This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.
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उच्चावच का क्या अर्थ है? |
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Answer» वे धरातलीय स्थलाकृतियाँ जिनकी रचना ऊँचाई एवं ढाल के द्वारा प्रदर्शित की जाती है, उच्चावच कहलाती हैं। |
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उच्चावच प्रदर्शन की कौन-कौन-सी प्रमुख विधियाँ हैं? |
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Answer» उच्चावच प्रदर्शन की प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित हैं – ⦁ चित्र विधि द्वारा प्रदर्शन (Pictorial Methods) |
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किन्हीं चार मिश्रित विधियों के नाम बताइए। |
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Answer» ⦁ समोच्च रेखा एवं रंग विधि |
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पंजाकार डेल्टा का एक उदाहरण दीजिए। |
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Answer» मिसीसिपी डेल्टा। |
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निम्नलिखित में से कौन-सा एक कार्य भारतीय रिजर्व बैंक का नहीं है?(क) साख नियन्त्रण(ख) नोटों का निर्गमन(ग) जनता को ऋण देना व उनसे जमा स्वीकार करना(घ) सरकार के बैंक का कार्य करना |
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Answer» (ग) जनता को ऋण देना व उनसे जमा स्वीकार करना। |
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भारतीय रिजर्व बैंक का मुख्यालय कहाँ पर स्थित है? |
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Answer» भारतीय रिजर्व बैंक का मुख्यालय मुम्बई में स्थित है। |
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डेल्टा और एस्चुअरी में अन्तर बताइए। |
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Answer» डेल्टा–त्रिभुजाकार होता है जो नदी मुहाने पर निक्षेपण की क्रिया से बनता है। एस्चुअरी-‘वी’ (V) आकृति में किसी नदी का ज्वारीय मुहाना है। |
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कन्दरा स्तम्भ कैसे बनते हैं? |
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Answer» कन्दरा स्तम्भों का निर्माण घुलनशील शैलों के क्षेत्रों में भूमिगत जल की घुलन क्रिया तथा निक्षेपण के द्वारा होता है। |
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गंगा-ब्रह्मपुत्र का डेल्टा किस प्रकार की डेल्टा है? |
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Answer» गंगा-ब्रह्मपुत्र का डेल्टा चापाकार डेल्टा है। |
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भारतीय रिजर्व बैंक के स्थानीय प्रधान कार्यालय कहाँ-कहाँ पर स्थित हैं? |
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Answer» भारतीय रिजर्व बैंक के चार स्थानीय प्रधान कार्यालय, नई दिल्ली, कोलकाता, मुम्बई तथा चेन्नई में स्थापित किये गये हैं। |
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घोल रन्ध्र (स्वालो होल्स) से सम्बन्धित स्थलाकृतियों के नाम लिखिए। |
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Answer» घोल रन्ध्र से सम्बन्धित स्थलाकृतियों में विलयन रन्ध्र, डोलाइन, घोलपटल, ध्वस्त रन्ध्र, कार्ट खिड़की, कार्ट झील, युवाला, पोलिज आदि प्रमुख हैं। |
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हिमनद कटक (एस्कर) क्या व कैसे बनते हैं? |
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Answer» हिमानी निक्षेप से बने लम्बे किन्तु कम ऊँचाई वाले टेढ़े-मेढ़े कटक हिमानी कटक कहलाते हैं। देखने पर ये कटक प्राकृतिक बाँध जैसे प्रतीत होते हैं। ये बालू, मिट्टी और गोलाश्म से निर्मित होते हैं। इन पदार्थों का निक्षेपण हिमानी के अन्दर बहने वाली जल-धाराओं द्वारा लाए गए अवसाद से होता है। |
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जलोढ़ पंख से क्या अभिप्राय है? |
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Answer» प्रौढ़ावस्था में नदी द्वारा निर्मित भू-आकृतियों में जलोढ़ पंख मुख्य आकृति है। पर्वतपदीय भागों में नदी बजरी, पत्थर, कंकड़, बालू, मिट्टी आदि पदार्थों का निक्षेपण शंकु के रूप में करती है। इनके बीच से अनेक छोटी-छोटी धाराएँ निकलती है। इस प्रकार के अनेक शंकु मिलकर पंखे जैसी आकृति का निर्माण करते हैं जिससे उन्हें जलोढ़ पंख का नाम दिया गया है। |
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भारतीय सर्वेक्षण विभाग का प्रधान कार्यालय कहाँ पर स्थित है? |
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Answer» भारतीय सर्वेक्षण विभाग का मुख्यालय हाथी-बडकला, देहरादून, उत्तराखण्ड राज्य में स्थित है। |
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स्थानांकित ऊँचाई विधि क्या होती है? |
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Answer» यह विधि किसी स्थान की धरातल पर अंकित ऊँचाई को प्रकट करती है। मानचित्र में उस स्थान की ऊँचाई मीटर अथवा फीट में नापी जाती है। |
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समोच्च रेखा से क्या अभिप्राय है? |
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Answer» मानचित्र में समान ऊँचाई वाले स्थानों को मिलाकर प्रदर्शित की जाने वाली रेखा को समोच्च रेखा कहते हैं। |
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प्रवणता (Gradient) क्या होती है? |
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Answer» धरातलीय दूरी एवं लम्बवत् दूरी में जो अनुपात होता है, उसे प्रवणता कहते हैं। |
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निर्देश चिह्न (Bench Mark) किसे कहा जाता है? |
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Answer» सर्वेक्षण में समुद्र-तल से विभिन्न स्थानों की ऊँचाई को अंकित किया जाता है। इसके समीप में निर्देश चिह्न बना दिया जाता है। इस संकेत के द्वारा उस स्थान की ऊँचाई का ज्ञान हो जाता है अथवा इस स्थान के सन्दर्भ में अन्य स्थानों की अपेक्षाकृत ऊँचाई का पता चल जाता है, जिसे निर्देश चिह्न का नाम दिया गया है। |
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धरातलीय भू-पत्रक से क्या अभिप्राय है? |
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Answer» ऐसे मानचित्र जिनमें प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक स्थलाकृतियों का चित्रण सांकेतिक चिह्नों की सहायता से दीर्घमापक पर किया जाता है, धरातलीय भू-पत्रक कहलाते हैं। |
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धरातलीय भू-पत्रकों का प्रकाशन किस विभाग द्वारा किया जाता है? |
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Answer» धरातलीय भू-पत्रक मानचित्रों का प्रकाशन भारतीय सर्वेक्षण विभाग, देहरादून द्वारा किया जाता है। |
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हिमानी जलोढ़ निक्षेप द्वारा कौन-कौन-सी स्थलाकृतियाँ बनती हैं? |
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Answer» हिमानी जलोढ़ निक्षेप द्वारा एस्कर, केम तथा हिमनद अपक्षेप मैदान आदि स्थलाकृतियाँ बनती है। |
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भारतीय भू-पत्रकों की संख्या कितनी है? |
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Answer» भारतीय भू-पत्रकों की संख्या 136 है। म्यांमार को छोड़कर 92 भू-पत्रक भारत के ऊपर से गुजरते हैं। |
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धरातलीय भू-पत्रकों का विस्तार बताइए। |
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Answer» प्रत्येक धरातलीय भू-पत्रक 4° अक्षांश तथा 4° देशान्तरों को प्रकट करता है। |
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भारतीय भू-पत्रक किस मापक पर बने हैं? |
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Answer» भारतीय भू-पत्रक 1 इंच = एक मील के मापक अर्थात् प्र० भि० 1/63, 360 पर निर्मित किये गये हैं। |
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नदी की प्रौढावस्था का विवरण दीजिए। |
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Answer» यह नदी की मैदानी अवस्था होती है। युवावस्था के बाद जैसे ही नदी पर्वत प्रदेश से मैदानों में प्रवेश करती है, उसका वेग एकदम मन्द हो जाता है। इस अवस्था में नदी में सहायक नदियों के मिलने से जल की मात्रा तो बढ़ जाती है परन्तु जल में तेज गति न होने के कारण उसकी वहन शक्ति क्षीण हो जाती है। अतः पर्वतीय क्षेत्रो से लाए गए अवसाद तथा शिलाखण्डों को नदी पर्वतपदीय क्षेत्रों में ही जमा कर देती है, जिसे पर्वतपदीय मैदान कहते हैं। गंगा नदी ऋषिकेश एवं हरिद्वार के निकट ऐसे ही अवसादों का निक्षेप करती है। इस अवस्था में नदी गहरे कटाव की अपेक्षा पाश्विक अपरदन (Lateral Erosion) अधिक करती है। कभी-कभी नदी क्रा एक किनारा खड़े ढाल वाला तथा दूसरा प्रायः समतल होता है। ऐसी दशा में नदी खड़े किनारे की ओर अपरदन तथा समतल किनारे की ओर निक्षेपण का कार्य करती है। इस अवस्था में नदी अपनी घाटी को चौड़ा करने का कार्य ही अधिक करती है। |
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नदी की जीर्णावस्था (वृद्धावस्था) में बनने वाली किसी एक आकृति का उल्लेख कीजिए। |
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Answer» नदी की जीर्णावस्था (वृद्धावस्था) में बनने वाली प्रमुख आकृति डेल्टा है। |
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नदी की युवावस्था में बनने वाली दो आकृतियों का उल्लेख कीजिए। |
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Answer» 1. ‘V’ आकार की घाटी तथा 2. जल-प्रपात या झरना। |
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पाश्विक हिमोढों का आधिक्य कहाँ मिलता है? |
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Answer» पाश्विक हिमोढ़ों का आधिक्य ग्रीनलैण्ड एवं अलास्का में अधिक मिलता है। यहाँ इनकी ऊँचाई 300 मीटर तक होती है। |
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निम्नलिखित में अन्तर स्पष्ट कीजिए –V आकार की घाटी और U आकार की घाटी |
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Answer» V आकार की घाटी – नदी पर्वतीय क्षेत्र में अपनी तली को काटकर उसे गहरा करती है। इससे ‘V’ आकार की घाटी का निर्माण होता है। U आकार की घाटी – ऊँचे पर्वतों पर जब कोई बर्फ का बड़ा टुकड़ा ढाल पर खिसकता है। तो उसे हिमानी कहते हैं। यह हिमानी पहले से बनी ‘V’ आकार की घाटी को ‘U’ आकार की घाटी में बदल देता है जिसका ढाल खड़ा तथा तल सपाट एवं चौड़ा होता है। |
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निम्नलिखित में अन्तर स्पष्ट कीजिए –अपक्षय और अपरदन |
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Answer» अपक्षय – ऋतु और मौसम के प्रभाव द्वारा चट्टानें धीरे-धीरे अपने ही स्थानों पर छोटे-छोटे टुकड़ों में टूटती रहती हैं। चट्टानों के टूटने-फूटने की इस क्रिया को अपक्षय कहते हैं। अपरदन- अपक्षय द्वारा टूटे हुए चट्टानों का बहता जल, नदी, सागर की लहरें, गतिशील बर्फ (हिमानी), पवन आदि एक स्थान से दूसरे स्थानों पर इकट्ठा कर देते हैं। इस क्रिया को अपरदन कहते हैं। |
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बरखान का निर्माण किस क्रिया द्वारा होता है ? |
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Answer» बरखान का निर्माण पवन की निक्षेपणात्मक क्रिया द्वारा होता है। |
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भूकम्प उदगम केन्द्र और भूकम्प अधिकेन्द्र में अन्तर स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» पृथ्वी के अन्दर जहाँ से कम्पन उत्पन्न होता है, उस स्थान को भूकम्प उद्गम केन्द्र कहते हैं। इस उद्गम केन्द्र के ठीक ऊपर धरातल पर स्थित बिन्दु को अधिकेन्द्र कहते हैं। |
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नदी की प्रौढावस्था में बनने वाली दो आकृतियों का उल्लेख कीजिए। |
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Answer» 1. जलोढ़ पंख तथा 2. नदी विसर्प। |
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हिमरेखा क्या होती है? |
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Answer» हिमरेखा वह काल्पनिक रेखा है जिससे ऊपर आर्द्रता सदैव हिम के रूप में पाई जाती है। |
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अन्धी घाटी किसे कहते हैं ? |
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Answer» जब धरातलीय नदियाँ घोल रन्ध्र, विलयन रन्ध्र आदि छिद्रों से प्रवेश करती हैं तो आगे चलकर अचानक ही इनका जल समाप्त हो जाता है। इन्हें ही अन्धी घाटियाँ कहते हैं। |
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पृथ्वी के आन्तरिक बल से आप क्या समझते हैं? |
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Answer» ऐसे बल जो पृथ्वी के आंतरिक भाग में उत्पन्न होते हैं, आंतरिक बल कहलाते हैं। |
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बालुका स्तूप क्या है? इसका निर्माण कैसे होता है? |
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Answer» मरुस्थलीय प्रदेशों में जब पवन के मार्ग में कोई बाधा होती है तब पवन का वेग कम हो जाता है, जिससे पवन के साथ उड़ने वाले पदार्थ धरातल पर गिरकर बालू के टीलों का निर्माण करते हैं। इन्हें बालुका स्तूप कहते हैं। |
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जल प्रपात कैसे बनते हैं? |
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Answer» जब नदी का जल ऊँचाई से खड़े ढाल के सहारे अधिक वेग से नीचे गिरता है तो वह जल प्रपात बन जाता है। |
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छोटे बच्चे को दुर्घटनास्थल से कैसे स्थानान्तरित किया जाता है? |
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Answer» छोटे बच्चे को गोद में उठाकर घटनास्थल से स्थानान्तरित किया जा सकता है। |
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आपातकालीन स्ट्रेचर कैसे बनाया जा सकता है? |
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Answer» आपातकालीन स्टेचर बनाने के लिए दो बॉस लेकर उनके बीच किसी दरी, टाट या कोट आदि को कसकर बाँध लिया जाता है। |
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गाँव में दुर्घटनाग्रस्त हुए व्यक्ति को चिकित्सा केन्द्र तक पहुँचाने के लिए आप कौन-सी विधि अफ्नाएँगी?(क) चारपाई पर लिटाकर(ख) तिहत्थी आसन द्वारा(ग) गोद में उठाकर(घ) पीठ पर लादकर |
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Answer» सही विकल्प है (क) चारपाई पर लिटाकर |
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घायल को दुर्घटनास्थल से स्थानान्तरित करने की आवश्यकता कब होती है?(क) आग में घिर जाने पर(ख) किसी वाहन से टकराने पर(ग) किसी इमारत से गिरने पर(घ) तीनों अवस्थाओं में |
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Answer» सही विकल्प है (घ) तीनों अवस्थाओं में |
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हस्त-आसन विधि कब प्रयुक्त की जाती है? |
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Answer» दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति के पैर घुटनों अथवा जाँघ में यदि चोट लगी हो, तो प्रायः हस्त आसन विधि का प्रयोग किया जाता है। |
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घायल व्यक्ति को कहाँ स्थानान्तरित किया जाता है? |
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Answer» घायल व्यक्ति को सुरक्षित तथा आरामदायक स्थान पर स्थानान्तरित किया जाता है। |
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आग लग जाने पर दुर्घटनाग्रस्त व्यक्तियों का स्थानान्तरण किया जाता है(क) कन्धे पर लादकर(ख) गोद में उठाकर(ग) सहारा देकर(घ) दोहत्थी आसन द्वारा |
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Answer» सही विकल्प है (क) कन्धे पर लादकर |
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मूर्च्छित अवस्था में घायल को स्थानान्तरित करने की विधि है(क) हस्त-आसन विधि(ख) कन्धे पर लादकर ले जाना(ग) सहारा देकर ले जाना(घ) ये सभी |
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Answer» सही विकल्प है (ख) कन्धे पर लादकर ले जाना |
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प्रयोगात्मक विधि का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा इस विधि के गुण-दोषों का उल्लेख कीजिए।याप्रयोग विधि के प्रमुख चरण क्या हैं? उदाहरण देकर लिखिए।याप्रयोगात्मक विधि के गुण-दोषों का विवेचन कीजिए।यामनोविज्ञान में प्रयोग विधि का संक्षिप्त विवरण दीजिए।यास्वतंत्र चर और आश्रित चर का अर्थ स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» प्रयोगात्मक विधि(Experimental Method) प्रयोगात्मक विधि अन्तर्दर्शन तथा निरीक्षण विधि से अधिक विकसित तथा वैज्ञानिक है। प्रयोग के समय प्रयोगकर्ता का दशाओं या घटनाओं पर नियन्त्रण रहता है, जबकि निरीक्षण के अन्तर्गत ऐसा नहीं होता है। उन्नीसवीं शताब्दी में वुण्ट नामक मनोवैज्ञानिक द्वारा मनोवैज्ञानिक प्रयोगशाला की स्थापना के साथ प्रयोग विधि का श्रीगणेश हुआ था। प्रयोग का अर्थ-वुडवर्थ के अनुसार प्रयोग का पहला अर्थ है- प्रकृति से प्रश्न करना। इसका अभिप्राय यह है कि प्रयोग करने वाले व्यक्ति के सामने एक स्पष्ट प्रश्न या समस्या होती है, जिसका उचित उत्तर पाने के लिए वह प्रकृति के सामने प्रयोग का आयोजन करता है। यह प्रश्न या समस्या किसी युक्ति से निकली उपकल्पना (सम्भावित उत्तर) पर आधारित होती है। इस उपकल्पना को प्रयोग के माध्यम से सिद्ध अथवा असिद्ध करना होता है। प्रयोग करते समय वस्तुओं को एक निश्चित क्रम में व्यवस्थित किया जाता है जिससे प्राप्त परिणाम उस प्रश्न का उत्तर देते हैं जिसे प्रकृति से पूछा गया था। प्रयोग की परिभाषा – प्रयोग को निम्न प्रकार परिभाषित किया जा सकता है – प्रयोगात्मक विधि के चरण(Steps of Experimental Method) (1) समस्या का निर्धारण – प्रयोगात्मक विधि का प्रथम चरण अध्ययन की समस्या का निर्धारण है। प्रयोग आरम्भ करने से पहले प्रयोगकर्ता समस्या का निर्धारण करता है। इसके लिए वह किसी उपयुक्त मनोवैज्ञानिक समस्या का चुनाव करता है। उदाहरण के लिए, समाज में नशे का व्यसन । बुरा समझा जाता है। प्रायः देखने में आता है कि अधिकांश ट्रक-ड्राइवर नशाखोरी करते हैं। माना जाता है कि नशा न करने वाले ड्राइवर, नशा करने वाले ड्राइवरों से सन्तुलित, विश्वसनीय एवं अच्छी गाड़ी चलाते हैं अथवा नशा करने से चरित्र पर बुरा प्रभाव पड़ता है। कुछ लोगों का कहना है कि नशा करने से ध्यान एकाग्र होता है और इससे गाड़ी चलाने में मदद मिलती है। जो लोग न तो नशाखोरी के पक्ष में हैं और न ही विपक्ष में, उनके अनुसार असन्तुलित एवं अविश्वसनीय गाड़ी चलाने का कारण नशे की आदत न होकर ड्राइवर का व्यक्तित्व है। उच्च जीवन-स्तर यापन करने वाले बहुत-से लोग नशा करते हैं। ये सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित हैं, चरित्रवान समझे जाते हैं और आर्थिक रूप से भी सम्पन्न हैं। इस तर्क-वितर्क से इस समस्या का जन्म होता है कि शारीरिक या मानसिक क्षमता पर नशाखोरी का क्या प्रभाव पड़ता है। प्रयोगात्मक विधि के गुण या लाभ (महत्त्व)(Merits of Experimental Method) (6) पशुओं पर प्रयोग सम्भव – सभी प्रकार के प्रयोगों को मानव-स्वभाव पर लागू करके निष्कर्ष नहीं निकाले जा सकते। पशुओं पर मनोवैज्ञानिक प्रयोग करने में प्रयोग विधि हमारी अत्यधिक सहायता करती है। इससे प्राप्त परिणामों को लागू करने से पूर्व इनकी मानव-स्वभाव से तुलना करके देखा जाता है। प्रयोगात्मक विधि के दोष अथवा कठिनाइयाँ (कमियाँ)(Demerits of Experimental Method) (1) प्रयोगशाला की कृत्रिम परिस्थिति – प्रयोग किसी विशेष अध्ययन के लिए प्रयोगशाला की विशिष्ट परिस्थितियों में आयोजित किये जाते हैं। ये विशिष्ट परिस्थितियाँ प्राकृतिक परिस्थितियों के समान न होकर कृत्रिम होती हैं और कृत्रिम व्यवहार से शुद्ध परिणाम प्राप्त करना कठिन है। नियन्त्रित एवं बनावटी परिस्थितियों में कोई भी प्रयोज्य (Subject) या व्यक्ति स्वाभाविक व्यवहार प्रदर्शित नहीं कर सकता। इससे प्रयोग के मध्य त्रुटियाँ उत्पन्न होने लगती हैं। मूल्यांकन – वस्तुत: प्रयोगात्मक विधि की उपर्युक्त सीमाओं के ज्ञान से उसके महत्त्व को कम नहीं आँका जा सकता। टी० जी० एण्ड्यू ज का कथन है, “प्रयोग ही मनोविज्ञान का केन्द्रीय आधार है। इस पद्धति की वैज्ञानिकता के परिणामस्वरूप ही मनोविज्ञान एक शुद्ध विज्ञान बन सका है। प्रयोगों की सफलता एवं उपयोगिता ने आधुनिक मनोविज्ञान को ‘परीक्षणशाला मनोविज्ञान का नाम प्रदान कर दिया। |
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निरीक्षण विधि से आप क्या समझते हैं? निरीक्षण विधि के गुण-दोषों का उल्लेख कीजिए।यानिरीक्षण विधि का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। इस विधि के गुण-दोषों का उल्लेख करते हुए तटस्थ मूल्यांकन कीजिए।याआधुनिक मनोविज्ञान के विकास में निरीक्षण विधि की भूमिका का विवेचन इसके गुण-दोषों के आलोक में कीजिए। |
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Answer» निरीक्षण विधि(Observation Method) उपर्युक्त वर्णित परिभाषाओं द्वारा निरीक्षण विधि का अर्थ स्पष्ट हो जाता है। इस विधि के अन्तर्गत व्यक्ति अथवा प्राणी के व्यवहार का अध्ययन मुख्य रूप से देखकर ही किया जाता है। वैसे तो इस विधि को -हर प्रकार के व्यवहार के अध्ययन के लिए अपनाया जा सकता है परन्तु बच्चों, असामान्य व्यक्तियों तथा पशु के व्यवहार के अध्ययन के लिए निरीक्षण विधि को अधिक उपयोगी माना जाता है। निरीक्षण विधि अपने आप में एक व्यवस्थित विधि है जिसके कुछ निश्चित एवं निर्धारित चरण हैं। सर्वप्रथम अध्ययन की निश्चित योजना तैयार की जाती है। इसके उपरान्त योजनानुसार व्यवहार का प्रत्यक्ष अवलोकन किया जाता है। अवलोकित व्यवहार को साथ-साथ नोट कर लिया जाता है। इसके उपरान्त नोट किये गये व्यवहार का विश्लेषण करके उसकी समुचित व्याख्या प्रस्तुत की जाती है। इस समस्त अध्ययन के आधार पर ही अभीष्ट सामान्य सिद्धान्त प्रतिपादित किये जाते हैं। निरीक्षण विधि के गुण या लाभ (महत्त्व)(Merits of Observation Method) (1) विषय के व्यवहार का दूर से अध्ययन – निरीक्षण विधि में विषय (अर्थात् या श्रेणी जिसका अध्ययन किया जाना है) के व्यवहार का पृथक् एवं दूर से अध्ययन किया जाता है। इस विधि के माध्यम से कोई भी प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिक अन्य व्यक्तियों के व्यवहारों और मानसिक क्रियाओं का सरलता से अध्ययन कर सकता है। निरीक्षण विधि के दोष एवं कठिनाइयाँ(Demerits of Observation Method) (1) क्रमबद्धता का अभाव – निरीक्षण विधि में घटनाओं की क्रमबद्धता का अभाव पाया जाता है। अध्ययनकर्ता को घटनाओं के घटित होने के क्रम में निरन्तर रूप से अवलोकन करना पड़ता है। यदि एक बार घटनाओं का प्राकृतिक क्रम टूट जाए तो पुनः घटना का शुद्ध निरीक्षण नहीं हो सकता, न ही वह घटना दोबारा उसी प्रकार घटित हो सकती है। |
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मनोविज्ञान की पहली प्रयोगशाला स्थापित की गई थी(क) इंग्लैण्ड में(ख) वियना में(ग) जर्मनी में(घ) इनमें से कोई नहीं |
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Answer» सही विकल्प है (ग) जर्मनी में। |
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मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के लिए अपनायी जाने वाली अन्तर्दर्शन विधि का अर्थ स्पष्ट कीजिए। इस विधि के गुण-दोषों का भी उल्लेख कीजिए।याअन्तर्दर्शन विधि द्वारा अध्ययन करते समय प्रस्तुत होने वाली कठिनाइयों का उल्लेख कीजिए तथा स्पष्ट कीजिए कि इन कठिनाइयों को किस प्रकार दूर किया जा सकता है।यामनोविज्ञान की अध्ययन विधियों से आप क्या समझते हैं? अन्तर्दर्शन विधि के गुण अथवा दोष बताइए।याअन्तर्दर्शन विधि का विस्तार से वर्णन कीजिए तथा वर्तमान में इसकी उपयोगिता स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» मनोविज्ञान के अध्ययन की प्रमुख पद्धतियाँ आधुनिक मनोविज्ञान अपनी विषय-वस्तु अर्थात् व्यवहार तथा मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन करने के लिए जिन प्रमुख विधियों को अपनाता है, उनमें से चार प्रमुख विधियाँ निम्न प्रकार हैं अन्तर्दर्शन विधि (Introspection Method) अन्तर्दर्शन का अर्थ – अन्तर्दर्शन का अर्थ है-‘अपने अन्दर झाँककर देखना’ या अपनी मन:-स्थिति को गम्भीरतापूर्वक अध्ययन करना।’ अन्तर्दर्शन विधि के माध्यम से कोई व्यक्ति स्वयं की मानसिक क्रियाओं, अनुभवों अथवा व्यवहारों का आत्म-निरीक्षण कर सकता है तथा उनका वर्णन प्रस्तुत कर सकता है। उदाहरण के लिए—कोई व्यक्ति चिन्ता या शंकाग्रस्त है या आनन्द का अनुभव कर रहा है, इन तथ्यों का विवरण व्यक्ति स्वयं अन्तर्दर्शन द्वारा ही प्रस्तुत करता है। उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि अन्तर्दर्शन विधि में व्यक्ति अपने अन्दर की क्रियाओं का स्वयं ही निरीक्षण करता है। निरीक्षण के उपरान्त वह क्रिया-प्रतिक्रिया की अनुभूति का प्रकटीकरण भी स्वयं ही करता है। अन्तर्दर्शन विधि का एक सही अर्थ विस्तारपूर्वक वुडवर्थ ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है-“जब कोई व्यक्ति हमें अपने विचारों, भावनाओं तथा उद्देश्यों के विषय में आन्तरिक सूचना प्रदान करती है कि वह क्या देखता है, सुनता है। जानती है तो वह अपनी प्रतिक्रियाओं का अन्तर्दर्शन कर रहा होता है।” स्पष्ट है कि अन्तर्दर्शन विधि में किसी बाहरी अध्ययनकर्ता या उपकरण आदि की आवश्यकता नहीं होती है। अन्तर्दर्शन विधि के गुण या लाभ(Merits of Introspection Method) (1) मानसिक क्रियाओं के ज्ञान में सहायक – मनोवैज्ञानिक अध्ययन के लिए पात्र (व्यक्ति) की मानसिक क्रियाओं का ज्ञान होना आवश्यक है। पात्र की विभिन्न मानसिक क्रियाओं; जैसे– कल्पना, स्मृति, अवंधान एवं चिन्तन का सुव्यवस्थित ज्ञान प्राप्त करने में अन्तर्दर्शन विधि ही सर्वाधिक उपयुक्त विधि मानी जाती है। अन्तर्दर्शन विधि के दोष अथवा कठिनाइयाँ तथा उनके निवारण के उपाय(Demerits of Introspection Method and their Remedies) (1) मानसिक क्रियाओं पर पूर्ण रूप से ध्यान केन्द्रित नहीं किया जा सकता – मानव-मन को किसी एक बिन्दु या लक्ष्य पर केन्द्रित करना अत्यन्त कठिन कार्य है। परिवर्तनशील एवं गतिमान मन की क्रियाएँ भी अपनी प्रकृति के कारण नितान्त परिवर्तनशील, अमूर्त तथा अप्रत्यक्ष होती हैं। मन की क्रियाओं को स्वरूप जड़ वस्तुओं या प्रघटनाओं से सर्वथा भिन्न होता है। अत: मानसिक क्रियाओं के अध्ययन करने वाले के लिए यह सम्भव नहीं होता कि वह अपना ध्यान पूर्ण रूप से केन्द्रित रख सके। यही कारण है कि अन्तर्दर्शन विधि द्वारा मानसिक क्रियाओं का अध्ययन एक बहुत ही कठिन कार्य समझा जाता है। (3) अन्तर्दर्शन में मन विभाजित हो जाता है – मनुष्य एक ‘मनप्रधान प्राणी है और मनोविज्ञान के अन्तर्गत मनोवैज्ञानिक मन की क्रियाओं का अध्ययन करते हैं। किन्तु यदि मन ही विभाजित हो गया हो तो क्या ऐसे विभाजित मन द्वारा वैज्ञानिक अध्ययन सम्भव है-यह आरोप अन्तर्दर्शन विधि के विरुद्ध लगाया जाता है। सच तो यह है कि अन्तर्दर्शन’ विधि में मन अपनी क्रियाओं का निरीक्षण स्वयं ही करता है। इस प्रकार कार्य करने के कारण वह दो भागों में बँट जाता है – एक मन जो निरीक्षण कार्य करता है तथा दूसरो मन जिसका निरीक्षण किया जाता है। किसी विशिष्ट समर्थ में एक ही मन ज्ञाता और ज्ञेय’ दोनों नहीं हो सकता। इस स्थिति में अन्तर्दर्शन विधि द्वारा वैज्ञानिक अध्ययन कैसे सम्भव हो सकता है? |
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