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‘उतर गए वे ज़माने । और गए वे कद्रदान जो पकाने-खाने की कद्र करना जानते थे। मियाँ अब क्या रखा है…. निकाली तंदूर से – निगली और हज़म ।’ वाक्य में निहित मर्म को स्पष्ट कीजिए।

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उपरोक्त पंक्तियों में मियाँ नसीरुद्दीन आज की पीढ़ी पर व्यंग्य कर रहे हैं । पहले के समय में जब मियाँ नसीरुद्दीन के पूर्वज बादशाह के दरबार में नानबाई का काम करते थे तब बादशाह उनके हुनर की कद्र भी करते थे और तारीफ़ भी किया करते थे । आज के समय में ऐसा कुछ भी नहीं रह गया है।

मियाँ नसीरुद्दीन छप्पन प्रकार की रोटियाँ बनाने के लिए मशहूर हैं पर उसका क्या मतलब जब लोगों के पास समय ही नहीं रह गया कि ये उस हुनर की सराहना करें । सभी बस, खाने में ही व्यस्त रहते हैं । इसलिए मियाँ नसीरुद्दीन गहरी सोच में डूब जाते हैं और उनके मुँह से यह वाक्य निकलता है कि ‘उतर गए वो जमाने । और गए वे कद्रदान जो पकाने-खाने की कद्र करना जानते थे । मियाँ अब क्या रखा है…… निकाली तंदूर से : निगली और हज़म ।’



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