This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.
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अच्छा! तो मुझे अब पता चला कि पहले जिसे पूर्वी बंगाल कहा जाता था वही आज का बंगलादेश है तो क्या यही कारण है कि हमारे वाले बंगाल को पश्चिमी बंगाल कहा जाता है? |
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Answer» देश के विभाजन से पूर्व बंगाल प्रान्त को दो भागों में विभाजित किया गया जिसका एक भाग पूर्वी बंगाल जो सन् 1971 तक पूर्वी पाकिस्तान के नाम से जाना जाता था। लेकिन सन् 1971 में यहाँ जिया उर रहमान के नेतृत्व में स्वतन्त्र बंगलादेश का निर्माण हुआ। इस प्रकार सन् 1971 के पश्चात् पूर्वी पाकिस्तान के हिस्से को बंगलादेश के नाम से जाना जाता है तथा बंगाल का दूसरा भाग जो भारत में आ गया उसे पश्चिमी बंगाल कहा गया। आज तक इसका यही नाम चला आ रहा है। |
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भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा एवं कार्यक्रमों का उल्लेख कीजिए। |
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Answer» भारतीय जनता पार्टी-5 अप्रैल, 1980 को भूतपूर्व जनसंघ के सदस्यों का नई दिल्ली में दो दिन का सम्मेलन हुआ और एक नई पार्टी बनाने का निश्चय किया जिसमें 6 अप्रैल, 1980 को तत्कालीन विदेशमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी की अध्यक्षता में भारतीय जनता पार्टी के नाम से एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल का गठन किया गया। भारतीय जनता पार्टी के घोषणा-पत्र में अनेक कार्यक्रमों को स्वीकृति प्रदान की गई। भारतीय जनता पार्टी की नीतियाँ एवं कार्यक्रम (क) राजनीतिक कार्यक्रम-भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख राजनीतिक कार्यक्रम निम्नलिखित हैं- (ख) आर्थिक कार्यक्रम एवं नीतियाँ-भाजपा के आर्थिक कार्यक्रम एवं नीतियाँ इस प्रकार हैं- (ग) सामाजिक कार्यक्रम-सामाजिक कार्यक्रम के अन्तर्गत पार्टी- (घ) विदेश नीति–पार्टी स्वतन्त्र विदेशी नीति की पक्षधर है तथा विश्व शान्ति, नि:शस्त्रीकरण, गुटनिरपेक्षता को मजबूत करने और पड़ोसी देशों के साथ शान्ति एवं मित्रता की नीति अपनाने, SAARC व आसियान जैसे क्षेत्रीय समूहीकरण को बढ़ावा देने के लिए वचनबद्ध है। |
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एक प्रभुत्व वाली दल प्रणाली के लाभ व दोषों का उल्लेख कीजिए। |
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Answer» एक प्रभुत्व वाली दल प्रणाली के प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं- ⦁ सत्ताधारी दल की स्थिति सुदृढ़ होती है तथा वह स्वतन्त्र रूप से शासन का संचालन कर सकता है। एक प्रभुत्व वाली दल प्रणाली के कुछ मुख्य दोष (हानियाँ) निम्नलिखित हैं- ⦁ एक दलीय व्यवस्था लोकतन्त्र की सफलता और विकास हेतु उचित नहीं है। |
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प्रथम तीन आम चुनावों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की मजबूत स्थिति के पीछे उत्तरदायी कारणों का संक्षेप में वर्णन कीजिए। |
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Answer» कांग्रेस की प्रधानता के लिए उत्तरदायी कारण-कांग्रेस पार्टी सन् 1920 से लेकर 1967 तक भारतीय राजनीति पर अपनी छत्रच्छाया कायम रखने में सफल रही। इसके पीछे अनेक कारण जिम्मेदार रहे, इनमें प्रमुख हैं- ⦁ प्रथम कारण यह है कि कांग्रेस पार्टी को राष्ट्रीय आन्दोलन के वारिस के रूप में देखा गया। आज़ादी के आन्दोलन के अग्रणी नेता अब कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे थे। इस प्रकार कांग्रेस को ‘अव्वल और इकलौता’ होने का फायदा मिला। |
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प्रथम आम चुनाव में कांग्रेसको भारी सफलता प्राप्त होने के कारणों का उल्लेख कीजिए। |
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Answer» प्रथम आम चुनाव में कांग्रेस को भारी सफलता प्राप्त होने के प्रमुख कारण निम्नांकित हैं- ⦁ कांग्रेस दल ने प्रथम आम चुनाव में लोकसभा की कुल 489 सीटों में से 364 सीटें जीतीं और इस प्रकार वह किसी भी प्रतिद्वन्द्वी से चुनावी दौड़ में आगे निकल गई। |
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प्रथम तीन आम चुनावों के सन्दर्भ में एक दल की प्रधानता का वर्णन कीजिए तथा इस प्रधानता के कारकों को स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» भारत में सर्वप्रथम सन् 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई। अपने प्रारम्भिक रूप में यह नवशिक्षित, कामकाजी और व्यापारिक वर्गों का हित समूह भर थी, लेकिन 20वीं सदी में इसने जन-आन्दोलन का रूप धारण कर लिया और इसने एक जनव्यापी राजनीतिक पार्टी का रूप ले लिया। स्वतन्त्रता के बाद भारत के राजनीतिक परिदृश्य में कांग्रेस का वर्चस्व लगातार तीन दशकों तक कायम रहा। भारत में एक दल की प्रधानता के कारण 1. कांग्रेस पार्टी को सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व प्राप्त था-कांग्रेस पार्टी के प्रभुत्व का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण यह था कि इसमें देश के सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व प्राप्त था। कांग्रेस पार्टी उदारवादी, गरमपन्थी, दक्षिणपन्थी, साम्यवादी तथा मध्यमार्गी नेताओं का एक महान मंच था जिसके कारण लोग इसी पार्टी को मत दिया करते थे। |
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सोशलिस्ट पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी के मध्य दो अन्तर बताइए। |
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Answer» ⦁ सोशलिस्ट पार्टी लोकतान्त्रिक विचारधारा में विश्वास करती है जबकि कम्युनिस्ट पार्टी सर्वहारा वर्ग के अधिनायकवादी लोकतन्त्र में विश्वास करती है। |
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कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापक थे-(a) श्यामाप्रसाद मुखर्जी(b) आचार्य नरेन्द्र देव(c) ए० वी० वर्धन(d) कु० मायावती। |
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Answer» सही विकल्प है (b) आचार्य नरेन्द्र देव। |
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संक्षेप में राज्य पुनर्गठन आयोग के निर्माण की पृष्ठभूमि, कार्य तथा इससे जुड़े एक्ट का उल्लेख कीजिए। |
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Answer» राज्य पुनर्गठन आयोग-आन्ध्र प्रदेश के गठन के साथ ही देश के दूसरे हिस्सों में भी भाषाई आधार पर राज्यों को गठित करने का संघर्ष चल पड़ा। इन संघर्षों से बाध्य होकर केन्द्र सरकार ने सन् 1953 में राज्य पुनर्गठन आयोग बनाया। इस आयोग का काम राज्यों के सीमांकन के मामलों पर गौर करना था। इसने अपनी रिपोर्ट में स्वीकार किया कि राज्यों की सीमाओं का निर्धारण वहाँ बोली जाने वाली भाषा के आधार पर होना चाहिए। इस आयोग की रिपोर्ट के आधार पर सन् 1956 में राज्य पुनर्गठन अधिनियम पास हुआ। इस अधिनियम के आधार पर 14 राज्य और 6 केन्द्रशासित प्रदेश बनाए गए। |
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रजवाड़ों के सन्दर्भ में सहमति-पत्र का आशय स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» रजवाड़ों का सहमति-पत्र-आजादी के तुरन्त पहले अंग्रेजी शासन ने घोषणा की कि भारत पर ब्रिटिश प्रभुत्व के समाप्त होने के साथ ही रजवाड़े भी ब्रिटिश-अधीनता से आजाद हो जाएंगे और वह अपनी इच्छानुसार भारत या पाकिस्तान में शामिल हो सकते हैं या अपना स्वतन्त्र अस्तित्व बनाए रख सकते हैं। शान्तिपूर्ण बातचीत के जरिए लगभग सभी रजवाड़े जिनकी सीमाएँ आजाद हिन्दुस्तान की नयी सीमाओं से मिलती थीं, के शासकों ने भारतीय संघ में अपने विलय के सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। इस सहमति-पत्र को ‘इंस्ट्रमेण्ट ऑफ एक्सेशन’ कहा जाता है। इस पर हस्ताक्षर का अर्थ था कि रजवाड़े भारतीय संघ का अंग बनने के लिए सहमत हैं। |
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भारत में देशी राज्यों ( रजवाड़ों) के विलय पर एक निबन्ध लिखिए। |
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Answer» राज्यों के पुनर्गठन की समस्या-राज्यों का गठन तथा पुनः संगठन स्वतन्त्र भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी। उस समय भारतवर्ष छोटी-छोटी रियासतों में बँटा हुआ था। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पहले भारत दो भागों में बँटा हुआ था- ब्रिटिश भारत का शासन तत्कालीन भारत सरकार के अधीन था, जबकि देसी राज्यों का शासन देसी राजाओं के हाथों में था। राजाओं ने ब्रिटिश राज की सर्वोच्च सत्ता स्वीकार कर रखी थी और इसमें वे अपने राज्य के घरेलू मामलों का शासन चलाते थे। अंग्रेजी प्रभुत्व में आने वाले भारतीय साम्राज्य के एक-तिहाई हिस्से में रजवाड़े कायम थे। प्रत्येक चार भारतीयों में से एक किसी-न-किसी रजवाड़े की प्रजा थी। देसी राज्यों या रजवाड़ों के विलय की समस्या-स्वतन्त्रता के तुरन्त पहले ब्रिटिश-शासन ने घोषणा की कि भारत पर ब्रिटिश प्रभुत्व के साथ ही रजवाड़े भी ब्रिटिश-अधीनता से स्वतन्त्र हो जाएँगे। रजवाड़ों की कुल संख्या लगभग 565 थी। ब्रिटिश शासन का यह दृष्टिकोण था कि रजवाड़े अपनी मर्जी से चाहें तो भारत या पाकिस्तान में शामिल हो जाएँ या फिर अपना स्वतन्त्र अस्तित्व बनाए रखें। यह फैसला रजवाड़ों की प्रजा को नहीं करना था बल्कि यह फैसला लेने का अधिकार राजाओं को दिया गया था। यह एक गम्भीर समस्या थी और इससे अखण्ड भारत के अस्तित्व पर ही खतरा मँडरा रहा था। अनेक राजाओं ने अपने राज्य को आजाद रखने की घोषणा भी कर दी थी। रजवाड़ों के शासकों के रवैये से यह बात साफ हो गई कि स्वतन्त्रता के बाद भारत कई छोटे-छोटे देशों की शक्ल में बँट जाने वाला है। भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम का लक्ष्य एकता और आत्मनिर्णय के साथ-साथ लोकतन्त्र का रास्ता अपनाना था जबकि रजवाड़ों में शासन अलोकतान्त्रिक रीति से चलाया जाता था और शासक अपनी प्रजा को लोकतान्त्रिक अधिकार देने के लिए तैयार नहीं थे। राज्यों के पुनर्गठन की समस्या का समाधान-यद्यपि देसी रियासतों की भारत में विलय की समस्या एक महत्त्वपूर्ण समस्या थी, परन्तु पं० नेहरू, तत्कालीन गृहमन्त्री सरदार पटेल ने इस समस्या को बड़े ही सुनियोजित ढंग से सुलझाया। देसी रियासतों की समस्या के हल के लिए पं० नेहरू ने 27 जून, 1947 को एक विभाग की स्थापना की, जिसे राज्य विभाग कहा जाता है। पं० नेहरू ने सरदार पटेल को इस विभाग का मन्त्री एवं वी० पी० मेनन को इसका सचिव नियुक्त किया। देसी रियासतों का विलय तीन चरणों में किया गया- (i) प्रथम चरण-एकीकरण, इस तरह पं० नेहरू एवं सरदार पटेल की सूझ-बूझ से देशी रियासतों की समस्या का समाधान किया गया। |
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हैदराबाद को भारत में किस प्रकार शामिल किया? |
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Answer» हैदराबाद रियासत का भारत में विलय-स्वतन्त्रता प्राप्ति एवं भारत के विभाजन के बाद हैदराबाद के निजाम उसमान अली खान ने हैदराबाद को स्वतन्त्र रखने का निर्णय लिया लेकिन हैदराबाद का निजाम परोक्ष रूप से पाकिस्तान का समर्थक था। हैदराबाद भारत के केन्द्र में स्थित था। यहाँ हिन्दू बहुसंख्यक रूप में निवासरत थे। इस कारण हैदराबाद का भारत में विलय अनिवार्य था। तत्कालीन गृहमन्त्री सरदार पटेल की आशंका थी कि आने वाले समय में हैदराबाद पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत के लिए खतरा उत्पन्न कर सकता है। सरदार पटेल तथा लॉर्ड माउण्टबेटन द्वारा हैदराबाद के निजाम को समझाने के प्रयासों की विफलता के बाद सरदार पटेल ने सैन्य कार्रवाई करके हैदराबाद को भारत में मिला लिया। |
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बताएँ कि आपातकाल के बारे में निम्नलिखित कथन सही हैं या गलत(क) आपातकाल की घोषणा 1975 में इन्दिरा गांधी ने की।(ख) आपातकाल में सभी मौलिक अधिकार निष्क्रिय हो गए।(ग) बिगड़ती हुई आर्थिक स्थिति के मद्देनजर आपातकाल की घोषणा की गई थी।(घ) आपातकाल के दौरान विपक्ष के अनेक नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।(ङ) सी०पी०आई० ने आपातकाल की घोषणा का समर्थन किया। |
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Answer» (ग) गलत, |
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संविधान सभा द्वारा राष्ट्रीय भाषा के प्रश्न का हल किस प्रकार किया गया? |
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Answer» संविधान सभा द्वारा राष्ट्रीय भाषा की समस्या का समाधान-बहुभाषी संस्कृति होने के कारण देश में भाषा की समस्या सबसे महत्त्वपूर्ण थी जिसका संविधान सभा को हल निकालना था। भाषा की समस्या का ऐसा हल ढूँढने का प्रयास किया गया जिसे सभी सामान्य रूप से स्वीकार कर लें और यह प्रयास तीन वर्षों तक जारी रहा। संविधान सभा की अन्तिम बैठक के प्रारम्भ में सभा के अध्यक्ष डॉ० राजेन्द्र प्रसाद ने कहा कि भाषायी प्रावधानों को मतदान के लिए नहीं रखेंगे क्योंकि यदि कोई निर्णय देश को स्वीकार न हुआ तो उसको लागू करना कठिन होगा। लम्बे वाद-विवाद के बाद भाषा की समस्या पर निर्णय लिए गए और इस प्रकार संविधान सभा में भाषा की समस्या का समाधान किया गया। जहाँ तक राष्ट्रीय भाषा का प्रश्न है तो उस पर यह सहमति बनी कि देवनागरी लिपि में लिखी हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्वीकार किया जाएगा। |
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पाण्डिचेरी तथा गोवा के भारत में विलय की घटनाओं का वर्णन कीजिए। |
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Answer» पाण्डिचेरी तथा गोवा का भारत में विलय-स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद पाण्डिचेरी फ्रांस तथा गोवा पुर्तगाल के अधीन थे। फ्रांस, पाण्डिचेरी को भारत में शामिल करने के पक्ष में नहीं था। परिणामस्वरूप भारतीय सैनिकों ने कार्रवाई करके पाण्डिचेरी को भारत संघ में शामिल कर लिया। इसी तरहं पुर्तगाल भी गोवा से अपना अधिकार छोड़ना नहीं चाहता था। अतः पुर्तगाल ने भारत द्वारा पेश किए गए सभी प्रस्तावों का विरोध किया। परिणामस्वरूप 18 दिसम्बर, 1961 को भारतीय सेना ने गोवा, दमन व दीव को पुर्तगाल से मुक्त कराके भारत में शामिल कर लिया। भारतीय प्रधानमन्त्री ने इसे मात्र पुलिस कार्रवाई की संज्ञा दी। सन् 1987 में गोवा भारत का 25वाँ राज्य बन गया। |
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वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार पुरुष-स्त्री प्रतिशत बताइए। |
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Answer» 2011 की जनगणना के अनुसार पुरुष 51.73 प्रतिशत तथा स्त्री 48.27 प्रतिशत है। |
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1947 में भारत के विभाजन के क्या परिणाम हुए? अथवा “भारत और पाकिस्तान का विभाजन अत्यन्त दर्दनाक था।” विभाजन के परिणामों का उल्लेख उपर्युक्त तथ्य के प्रकाश में सविस्तार कीजिए। |
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Answer» भारत का विभाजन-14-15 अगस्त, 1947 को एक नहीं बल्कि दो राष्ट्र भारत और पाकिस्तान अस्तित्व में आए। भारत और पाकिस्तान का विभाजन दर्दनाक था तथा इस पर फैसला करना और अमल में लाना और भी कठिन था। विभाजन के कारण– भारत-विभाजन के परिणाम भारत और पाकिस्तान विभाजन के निम्नलिखित परिणाम सामने आए- इस तरह भारत और पाकिस्तान का विभाजन अत्यन्त दर्दनाक व त्रासदी से भरा था। सआदत हसन मंटो के अनुसार, “दंगाइयों ने चलती ट्रेन को रोक लिया। गैर मजहब के लोगों को खींच-खींचकर निकाला और तलवार तथा गोली से मौत के घाट उतार दिया। बाकी यात्रियों को हलवा, फल और दूध दिया गया।” |
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‘इंस्ट्रमेण्ट ऑफ एक्सेशन’ से आप क्या समझते हैं? |
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Answer» विभिन्न रजवाड़ों या रियासतों के शासकों ने भारतीय संघ में अपने विलय के एक सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर किए। इस सहमति-पत्र को ‘इंस्ट्रमेण्ट ऑफ एक्सेशन’ कहा जाता है। इस पर हस्ताक्षर का अर्थ यह था कि रजवाड़े भारतीय संघ का अंग बनने के लिए सहमत हैं। |
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खान अब्दुल गफ्फार खाँ को किस नाम से जाना जाता है-(a) महात्मा गांधी(b) मुहम्मद अली जिन्ना(c) सीमान्त गांधी(d) मौलाना आजाद। |
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Answer» सही विकल्प है (c) सीमान्त गांधी। |
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नगरीकरण का आर्थिक विकास से क्या सम्बन्ध है? नगरों में जनसंख्या-वृद्धि के क्या कारण हैं? |
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Answer» किसी भी देश के नगरीकरण में प्रगति उस देश के विकास की गति को सूचित करती है। यही कारण है जिसकी वजह से कहा जाता है कि नगरीकरण व आर्थिक विकास का घनिष्ठ सम्बन्ध है। जिस देश में नगरीकरण का अनुपात जितना अधिक होगा वह देश उतना ही अधिक विकसित होगा। ⦁ उद्योगीकरण एवं नवीन उद्योगों का विकास, |
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भारत में तीव्र जनसंख्या-वृद्धि के किन्हीं चार प्रमुख कारणों पर प्रकाश डालिए। |
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Answer» जनसंख्या-वृद्धि को रोकने के उपाय 1. जन्म-दर में कमी करना – जनसंख्या-वृद्धि को सीमित करने के लिए यह आवश्यक है कि मृत्यु-दरे के साथ-साथ जन्म-दर में भी गिरावट लायी जाए। वर्ष 1951-60 में जन्म-दर 41.7% थी, जो 2011 ई० में 23% हो गयी। जन्म-दर में और अधिक कमी लायी जानी चाहिए। |
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भारत में जनसंख्या-वृद्धि के कारणों एवं जनसंख्या-वृद्धि को रोकने के उपाय बताइए।या“भारत में जनसंख्या की समस्या विस्फोटक है।” विवेचना कीजिए। इसे हल करने के लिए आप क्या सुझाव देंगे? याभारत में जनाधिक्य की समस्या हल करने के लिए सुझाव दीजिए। |
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Answer» भारत में तीव्र गति से जनसंख्या वृद्धि के कारण निम्नलिखित हैं जनसंख्या-वृद्धि को रोकने के उपाय |
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जनसंख्या शिक्षा के महत्त्व पर प्रकाश डालिए। |
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Answer» यह आशंका प्रकट की जाती है कि विश्व की जनसंख्या, जो 1980 ई० में 4 अरब के करीब थी, सन् 2000 तक 6 अरब की संख्या को पार कर चुकी थी। दूसरे शब्दों में, आने वाले दो दशकों में आज पृथ्वी पर जितने लोग रहते हैं उसका आधा हिस्सा उसमें और जुड़ जाएगा, यानि जनसंख्या डेढ़ गुना अधिक हो जाएगी। इस वृद्धि में 90% जनसंख्या की वृद्धि विकासशील देशों में होगी, जो कि पहले से ही भूमि, भोजन, पानी, आवास, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य की समस्याओं से ग्रस्त हैं। इन सब कारणों से आज जनसंख्या शिक्षा का महत्त्व स्पष्ट हो जाता है। यदि विकासशील देशों को भोजन, आवास, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य की समस्याओं का निवारण करना है तो इन सबका एकमात्र उपाय जनसंख्या शिक्षा है, क्योंकि जनसंख्या शिक्षा के माध्यम से जन्म-दर में गिरावट आएगी तथा जनसंख्या को नियन्त्रित करने में सफलता मिलेगी। उपर्युक्त सभी समस्याओं, विशेष रूप से बेरोजगारी, निर्धनता, भोजन व आवास तथा शिक्षा और स्वास्थ्य की समस्याओं से तब तक सुचारु रूप से नहीं निपटा जा सकता, जब तक कि परिवार का आकार सीमित न हो जिससे हर शिशु को संसाधनों तथा अवसरों का उचित अंश मिल सके। यह सब जनसंख्या शिक्षा के प्रचार एवं प्रसार द्वारा ही सम्भव है। |
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वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार पुरुष साक्षरता-दर क्या थी? |
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Answer» वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार पुरुषों में साक्षरता दर 82.14 प्रतिशत थी। |
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भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने के लिए नेहरू ने किन तर्कों का इस्तेमाल किया? क्या आपको लगता है कि ये केवल भावात्मक और नैतिक तर्क हैं अथवा इनमें कोई तर्क युक्तिपरक भी है? |
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Answer» नेहरू जी धर्मनिरपेक्षता में पूर्ण विश्वास रखते थे, वे धर्म विरोधी या नास्तिक नहीं थे। उनकी धर्म सम्बन्धी धारणा संकुचित न होकर अधिक व्यापक थी। भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने के लिए भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू ने अपने तर्क प्रस्तुत किए। ये तर्क इस प्रकार हैं “अनेक कारणों की वजह से हम इस भव्य तथा विभिन्नता से भरपूर देश को एकता के सूत्र में बाँधे रखने में सफल हुए हैं। इसमें मुख्य रूप से हमारे संविधान निर्माण तथा उनका अनुकरण करने वाले महान नेताओं की बुद्धिमत्ता तथा दूरदर्शिता है। यह बात कम महत्त्व की नहीं है कि भारतीय स्वभाव से धर्मनिरपेक्ष हैं और हम प्रत्येक धर्म का अपने दिल से आदर करते हैं। भारतवासियों की भाषाई तथा धार्मिक पहचान चाहे कुछ भी हो, वे कभी भी भाषायी तथा सांस्कृतिक एकरूपता रूपी एक नीरस तथा कठोर व्यवस्था को उन पर थोपने के लिए प्रयत्न नहीं करते। हमारे लोग इस बात से भली-भाँति परिचित हैं कि जब तक हमारी विविधता सुरक्षित है, हमारी एकता भी सुरक्षित है। हजारों वर्ष पूर्व हमारे प्राचीन ऋषियों ने यह उद्घोषित किया था कि समस्त विश्व एक कुटुम्ब है।” नेहरू जी की उपर्युक्त पंक्तियों में निम्नांकित तर्क हमारे समक्ष प्रस्तुत किए गए हैं- (1) नेहरू जी ने यह तर्क प्रस्तुत किया कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है तथा प्राचीन काल से ही यहाँ समय-समय पर विभिन्न सांस्कृतिक विशेषताओं वाले समूह व जनसमूह विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति हेतु आते रहे हैं। नेहरू जी के शब्दों में, “भारत मात्र एक भौगोलिक अभिव्यक्ति नहीं है बल्कि भारत के मस्तिष्क की विश्व में बहुत मान्यता है जिसके कारण भारत विदेशी प्रभावों को आमन्त्रित करता है और इन प्रभावों की अच्छाइयों को एक सुसंगत तथा मिश्रित बपौती में संश्लेषित कर लेता है। भारत के अतिरिक्त किसी अन्य देश में, विभिन्नता में एकता जैसे सिद्धान्त को नहीं उत्पन्न किया गया है क्योंकि यहाँ यह हजारों वर्षों से एक सभ्य सिद्धान्त बन गया है तथा यही भारतीय राष्ट्रवाद का आधार है। इस विभिन्नता के प्रति न डगमगाने वाले समर्पण को निकाल देने से भारत की आत्मा ही लुप्त हो जाएगी। स्वतन्त्रता संग्राम ने इसी सभ्यता के सिद्धान्त को एक राष्ट्र की व्यावहारिक राजनीति में निर्मित करने के लिए उपयोग किया।” पं० नेहरू द्वारा प्रस्तुत यह तर्क भावनात्मक और नैतिक तो ही है साथ ही इनका आधार भी युक्तिसंगत व देश की गरिमा व अस्मिता के अनुकूल है जो राष्ट्रीय एकता व अखण्डता की दृष्टि से समीचीन प्रतीत होते हैं। (2) नेहरू जी ने देश की स्वतन्त्रता से पहले तथा संविधान निर्माण की प्रक्रिया के दौरान भी इस बात पर विशेष बल दिया था कि भारत की एकता व अखण्डता तभी अक्षुण्ण रह सकती है जबकि अल्पसंख्यकों को समान अधिकार, धार्मिक तथा सांस्कृतिक स्वतन्त्रता एवं धर्मनिरपेक्ष राज्य का वातावरण तथा विश्वास प्राप्त होता रहे। उनका तर्क था कि हम भारत में अनेक कारणों से राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने में सफल हुए हैं, इसी कारण भारत धर्मनिरपेक्ष व अल्पसंख्यक, भाषाई और धार्मिक समुदायों की पहचान को बचाने में सफल रहा। भारत विश्व को एक परिवार समझकर “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना में विश्वास करने वाला राष्ट्र रहा है। चूँकि भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य बनाना था अत: पं० नेहरू का यह कथन पूर्ण युक्तिपरक है कि अपने देश में रहने वाले अल्पसंख्यक मुस्लिमों के साथ समानता का व्यवहार किया जाएगा। पाकिस्तान चाहे जितना भी उकसाए अथवा वहाँ के गैर-मुस्लिमों को अपमान व भय का सामना करना पड़े परन्तु हमें अपने अल्पसंख्यक भाइयों के साथ सभ्यता व शालीनता का व्यवहार करना है तथा उन्हें समस्त नागरिक अधिकार दिए जाने हैं तभी भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र कहलाएगा। भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाए रखने के लिए 15 अक्टूबर, 1947 को नेहरू जी ने देश के विभिन्न प्रान्तों के मुख्यमन्त्रियों को जो पत्र लिखा था उसमें उन्होंने यह तर्क दिया था कि मुस्लिमों की संख्या इतनी अधिक है कि चाहें तो भी वे दूसरे देशों में नहीं जा सकते। इस प्रकार नेहरू जी द्वारा प्रस्तुत किए गए तर्क भावनात्मक और नैतिक होते हुए भी युक्तिपरक हैं। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने के लिए प्रस्तुत किए गए नेहरू जी के तर्क केवल भावनात्मक व नैतिक़ ही नहीं बल्कि युक्तिपरक भी हैं। |
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नीचे दो तरह की राय लिखी गई है-विस्मय-रियासतों को भारतीय संघ में मिलाने से इन रियासतों की प्रजा तक लोकतन्त्र का विस्तार हुआ।इन्द्रप्रीत—यह बात मैं दावे के साथ नहीं कह सकता। इसमें बल प्रयोग भी हुआ था जबकि लोकतन्त्र में आम सहमति से काम लिया जाता है।देसी रियासतों के विलय और ऊपर के मशविरे के आलोक में इस घटनाक्रम पर आपकी क्या राय है? |
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Answer» 1. विस्मय की राय के सम्बन्ध में विचार-देसी रियासतों का विलय प्रायः लोकतान्त्रिक तरीके से ही हुआ क्योंकि 565 में से केवल चार-पाँच रजवाड़ों ने ही भारतीय संघ में शामिल होने से कुछ आना-कानी दिखाई थी। इनमें से भी कुछ शासक जनमत एवं जनता की भावनाओं की अनदेखी कर रहे थे। विलय से पूर्व अधिकांश रियासतों में शासन अलोकतान्त्रिक रीति से चलाया गया था और रजवाड़ों के शासक अपनी प्रजा को लोकतान्त्रिक अधिकार देने के लिए तैयार नहीं थे। इन रियासतों को भारतीय संघ में मिलाने से यहाँ समान रूप से चुनावी प्रक्रिया क्रियान्वित हुई। अत: विस्मय का यह विचार सही है कि भारतीय संघ में मिलाने से यहाँ जनता तक लोकतन्त्र का विस्तार हुआ। |
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मृत्यु-दर से आप क्या समझते हैं? |
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Answer» मृत्यु-दर से अर्थ एक वर्ष में प्रति हजार जनसंख्या के पीछे मृत्युओं की संख्या से है। भारत में इस दर में भी अत्यधिक कमी हुई है। वर्ष 2011 में यह 9 प्रति हजार है। यह अन्य देशों की तुलना में ऊँची है। |
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उपनिवेशवाद से क्या अभिप्राय है? |
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Answer» उपनिवेशवाद-वह विचारधारा जिससे प्रेरित होकर प्राय: एक शक्तिशाली राष्ट्र अन्य राष्ट्र या किसी राष्ट्र विशेष के किसी भाग पर अपना वर्चस्व स्थापित कर, उसके आर्थिक एवं प्राकृतिक संसाधनों का शोषण अपने हित में करता है उसे ‘उपनिवेशवाद’ कहते हैं। |
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भारत में एकदलीय प्रधानता का युग कंब समाप्त हुआ? इसके क्या कारण थे? |
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Answer» भारत में सन् 1977 में एकदलीय प्रधानता का युग समाप्त हुआ। इसके मुख्य कारण थेआपातकाल के दौरान तत्कालीन कांग्रेस सरकार की लोगों पर ज्यादतियाँ/अन्याय। दूसरा कारण था-तत्कालीन सरकार के तानाशाही दृष्टिकोण से लोग नाराज हो गए और विपक्षी पार्टियाँ एक गठबन्धन के रूप में सामने आईं। |
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क्या क्षेत्रीय दल आवश्यक हैं? अपने उत्तर के पक्ष में कोई दो तर्क दीजिए। |
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Answer» भारत में क्षेत्रीय दलों का होना अति आवश्यक है। क्षेत्रीय दलों के होने के दो महत्त्वपूर्ण कारण निम्नलिखित हैं- ⦁ भारत में विभिन्न भाषाओं, धर्मों तथा जातियों के लोग रहते हैं। अनेक क्षेत्रीय दलों का निर्माण जाति, धर्म एवं भाषा के आधार पर हुआ है। |
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1977 के चुनावों में कांग्रेस की हार के प्रमुख कारण क्या थे? |
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Answer» सन् 1977 के चुनावों में कांग्रेस की हार के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे- ⦁ सरकार की तानाशाही पद्धति, मौलिक अधिकारों को भंग करना। |
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जन्म-दर से आप क्या समझते हैं? भारत में जन्म-दर के नवीनतम आँकड़े दीजिए। |
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Answer» जन्म-दर से अर्थ एक वर्ष में प्रति हजार जनसंख्या के पीछे बच्चों के जन्म से है। वर्ष 2011 में यह 23 प्रति हजार हो गयी। यह दर अन्य देशों की तुलना में अत्यधिक ऊँची है। |
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परिवार-कल्याण कार्यक्रम के सम्बन्ध में सरकार द्वारा क्या कदम उठाए गये हैं ? |
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Answer» स्वाधीनता के बहुत पहले ही हमने यह अनुभव कर लिया था कि गरीबी से तब तक नहीं निपटा जा सकता जब तक कि परिवार का आकार सीमित न हो। भारत परिवार नियोजन को सरकारी नीति के रूप में अपनाने वाला पहला देश है। जनसंख्या नियन्त्रण हमारी योजनाओं का एक अभिन्न अंग है। सरकार द्वारा किये गये प्रयासों के कारण जन्म-दर, जो सन् 1951 में 40.8 प्रति हजार से अधिक थी, वह 2011 में घटकर 23 प्रति हजार तक आ गयी है। हमारा लक्ष्य औसत राष्ट्रीय जन्म दर को घटाकर 21 प्रति हजार से भी कम करना है। सन् 1951 के जनगणना आयुक्त ने परिवार नियोजन की आवश्यकता पर बल दिया था। इसलिए प्रथम तथा द्वितीय पंचवर्षीय योजनाओं में सरकार ने कुछ अप्रत्यक्ष प्रयास किये, लेकिन इसका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। सन् 1961 ई० की जनगणना में हुई जनसंख्या-वृद्धि से सरकार अत्यधिक चिन्तित हुई। अत: 1966 ई० में इसके लिए एक पृथक् स्वतन्त्र विभाग खोला गया। पंचवर्षीय योजनाओं द्वारा सरकार जनसंख्या नियन्त्रित करने तथा परिवार कल्याण के लिए निम्नलिखित प्रयास किये हैं 1. परिवार-कल्याण मन्त्रालय की स्थापना – परिवार-कल्याण कार्यक्रमों के उचित संचालन के लिए परिवार कल्याण मन्त्रालय स्थापित किया गया है। यह मन्त्रालय परिवार कल्याण सम्बन्धी कार्यों एवं नीतियों के साथ-साथ इस बात का भी निर्धारण करता है कि परिवार कल्याण कार्यक्रम के अन्तर्गत हमने कितनी सफलता प्राप्त की है। |
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भारत में परिवार-कल्याण कार्यक्रमों के मार्ग में आने वाली बाधाओं को समझाइए। |
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Answer» भारत परिवार नियोजन को सरकारी नीति के रूप में अपनाने वाला संसार का पहला देश है। जनसंख्या-नियन्त्रण हमारी विकास योजनाओं का अभिन्न अंग-पूर्णतया स्वैच्छिक है। परिवार-कल्याण कार्यक्रम के मार्ग में अनेक बाधाएँ हैं, जिससे यह कार्यक्रम पूर्ण रूप से सफल नहीं हो पा रहा है। इस कार्यक्रम की प्रमुख बाधाएँ अग्रलिखित हैं 1. कार्यक्रम जन-अभियान न बन पाना – परिवार-कल्याण कार्यक्रम 50 वर्षों के पश्चात् भी जन-अभियान नहीं बन पाया है। इसका मूल कारण हमारे देश की जटिल सामाजिक व्यवस्था के द्वारा ‘सेक्स शिक्षा’ को हेय दृष्टि से देखना रहा है। |
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| 35. |
परिवार-कल्याण कार्यक्रम के मार्ग में उत्पन्न होने वाली चार बाधाएँ लिखिए। |
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Answer» परिवार-कल्याण कार्यक्रम के मार्ग में निम्नलिखित चार बाधाएँ उत्पन्न होती हैं |
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भारत धर्मनिरपेक्ष राज्य कैसे बना? तर्क सहित उत्तर दीजिए। |
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Answer» भारत और पाकिस्तान का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था, परन्तु सन् 1951 के वक्त भारत में 12% मुसलमान थे फिर भी लोकतान्त्रिक भारत में मुसलमान, सिक्ख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी और यहूदियों के साथ समानता का व्यवहार किया गया। अत: भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बना। |
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सन्त गाडगे जी का नाम क्या था? |
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Answer» सन्त गाड़गे जी का नाम देव डेबू जी झिंगराजी जाणोरकर था। |
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जनसंख्या शिक्षा के उद्देश्यों पर प्रकाश डालिए। |
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Answer» भारत सरकार ने जनसंख्या सम्बन्धी नीतियों एवं कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से कार्यान्वित करने के लिए 1970 ई० में राष्ट्रीय स्तर पर एक ‘जनसंख्या शिक्षा कोष्ठ’ स्थापित किया। भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ की शाखा ‘यूनाइटेड नेशन्स फण्ड फॉर पॉपुलेशन एक्टीविटीज’ के सहयोग से जनसंख्या शिक्षा कार्यक्रम को देश में कार्यान्वित करने के लिए कदम उठाया, जिसके निम्नलिखित उद्देश्य हैं ⦁ जनसंख्या को नियन्त्रित करने के लिए हमें जनसाधारण में ऐसी चेतना का विकास करना है। जो व्यक्ति, समाज तथा राष्ट्र के लिए हितकारी हो। |
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मामा की मृत्यु के बाद डेबूजी ने क्या संकल्प किया? |
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Answer» मामी की मृत्यु के बाद डेबू जी ने संकल्प लिया कि गरीब लोगों की सहायता करेंगे और शिक्षित करेंगे ताकि गाँव वाले किसी के धोखे के शिकार न हो सकें। |
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‘जनसंख्या शिक्षा क्या है ? संक्षेप में समझाइए। |
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Answer» जनसंख्या शिक्षा वह शिक्षा है जो मनुष्य को विश्व, देश तथा राज्य की जनसंख्या के सभी पक्षों का ज्ञान दे। जनसंख्या और इसकी समस्याओं के प्रति ऐसी अवधारणाओं तथा व्यवहार का विकास करने में सहायक हो, जो व्यक्ति और राष्ट्र के लिए हितकारी हों। |
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| 41. |
क्या एकल पार्टी-प्रभुत्व की प्रणाली का भारतीय राजनीति के लोकतान्त्रिक चरित्र पर खराब असर हुआ? |
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Answer» एकल पार्टी प्रभुत्व की प्रणाली का भारतीय राजनीति की लोकतान्त्रिक प्रवृत्ति पर विपरीत प्रभाव पड़ता है तथा प्रभुत्व प्राप्त दल विपक्षी पार्टियों की आलोचना की परवाह न करके मनमाने ढंग से शासन चलाने लगता है व लोकतन्त्र को तानाशाही शासन में बदलने की सम्भावना विकसित होती है, परन्तु हमारे देश में ऐसा नहीं हुआ। पहले तीन आम-चुनावों में कांग्रेस के प्रभुत्व के भारतीय राजनीति पर विपरीत प्रभाव नहीं पड़े तथा इसने भारतीय लोकतन्त्र लोकतान्त्रिक राजनीति व लोकतान्त्रिक संस्थाओं को सुदृढ़ बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। इस प्रकार एकल पार्टी-प्रभुत्व प्रणाली के अच्छे परिणामों की पुष्टि निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर होती है- ⦁ कांग्रेस राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान किए गए वायदों को पूर्ण करने में सफल रही। जनमानस में कांग्रेस एक विश्वसनीय दल था, जनमानस की आशाएँ उसी से जुड़ी थीं, अतः मतदाताओं ने उसे ही चुना। |
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| 42. |
प्रारम्भ से ही कांग्रेस पार्टी का भारतीय राजनीति में केन्द्रीय स्थान रहा है। क्यों? |
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Answer» कांग्रेस एशिया का सबसे पुराना राजनीतिक दल रहा है। भारतीय राजनीति के केन्द्र में यह दो दृष्टिकोणों से प्रमुख है- |
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जनसंख्या के घनत्व की परिभाषा अपने शब्दों में दीजिए। |
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Answer» जनसंख्या के घनत्व से अभिप्राय मनुष्य-भूमि अनुपात से है अर्थात् “किसी देश के प्रति वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में निवास करने वाले व्यक्तियों की संख्या को जनसंख्या का घनत्व कहते हैं।” |
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भारत और मैक्सिको दोनों ही देशों में एक खास समय तक एक पार्टी का प्रभुत्व रहा।बताएँ कि मैक्सिको में स्थापित एक पार्टी का प्रभत्व कैसे भारत की एक पार्टी के प्रभत्व से अलग था। |
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Answer» इंस्टीट्यूशनल रिवोल्यूशनरी पार्टी जिसे स्पेनिश में पी० आर० आई० कहा जाता है का मैक्सिको में लगभग 60 वर्षों तक शासन रहा। इस पार्टी की स्थापना सन् 1929 में हुई थी तब इसे ‘रिवोल्यूशनरी पार्टी’ कहा जाता था। मूलत: पी० आर० आई० राजनेता व सैनिक नेता, मजदूर तथा किसान संगठन व अनेक राजनीतिक दलों सहित विभिन्न किस्म के हितों का संगठन था। समय बीतने के साथ-साथ पी० आर० आई० के संस्थापक प्लूटार्क इलियास कैलस ने इसके संगठन पर कब्जा कर लिया व इसके पश्चात् नियमित रूप से होने वाले चुनावों में प्रत्येक बार पी० आर० आई० ही विजय प्राप्त करती रही। शेष पार्टियाँ नाममात्र की थी जिससे कि शासक दल को वैधता प्राप्त होती रहे। चुनाव के नियम भी इस प्रकार तय किए गए कि पी० आर० आई० की जीत हर बार निश्चित हो सके। शासक दल ने अक्सर चुनावों में हेर-फेर और धाँधली की। पी० आर० आई० के शासन को ‘परिपूर्ण तानाशाही’ कहा जाता है। अन्ततः सन् 2000 में हुए राष्ट्रपति पद के चुनाव में इस पार्टी को पराजय का मुँह देखना पड़ा। मैक्सिको अब एक पार्टी के प्रभुत्व वाला देश नहीं रहा फिर भी अपने प्रभुत्व के काल में पी० आर० आई० ने जो तरीके अपनाए थे उनका लोकतन्त्र की सेहत पर बहुत प्रभाव पड़ा। मुक्त और निष्पक्ष चुनाव की बात पर अब भी वहाँ के नागरिकों का पूर्ण विश्वास नहीं जम पाया है। भारत में स्वतन्त्रता संघर्ष से लेकर लगभग सन् 1967 तक देश की राजनीति पर एक ही पार्टी (कांग्रेस) का प्रभुत्व रहा। यहाँ हम मैक्सिको की तुलना भारत में कांग्रेस के प्रभुत्व से करते हैं तो दोनों में अनेक प्रकार के अन्तर मिलते हैं जिनमें से निम्नलिखित प्रमुख हैं- (1) भारत और मैक्सिको में एकल पार्टी का प्रभुत्व सम्बन्धी अन्तर यह है कि भारत में कांग्रेस का प्रभुत्व एक साथ नहीं रहा, जबकि मैक्सिको में पी० आर० आई० का शासन निरन्तर 60 वर्षों तक चला। |
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डेबूजी के पिता ने अन्तिम समय में डेबूजी की माँ से क्या कहा? |
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Answer» डेबू जी के पिता ने अन्तिम समय में डेबू जी की माँ से कहा कि मैं कुछ दिन का मेहमान हूँ। डेबू जी का ध्यान रखना और मांस-मदिरा से दूर रहने की सलाह देना। |
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संत गाडगे बाबा ने कौन-कौन से कार्य किए ? |
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Answer» सन्त गाडगे बाबा ने निम्न कार्य किए- उन्होंने मूर्ति पूजा का विरोध किया, दहेज प्रथा, बाल विवाह, छुआछूत जैसी बुराइयों को दूर करने के लिए उन्होंने बहुत संघर्ष किया। |
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स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भारत के लोकतान्त्रिक प्रणाली अपनाने के प्रतिकूल कौन-कौन सी चुनौतियाँ थीं? विस्तारपूर्वक उल्लेख कीजिए। |
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Answer» स्वतन्त्र भारत का जन्म अत्यन्त कठिन परिस्थितियों में हुआ। देश के सामने प्रारम्भ से ही राष्ट्र-निर्माण की चुनौती थी। ऐसी अनेक चुनौतियों की चपेट में आकर कई अन्य देशों के नेताओं ने फैसला किया कि उनके देश में अभी लोकतन्त्र को ही नहीं अपनाया जा सकता है। इन नेताओं ने कहा कि राष्ट्रीय एकता हमारी पहली प्राथमिकता है और लोकतन्त्र को अपनाने से मतभेद और संघर्ष को बढ़ावा मिलेगा। उपनिवेशवाद के चंगुल से आजाद हुए कई देशों में इसी कारण अलोकतान्त्रिक शासन-व्यवस्था कायम हुई। इस अलोकतान्त्रिक शासनव्यवस्था के कई रूप थे। अलोकतान्त्रिक शासन व्यवस्थाओं की शुरुआत इस वायदे से हुई कि शीघ्र ही लोकतन्त्र कायम कर दिया जाएगा। भारत में भी परिस्थितियाँ बहुत अलग नहीं थीं, परन्तु स्वतन्त्र भारत के नेताओं ने अपने लिए कहीं अधिक कठिन रास्ता चुनने का फैसला लिया। नेताओं ने कोई और रास्ता चुना होता तो वह अचम्भित करने वाली बात होती क्योंकि हमारे स्वतन्त्रता-संग्राम की गहरी प्रतिबद्धता लोकतन्त्र से थी। हमारे नेताओं ने राजनीति को समस्या के रूप में नहीं देखा तथा वे लोकतन्त्र में राजनीति की निर्णायक भूमिका को लेकर सचेत थे। वे राजनीति को समस्या के समाधान का उपाय मानते थे। किसी भी समाज में कई समूह होते हैं, इनकी आकांक्षाएँ अक्सर अलग-अलग एक-दूसरे के विपरीत होती हैं। हर समाज के लिए यह फैसला करना आवश्यक होता है कि उसका शासन कैसे चलेगा और वह किन कायदे-कानूनों पर अमल करेगा। सत्ता और प्रतिस्पर्धा राजनीति की दो सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण चीजें हैं। परन्तु राजनीतिक गतिविधि का उद्देश्य जनहित का फैसला करना और उस पर अमल करना होता है। अतः हमारे नेताओं ने लोकतान्त्रिक राजनीति के रास्ते को चुनने का फैसला किया। स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय निम्नलिखित परिस्थितियाँ थीं जो लोकतन्त्र की सफलता में बाधक या चुनौती थीं- |
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स्वतन्त्रता पूर्व से सन् 1967 तक मिली-जुली सरकारों के उदाहरण प्रस्तुत कीजिए तथा बताइए कि भारतीय राज्यों में मिली-जुली सरकारों की राजनीति सन् 1967 के पश्चात् क्यों प्रारम्भ हुई। |
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Answer» स्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व मिली-जुली सरकार भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में मिली-जुली सरकार के गठन का इतिहास स्वतन्त्रता प्राप्ति के पूर्व से प्रारम्भ होता है। स्वतन्त्र भारत में नियमों व विधानों के निर्माण हेतु तथा नवीन संविधान की रचना हेतु कैबिनेट मिशन के द्वारा एक अन्तरिम सरकार का गठन किया गया था। इस सरकार में भारत के प्रमुख राजनीतिक दलों, कांग्रेस, मुस्लिम लीग, अकाली दल आदि को शामिल किया गया था। इस अन्तरिम सरकार के सभी दलों को मिलाकर कुल 14 प्रतिनिधि शामिल किए गए जिसमें कांग्रेस के 6, मुस्लिम लीग के 5, अकाली दल का 1, एंग्लो इण्डियन समुदाय का 1 तथा पारसी समुदाय का 1 प्रतिनिधि था। अन्तरिम सरकार का अध्यक्ष गवर्नर जनरल को बनाया गया। भारतीय प्रशासन के सभी विभाग अन्तरिम सरकार को सौंपे गए। इस अन्तरिम सरकार के प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू थे। इस अन्तरिम सरकार ने स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद तब तक यह कार्य किया जब तक कि संविधान लागू नहीं हुआ। 1952 से 1967 तक मिली-जुली सरकार भारत के प्रथम आम-चुनाव 1952 में हुए। इन चुनावों में चुनाव आयोग ने 14 राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक दल के रूप में मान्यता प्रदान की। इन चुनावों में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ, क्योंकि उस समय राजनीतिक दल कांग्रेस के समान व्यापक स्तर के नहीं थे फिर भी पं० जवाहरलाल नेहरू ने डॉ० बी० आर० अम्बेडकर, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, गोपाला स्वामी आयंगर जैसे गैर-कांग्रेसी सदस्यों को भी अपने मन्त्रिमण्डल में शामिल किया। भारतीय राज्यों में मिली-जुली सरकारों की राजनीति सन् 1967 के बाद प्रारम्भ हुई। इसके उदय के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे- 1. एक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त न होना-चौथे आम-चुनावों के समय उत्तर प्रदेश, उड़ीसा (वर्तमान ओडिशा), मध्य प्रदेश, प० बंगाल, केरल व गुजरात में किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त न हो सका। इसलिए अनेक दलों ने परस्पर सहयोग कर सरकारों का गठन किया। |
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रिक्त स्थानों की पूर्ति करो (पूर्ति करके)-(क) डेबूजी के पिता _____ और माता सखूबाई थीं।(ख) इनका विवाह ____ की आयु में कुन्ताबाई से हो गया।(ग) उनके पिता की मृत्यु का मुख्य कारण ____ थी।(घ) भोजन में _____ भोजन परोसा गया।(ङ) वे मन्दिर बनवाने की अपेक्षा _____ बनवाना अच्छा समझते थे। |
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Answer» (क) डेबूजी के पिता झिंगराजी जाणोरकर और माता सखूबाई थीं। |
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मौलिक अधिकारों का अर्थ और परिभाषा लिखिए। |
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Answer» वे अधिकार, जो मानव-जीवन के लिए मौलिक तथा अपरिहार्य होने के कारण संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदान किए जाते हैं, ‘मौलिक अधिकार’ कहलाते हैं। व्यवस्थापिका तथा कार्यपालिका द्वारा इनका उल्लंघन नहीं किया जा सकता है। देश की न्यायपालिका एक प्रहरी की भाँति इन अधिकारों की सुरक्षा करती है। राज्य का मुख्य उद्देश्य नागरिकों का चहुंमुखी विकास व उनका कल्याण करना है। इसलिए संविधान द्वारा नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान किए जाते हैं। भारतीय संविधान द्वारा भी इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं। जी० एन० जोशी का कथन है, “मौलिक अधिकार ही ऐसा साधन है, जिसके द्वारा एक स्वतन्त्र लोकराज्य के नागरिक अपने सामाजिक, धार्मिक तथा नागरिक जीवन का आनन्द उठा सकते हैं। इनके बिना लोकतन्त्रीय शासन सफलतापूर्वक नहीं चल सकता और बहुमत की ओर से अत्याचारों का खतरा बना रहता है।” |
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