है या आनन्द का अनुभव कर रहा है, इन तथ्यों का विवरण व्यक्ति स्वयं अन्तर्दर्शन द्वारा ही प्रस्तुत करता है।
अन्तर्दर्शन की परिभाषा – मनोवैज्ञानिकों द्वारा अन्तर्दर्शन को अग्र प्रकार परिभाषित किया गया है –
(1) टिचनर के मतानुसार, “अन्तर्दर्शन अन्दर झाँकना है।”
(2) मैक्डूगल के शब्दों में, “अन्तर्दर्शन करने का अर्थ है-क्रमबद्ध रूप से अपने मन की कार्य-प्रणाली का सुव्यवस्थित अध्ययन करना।”
(3) स्टाउट ने लिखा है, “क्रमबद्ध रीति से अपने मस्तिष्क के कार्य व्यापारों का निरीक्षण करना ही अन्तर्निरीक्षण (अन्तर्दर्शन) है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि अन्तर्दर्शन विधि में व्यक्ति अपने अन्दर की क्रियाओं का स्वयं ही निरीक्षण करता है। निरीक्षण के उपरान्त वह क्रिया-प्रतिक्रिया की अनुभूति का प्रकटीकरण भी स्वयं ही करता है। अन्तर्दर्शन विधि का एक सही अर्थ विस्तारपूर्वक वुडवर्थ ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है-“जब कोई व्यक्ति हमें अपने विचारों, भावनाओं तथा उद्देश्यों के विषय में आन्तरिक सूचना प्रदान करती है कि वह क्या देखता है, सुनता है। जानती है तो वह अपनी प्रतिक्रियाओं का अन्तर्दर्शन कर रहा होता है।” स्पष्ट है कि अन्तर्दर्शन विधि में किसी बाहरी अध्ययनकर्ता या उपकरण आदि की आवश्यकता नहीं होती है।

अन्तर्दर्शन विधि के गुण या लाभ(Merits of Introspection Method)
मनोवैज्ञानिक अध्ययन की पद्धतियों में अन्तर्दर्शन विधि का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह मनोवैज्ञानिक अध्ययन की एक मौलिक विधि है। इस विधि के गुण अथवा लाभों को निम्न प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है

(1) मानसिक क्रियाओं के ज्ञान में सहायक – मनोवैज्ञानिक अध्ययन के लिए पात्र (व्यक्ति) की मानसिक क्रियाओं का ज्ञान होना आवश्यक है। पात्र की विभिन्न मानसिक क्रियाओं; जैसे– कल्पना, स्मृति, अवंधान एवं चिन्तन का सुव्यवस्थित ज्ञान प्राप्त करने में अन्तर्दर्शन विधि ही सर्वाधिक उपयुक्त विधि मानी जाती है।
(2) अनुभवों तथा भावनाओं के ज्ञान में सहायक – किसी व्यक्ति के अनुभवों तथा भावनाओं का ज्ञान प्राप्त करने के लिए अन्तर्दर्शन विधि का सहारा लिया जाता है। मनुष्य के जीवन से जुड़ी अनेक समस्याओं के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण तथा समाधान तक पहुँचने के लिए उसके निजी अनुभवों तथा भावनाओं को जानना आवश्यक है। निजी अनुभव तथा भाव नितान्त व्यक्तिगत एवं आन्तरिक तथ्य हैं। जिन्हें निरीक्षण अथवा प्रयोग विधि के माध्यम से ज्ञात नहीं किया जा सकता, केवल अन्तर्दर्शन विधि ही इन्हें जानने की एकमात्र उपयुक्त उपाय है।
(3) अतृप्त इच्छाओं तथा कुण्ठाओं के ज्ञान में सहायक – मनुष्य की इच्छाओं का कोई अन्त नहीं है और इच्छाओं की सन्तुष्टि के साधन सीमित हैं। इस प्रकारे मनुष्य की कुछ इच्छाएँ सन्तुष्ट हो जाती हैं तो बहुत-सी इच्छाएँ अतृप्त रह जाती हैं। इन अतृप्त इच्छाओं या दमित इच्छाओं का ज्ञान अन्तर्दर्शन विधि के द्वारा ही सम्भव है। ठीक उसी प्रकार अन्तर्दर्शन की सहायता से विषयपात्र में पायी जाने वाली कुण्ठाओं को भी ज्ञान हो जाता है।
(4) मितव्ययी, सरल तथा परीक्षणहीन विधि – अन्तर्दर्शन विधि मितव्ययी समझी जाती है, क्योकि इस विधि में निरीक्षक, अध्ययन-सामग्री या किसी बाहरी उपकरण की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसके अतिरिक्त इस विधि के द्वारा अध्ययन हेतु किसी विशेष परीक्षण की भी आवश्यकता नहीं होती। इसका प्रयोग भी सरलता से किया जा सकता है।
(5) तुलनात्मक अध्ययन एवं सामान्यीकरण के लिए उपयोगी – अन्तर्दर्शन विधि के माध्यम से किसी विशिष्ट समस्या का तुलनात्मक अध्ययन सम्भव है। साथ-ही-साथ, यदि दो प्रणालियों को अध्ययन करके उनसे प्राप्त परिणामों की तुलना की जाए तो प्रयोगकर्ता एक विश्वसनीय सामान्यीकरण पर पहुँच सकता है। सामान्यीकरण की प्रक्रिया हमें मनोविज्ञान के सर्वमान्य नियम यो सिद्धान्त प्रदान करती है।
(6) मौलिक एवं अपरिहार्य विधि – अन्तर्दर्शन विधि मनोविज्ञान की एक मौलिक विधि है। इसमें निहित विशिष्टताएँ अन्य पद्धतियों में दृष्टिगोचर नहीं होतीं। आलोचकों द्वारा अन्तर्दर्शन विधि की भले ही कितनी भी आलोचनाएँ प्रस्तुत की गयी हों, किन्तु अन्तर्दर्शन विधि मनोवैज्ञानिक अध्ययन के लिए अपरिहार्य है और इसे नकारा नहीं जा सकता।

अन्तर्दर्शन विधि के दोष अथवा कठिनाइयाँ तथा उनके निवारण के उपाय(Demerits of Introspection Method and their Remedies)
नि:सन्देह अन्तर्दर्शन विधि मनोवैज्ञानिक अध्ययन की एक मौलिक एवं विशिष्ट विधि है, परन्तु व्यक्ति के व्यवहार के अध्ययन के लिए इस विधि को अपनाते समय कुछ कठिनाइयों का सामना अवश्य करना पड़ता है। अन्तर्दर्शन विधि की इन कठिनाइयों को इस विधि के दोष भी कहा जाता है। विभिन्न विद्वानों ने अन्तर्दर्शन विधि की कठिनाइयों के निवारण के उपायों का भी उल्लेख किया है। अन्तर्दर्शन विधि की मुख्य कठिनाइयों तथा उनके निवारण के उपायों का विवरण निम्नलिखित है –

(1) मानसिक क्रियाओं पर पूर्ण रूप से ध्यान केन्द्रित नहीं किया जा सकता – मानव-मन को किसी एक बिन्दु या लक्ष्य पर केन्द्रित करना अत्यन्त कठिन कार्य है। परिवर्तनशील एवं गतिमान मन की क्रियाएँ भी अपनी प्रकृति के कारण नितान्त परिवर्तनशील, अमूर्त तथा अप्रत्यक्ष होती हैं। मन की क्रियाओं को स्वरूप जड़ वस्तुओं या प्रघटनाओं से सर्वथा भिन्न होता है। अत: मानसिक क्रियाओं के अध्ययन करने वाले के लिए यह सम्भव नहीं होता कि वह अपना ध्यान पूर्ण रूप से केन्द्रित रख सके। यही कारण है कि अन्तर्दर्शन विधि द्वारा मानसिक क्रियाओं का अध्ययन एक बहुत ही कठिन कार्य समझा जाता है।
कठिनाई निवारण के उपाय – निरन्तर अभ्यास के माध्यम से उपर्युक्त कठिनाई को दूर किया जा सकता है। अन्तर्दर्शन विधि की सफलता पर्याप्त प्रशिक्षण पर निर्भर करती है। निरन्तर अभ्यास एवं प्रशिक्षण से अमूर्तकरण की क्षमता में वृद्धि होगी और इस भाँति मन की एकाग्रता उत्तरोत्तर बढ़ती जायेगी। मन की अधिकाधिक एकाग्रता मानसिक क्रियाओं के अध्ययन में सहायक होगी।
(2) मानसिक प्रक्रियाओं की प्रकृति गत्यात्मक एवं चंचल होती है – मानव की अनुभूतियाँ, मनोवृत्तियाँ, भावनाएँ, विचार एवं इच्छाएँ हर समय एकसमान नहीं रहतीं। इन प्रक्रियाओं की तीव्रता में लगातार उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। निरीक्षण के लिए निरीक्षण के विषय का स्थिर होना पहली और आवश्यक शर्त है। हम अपने चारों ओर विभिन्न स्थिर वस्तुएँ पाते हैं जिनका निरीक्षण सहज रूप से सम्भव है। किन्तु मानसिक प्रक्रियाएँ तो निरन्तर बदलती रहती हैं, जिनका निरीक्षण एक दुष्कर कार्य है। और इनका अन्तर्दर्शन के माध्यम से ज्ञान भी पर्याप्त रूप से कठिन है। उदाहरण के लिए माना एक व्यक्ति किसी कारणवश भयभीत हो उठा। मनोवैज्ञानिक उस व्यक्ति के भय की दशा का ज्ञान अन्तर्दर्शन विधि से करना चाहेंगे, परन्तु यह एक कठिन कार्य है। क्योंकि व्यक्ति का भय के कारण पर नियन्त्रण नहीं था; अत: एक तो वह चाहकर भी पुन: उसी कारण से भयभीत नहीं हो सकता और दूसरे भय की यह दशा हमेशा बनी नहीं रह सकती। इसलिए सम्भव है कि निरीक्षण करते-करते भय की अवस्था ही समाप्त हो जाए अथवा उसकी तीव्रता में हास आ जाए। भय की ऐसी परिवर्तनशील अवस्था में कोई उचित निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इस भाँति चंचल एवं परिवर्तनशील मानसिक प्रक्रियाओं का अन्तर्दर्शनएक कठिन समस्या है।
कठिनाई निवारण के उपाय – अन्तर्दर्शन विधि में मानसिक प्रक्रियाओं की चंचल प्रकृति सम्बन्धी कठिनाई पर स्मृति के माध्यम से अंकुश लगाया जा सकता है। स्मृति की मदद से किसी समय-विशेष की मानसिक दशा का विश्लेषण करना सम्भव होता है। इसके अतिरिक्त; अभ्यास, प्रशिक्षण, मानसिक सावधानी तथा विविध अभिलेखों की तुलना द्वारा अन्तर्दर्शन के अन्तर्गत मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन किया जा सकता है।

(3) अन्तर्दर्शन में मन विभाजित हो जाता है – मनुष्य एक ‘मनप्रधान प्राणी है और मनोविज्ञान के अन्तर्गत मनोवैज्ञानिक मन की क्रियाओं का अध्ययन करते हैं। किन्तु यदि मन ही विभाजित हो गया हो तो क्या ऐसे विभाजित मन द्वारा वैज्ञानिक अध्ययन सम्भव है-यह आरोप अन्तर्दर्शन विधि के विरुद्ध लगाया जाता है। सच तो यह है कि अन्तर्दर्शन’ विधि में मन अपनी क्रियाओं का निरीक्षण स्वयं ही करता है। इस प्रकार कार्य करने के कारण वह दो भागों में बँट जाता है – एक मन जो निरीक्षण कार्य करता है तथा दूसरो मन जिसका निरीक्षण किया जाता है। किसी विशिष्ट समर्थ में एक ही मन ज्ञाता और ज्ञेय’ दोनों नहीं हो सकता। इस स्थिति में अन्तर्दर्शन विधि द्वारा वैज्ञानिक अध्ययन कैसे सम्भव हो सकता है?
कठिनाई निवारण के उपाय – व्यावहारिक दृष्टि से उपर्युक्त कठिनाई का निराकरण भी सम्भव है। अवधान को इस प्रकार अभ्यस्त एवं प्रशिक्षित बनाया जा सकता है कि मनुष्य बाह्य वस्तुओं के अनुरूप अपनी आन्तरिक प्रवृत्तियों का भी सही-सही निरीक्षण कर सके। मन एक साक्षी सत्ता है। और यह साक्षी सत्ता विभक्त होते हुए भी सुख-दुःख, प्रेम-घृणा, काम और क्रोध आदि भावनाओं का अनुभव कर सकती है। प्रत्येक मनुष्य का मन अपने ही अन्दर इस प्रकार की भावनाओं का अनुभव करता है। फलतः वह ज्ञाता भी बनता है और ज्ञेय भी।
(4) कई मनोवैज्ञानिक एक ही मानसिक प्रक्रिया का अध्ययन नहीं कर सकते – वैज्ञानिक अध्ययन की एक आधारभूत मान्यता यह है कि सम्बन्धित विषय अथवा घटना का एक से अधिक वैज्ञानिकों द्वारा एक ही समय में अवलोकन किया जाए। मनोविज्ञान की अन्तर्दर्शने विधि इस शर्त को पूरा नहीं करती, क्योंकि किसी व्यक्ति की आन्तरिक दशाओं का अध्ययन अन्य व्यक्तियों द्वारा नहीं किया जा सकता। इस प्रकार अन्तर्दर्शन विधि पर अवैज्ञानिकता का आरोप लगाया जाता है।
कठिनाई निवारण के उपाय – अन्तर्दर्शन, विधि के विरुद्ध यह आरोप निराधार है। उक्त कठिनाई के निराकरण के लिए मनोवैज्ञानिकों को चाहिए कि वे परस्पर सहयोग से कार्य करें। सर्वप्रथम, प्रत्येक मनोवैज्ञानिक किसी मानसिक प्रक्रिया का अलग से अध्ययन करेगा और फिर इस सन्दर्भ में अपने अनुभवों को एक-दूसरे से कहेगा। जब कई मनोवैज्ञानिक अपने-अपने अनुभवों की परस्पर तुलना करेंगे तो वे इस भाँति प्राप्त निष्कर्षों से एक सामान्य नियम तक पहुँच सकते हैं। सामान्यीकरण की पद्धति पर आधारित ऐसे नियम सार्वभौमिक (Universal) होते हैं।
(5) मनोदशा और वस्तु का एक साथ निरीक्षण नहीं किया जा सकता – यदि अन्तर्दर्शन में किसी ऐसी मानसिक अवस्था या वृत्ति पर ध्यान केन्द्रित करना पड़े जो किसी बाह्य वस्तु के कारण उत्पन्न हुई हो तो उस परिस्थिति में अन्तर्दर्शन सम्भव नहीं होता। इसका कारण यह है कि व्यक्ति द्वारा मनोदशा पर ध्यान लगने से उसका ध्यान वस्तु से हट जाता है। यदि वह वस्तु पर ध्यान लगाता है तो उसका ध्यान मनोदशा से हट जाता है। फलतः दोनों पर एक साथ ध्यान नहीं लग पाता। व्यक्ति का ध्यान एक समय में एक ही स्थान पर केन्द्रित हो सकता है।
कठिनाई निवारण के उपाय – इस कठिनाई पर अभ्यास के माध्यम से विजय प्राप्त की जा सकती है। इसके लिए ध्यान के अभ्यास एवं प्रशिक्षण की आवश्यकता होगी। कुछ देर तक वस्तु पर तथा कुछ देर तक मानसिक क्रिया पर ध्यान केन्द्रित करना होगा। अभ्यास का यह कार्य बारी-बारी से लगातार करने पर वस्तु और उससे उत्पन्न मनोदशा का एक साथ निरीक्षण करना सम्भव हो सकता है।
(6) अन्तर्दर्शन द्वारा प्राप्त ज्ञान आत्मगत एवं व्यक्तिगत होता है – अन्तर्दर्शन में एक कठिनाई यह है कि इस विधि के द्वारा जो भी अध्ययन किये जाते हैं वे नितान्त व्यक्तिगत तथा आत्मगत (Subjective) होते हैं, वस्तुनिष्ठ (Objective) नहीं। यही कारण है कि अन्तर्दर्शन से प्राप्त परिणामों में वैज्ञानिकता तथा विश्वसनीयता का प्रायः अभाव रहता है; अतः इस विधि के माध्यम से सामान्य निष्कर्ष निकालना कठिन है।
कठिनाई निवारण के उपाय – इसके लिए परामर्श दिया जाता है कि अन्तर्दर्शन को अभ्यास एवं प्रशिक्षण के माध्यम से अधिकाधिक वस्तुनिष्ठ बनाया जाये ताकि इसके ज्ञान पर आधारित कुछ सामान्य नियम प्रतिपादित हो सकें। इसके अतिरिक्त विभिन्न मनोवैज्ञानिकों के अनुभवों की तुलना करके सामान्यीकरण की विधि से सर्वमान्य सिद्धान्त भी बनाये जा सकें।
(7) अन्तर्दर्शन में तथ्यों को छिपाने की सम्भावना है – अन्तर्दर्शन विधि में एक मुख्य कठिनाई यह आती है कि विषय-पात्र उन तथ्यों को सरलता से छिपा सकता है जो सच्चाई के अधिक निकट होते हैं, क्योंकि प्रयोगकर्ता के पास विषय-पात्र के अतिरिक्त कोई अन्य ऐसा स्रोत नहीं होता जिससे तथ्यों की प्रामाणिकता सिद्ध हो सके; अत: इस पद्धति के माध्यम से सत्यान्वेषण का कार्य नहीं हो सकता।
कठिनाई निवारण के उपाय – विषय-पात्र को यह विश्वास दिलाकर कि उससे प्राप्त सूचनाओं को गुप्त रखा जाएगा, यथार्थ स्थिति का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त अन्य व्यक्तियों के अन्तर्दर्शनं विवरण से मिलान करके ही तथ्यों की प्रामाणिकता पुष्ट की जानी चाहिए।