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This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.

1.

द्वितीयक समूह में किस प्रकार के सम्बन्धों की प्रधानता पायी जाती है ?

Answer»

द्वितीयक समूह में औपचारिक सम्बन्धों की प्रधानता पायी जाती है।

2.

द्वितीयक समूह की परिभाषा दो उपयुक्त उदाहरणों के साथ दीजिए। याद्वितीयक समूह के दो उदाहरण दीजिए। 

Answer»

परिभाषा-वे समूह जो आकार में बड़े होते हैं, जिसके सदस्यों में घनिष्ठता का अभाव होता है, जिनमें अवैयक्तिक सम्बन्ध पाए जाते हैं तथा औपचारिक सम्बन्धों के कारण हम की भावना का प्रायः अभाव होता है, द्वितीयक समूह कहलाते हैं उदाहरण-महाविद्यालय, श्रमिक संघ, राष्ट्र, नगर व व्यावसायिक संघ आदि।

3.

निम्नलिखित में से कौन समाजवादी चिन्तक नहीं है?(क) जयप्रकाश नारायण(ख) आचार्य नरेन्द्र देव(ग) राममनोहर लोहिया(घ) डॉ० बी०आर० अम्बेडकर

Answer»

सही विकल्प है (घ) डॉ० बी०आर० अम्बेडकर

4.

प्राथमिक समूहों को प्राथमिक क्यों कहा जाता है ?  इनके तीन उदाहरण दीजिए।याप्राथमिक समूह के दो उदाहरण दीजिए। 

Answer»

कूले ने प्राथमिक समूहों को समय एवं महत्त्व की दृष्टि से प्राथमिक माना है। समय की दृष्टि से सर्वप्रथम बच्चा प्राथमिक समूहों; जैसे–परिवार, पड़ोस एवं मित्र-मण्डली के सम्पर्क में आता है। अन्य समूहों का सदस्य तो वह बाद में बनता है। चूंकि प्राथमिक समूह का व्यक्तित्व के निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान होता है, इसलिए महत्त्व की दृष्टि से भी ये प्राथमिक हैं। कूले लिखते हैं, “वैसे तो वे अनेक अर्थों में प्राथमिक हैं, किन्तु मुख्यतः इस कारण से कि वे व्यक्तियों की सामाजिक प्रकृति एवं आदर्शों के निर्माण में मौलिक हैं।” समाजीकरण की प्रक्रिया के द्वारा प्राथमिक समूह ही बच्चे को सर्वप्रथम संस्कृति, प्रथाओं, रीति-रिवाजों, आदर्शो, मूल्यों आदि का ज्ञान कराते हैं और उसे सामाजिक आदर्शों के अनुरूप ढालने एवं आचरण करने में योग देते हैं। प्राथमिक समूह ही बच्चे में विभिन्न परिस्थितियों से अनुकूलन करने की क्षमता पैदा करते हैं जिससे कि वह अपने जीवन में आने वाली विभिन्न कठिनाइयों एवं संकटों का मुकाबला कर सके। प्राथमिक समूह ही व्यक्ति में आत्म-नियन्त्रण की भावना पैदा करते हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि प्राथमिक समूह महत्त्व, समाजीकरण, व्यक्तित्व-निर्माण, सामाजिक नियन्त्रण, मौलिकता एवं प्राचीनता आदि की दृष्टि से प्राथमिक हैं। चार्ल्स कूले परिवार, क्रीड़ा-समूह और पड़ोस को प्राथमिक समूह मानते है।

5.

कौटिल्य के अनुसार, राज्य के कितने अंग होते हैं ? (क) चार(ख) पाँच(ग) छः(घ) सात

Answer»

सही विकल्प है (घ) सात

6.

‘अर्थशास्त्र’ का लेखक कौन है ?(क) मनु(ख) शुक्राचार्य(ग) कौटिल्य(घ) भीष्म

Answer»

सही विकल्प है (ग) कौटिल्य

7.

द्वितीयक समूह की उपयोगिता की विवेचना कीजिए।

Answer»

व्यक्तित्व के विकास और सामाजिक अनुकूलन के क्षेत्र में द्वितीयक समूहों के महत्त्व को अग्रलिखित रूप से समझा जा सकता है

1. विशेषीकरण को प्रोत्साहन-वर्तमान युग श्रम-विभाजन और विशेषीकरण को सबसे अधिक महत्त्व देता है। विशेषीकरण की योजना व्यक्ति को द्वितीयक समूहों से ही प्राप्त होती है, क्योंकि द्वितीयक समूहों की प्रकृति अपने आप में विशेषीकृत होती है। उदाहरण के लिए, एक प्राथमिक समूह अपने किसी सदस्य को एक कुशल नेता, डॉक्टर, प्रोफेसर अथवा अभिनेता नहीं बना सकता। व्यक्ति को ये स्थितियाँ केवल द्वितीयक समूह ही प्रदान कर सकते हैं।

2. सामाजिक परिवर्तन द्वारा प्रगति-द्वितीयक समूह व्यक्ति को भविष्य के प्रति आशावान बनाकर परिवर्तन को प्रोत्साहन देते हैं। वास्तविकता यह है कि हमारे समाज में आज यदि प्रथाओं, परम्पराओं, रूढ़ियों और अन्धविश्वासों का प्रभाव कुछ कम हो सका है तो इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि द्वितीयक समूहों ने हमें नये व्यवहारों को ग्रहण करने की प्रेरणा दी है।

3. जागरूकता में वृद्धि-द्वितीयक समूह परम्परा पर आधारित न होकर विवेक और तर्क को अधिक महत्त्व देते हैं। इस कारण इन समूहों में रहकर व्यक्ति का दृष्टिकोण अधिक तार्किक बन जाता है। आज द्वितीयक समूहों के प्रभाव से ही अनेक उपनिवेशवादी समाजों को अपनी दमनकारी नीति को छोड़ना पड़ा है। इसके अतिरिक्त, स्त्रियों की वर्तमान उन्नति और श्रमिक वर्ग को प्राप्त होने वाले अधिकार भी द्वितीयक समूहों के कारण ही सम्भव हो सके हैं।

4. आवश्यकताओं की पूर्ति-औद्योगीकरण के युग में व्यक्ति की आवश्यकताओं की पूर्ति केवल द्वितीयक समूह में रहकर ही सम्भव है। वर्तमान युग में कार्य करना आवश्यक हो गया है। उदाहरण के लिए, शिक्षा प्राप्त करना, किसी कारखाने या कार्यालय में नौकरी करना, राजनीतिक संगठनों से सम्बन्ध बनाये रखना, अनेक कल्याण संगठनों में रहकर कार्य करना, स्थानीय अथवा राष्ट्रीय मामलों में रुचि लेना आदि व्यक्ति की प्रमुख आवश्यकताएँ हैं। इन सभी आवश्यकताओं को केवल द्वितीयक समूह ही पूरा करते हैं।

5. श्रम को प्रोत्साहन-द्वितीयक समूहों ने श्रम को सर्वोच्च मानवीय मूल्य के रूप में स्वीकार करके सामाजिक प्रगति में विशेष योगदान दिया है। द्वितीयक समूह व्यक्ति को श्रम का वास्तविक पुरस्कार देकर उसे अधिक-से-अधिक काम करने की प्रेरणा देते हैं। इससे व्यक्ति का जीवन कर्मठ बनता है।

8.

आर्थर स्लेशिंगर तथा गार्नर ने कल्याणकारी राज्य की क्या परिभाषा दी है?

Answer»

आर्थर स्लेशिंगर के शब्दों में, “कल्याणकारी राज्य वह व्यवस्था है जिसके अन्तर्गत शासन अपने समस्त नागरिकों हेतु रोजगार, आय, चिकित्सा, शिक्षा, सहायता, सामाजिक सुरक्षा एवं आवास के कुछ स्तर स्थापित करने हेतु तैयार रहता है।”
गार्नर के मतानुसार, “कल्याणकारी राज्य का उद्देश्य राष्ट्रीय जीवन, राष्ट्रीय सम्पत्ति तथा जीवन में भौतिक तथा नैतिक स्तर को विस्तृत करना है।”

9.

आधुनिक राज्य के चार प्रमुख कार्यों का वर्णन कीजिए। 

Answer»

आधुनिक राज्य के चार प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं-

⦁    शान्ति एवं व्यवस्था की स्थापना,
⦁    देश की बाह्य आक्रमण से सुरक्षा,
⦁    अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों की स्थापना,
⦁    न्याय एवं दण्ड की व्यवस्था।

10.

व्यक्तिवाद की चार विशेषताएँ बताइए।

Answer»

व्यक्तिवादी सिद्धान्त की चार प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

⦁    व्यक्तिवाद राज्य को एक आवश्यक बुराई मानता है।
⦁    व्यक्तिवाद राज्य को साधन मानता है।
⦁    यह व्यक्ति को साध्य अथवा लक्ष्य मानता है तथा व्यक्तित्व के विकास पर बल देता है।
⦁    व्यक्तिवाद व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर अत्यधिक बल देता है।

11.

व्यक्ति सामाजिक संबंधों का निर्माण कब करते हैं ?

Answer»

जब दो या दो से अधिक व्यक्ति अपनी विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु एक-दूसरे के सम्पर्क में आते हैं, परस्पर अन्त:क्रिया करते हैं, एक-दूसरे को अर्थपूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं एवं एक-दूसरे से प्रभावित होते हैं तो वे सामाजिक संबंधों का निर्माण करते हैं।

12.

राज्य के कार्यों के सम्बन्ध में व्यक्तिवादी दृष्टिकोण का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। याराज्य के कार्यों का व्यक्तिवादी सिद्धान्त क्या है? इसकी विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।याव्यक्तिवाद से आप क्या समझते हैं ? इसके गुण एवं दोषों की विवेचना कीजिए।या“राज्य एक आवश्यक बुराई है।” क्या आप इस कथन से सहमत हैं? अपने विचारों के पक्ष में तीन तर्क दीजिए। याव्यक्तिवाद की विशेषताएँ बतलाइए तथा समाजवाद से इसका अन्तर स्पष्ट कीजिए।या“राज्य एक अनिवार्य बुराई है।” इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।

Answer»

व्यक्तिवादी सिद्धान्त
व्यक्तिवादी सिद्धान्त के समर्थक व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर सर्वाधिक बल देते हैं। उनके अनुसार, राज्य के कार्य तथा कानून व्यक्ति की स्वतन्त्रता को प्रतिबन्धित करते हैं; अतः राज्यों के कार्यों की संख्या न्यूनतम होनी चाहिए। राज्य को व्यक्ति के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
इस सिद्धान्त के समर्थक एडम स्मिथ, जे०एस० मिल, हरबर्ट स्पेन्सर आदि थे। फ्रीमैन के शब्दों में, “सबसे अच्छी सरकार वह है जो सबसे कम शासन करती है।’
एक अन्य लेखक के अनुसार, “राज्य एक अनिवार्य बुराई है।” अर्थात् यह एक ऐसी बुराई है। जिसे व्यक्ति विवश होकर अपनाता है; अतः इसे अधिक कार्य नहीं सौंपे जाने चाहिए।

बेन्थम के शब्दों में, “व्यक्ति के हित को समझे बिना समुदाय के हित की कल्पना करना कोरी बकवास है।”
व्यक्तिवादियों के अनुसार, “राज्य एक अयोग्य संस्था है।”

स्पेन्सर के शब्दों में, “विधानमण्डलों के अँगूठा टेक, अशिक्षित तथा अनुभवहीन सदस्यों ने अतीत में अनेक भयंकर भूलें करके समाज को हानि पहुँचाई है। अतः भविष्य में उन पर कोई विश्वास नहीं किया जाना चाहिए।

व्यक्तिवादी मत के अनुसार राज्य का कार्यक्षेत्र
व्यक्तिवादी चाहते हैं कि राज्य के कार्यक्षेत्र को अधिक-से-अधिक सीमित कर दिया जाये। स्पेन्सर के मतानुसार, “व्यक्ति का स्थान समाज तथा राज्य के ऊपर होना चाहिए और राज्य को केवल वही कार्य करने चाहिए जिन्हें व्यक्ति नहीं कर सकता। उनके अनुसार राज्य के केवल निम्नलिखित तीन कार्य होने चाहिए-
1. आन्तरिक शान्ति और व्यवस्था करना – राज्य की आन्तरिक शान्ति और व्यवस्था अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य है। राज्य में नागरिकों को घूमने-फिरने, सभा करने, मिलने-जुलने, आजीविका प्राप्त करने इत्यादि के अनेक अधिकार होते हैं, परन्तु समाज में अनेक ऐसे व्यक्ति होते हैं जो इन अधिकारों के प्रयोग में बाधा उत्पन्न करते हैं। इससे लोगों का जीवन व सम्पत्ति खतरे में पड़ जाती है। ऐसे असामाजिक तत्वों का दमन कर शान्ति और व्यवस्था बनाये रखना राज्य का प्रधान कर्तव्य है, इसीलिए राज्य पुलिस और सेना की सहायता से समाज में शान्ति और व्यवस्था का प्रबन्ध करता है। राज्य अपराधों, उपद्रव, लूटमार, चोरी-डकैती, विद्रोह आदि को रोकता है।
2. देश की बाहरी आक्रमणों से रक्षा करना – कभी-कभी एक राज्य दूसरे राज्य पर आक्रमण कर उस पर आधिपत्य स्थापित करने का प्रयास करता है। आत्म-रक्षा प्रत्येक राज्य का प्रमुख कार्य होता है। बाहरी आक्रमणों से रक्षा करने की दृष्टि से राज्य शक्तिशाली जल, थल तथा वायु सेना आदि रखता है। इस प्रकार बाह्य आक्रमण से देश की रक्षा करना राज्य का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य है। इसके अभाव में उसका अस्तित्व ही समाप्त हो सकता है।
3. न्याय और दण्ड की व्यवस्था करना – समाज में शान्ति और व्यवस्था बनाये रखने के लिए न्याय की उत्तम व्यवस्था का होना भी अनिवार्य है। न्याय की समुचित व्यवस्था से ही दुर्बल और असहाय व्यक्ति के अधिकार सुरक्षित रह पाएँगे और प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करेगा। इसलिए न्याय का प्रबन्ध करना भी राज्य का अनिवार्य कार्य है। न्याय के साथ दण्ड भी सम्बद्ध है। दण्ड का उद्देश्य प्रतिशोध नहीं होना चाहिए, उसका उद्देश्य अपराधी का सुधार होना चाहिए।

व्यक्तिवाद की विशेषताएँ
व्यक्तिवादी सिद्धान्त की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
⦁    यह सिद्धान्त राज्य की सर्वव्यापक शक्ति का विरोध करता है।
⦁    यह सिद्धान्त इस बात में विश्वास नहीं करता कि राज्य के अपने निजी व्यक्तित्व और अपने निजी उद्देश्य हैं। व्यक्ति स्वयं साध्य है और राज्य साधन।
⦁    व्यक्तिवादी राज्य की निरंकुशता तथा असीमितता में विश्वास नहीं करते।
⦁    यह सिद्धान्त ‘लैसिस फेयर’ (Laissez Faire) के नाम से पुकारा जाता है, जिसका अभिप्राय है कि मनुष्य को जो वह चाहे करने दो।
⦁    व्यक्तिवादी चाहते हैं कि राज्य को मनुष्य के जीवन से अलग रहना चाहिए।
⦁    व्यक्तिवादियों के मतानुसार, राज्य का कार्य मनुष्य की स्वतन्त्रता की रक्षा करना, अपराधी को दण्ड देना और बाहरी शत्रु से देश की रक्षा करना है, अर्थात् राज्य का कार्य मनुष्य की रक्षा करना है न कि उनके व्यक्तित्व के विकास में सहायता करना।
⦁    व्यक्तिवादियों के अनुसार, राज्य का अस्तित्व मानव-स्वभाव की निर्बलता का कारण है।
⦁    स्वतन्त्रता व्यक्तिवाद की आधारशिला है। यह सिद्धान्त राज्य को व्यक्तियों की स्वतन्त्रता की रक्षा करने के लिए केवल पुलिस संगठन का कार्य देना चाहता है। राज्य को ऐसी कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए जिससे मनुष्य के व्यक्तित्व के स्वतन्त्र विकास में कोई बाधा उत्पन्न हो।
⦁    व्यक्तिवादियों के अनुसार, “राज्य एक अभिशाप है, क्योंकि वह व्यक्तिगत स्वतन्त्रता छीनता है तथा एक ऐसी संस्था है जो बुरी होते हुए भी समाज से अराजकता और अव्यवस्था दूर करने के लिए आवश्यक है।

व्यक्तिवाद के पक्ष में तर्क (गुण)
व्यक्तिवादी सिद्धान्त के समर्थन में निम्नलिखित तर्क दिये जा सकते हैं-
1. नैतिक तर्क – व्यक्तिवाद के समर्थन में नैतिक तर्क यह है कि प्रत्येक व्यक्ति का अपना अलग व्यक्तित्व तथा विशेषता होती है। अत: यह आवश्यक है कि राज्य सभी व्यक्तियों को समान न समझे, अपितु प्रत्येक व्यक्ति को उसकी इच्छा के अनुसार अपनी शिक्षा, व्यवसाय तथा मनोरंजन आदि कार्यों को करने की स्वतन्त्रता होनी चाहिए। मिल ने कहा है कि व्यक्तिगत जीवन में राजकीय हस्तक्षेप व्यक्ति के आत्म-विश्वास को नष्ट कर देता है, उसकी उत्तरदायित्व की भावना को कमजोर बनाता है तथा चारित्रिक विकास को अवरुद्ध कर देता
2. आर्थिक तर्क – एडम स्मिथ, माल्थस, मिल, रिकाड आदि अर्थशास्त्री इस विचारधारा के सम्बन्ध में यह तर्क प्रस्तुत करते हैं कि व्यक्ति अपने हानि-लाभ तथा आर्थिक हितों को स्वयं ही भली प्रकार समझता है। अतः राज्य को व्यक्ति के आर्थिक जीवन में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
3. ऐतिहासिक तर्क – व्यक्तिवादी अपने मत के समर्थन में ऐतिहासिक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। उनका कहना है कि व्यक्ति के आर्थिक तथा सामाजिक जीवन में राज्य का हस्तक्षेप सदैव हानिकारक रहा है। राज्य ने मूल्य पर नियन्त्रण किया तो चोर-बाजारी बढ़ी, उत्पादन अपने हाथ में लिया तो भ्रष्टाचार बढ़ा और धार्मिक जीवन में हस्तक्षेप से क्रान्तियाँ हुईं। अतः राज्य को हस्तक्षेप न करने की नीति का ही पालन करना चाहिए।
4. प्राणिवैज्ञानिक तर्क – स्पेन्सर ने व्यक्तिवाद के समर्थन में नया तर्क प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, यह प्राकृतिक नियम है कि सभी प्राणी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करते हैं। उस संघर्ष में योग्य तथा सबल प्राणी ही जीवित रहते हैं तथा शेष नष्ट हो जाते हैं। अयोग्य और निर्बल व्यक्तियों के नष्ट होने से एक उन्नत और शक्तिशाली राज्य का निर्माण सम्भव होता है। स्पेन्सर ने यहाँ तक कहा कि राज्य को निर्धन, अपाहिज व अनाथों की रक्षा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यह जैविक नियमों के विरुद्ध है। राज्य को अपनी ऊर्जा योग्य व्यक्तियों के विकास के लिए लगानी चाहिए, क्योंकि वे ही समाज में रन के रूप में होते हैं।”
5. व्यावहारिक तर्क – व्यक्तिवादी विचारधारा के समर्थकों का कहना है कि व्यावहारिक दृष्टि से : राज्य में सभी कार्यों को सम्पन्न करने की योग्यता नहीं होती, क्योंकि राज्य के कर्मचारी लगन और प्रतिबद्धता से कार्य नहीं करते और मन्त्री प्रायः अनुभवशून्य होते हैं। इसके अतिरिक्त अनेक समस्याएँ स्थानीय प्रकृति की होती हैं तथा कुछ ऐसे कार्य होते हैं जिन्हें देरी किये बिना सम्पन्न करना आवश्यक होता है। इन्हें व्यक्तिगत स्तर पर जितनी जल्दी निपटाया जा सकता है, सरकारी स्तर पर उतना शीघ्र नहीं।

व्यक्तिवादी सिद्धान्त की आलोचना (दोष)
व्यक्तिवादी सिद्धान्त की आलोचना निम्नलिखित आधारों पर की जाती है-
1. व्यक्ति और समाज की गलत कल्पना – वास्तविकता यह है कि “मनुष्य स्वभाव से ही एक सामाजिक प्राणी है। समाज से उसका अटूट सम्बन्ध है। समाज तथा राज्य के बिना मनुष्य अपना विकास नहीं कर सकता। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि व्यक्तिवादी विचारधारा गलत धारणा पर आधारित है।
2. स्वतन्त्रता का भ्रामक अर्थ – वस्तुतः राज्य अपने कानूनों द्वारा स्वतन्त्रता का अपहरण नहीं करता, अपितु उसकी रक्षा करता है। अतः यह कहा जा सकता है कि व्यक्तिवादियों की स्वतन्त्रता विषयक धारणा गलत मान्यताओं पर टिकी है।
3. राज्य को अनिवार्य बुराई कहना गलत – अरस्तू ने लिखा है कि राज्य की उत्पत्ति मनुष्य की रक्षा के लिए हुई है और श्रेष्ठ जीवन की प्राप्ति के लिए ही वह स्थिर है। अतः राज्य एक आवश्यक बुराई नहीं, अपितु एक सकारात्मक अच्छाई है।
4. राज्य मानव की उन्नति में बाधक नहीं – राज्य मनुष्यों की सर्वांगीण उन्नति के लिए। समुचित अवसर तथा सुविधाएँ प्रदान करता है। मानव-समाज ने राज्य की छत्रछाया में ही पर्याप्त आर्थिक व वैज्ञानिक उन्नति की है। इसलिए राज्य मानव-उन्नति में बाधक नहीं है। अरस्तु के अनुसार, “राज्य समस्त विज्ञानों, समस्त कलाओं, समस्त गुणों तथा समस्त पूर्णता में सहायक है।”
5. राज्य को हस्तक्षेप आवश्यक – राज्य के अभाव में प्रत्येक व्यक्ति अपने हित व स्वार्थ की पूर्ति के लिए प्रयत्नशील होगा। उसका ऐसा प्रयत्न दूसरे व्यक्ति के ऐसे ही प्रयत्नों में बाधक हो सकता है जो परस्पर संघर्ष को जन्म देगा। इसलिए व्यक्तिवादियों का यह मत गलत है कि राज्य का हस्तक्षेप अनावश्यक है।
6. लोकतन्त्रीय युग में व्यक्तिवाद अनावश्यक – व्यक्तिवाद का जन्म निरंकुश राज्यों की प्रतिक्रिया-स्वरूप हुआ था। वर्तमान युग में लोकतन्त्र के उदय तथा लोक-कल्याणकारी राज्य की धारणा के उद्भव से ऐसी परिस्थिति नहीं है; अतः आज यह सिद्धान्त अमान्य है।
7. व्यक्तिवादी तर्क अमानवीय – लीकॉक ने कहा है कि “यदि शक्ति को ही जीवित रहने की कसौटी मान लिया जाए तो एक समृद्ध और सबल चोर समाज में प्रशंसा का पात्र होगा और एक भूखा कलाकार घृणा का।” इस प्रकार शारीरिक शक्ति बौद्धिक बल पर हावी हो जाएगी, जिसे जंगल-राज कह सकते हैं; अतः व्यक्तिवादी सिद्धान्त अमानवीय है।
निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि यद्यपि व्यक्तिवादी सिद्धान्त वर्तमान समय में प्रभावहीन हो गया है, तथापि इस सिद्धान्त का महत्त्व इस दृष्टिकोण से आवश्यक है कि राज्य की व्यक्तिगत स्वतन्त्रता को सुरक्षित रखना चाहिए। वस्तुतः व्यक्तिवाद व्यक्ति की गरिमा एवं स्वतन्त्रता पर बल देती है। गार्नर के शब्दों में, “व्यक्तिवादियों ने व्यक्ति के महत्त्व को विश्व के समक्ष रखा है।”

व्यक्तिवाद और समाजवाद में अन्तर
1. विचारधारा – व्यक्तिवादी सिद्धान्त के समर्थक व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर बल देते हैं। उनके अनुसार, राज्य के कार्य तथा कानून व्यक्ति की स्वतन्त्रता को प्रतिबन्धित करते हैं; अत: राज्य के कार्यों की संख्या न्यूनतम होनी चाहिए। वे राज्य को एक आवश्यक बुराई मानते हैं। । दूसरी ओर समाजवादी विचारधारा के अनुसार राज्य के द्वारा वे सभी कार्य किये जाने चाहिए जो व्यक्ति और समाज की उन्नति के लिए आवश्यक हों। इस विचारधारा के अनुसार राज्य के कार्यों की कोई सीमा नहीं है तथा सामाजिक जीवन के प्रायः सभी कार्य राज्य के कार्यक्षेत्र के अन्तर्गत आ जाते हैं।
2. कार्यक्षेत्र – व्यक्तिवादी चाहते हैं कि राज्य के कार्यक्षेत्र को अधिक-से-अधिक सीमित कर दिया जाए। स्पेन्सर के मतानुसार, “व्यक्ति का स्थान समाज तथा राज्य के ऊपर होना चाहिए। और राज्य को केवल वही कार्य करने चाहिए जिन्हें व्यक्ति नहीं कर सकता।” उनके अनुसार राज्य के केवल तीन निम्नलिखित कार्य होने चाहिए-
⦁    आन्तरिक शान्ति और व्यवस्था करना,
⦁    देश की बाहरी आक्रमणों से रक्षा करना तथा
⦁    न्याय और दण्ड की व्यवस्था करना।
दूसरी ओर समाजवादी समानता को अपना आदर्श मानकर चलते हैं और राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक क्षेत्रों में अधिकाधिक स्थापित करने के लिए निम्नलिखित बातों पर विशेष बल देते हैं-
⦁    समाज की आंगिक एकता,
⦁    समाज में प्रतियोगिता के स्थान पर सहयोग,
⦁    पूँजीवाद का अन्त तथा
⦁    उत्पादन के साधनों पर सामाजिक स्वामित्व।

उद्योगों के प्रति दृष्टिकोण
व्यक्तिवादी विचारधारा राज्य के कार्यों को न्यूनतम कर देना चाहती है तथा उद्योगों को व्यक्तियों के लिए पूर्ण रूप से खुला रखना चाहती है। वह उद्योगों की स्थापना, संचालन तथा विकासे में राज्य का हस्तक्षेप नहीं चाहती। वह खुली प्रतियोगिता में विश्वास रखती है तथा एक प्रकार से पूँजीवाद की समर्थक है।
दूसरी ओर समाजवादी विचारधारा पूँजीवाद की घोर विरोधी होने के कारण भूमि और उद्योगों पर व्यक्तिगत स्वामित्व के अन्त की माँग करती है। यह विचारधारा उत्पादन के समस्त साधनों पर सामाजिक स्वामित्व स्थापित करना चाहती है। समाजवादी विचारधारा के अनुसार वैयक्तिक उद्योग वैयक्तिक लूटमार है और व्यक्तिगत सम्पत्ति को सामाजिक अथवा सामूहिक सम्पत्ति का रूप देना ही उचित है।
अतः निष्कर्षतया कहा जा सकता है कि उद्योगों के निजीकरण की प्रवृत्ति समाजवादी विचारधारा के प्रतिकूल है।

13.

“समाज सामाजिक संबंधों का जाल है।” यह कथन किस विद्वान का है?

Answer»

यह कथन मैकाइवर तथा पेज का है।

14.

“समाजशास्त्र अन्य सामाजिक विज्ञानों की न तो दासी है और न ही मालकिन है, बल्कि यह उनकी बहन है।” यह कथन किस विद्वान का है?

Answer»

यह कथन बांर्स एवं बेकर का है।

15.

सामाजिक विज्ञानों की अध्ययन सामग्री क्या है तथा उनमें पारस्परिक संबंध क्यों है ?

Answer»

सामाजिक विज्ञानों में मानवीय क्रियाओं, समाज और सामाजिक घटनाओं का अध्ययन किया जाता है। विभिन्न सामाजिक विज्ञानों में से प्रत्येक के द्वारा सामाजिक जीवन के किसी-न-किसी पहलू का अध्ययन किये जाने के कारण उन सभी में पारस्परिक सम्बन्धों का होना स्वाभाविक है।

16.

“समाज एक प्रकार की चेतना है।” यह कथन किस विद्वान का है?

Answer»

यह कथन गिडिंग्स का है।

17.

किस विद्वान ने वर्गविहीन समाज की कल्पना की है?

Answer»

‘वर्गविहीन समाज’ की कल्पना कार्ल मार्क्स ने की है।

18.

समूहों के दो प्रकार क्या हैं?

Answer»

⦁    अन्तः समूह तथा
⦁    बाह्य समूह।

19.

सकारात्मक एवं नकारात्मक समूह की अवधारणा किसने प्रतिपादित की थी ?

Answer»

सकारात्मक एवं नकारात्मक समूह की अवधारणा न्यू कॉम्ब ने प्रतिपादित की थी।

20.

समूह के लिए आवश्यक है(क) दो या दो से अधिक व्यक्तियों का होना।(ख) दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच सामाजिक चेतना का होना(ग) अधिक व्यक्तियों का एकत्र होना(घ) व्यक्तियों के बीच संचारविहीनता का होना

Answer»

(क) दो या दो से अधिक व्यक्तियों का होना

21.

समाजवाद के पक्ष में दो तर्क दीजिए।

Answer»

⦁    यह न्याय पर आधारित है तथा
⦁    यह अधिक लोकतन्त्रात्मक है।

22.

राज्य के समाजवादी सिद्धान्त के पक्ष में दो तर्क दीजिए। 

Answer»

⦁    समाजवाद श्रमिकों एवं गरीबों के शोषण का विरोध करता है तथा
⦁    समाजवाद श्रम तथा समाज सेवा पर अत्यधिक जोर देता है।

23.

समाजवाद के अनुसार राज्य का कार्यक्षेत्र बताइए।यासमाजवादी राज्य के कार्यों का परीक्षण कीजिए। 

Answer»

राज्य के कार्यक्षेत्र का निर्धारण करने की दृष्टि से समाजवादी सिद्धान्त व्यक्तिवादी सिद्धान्त के ठीक विपरीत है। व्यक्तिवाद जहाँ राज्य के सीमित कार्यक्षेत्र पर बल देता है वहीं समाजवाद राज्य के उन समस्त कार्यों को सम्पादित करने को कहता है, जिनसे समाज की उन्नति सम्भव है। इसके अतिरिक्त समाजवाद की मान्यता है कि राज्य को उत्पत्ति एवं वितरण के साधनों पर नियन्त्रण रखकर स्वयं ही सार्वजनिक हित के कार्यों का सम्पादन करना चाहिए। अतः कहा जा सकता है कि समाजवाद के अनुसार प्रायः सामाजिक जीवन के समस्त कार्य राज्य के कार्यक्षेत्र के अन्तर्गत आ जाते हैं। इस सम्बन्ध में गार्नर का यह कथन उचित ही है, “राज्य मानव विकास की सर्वोच्च संस्था है। उसका कार्यक्षेत्र व्यापक है। वह व्यक्ति के सामाजिक, आर्थिक, बौद्धिक एवं नैतिक सभी क्षेत्रों के हितों की अभिवृद्धि करती है।”

24.

कौन-सी संकल्पना गुणात्मक है ?(A) राष्ट्रीय आय की वृद्धि दर(B) प्रतिव्यक्ति आय की वृद्धि दर(C) आर्थिक वृद्धि(D) आर्थिक विकास

Answer»

सही विकल्प है (D) आर्थिक विकास

25.

माइकल टोडेरो के अनुसार आर्थिक विकास क्या है ?

Answer»

माइकल टोडेरो के अनुसार – ‘आर्थिक विकास यह बहुपरिमाणीय प्रक्रिया है ।’

26.

लोकतान्त्रिक समाजवाद की प्रमुख विशेषताओं की विवेचना कीजिए।यापण्डित जवाहरलाल नेहरू के लोकतान्त्रिक समाजवाद पर एक लेख लिखिए।

Answer»

‘लोकतन्त्रवाद’ और ‘समाजवाद’ के संयोग से जिस उदार समाजवाद की रचना हुई उसे ही लोकतान्त्रिक समाजवाद (Democratic Socialism) कहा जाता है। आज के युग में जबकि पश्चिमी पूँजीवादी लोकतन्त्र चीनी उग्र साम्यवाद से लोगों की आस्था समाप्त होती जा रही है, लोकतान्त्रिक समाजवाद दक्षिण और वाम दोनों ही विचारों को सामंजस्य करते हुए एक मध्यममार्गी समाजवाद का रूप ले रहा है। फ्रांस, इंग्लैण्ड, इटली और अब भारत में भी इसी प्रकार के समाजवाद का रूप विभिन्न राजनीतिक दलों के माध्यम से अभिव्यक्त हो रहा है। भारत में लोकतान्त्रिक समाजवाद ने पण्डित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में अपना रास्ता तय किया। कांग्रेस द्वारा समाजवादी व्यवस्था को अपना लक्ष्य घोषित कराने में नेहरू जी की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रही है।

पण्डित नेहरू का लोकतान्त्रिक समाजवाद
1. लोकतन्त्र के समर्थक – यद्यपि भारत में समाजवाद का प्रचार करने में कांग्रेसी समाजवादियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है, किन्तु वह नेहरू जी की भूमिका के सामने फीकी पड़ जाती है। जब वे इंग्लैण्ड में शिक्षा प्राप्त कर रहे थे, तब वे वहाँ की लोकतन्त्र व्यवस्था से काफी प्रभावित हुए। उन्हें लोकतन्त्र में व्यक्ति की स्वतन्त्रता तथा विचार अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता ने काफी प्रभावित किया। वे रूस भी गये तथा वहाँ की समाजवादी व्यवस्था से भी वे बहुत अधिक प्रभावित हुए। वहाँ की वर्ग-विहीन समाज व्यवस्था से वे बहुत अधिक प्रभावित हुए। परन्तु उसके साधनों में उन्हें हिंसा-ही-हिंसा दिखायी दी। अतः उन्होंने माक्र्सवाद या साम्यवाद को ज्यों-का-त्यों स्वीकार न करके वर्ग-सहयोग एवं सामंजस्य पर बल दिया। इस प्रकार उन्होंने समाजवाद और लोकतन्त्र का मध्य मार्ग अपनाकर उसे ‘लोकतान्त्रिक समाजवाद का नाम दिया।
2. लोकतन्त्र समाजवाद को लाने का साधन – नेहरू जी ने लोकतन्त्र व समाजवाद को एक- दूसरे को पूरक माना है। वे लोकतन्त्र के प्रबल समर्थक होने के साथ-साथ समाजवाद के भी बड़े प्रशंसक थे। उनका कहना था कि भारत में जब तक समानता नहीं आयेगी, तब तक लोकतन्त्र की स्थापना सम्भव नहीं है। लोकतन्त्र के लिए आर्थिक एवं सामाजिक समानता आवश्यक है। एक ओर उच्च वर्ग तथा दूसरी ओर दलित वर्ग जब तक समान स्तर पर नहीं लाये जायेंगे तब तक लोकतन्त्र कदापि सम्भव नहीं है। वे समाजवाद को लाने के लिए लोकतन्त्र को प्रमुख साधन मानते थे।
3. संघर्ष एवं हिंसा का विरोध – यद्यपि नेहरू जी मार्क्स के सिद्धान्तों की बड़ी प्रशंसा करते थे, किन्तु वे अहिंसा द्वारा समाजवाद को भारत में लाना चाहते थे। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है। कि सामाजिक एवं आर्थिक लोकतन्त्र के अभाव में राजनीतिक लोकतन्त्र का कोई मूल्य नहीं होता, परन्तु इसके लिए वे संघर्ष एवं हिंसा को साधन नहीं बनाना चाहते थे। वे हिंसात्मक रवैये को एकदम ‘अवैज्ञानिक’, ‘तर्कहीन’ तथा ‘असभ्य’ समझते थे। उनकी धारणा यह थी कि समाज की प्रमुख समस्याओं का कोई भी समाधान हिंसा के द्वारा नहीं किया जा सकती। इसका स्पष्ट अर्थ यही निकलता है कि उन पर गाँधी जी का प्रभाव विशेष रूप से अधिक था। वे गाँधी जी द्वारा प्रतिपादित शान्तिपूर्ण उपायों में विश्वास रखते थे। उन्होंने स्पष्ट किया था कि राष्ट्रीय सम्पत्ति में वृद्धि करके तथा समाज में विद्यमान असमानताओं को कम करके सब लोगों को प्रगति के लिए समान अवसर प्रदान करने वाले समाजवादी लक्ष्य की प्राप्ति शान्तिपूर्ण संवैधानिक साधनों से ही होनी चाहिए।
4. लोकतन्त्र की प्रथम शर्त दरिद्रता, असमानता एवं अशिक्षा को समाप्त करना – नेहरू जी लोकतन्त्र के आर्थिक पक्ष के महत्त्व को स्वीकार करते थे। उनका विचार था कि स्वराज्य को यथार्थ रूप देने के लिए राष्ट्र के धन का समुचित एवं न्यायपूर्ण वितरण किया जाए तथा समाज में विद्यमान वर्ग विभेद को समाप्त किया जाए। शिक्षा के माध्यम से शिक्षित एवं अशिक्षित जनता के अन्तर को दूर किया जाए। दरिद्रता, असमानता एवं अशिक्षा को समाप्त करना वे लोकतन्त्र के लिए प्रथम शर्त मानते थे।

भारत में लोकतान्त्रिक समाजवाद
यदि आज भारत की जनता ने लोकतान्त्रिक समाजवाद’ को अपना मान लिया है तथा ‘समाजवाद’ शब्द सम्माननीय एवं सुन्दर हो गया है और यदि इसका अर्थ ‘उग्र वर्ग-संघर्ष’ तथा ‘सर्वहारा वर्ग की अधिनायकता के स्थान पर ‘विकास’, ‘कल्याण तथा सामाजिक जीवन में ईमानदारी’, ‘पवित्रता’ एवं ‘अनुशासन’ लगाया जाने लगा है तो इसका श्रेय साम्यवादी दल, प्रजा समाजवादी दल अथवा समाजवादी दल को ही नहीं बल्कि पण्डित जवाहरलाल नेहरू को है। उन्होंने ही अपने प्रयासों द्वारा लोकतन्त्र एवं समाजवाद का समन्वय करके इस नवीन विचारधारा को जन्म दिया। यद्यपि वे मार्क्सवाद के सिद्धान्तों के पक्षपाती थे, किन्तु वे मार्क्सवादी या साम्यवादी नहीं थे। उन्होंने मार्क्सवाद के समाजवादी पक्ष को कुछ संशोधन कर स्वीकार किया है। उनके इन्हीं विचारों को भारत के संविधान की प्रस्तावना तथा नीति-निदेशक सिद्धान्तों में स्थान दिया गया है। शासन के द्वारा अपनायी गई पंचवर्षीय योजनाओं में लोकतन्त्रात्मक समाजवाद के लक्ष्यों के अनुरूप नीतियों का निर्माण किया गया। नेहरू जी का विचार था कि “नियोजित अर्थव्यवस्था द्वारा ही हम समाजवाद को प्राप्त कर सकते हैं; अतः हमारे देश में अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में आर्थिक नियोजन (Economic Planning) की नीति को अपनाया गया है। वास्तव में नेहरू जी का चिन्तनपूर्ण रूप से व्यावहारिक कहा जा सकता है।

27.

व्यक्तिवाद और समाजवाद का अन्तर समझाइए। उद्योगों के निजीकरण की प्रवृत्ति इन दोनों में से किसकी अवधारणा के प्रतिकूल है? कारण का भी उल्लेख कीजिए।

Answer»

व्यक्तिवाद और समाजवाद का अन्तर
1. विचारधारा – व्यक्तिवादी सिद्धान्त के समर्थक व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर बल देते हैं। उनके अनुसार, राज्य के कार्य तथा कानून व्यक्ति की स्वतन्त्रता को प्रतिबन्धित करते हैं; अत: राज्य के कार्यों की संख्या न्यूनतम होनी चाहिए। वे राज्य को एक आवश्यक बुराई मानते हैं। । दूसरी ओर समाजवादी विचारधारा के अनुसार राज्य के द्वारा वे सभी कार्य किये जाने चाहिए जो व्यक्ति और समाज की उन्नति के लिए आवश्यक हों। इस विचारधारा के अनुसार राज्य के कार्यों की कोई सीमा नहीं है तथा सामाजिक जीवन के प्रायः सभी कार्य राज्य के कार्यक्षेत्र के अन्तर्गत आ जाते हैं।
2. कार्यक्षेत्र- व्यक्तिवादी चाहते हैं कि राज्य के कार्यक्षेत्र को अधिक-से-अधिक सीमित कर दिया जाए। स्पेन्सर के मतानुसार, “व्यक्ति का स्थान समाज तथा राज्य के ऊपर होना चाहिए।
और राज्य को केवल वही कार्य करने चाहिए जिन्हें व्यक्ति नहीं कर सकता।” उनके अनुसार राज्य के केवल तीन निम्नलिखित कार्य होने चाहिए-
⦁    आन्तरिक शान्ति और व्यवस्था करना,
⦁    देश की बाहरी आक्रमणों से रक्षा करना तथा
⦁    न्याय और दण्ड की व्यवस्था करना।
दूसरी ओर समाजवादी समानता को अपना आदर्श मानकर चलते हैं और राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक क्षेत्रों में अधिकाधिक स्थापित करने के लिए निम्नलिखित बातों पर विशेष बल देते हैं–
⦁    समाज की आंगिक एकता,
⦁    समाज में प्रतियोगिता के स्थान पर सहयोग,
⦁    पूँजीवाद का अन्त तथा
⦁    उत्पादन के साधनों पर सामाजिक स्वामित्व।

उद्योगों के प्रति दृष्टिकोण
व्यक्तिवादी विचारधारा राज्य के कार्यों को न्यूनतम कर देना चाहती है तथा उद्योगों को व्यक्तियों के लिए पूर्ण रूप से खुला रखना चाहती है। वह उद्योगों की स्थापना, संचालन तथा विकासे में राज्य का हस्तक्षेप नहीं चाहती। वह खुली प्रतियोगिता में विश्वास रखती है तथा एक प्रकार से पूँजीवाद की समर्थक है।
दूसरी ओर समाजवादी विचारधारा पूँजीवाद की घोर विरोधी होने के कारण भूमि और उद्योगों पर व्यक्तिगत स्वामित्व के अन्त की माँग करती है। यह विचारधारा उत्पादन के समस्त साधनों पर सामाजिक स्वामित्व स्थापित करना चाहती है। समाजवादी विचारधारा के अनुसार वैयक्तिक उद्योग वैयक्तिक लूटमार है और व्यक्तिगत सम्पत्ति को सामाजिक अथवा सामूहिक सम्पत्ति का रूप देना ही उचित है।
अतः निष्कर्षतया कहा जा सकता है कि उद्योगों के निजीकरण की प्रवृत्ति समाजवादी विचारधारा के प्रतिकूल है।

28.

समाजवादी राज्य की अवधारणा का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। यासमाजवादी राज्य के कार्यों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।

Answer»

समाजवाद की आलोचना
आधुनिक पूँजीवादी व्यवस्था के अन्त के लिए समाजवाद एक सुन्दर मार्ग प्रस्तुत करता है। समाजवाद ने व्यक्तिगत हित की अपेक्षा सामाजिक हित को उच्चतर स्थान प्रदान कर प्रशंसनीय कार्य किया है, किन्तु इन गुणों के होते हुए भी समाजवादी व्यवस्था दोषमुक्त नहीं है। इस व्यवस्था की प्रमुख रूप से निम्नलिखित आधारों पर आलोचना की जाती है-
1. उत्पादन क्षमता में कमी – यह मानव स्वभाव है कि व्यक्तिगत लाभ की प्रेरणा पर ही वह ठीक प्रकार से कार्य कर सकता है। समाजवादी व्यवस्था में उत्पादन कार्य राज्य के हाथ में आ जाने और सभी व्यक्तियों को पारिश्रमिक निश्चित होने के कारण कार्य करने के लिए प्रेरणा का अन्त हो जाता है और व्यक्ति आलसी बन जाता है। इसी कारण आर्थिक प्रगति रुक जाती है।
2. नौकरशाही का विकास समाजवादी –  व्यवस्था में सभी उद्योगों पर राजकीय नियन्त्रण होगा और उनका प्रबन्ध सरकारी अधिकारियों द्वारा किया जाएगा। सरकारी अधिकारियों के हाथ में शक्ति आ जाने का स्वाभाविक परिणाम नौकरशाही का विकास होगा। काम की गति शिथिल हो जाएगी, सरल-से-सरल काम देर से होंगे और घूसखोरी तथा भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन मिलेगा।
3. समानता की धारणा प्राकृतिक विधान के विरुद्ध – समाजवाद समानता, सबसे प्रमुख रूप में आर्थिक समानता पर बल देता है और आलोचकों के अनुसार समानता का यह विचार प्राकृतिक विधान और प्राकृतिक व्यवस्था के विरुद्ध है। प्रकृति के द्वारा व्यक्तियों को शारीरिक, मानसिक और नैतिक शक्तियाँ समान रूप में नहीं वरन् असमान रूप में प्रदान की गयी हैं और इसी कारण समानता स्थापित करने के किसी भी प्रयत्न में सफलता प्राप्त होमा बहुत अधिक सन्देहपूर्ण है।
4. राज्य की कार्यकुशलता में कमी – समाजवादी व्यवस्था में राज्य के कार्यक्षेत्र में बहुत अधिक विस्तार हो जाने के कारण राज्य की कार्यकुशलता में भी कमी हो जाएगी। समाजवादी व्यवस्था में सार्वजनिक निर्माण सम्बन्धी, उत्पादन, वितरण तथा श्रमिक विधान सम्बन्धी सभी कार्य राज्य द्वारा होंगे। आलोचकों का कथन है कि राज्य के हाथ में इतने अधिक कार्यों के आ जाने से एक भी कार्य ठीक प्रकार से सम्पन्न नहीं हो सकेगा।
5. मनुष्य का नैतिक पतन – सभी कार्यों को करने की शक्ति राज्य के हाथ में आ जाने से आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास, साहस और आरम्भक के नैतिक गुणों का व्यक्तियों में अन्त हो जाएगा। समाजवादी व्यवस्था में उसे अपने विकास की नवीन दिशाएँ और देशाएँ न प्राप्त होने के कारण वह हतप्रभ हो जाएगा और उसका नैतिक पतन हो जाएगा।
6. समाजवादी व्यवस्था अपव्ययी होगी – आलोचके यह भी कहते हैं कि समाजवादी व्यवस्था पूँजीवादी व्यवस्था से बहुत अधिक खर्चीली होगी। जब सरकार के द्वारा किसी प्रकार का कार्य किया जाता है तो एक छोटे-से काम के लिए अनेक कर्मचारी रखे जाते हैं और फिर भी यह कार्य सफलतापूर्वक नहीं हो पाता।
7. व्यक्ति की स्वतन्त्रता के अन्त का भय – समाजवाद के अन्तर्गत जब सरकार के द्वारा बहुत अधिक कार्य किये जाते हैं तो इस बात का भय रहता है कि व्यक्तियों के जीवन में सरकार के इस अत्यधिक हस्तक्षेप से उनकी स्वतन्त्रता का अन्त हो जाएगा।

29.

समाजवाद के दो दोष लिखिए।

Answer»

⦁    सरकार की शक्ति में अधिक वृद्धि तथा
⦁    धर्म का विरोध।

30.

राज्य के कार्यों से सम्बन्धित कौटिल्य के विचारों का विवेचन (उल्लेख) कीजिए। याआचार्य कौटिल्य द्वारा प्रतिपादित राज्य की अवधारण बताइए। कौटिल्य द्वारा प्रतिपादित राज्य सम्बन्धी सप्तांग सिद्धान्त का वर्णन कीजिए।याकौटिल्य के राजनीतिक विचारों का वर्णन कीजिए।

Answer»

कौटिल्य ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रन्थ ‘अर्थशास्त्र में राज्य के कार्यों और राजा के कर्तव्यों का विस्तार से उल्लेख किया है। कौटिल्य प्रजा के सुख को सर्वोपरि मानते हैं। यह उनकी विचारधारा का मूल आधार है। उन्होंने लिखा है-
प्रजा सुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हितो हितम्।
नात्मप्रिये हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्।।
(कौटिल्य अर्थशास्त्र 1:39)
[अर्थात् ‘प्रजा’ के सुख में राजा का सुख है, प्रजा के हित में राजा का हित है। राजा के लिए प्रजा के सुख से अलग अपना कोई सुख नहीं है, प्रजा का प्रिय और हित ही राजा का प्रिय और हित है।]
इसी आधार पर कौटिल्य राज्य के कार्यक्षेत्र तथा राजा के कर्तव्यों की विशद् विवेचना भी करता है। उनके अनुसार राज्य के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं-
1. वर्णाश्रम धर्म को बनाये रखना – कौटिल्य के अनुसार राज्य का एक प्रमुख कार्य वर्णाश्रम धर्म को बनाये रखना और सभी प्राणियों को अपने धर्म से विचलित न होने देना है। प्राचीन भारतीय जीवन के अन्तर्गत चार वर्षों और वर्णाश्रम धर्म की व्यवस्था को स्वीकार किया गया था। कौटिल्य का मत है कि “जिस राजा की प्रजा आर्य मर्यादा के आधार पर व्यवस्थित रहती है, जो वर्ण और आश्रमों के नियमों का पालन करती है और त्रयी (तीन वेद) द्वारा निहित विधान से रक्षित रहती है, वह प्रजा सदैव प्रसन्न रहती है और उसका कभी नाश नहीं होता।”
2. न्याय की व्यवस्था करना – स्वधर्म पालन योजना को कार्यान्वित करने के लिए न्यायव्यवस्था की स्थापना आवश्यक है। इसके दो क्षेत्र होते हैं-
(i) व्यवहार क्षेत्र तथा (ii) कण्टक शोधन क्षेत्र। पहले का सम्बन्ध नागरिकों के पारस्परिक विवादों से है और दूसरे का राज्य के कर्मचारियों व व्यवसायियों से है। निर्णय के लिए कौटिल्य राज्य को अनेक प्रकार के न्यायालयों की स्थापना का परामर्श देता है।
3. दण्ड की व्यवस्था करना – राज्य का दूसरा महत्त्वपूर्ण कार्य दण्ड की व्यवस्था करना है। दण्ड से अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति होती है, उसकी रक्षा होती है, रक्षित वस्तु बढ़ती है और बढ़ी हुई वस्तु का उपभोग होता है। समाज और सामाजिक व्यवहार भी दण्ड पर ही निर्भर होते हैं, इसीलिए दण्ड की व्यवस्था महत्त्वपूर्ण है। इस सम्बन्ध में राजा को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि दण्ड न तो आवश्यकता और औचित्य से अधिक हो और न ही कम। दण्ड देते समय राज्य को अपराधी की सामर्थ्य, अपराधी का वर्ण, अपराधी के सुधार आदि को ध्यान में रखना चाहिए। यथोचित दण्ड देने वाला राजा पूज्य होता है और केवल यथोचित दण्ड ही प्रजा को धर्म, अर्थ तथा काम से परिपूर्ण करता है। यदि दण्ड को उचित प्रयोग नहीं होता तो बलवान निर्बल को वैसे ही खा जाते हैं जैसे बड़ी मछली छोटी मछली को।
4. राज्य की सुरक्षा करना – राज्य का सर्वप्रथम कर्तव्य है कि वह अपनी रक्षा करे, क्योंकि यदि वह स्वयं अपनी रक्षा न कर सका तो वह नष्ट हो जाएगा। अपनी रक्षा हेतु राज्य को समुचित सेना, सुदृढ़ दुर्गों, पुलों आदि की व्यवस्था करनी चाहिए। षाडगुण्य नीति’ के अन्तर्गत राज्य को वैदेशिक सम्बन्धों के संचालन के लिए सन्धि, विग्रह (युद्ध), आसन (तटस्थता), यान (शत्रु पर आक्रमण करना), संश्रय (बलवान का आश्रय लेना) तथा दैवीभाव (सन्धि और युद्ध को एक साथ प्रयोग) को आधार बनाना चाहिए। अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के सफल संचालन हेतु राज्य को साम, दाम, दण्ड, भेद साधनों का अनुसरण करना चाहिए।
5. गुप्तचर की व्यवस्था करना – इस कर्त्तव्य के विधिवत् पालन हेतु राज्य के कर्मचारियों, व्यापारियों आदि के दैनिक व्यवहार पर गुप्तचर व्यवस्था के द्वारा नजर रखता है। विपत्ति के समय राज्य प्रजा की विभिन्न प्रकार से सहायता करता है, जो कि उसका परम कर्तव्य है।
6. लोकहित और सामाजिक कल्याण करना – कौटिल्य राजा को लोकहित और सामाजिक कल्याण के कार्य भी सौंपता है। इसके अन्तर्गत राजा दान देगा और अनाथ, वृद्ध तथा असहाय लोगों का पालन-पोषण करेगा। असहाय गर्भवतियों की उचित व्यवस्था करेगा और उनके बच्चों का पालन-पोषण करेगा। राज्य के अन्य भी कर्तव्य हैं; जैसे—कृषि के लिए बाँध बनाना, जल मार्ग, स्थल मार्ग, बाजार और जलाशय बनाना, दुर्भिक्ष के समय जनता की सहायता करना और उन्हें बीज देना आदि। जो किसान खेती न करके जमीन परती छोड़ देते हों, उनके पास से जमीन लेकर वह खुद किसान को देगा।
राजा के लोकहित और समाज-कल्याण सम्बन्धी इन राज्यों के उल्लेख में कौटिल्य की दूरदर्शिता ही झलकती है। कौटिल्य के अनुसार, खदानें, वस्तुओं के निर्माण, जंगलों में इमली की लकड़ी और हाथियों को प्राप्त करने तथा अच्छी नस्ल के जानवरों को पैदा करने के प्रबन्ध भी राज्य के ही कार्य हैं।
7. आर्थिक प्रबन्ध करना – कौटिल्य के अनुसार, राज्य की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होनी चाहिए और आर्थिक विषयों का प्रबन्ध सुव्यवस्थित रूप में होना चाहिए। राज्य के पास भरा-पूरा कोष और आय के स्थायी स्रोत होने चाहिए। इस सम्बन्ध में कौटिल्य का मत है कि राजा को प्रजा से उपज का छठा भाग लेना चाहिए तथा कोष में बहुमूल्य धातुएँ तथा मुद्राएँ पर्याप्त मात्रा में रखनी चाहिए। कौटिल्य का विचार है कि आवश्यक होने पर राज्य के द्वारा धनवानों पर अधिक कर लगाये जाने चाहिए और इस प्रकार एकत्रित की गयी धनराशि गरीबों में बाँट देनी चाहिए।
8. युद्ध करना – कौटिल्य के अनुसार, युद्ध करना राज्य का प्रमुख कार्य है। कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ का केन्द्र एक ऐसा विजिगीषु (विजय की इच्छा रखने वाला) राजो है जिसका उद्देश्य निरन्तर नये प्रदेश प्राप्त कर अपने क्षेत्र में वृद्धि करना है। कौटिल्य सभी आर्थिक और अन्य संस्थाओं की महत्ता इसी मापदण्ड से निश्चित करता है कि ये राज्य को किस सीमा तक सफल युद्ध के लिए तैयार करती हैं।
कौटिल्य के अनुसार, राजा के द्वारा उपर्युक्त सभी कार्यों को सम्पादन लोकहित की भावना से ही किया जाना चाहिए।
कौटिल्य राजतन्त्र को शासन का एकमात्र स्वाभाविक और श्रेष्ठ प्रकार मानता है। वह राज्य के सात अंगों में राजा को सर्वोच्च स्थिति प्रदान करता है। इतना होने पर भी कौटिल्य का राजा निरंकुश नहीं है। उस पर निम्नलिखित कुछ ऐसे प्रतिबन्ध हैं जिनके कारण वह मनमानी नहीं कर सकता-.

1. अनुबन्धवाद – कौटिल्य के अनुसार, मनुष्यों ने राजा की आज्ञाओं के पालन की जो प्रतिज्ञा की उसके बदले में राजा ने अपनी प्रजा के धन-जन की रक्षा का वचन दिया था। इसीलिए राजा प्रजा के जन-धन को हानि पहुँचाने वाला कोई कार्य नहीं कर सकता। कौटिल्य का मत है कि राजा की स्थिति वेतन-भोगी सैनिकों के समान ही होती है, अर्थात् राजा राजकोष से निश्चित वेतन ले सकता है। उसे मनमाने ढंग से राज्य की सम्पत्ति को व्यय करने का अधिकार नहीं था।
2. धर्म और रीति-रिवाज – कौटिल्य के अनुसार, राजा के अधिकार धर्म और रीति-रिवाज सीमित थे और वह इनका पालन करने के लिए बाध्य था। उसे यह डर रहता था कि राजा द्वारा इन नियमों का उल्लंघन किये जाने पर जनता क्षुब्ध होकर स्वयं ही उसके जीवन का अन्त न कर दे। तत्कालीन जीवन में धर्म और परलोक की भावना बहुत प्रबल होने के कारण नरक को भये भी राजा को मनमानी करने से रोकता था।
3. मन्त्रिपरिषद् – राजा की शक्ति पर मन्त्रिपरिषद् का भी प्रतिबन्ध होता था। उसके अनुसार राजा और मन्त्रिपरिषद् राज्य रूपी रथ के दो चक्र हैं, इसीलिए मन्त्रिपरिषद् का अधिकार राजा के बराबर ही है। मन्त्रिपरिषद् राजा की शक्ति पर नियन्त्रण रख उसे मनमानी करने से रोकती थी।
4. राजा का व्यक्तित्व और उसकी शिक्षा – राजा का व्यक्तित्व तथा उसे प्रदान की गयी शिक्षा भी कौटिल्य के राजा की निरंकुशता पर अत्यन्त प्रभावशाली प्रतिबन्ध है। कौटिल्य ने राजा के लिए अनेक गुण आवश्यक बताये हैं और ऐसा सर्वगुणसम्पन्न राजा अपने स्वभाव से निरंकुश नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त कौटिल्य ने राजा की शिक्षा पर बल देकर उस पर ऐसे संस्कार डालने चाहे हैं कि वह लोकहित के कार्यों में लगा रहे। श्री कृष्णराव ने ठीक ही कहा है कि “कौटिल्य का राजा अत्याचारी नहीं हो सकता, चाहे वह कुछ बातों में स्वेच्छाचारी रहे, क्योंकि वह धर्मशास्त्र और नीतिशास्त्र के सुस्थापित नियमों के अधीन रहता है।”

31.

समाजवाद की कोई दो मान्यताएँ बताइए।

Answer»

⦁    व्यक्ति की अपेक्षा समाज को प्राथमिकता तथा
⦁    उत्पादन के साधनों पर सामाजिक स्वामित्व।

32.

आज ऐशिया आफ्रिका और …………………………. के देश आर्थिक विकास के लिए सक्रिय बने हैं ।(A) रशिया(B) युरोप(C) अन्टार्कटिका(D) लेटिन अमेरिका

Answer»

सही विकल्प है (D) लेटिन अमेरिका

33.

आर्थिक विकास के निर्देशक के रूप में जीवन की भौतिक गुणवत्ता अंक में सुधार के बारे में चर्चा कीजिए ।

Answer»

आर्थिक विकास के निर्देशक के रूप में राष्ट्रीय आय और प्रतिव्यक्ति आय में मर्यादा देखी गयी तब जीवन की भौतिक गुणवत्ता में सुधार को नया निर्देशक स्वीकार किया गया ।

जीवन की भौतिक गुणवत्ता में तीन बातों का समावेश किया जाता है :
(1) शिक्षा का प्रमाण
(2) अपेक्षित औसत आयु
(3) बाल मृत्युदर

(1) शिक्षा का प्रमाण : सामान्य रूप से साक्षरता अर्थात् देश में शिक्षा प्राप्त करनेवाली जनसंख्या के देश में कितनी जनसंख्या प्रतिशत में साक्षर है इसके आधार पर शिक्षा का प्रभाव जान सकते हैं ।
साक्षरता का प्रभाव बढ़ने से व्यक्ति की कुशलता और देश के विकास के लिए अनिवार्य है ।

(2) अपेक्षित औसत आयु : बालक जन्म के समय से कितने वर्ष की आयु जियेगा उसकी अपेक्षा को अपेक्षित औसत आयु कहते है ।
अपेक्षित औसत आयु सामाजिक परिस्थिति और सुख-समृद्धि का प्रतिबिंब है । अपेक्षित औसत आयु में वृद्धि पोषण, स्वास्थ्य तथा पर्यावरणीय परिस्थिति का प्रतिबिम्ब है ।

(3) बाल मृत्युदर : एक वर्ष में प्रति हजार बालकों में से एक वर्ष की आयु से पूर्व मृत्यु पाने बालको की संख्या को बालमृत्युदर कहते हैं ।
बाल मृत्युदर पीने का स्वच्छ पानी, घर का पर्यावरण, महिलाओं की स्थिति, मातृत्व का संवेदनशील प्रतिबंध है ।

जीवन के भौतिक गुणवत्ता अंक की रचना : इन तीनों मापदण्डों के आधार पर प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ने जीवन के भौतिक गुणवत्ता अंक की रचना की । जिसका मूल्य 0 से 100 के बीच होता है ।

34.

आर्थिक विकास के कारण लोगों की ………………………… में परिवर्तन आता है ।(A) पूर्ति(B) जत्था(C) माँग(D) सीमांत आय

Answer»

सही विकल्प है (C) माँग

35.

देश की आर्थिक विकास में वृद्धि होने से …………………….(A) कृषि क्षेत्र का हिस्सा घटता है ।(B) कृषि क्षेत्र का हिस्सा बढ़ता है ।(C) औद्योगिक क्षेत्र का योगदान घटता है ।(D) सेवा क्षेत्र का योगदान घटता है ।

Answer»

सही विकल्प है (A) कृषि क्षेत्र का हिस्सा घटता है ।

36.

HDI में किस वर्ष में सुधार किया गया ?(A) 2009(B) 2011(C) 2008(D) 2010

Answer»

सही विकल्प है (D) 2010

37.

जीवन की भौतिक गुणवत्ता अंक का मूल्य कितना होता है ?(A) 0 से 1 के बीच(B) 0 से 100 के बीच(C) शून्य(D) 100

Answer»

सही विकल्प है (B) 0 से 100 के बीच

38.

मानवविकास अंक किसने प्रस्तुत किया ?(A) UNDP(B) UNO(C) U.S.(D) U.K.

Answer»

सही विकल्प है (A) UNDP

39.

वर्ष 2014 में मानवविकास अंक की गणना में कितने देशों का समावेश किया गया था ?(A) 100(B) 150(C) 188(D) 200

Answer»

सही विकल्प है (C) 188

40.

2014 में मानवविकास अंक की दृष्टि से अंतिम क्रम पर कौन-सा देश था ?

Answer»

2014 में मानवविकास अंक की दृष्टि से अंतिम क्रम पर नाइजीरिया था ।

41.

मानवविकास अंक के महत्त्व की चर्चा कीजिए ।

Answer»

मानवविकास अंक का महत्त्व निम्नानुसार है :

  1. आर्थिक विकास के HDI (Human Development Index) में मात्र आर्थिक ही नहीं सामाजिक कल्याण के शिक्षा और स्वास्थ्य का भी समावेश किया जाता है । इसलिए यह संपूर्ण है ।
  2. HDI आर्थिक नीति निर्धारित करनेवालों को सूचित करता है कि आर्थिक विकास साधन है । और मानव कल्याण यह अंतिम उद्देश्य है ।
  3. HDI देश की सच्ची प्रगति को दर्शाती है क्योंकि इसमें आर्थिक और सामाजिक दोनों प्रगति होती है ।
  4. HDI का अंक विधेयात्मक (सकारात्मक) है । HDI में वृद्धि हो तो देश में शिक्षा और स्वास्थ्य में भी सुधार हो रहा है । ऐसा सूचित करता है ।
  5. HDI अंक से विकासशील देशों में कहाँ विकास की संभावना है । कहाँ सरकार को कार्य करना है इसका ख्याल आता है ।
  6. HDI का अंक अधिक प्रगतिशील संकल्पना है ।
42.

मानवविकास अंक (HDI) की मर्यादाओं की चर्चा कीजिए ।

Answer»

मानवविकास अंक की मर्यादाएँ नीचे देख सकते हैं :

  1. HDI में मात्र दो ही सामाजिक निर्देशकों का समावेश किया जाता है, जो कम हैं । दूसरे सामाजिक निर्देशकों को समाविष्ट करना चाहिए ।
  2. HDI में तीनों निर्देशकों को समान महत्त्व दिया जाता है । वास्तव में अलग-अलग परिस्थिति में अलग-अलग महत्त्व होता है ।
  3. मानवविकास अंक निरपेक्ष स्थिति को दर्शाता नहीं है । कोई एक देश अन्य देशों की तुलना में किस स्थान पर है वह दर्शाता है, जिससे मात्र सापेक्ष प्रगति का ही ख्याल आता है ।
43.

जीवन की भौतिक गुणवत्ता अंक की मर्यादाओं को संक्षिप्त में समझाइए ।

Answer»

जीवन की भौतिक गुणवत्ता अंक मानव की भौतिक सुख-समृद्धि का निर्देशक है । इसलिए उसे आर्थिक विकास का उचित निर्देशक माना गया है । परंतु जीवन की भौतिक गुणवत्ता अंक में भी कुछ मर्यादाएँ हैं जो आर्थिक विकास को निर्देशित नहीं करती हैं, जैसे :

  • अन्य मापदण्डों की अवगणना : जीवन की भौतिक गुणवत्ता अंक में साक्षरता, औसत आयु और बाल मृत्युदर को ही ध्यान में लिया गया है । इन तीन बातों से ही देश के विकास को नहीं जाना जा सकता है । इसलिए अन्य मापदण्डों को भी ध्यान में लेना चाहिए ।
  • मात्र औसत दर्शाता है : तीनों निर्देशकों से प्राप्त अंक को तीन से भाग देने पर प्राप्त अंक PQLI है । जो औसत है । औसत से देश की तीनों बातों में अग्रिमता या पिछड़ापन नहीं कह सकते । औसत से उचित निर्णय नहीं ले सकते हैं ।
  • सामान्यीकरण संभव नहीं : किसी देश का वर्तमान PQLI की दर अधिक हो, तो देश का विकास दूसरे देशों से अधिक है। ऐसा सामान्यीकरण संभव नहीं है ।
  • आवक वृद्धि की उपेक्षा : जीवन की भौतिक गुणवत्ता अंक में आवक वृद्धि भी महत्त्वपूर्ण होती है । परंतु उसकी उपेक्षा की गयी हैं । जो उचित नहीं है ।
  • धनिक देशों की मर्यादा : धनिक देशों की PQLI बढ़ने की गति धीमी होती है कारण कि औसत आयु अमुक सीमा के बाद बढ़ाना संभव नहीं है । इसलिए ऐसा नहीं कह सकते हैं कि धनिक देशों का विकास स्थिर है ।
44.

जीवन की भौतिक गुणवत्ता अंक (PQLI) के महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष की चर्चा कीजिए ।

Answer»

जीवन की भौतिक गुणवत्ता अंक (PQLI – Physical Quality Life Index) के महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निम्नानुसार हैं :

  1. जीवन की भौतिक गुणवत्ता अंक का मूल्य 0 से 100 के बीच होता है ।
  2. जिस देश का PQLI अंक 100 के नजदीक होगा तो उस देश की शिक्षा, औसत आयु एवं बालमृत्युदर का कार्य उत्तम है ।
  3. जो देश PQLI अंक 0 के नजदीक वह इन तीनों में कनिष्ठ है ।
  4. PQLI के आधार पर दो देश या दो राज्यों की तुलना कर सकते हैं ।
  5. PQLI का अंक अधिक तो उस देश का आर्थिक विकास अधिक हुआ माना जाता है ।
  6. PQLI का अंक कम उस देश का आर्थिक विकास नीचा गिना जाता है ।
45.

जीवन की भौतिक गुणवत्ता अंक की रचना किस अर्थशास्त्री ने की ?(A) मोरिस डेविस(B) थोमस माल्वस(C) मार्शल(D) मेकलप

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सही विकल्प है (A) मोरिस डेविस

46.

2014 में मानवविकास अंक की दृष्टि से विश्व में प्रथम क्रम पर कौन-सा देश था ?

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2014 में मानवविकास अंक की दृष्टि से विश्व में प्रथम क्रम पर नोर्वे था ।

47.

 पाकिस्तान की प्रतिव्यक्ति आय ………………………… ।(A) 6648 डॉलर(B) 6468 डॉलर(C) 4866 डॉलर(D) 580 डॉलर

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सही विकल्प है (C) 4866 डॉलर

48.

जीवन की भौतिक गुणवत्ता अंक में साक्षरता का प्रमाण, अपेक्षित आयु एवं बालमृत्युदर इन्ही तीन निर्देशकों का समावेश क्यों होता है ?

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जीवन की भौतिक गुणवत्ता अंक में साक्षरता, अपेक्षित आयु एवं बालमृत्युदर इन्ही तीन निर्देशकों का ही निम्नलिखित कारणों से समावेश किया जाता है ?

  1. इन तीन निर्देशकों के विश्वसनीय अंक प्रत्येक देश में से प्राप्त कर सकते हैं ।
  2. यह तीनो निर्देशक मात्र प्रयत्न नहीं परिणाम को दर्शाते हैं ।
  3. यह तीनों निर्देशक वस्तुलक्षी होने कार्य की तुलना के लिए उचित मापदण्ड उपलब्ध कराते हैं ।
49.

राष्ट्रीय आय की तुलना में प्रतिव्यक्ति आय का मापदण्ड किस लिए अधिक श्रेष्ठ है ?

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राष्ट्रीय आय आर्थिक विकास का उचित निर्देशक हैं । परंतु राष्ट्रीय आय की वृद्धिदर जनसंख्या वृद्धिदर से कम हुयी तो प्रतिव्यक्ति आय कम हो जाएगी और लोगों के जीवनस्तर पर विपरीत असर पड़ेगा । प्रतिव्यक्ति आय में आय के साथ जनसंख्या को भी ध्यान में लिया जाता है । इसलिए प्रतिव्यक्ति आय के बढ़ने से लोगों के जीवनस्तर में सुधार होगा । इसलिए उचित निर्देशक है ।

50.

‘समूह मन के सिद्धान्त (Group-mind Theory) के प्रतिपादक कौन हैं ?

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समूह मन के सिद्धान्त’ (Group-mind Theory) के प्रतिपादक मैक्डूगल हैं।