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This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.

1.

 ____ is known as the Queen of the Arabian Sea. (a) Cochin (b) Mumbai(c) Mangalore (d) Surat

Answer»

Cochin is known as the Queen of the Arabian Sea.

2.

In a triangle A,B,C if 3angle A=4angle B=6angle C,then angle A, angle B, angle C areA) 70°,70°,40°B) 80°,60°,40°C) 60°,60°,60°D) 75°,45°,60°

Answer»

Given: 
In ∆ABC , 3∠A= 4∠B= 6∠C

Let x= 3∠A= 4∠B= 6∠C

x=3∠A
∠A= x/3

x=4∠B
∠B= x/4

x=6∠C
∠C= x/6

By angle sum property

∠A+∠B+∠C= 180°
Put the value of ∠A, ∠B, ∠C 
x/3+x/4+x/6= 180°
L.c.m of 3,4,6 = 12

(4x + 3x +2x) /12 = 180°
9x = 12 × 180
x= (12× 180) /9
x= 240°

∠A= x/3
∠A= 240/3 = 80°

∠B= x/4
∠B= 240/4= 60°

∠C= x/6
∠C= 240/6 = 40°
_____________________________
Hence the angles be 
∠A=80°
∠B=60°
∠C= 40°

3.

If positive integers satisfying: (l+x)(l+y)=4y   (l+y)(l+z)=4z(l+z)(l+x)=4x then the value of 2x+3y+4z+x²+y²+z⁴ is 

Answer»

All equations (1 + x)(1 + y) = 4y

(1 + y) (1 + z) = 4z

(1 + z) (1 + x) = 4x

will satisfy by x = y = z = 1

\(\therefore\) 2x + 3y + 4z + x2 + y3+z4 

 = 2 + 3 + 4 + 1 + 1 + 1 = 12

4.

निबन्ध : दीपावली

Answer»

हिन्दुओं के चार प्रमुख त्योहार हैं– दशहरा, रक्षाबन्धन, दीपावली तथा होली किन्तु इन चारों में दीपावली का विशेष महत्त्व है। यह त्याहार सारे देश में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। जैसा कि दीपावली शब्द से ही स्पष्ट है कि इस दिन घरों, बाजारों और सड़कों को दीपकों की पंक्तियों से प्रकाशित किया जाता है। यह त्योहार कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है। कई सप्ताह पूर्व से ही घरों की सफाई की जाती है तथा चूने से पोता जाता है। मुख्य त्योहार से दो दिन पूर्व धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध किया था। अमावस्या के दिन प्रात:काल से ही विशेष चहल-पहल प्रारम्भ हो जाती है। स्त्रियाँ घरों में भाँति-भंति के पकवान तैयार करती हैं। दुकानदार अपनी दुकानों को विशेष रूप से सजाते हैं। इस दिन मिठाई की तो विशेष बक्री होती है। हलवाई अपनी दुकानों को मिठाइयों तथा चित्रों से अच्छी प्रकार सजाते हैं। इस दिन बच्चों को तो विशेष आनन्द प्राप्त होता है। कोई फुलझड़ी लाता है तो कोई बल्ब, खिलौना, बताशे और कंडील लाता है।

रात्रि को श्रीगणेश-लक्ष्मीजी का पूजन होता है और प्रकाश किया जाता है। स्वच्छ लिपे-पुते मकानों में जब दीपमालिका जगमगाती है तो उनकी शोभा बहुत बढ़ जाती है। कोई रंग-बिरंगे कंडीलों में दीपक जलाता है, तो कोई रंग-बिरंगे विद्युत बल्बों द्वारा प्रकाश करता है। इस दिन सारे नगर की शोभा दर्शनीय होती है। | इस त्योहार के सम्बन्ध में प्रसिद्ध है कि भगवान श्री राम रावण को मारकर अयोध्या वापस लौटे, तो लोगों ने उनके स्वागत में दीपक जलाए थे। तब से अब तक यह त्योहार मनाया जाता है। कुछ लोगों का मत है कि वामन भगवान ने इस दिन राजा बलि को पाताल भेजा था, उन्हीं की स्मृति में दीपक जलाकर दीपावली मनाई जाती है। वास्तव में यह त्योहार प्रसन्नता और नया उत्साह प्रदान करता है।

दीपावली के दिन गोवर्धन का पर्व मनाया जाता है। इस दिन गौवंश की उन्नति के लिए उनकी सेवा की जाती है तथा मन्दिरों में भगवान को भोग लगाया जाता है। इसके अगले दिन ‘भैया दूज’ का त्योहार मनाया जाता है। बहन-भाई के माथे पर मंगल-कामना के लिए भगवान से प्रार्थना करती है। इस प्रकार लगातार पाँच दिन तक चारों ओर आनन्द छाया रहता है।

दीपावली भारत का एक विशेष त्योहार है। इस त्योहार के बहाने घर के प्रत्येक भाग की सफाई हो जाती है। वर्षा ऋतु में जो छोटे-छोटे कीड़े उत्पन्न हो जाते हैं वे लिपाई-पुताई में नष्ट हो जाते हैं। दीपकों का प्रकाश अनेक बीमारियों के कीटाणुओं को नष्ट कर देता है। इसके अतिरिक्त पाँच दिन तक व्यक्ति अपनी सभी चिन्ताओं को भूल जाता है तथा आनन्द से दिन व्यतीत करता है। इस दिन बहुत से लोग जुआ भी खेलते हैं। इस कुप्रथा को रोकना अत्यन्त आवश्यक है। इसके अतिरिक्त कुछ लोग फुलझड़ी तथा पटाखे आदि भी छोड़ते हैं। इससे धन का तो अपव्यय होता ही है, किन्तु कभी-कभी आग भी लग जाती है। कभी-कभी बच्चे पटाखों से जल भी जाते हैं। अतः इसे रोकना भी अत्यन्त आवश्यक है।

हमें अपने इस त्योहार के वास्तविक महत्त्व को समझना चाहिए तथा उसे उचित रीति से मनाना चाहिए। दीपावली का वास्तविक महत्त्व जुआ खेलने तथा पटाखे छुटाने से स्पष्ट नहीं होता है अपितु हमें चाहिए कि इस दिन प्रेमपूर्वक रहने की प्रतिज्ञा करें तथा सभी प्रसन्नतापूर्वक रहें।

5.

निबन्ध : दशहरा (विजयादशमी)

Answer»

हमारे प्रत्येक त्योहार को किसी-न-किसी ऋतु के साथ सम्बन्ध रहता है। विजयादशमी शरद् ऋतु के प्रधान त्योहारों में एक है। यह आश्विन मास की शुक्लपक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन श्री राम ने लंकापति रावण पर विजय पाई थी। इसलिए इसको विजयादशमी कहते हैं।

भगवान श्री राम के वनवास के समय में रावण छल से सती जी को हर कर ले गया था। राम ने हनुमान सुग्रीव आदि मित्रों की सहायता से लंका पर आक्रमण किया तथा रावण को मारकर लंका पर विजय पाई। तभी से यह दिन इस त्योहार के रूप में मनाया जाता है।

वस्तुतः विजयादशमी का त्योहार पाप पर पुण्य की, अधर्म पर धर्म की, असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक है। भगवान श्री राम ने अत्याचारी और दुराचारी रावण का विध्वंस कर भारतीय और उसकी महान परम्पराओं की पुनः प्रतिष्ठा स्थापित की थी।

इसके अतिरिक्त इस दिन को और भी महत्त्व है। वर्षा ऋतु के कारण क्षत्रिय राजा तथा व्यापारी अपनी यात्रा स्थगित कर देते थे। क्षत्रिय अपने-अपने शस्त्रों को बन्द करके रख देते थे और शरद् ऋतु के आने पर निकालते थे। शस्त्रों की पूजा करते थे और उन्हें तेज करते थे। व्यापारी माल खरीदते हैं और वर्षा ऋतु के अन्त . में बेचने को चल पड़ते थे। उपदेशक तथा साधु-महात्मा धर्म प्रचार के लिए अपनी यात्री को निकल पड़ते है।

दशहरा श्रीरामलीला का अन्तिम दिन होता है। भिन्न-भिन्न स्थानों में अलग-अगल प्रकार से यह दिन मनाया जात है। बड़े-बड़े नगरो में रामायण के पात्रों की झाँकियाँ निकाली जाती हैं। दिल्ली तथा कुल्लू का दशहरा प्रसिद्ध है। दशहरे के दिन रावण, कुम्भकर्ण तथा मेघनाद के कागज के पुतले बनाए जाते हैं। सायंकाल राम और रावण के दलों में कृत्रिम लड़ाई होती है। श्रीराम रावण को मार देते हैं। रावण आदि के पुतले जलाए जाते हैं। लोग मिठाइयाँ तथा खिलौने लेकर घरों को लौटते हैं।

यदि उचित ढंग से इस त्योहार को मनाया जाए तो आशातीत लाभ हो सकता है। श्री राम के जीवन पर प्रकाश डालें तथा उस समय का इतिहास याद रखें। इस प्रकार दशहरा हमें उन गुणों को धारण करने का उपदेश देता है जो श्री राम में विद्यमान थे।

6.

Find the complement of expression, F=x+x z+x y 

Answer» (x+xz+xy)' = x'.(xz)'.(xy)' = x'.(x'+z').(x'+y')
7.

निबन्ध : यात्रा का वर्णन

Answer»

रूपरेखा- यात्रा की तैयारियाँ और आरम्भ, स्टेशन के टिकटघर और प्लेटफार्म का दृश्य, गाड़ी का आगमन, मार्ग के दृश्यों का वर्णन, स्टेशनों का आना में भीड़ को उतरना-चढ़ना, दिल्ली के स्टेशन का वर्णन, मेरे अनुभव, उपसंहार।

इस वर्ष 10 मई को हमारे विद्यालय की वार्षिक परीक्षाएँ समाप्त हुई। 14 मई को मेरे मामा जी का दिल्ली से पत्र आया। उन्होंने मेरे लिए लिखा था कि परीक्षा समाप्त होते ही तुम दिल्ली आ जाओ। मुझे पत्र पढ़कर बहुत प्रसन्नता हुई। मैंने पिता जी से दिल्ली चलने का आग्रह किया, वे भी राजी हो गए और हमने 21 मई को दिल्ली चलने का निश्चय कर लिया। 18 मई से ही मैंने तो अपने कपड़े और सामान इकट्ठा करना प्रारम्भ कर दिया और 21 मई को सुबह 8 बजे हम लोग अपने नगर हापुड़ के रेलवे स्टेशन पर जा पहुँचे।

रेलवे स्टेशन के बाहर ही टिकट घर बना हुआ था। वहाँ पर टिकट खरीदने वाले यात्रियों की लम्बी पंक्ति बनी हुई थी। मेरे पिता जी उस पंक्ति में पीछे जा खड़े हुए। थोड़ी देर में उन्हें भी टिकट मिल गया और हम लोग प्लेटफॉर्म पर आ गए, यहाँ पर बड़ी भीड़ थी। कुछ लोग इधर से उधर घूम रहे थे। कुछ अपने सामान के साथ बैठे हुए थे और कुछ चाट-पकौड़ी खा रहे थे। खौंमचे वाले, पापड़ वाले, बर्फ वाले और सिगरेट-पान वाले इधर-से-उधर आ जा रहे थे। इतने में टन-टन की घण्टी बजी और थोड़ी देर बाद धड़-धड़ाती हुई ट्रेन स्टेशन पर आकर रुक गई। ट्रेन में पहले ही हजारों यात्री बैठे हुए थे। ट्रेन के रुकते ही सैकड़ों यात्री उतर पड़े और सैकड़ों ही उसमें बैठ गए। हम भी एक डिब्बे में जाकर बैठ गए।

थोड़ी देर बाद गाड़ी चल दी। गर्मी के दिन थे। सुबह की ठण्डी-ठण्डी हवा बड़ी अच्छी लग रही थी। दूर तक चारों ओर खेत साफ दिखाई देने लगे थे। जगह-जगह पर कटे हुए अन्न के ढेर लगे हुए थे। कहीं-कहीं किसान अनाज को काटते भी मिले। कोई बीस मिनट के बाद ही गाड़ी पिलखुआ के स्टेशन पर आकर रुक गई। यहाँ पर अनेक यात्री उतरे और चढे। पिलखुआ एक छोटा-सा स्टेशन है। यहाँ तीन मिनट रुकने के बाद गाड़ी फिर छुक-छुक करती हुई आगे चली। यहाँ से एक सामान नीलाम करने वाला व्यक्ति भी हमारे डिब्बे में आ गया। उसने नए-नए ताले, टार्च, कैंची आदि नीलामी की और खूब सामान बेचा। इतने में ही गाजियाबाद आ गया। यहाँ का स्टेशन बहुत बड़ा था। गाड़ी रुकते ही पान, बीड़ी, सिगरेट, हलवा, पूड़ी आइसक्रीम और चाय बेचने वाले आ गए। यहाँ स्टेशन पर यात्रियों की बड़ी भीड़ थी। दिल्ली को जाने वाले हजारों यात्री खड़े हुए थे। ट्रेन के रुकते ही यात्री डिब्बे की ओर झपट पड़े, बड़ी धक्का-मुक्की हुई। हमारे डिब्बे में तो एक साथ इतने यात्री आ गए कि उसमें पाँव रखने की भी जगह नहीं रही। कोई पाँच मिनट बाद गाड़ी यहाँ से चल दी और हम सबने चैन की साँस ली।

धीरे-धीरे हम दिल्ली की ओर बढ़े। शाहदरा आया और हमारी गांड़ी आगे बढ़ती गई। यमुना जी के पुल के आते ही सभी का ध्यान उस ओर चला गया। यह पुल बहुत ही बड़ा है। नीचे यमुना-जल बह रहा था। उसके बीच में मोटर, ताँगे और पैदल चलने वालों के लिए पुल बना था तथा उसके ऊपर से हमारी ट्रेन धड़-धड़ाती हुई चली आ रही थी।

इस समय लगभग 10 बज चुके थे, गर्मी काफी हो गई थी। उधर डिब्बे में यात्रियों की भीड़ बहुत थी। मेरा मन दिल्ली देखने के लिए उतावला हो रहा था कि पिता जी कहने लगे कि सामान सँभालो, स्टेशन आने वाला है। हमने अपना सामान सँभाला और गाड़ी स्टेशन पर आकर रुक गई। यात्रियों की भीड़ गाड़ी में से उतर पड़ी। पिता जी ने तुरन्त ही कुली को आवाज दी। शीघ्र ही एक कुली आ गया। उसने हमारा सभी सामान डिब्बे से उतारा और स्टेशन के बाहर तक पहुँचा दिया। वहाँ जाकर हमने एक ताँगा किराए पर लिया और मार्ग के दृश्यों को देखते हुए अपने मामा जी के घर पहुँच गए यह मेरी प्रथम रेल यात्रा थी जिसे मैं कभी नहीं भूल सकता।

8.

निबन्ध : होली

Answer»

हिन्दुओं के चार प्रमुख त्योहार माने जाते हैं- दशहरा, होली, दीपावली और रक्षाबन्धन। इसमें होली मस्ती और प्रसन्नता का त्योहार है। यह त्योहार सारे देश में बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। सभी जातियों के लोग इसे बड़ी प्रसन्नतापूर्वक मनाते हैं। | होली का त्योहार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। पूर्णिमा के दिन किसी बड़े चौक में ईंधन का ढेर लगा दिया जाता है। रात्रि में इसका पूजन होता है और इसमें आग लगा दी जाती है। सभी लोग इस आग में जौ की बालिया भूनते हैं और एक दूसरे से गले मिलते है। होली जलने के दूसरे दिन होली खेली जाती है। सुबह से ही चारों ओर रंग की फुहारें उड़ने लगती है। लाल गुलाल से सबके मुँह सँग दिए जाते हैं। सुबह से ही चारों ओर व्यक्ति एक-दूसरे पर रंग डालते हैं और प्रेम से एक-दूसरे से गले मिलते हैं। दोपहर को लगभग दो बजे तक यही कार्यक्रम चलता रहता है। इसके बाद लोग नहा-धोकर नए कपड़े पहनकर बाहर निकलते हैं और सारा दिन बड़ी हँसी-खुशी के साथ व्यतीत करते हैं।

होली के त्योहार के सम्बन्ध में अनेक कहानियाँ कही जाती हैं। कुछ लोग कहते हैं कि संवत् के बदलने की खुशी में यह त्योहार मनाया जाता है। कुछ लोगों के अनुसार इसी दिन हिरण्यकश्यप की बहन होलिका, भक्त प्रहलाद को लेकर आग में बैठ गई थी किन्तु भगवान की कृपा से प्रहलाद बच गया और होलिका जल गई। इसी स्मृति में आज भी होली जलाई जाती है। कुछ भी हो, यह त्योहार हँसी-खुशी में भरपूर होता है।

होली का त्योहार आज जिस ढंग से मनाया जाता है, उसमें सुधारों की भी आवश्यकता है। हमें होली इस प्रकार खेलनी चाहिए जिससे दूसरों को भी प्रसन्नता हो। किसी को भी दुःख नहीं होना चाहिए। होली में ईंधन के लिए किसी के भी साथ हठ नहीं करनी चाहिए। बहुत से व्यक्ति रंग के स्थान पर कीचड़ मिट्टी आदि का प्रयोग करते है, इससे हानि होती है, ऐसा कभी नहीं करना चाहिए। अतः इनसे बचना चाहिए तथा अपने इस त्योहार को हँसी-खुशी के साथ मनाना चाहिए।

वास्तव में होली के त्योहार का बहुत महत्त्व है। यह त्योहार एकता और भाई-चारे को बढ़ाने वाला है। अतः हमें इसे इसी रूप में मनाना चाहिए तथा प्रेमपूर्वक एक दूसरे से मिलना चाहिए।

9.

Find maximum and minimum value of sin2x+5 from second derivative test

Answer»

f(x)=sin 2x+5

We know that,

-1≤sinӨ≤1

-1≤sin2x≤1

Adding 5 on both sides,

 -1+5≤sin2x+5≤1+5

4≤sin2x+5≤6

Hence 

Max value of f(x)=sin2x+5 will be 6

Min value of f(x) =sin2x+5 will be 4

10.

निबन्ध : मेले का वर्णन

Answer»

प्रत्येक देश में मेले अति प्राचीनकाल से लगते आए हैं। प्राचीनकाल में मनुष्यों ने आपस में मिलने-जुलने और प्रसन्न होने के लिए मेलों की योजना बनाई थी। मेलों में दूर-दूर से मनुष्य आते हैं। कोई तमाशा देखने आता है तो कोई सामान खरीदने आता है। कोई पैसा कमाने आता है तो कोई खर्च करने आता है। प्रायः प्रत्येक मेले में खूब भीड़ इकट्ठी हो जाती है।

हमारे नगरों में भी प्रतिवर्ष प्रदर्शनी का आयोजन किया जाता है। इस प्रदर्शनी का आयोजन नगर के सभी बड़े अधिकारी मिलकर करते हैं। इस प्रदर्शनी में चौबीस घण्टे बड़ी चहल-पहल रहती है। जब हम प्रदर्शनी देखने पहुँचे तो देखते हैं कि मेले के मुख्य द्वार से पहले ही काफी दूर तक दुकानें सजी हुई थीं। सड़क के किनारे-किनारे खिलौने वाले तथा तमाशे वाले बैठे हुए थे। छोटे-छोटे बच्चे बाहर इधर-से-उधर आ-जा रहे थे। कोई खिलौने खरीद रहा था तो कोई पकौड़ियाँ ले रहा था। धीरे-धीरे हम भी आगे बढ़े। जैसे-जैसे हम मेले की ओर बढ़ते जाते थे, वैसे-वैसे भीड़ भी बढ़ती जा रही थी। धीरे-धीरे हम लोग प्रदर्शनी के मुख्य द्वार पर पहुँच गए। मुख्य द्वार को हजारों बर; से सजाया गया था। भीड़ के कारण बड़ी कठिनाई से हम लोग मुख्य द्वार के अन्दर प्रवेश कर मेले के मुख्य बाजार में पहुँचे। वहाँ पर भी अपार भीड़ थी। दोनों ओर खिलौने वाले तथा अनेक छोटे बड़े दुकानर अपनी दुकानें सजाए बैठे थे।

थोड़ी दूर आगे चलकर यह मुख्य बाजार चार भागों में विभाजित हो गया। यहं जाकर भीड़ भी कुछ कम हो गई थी। अतः यहाँ हमने भली प्रकार दुकानें देखीं। एक बाजार । चूड़ियों की बड़ी दुकानें थी जिसमें विद्युत् के बड़े बड़े बल्ब चकाचौंध पैदा कर रहे थे। दूसरे बाजार में सन्दूक व र इ के सामान वाली दुकानें थीं तो तीसरे बाजार में कपड़े के व्यापारी थे। इन चारों बाजारों को मिलाकर एक शाल मुख्य बाजार बनाया गया था, जो सारी प्रदर्शनी का मुख्य आकर्षण केन्द्र था। इस बाजार की शोभः का तो कहना ही क्या। इसमें असंख्य बल्ब जगमगाते दिखाई दे रहे थे। सारे बाजार के बीच-बीच में चौव सजे थे, जिनमें फौव्वारे और त्रिमूर्ति आदि बने हुए थे।

इस प्रकार घूमते हुए हम लोग प्रदर्शनी के मुर। पंडाल में जा पहुँचे। वहाँ पर उस दिन कवि-सम्मेलन का आयोजन किया गया था। टिकट लेकर हमने की शोभा भी देखी। वहाँ पर प्रत्येक श्रेणी के टिकट वालों के लिए बैठने के अलग-अलग स्थान नियत थे। रात्रि के दस बजे कवि सम्मेलन प्रारम्भ हुआ। सभी कवियों ने अपनी सरस कविताएँ सुनाईं। अधिकतर कविताएँ देश-प्रेम तथा समाज सुधार से सम्बन्धित थीं। रात्रि के डेढ़ बजे के लगभग कवि सम्मेलन समाप्त हुआ। हम लोग उस समय काफी थक चुके थे। अतः वापस घर की ओर चल पड़े। ठीक डेढ़ बज चुका था। फिर भी लागे मेले में आ-जा रहे थे। सभी बाजारों को धीरे-धीरे पार करते हम अपने स्थान को लौट आए। यह प्रदर्शनी जहाँ सबका मनोरंजन करती है, वहाँ इसका व्यापारिक तथा सामाजिक महत्त्व भी है। यहाँ पर दूर-दूर के व्यापारी अपनी-अपनी वस्तुएँ लेकर आते हैं। बच्चों के लिए तो यह मेला विशेष आकर्षक का केन्द्र बना रहता है। खोमचे वाले, तमाशे वाले, झूले वाले तथा सैकड़ों प्रकार के खेल-तमाशे वाले बच्चों की भीड़ को आकर्षित किए रहते हैं। इस प्रकार मेलों का मानव जीवन में निजी महत्त्व है। बच्चे, युवक तथा बूढ़े सभी को अपनी मनोनुकूल वस्तुएँ यहाँ मिल जाती हैं। इसीलिए सभी इसमें प्रसन्नतापूर्वक भाग लेते हैं।

11.

(ii) \( 12-31 / 2 \)

Answer»
=12-(31/2)
=12-15.5
=-3.5

=12*2/2 -31/2

=24-31/2

=7/2

=3.5

12.

Binary number

Answer»

A binary number system is one of the four types of number system. In computer applications, where binary numbers are represented by only two symbols or digits, i.e. 0 (zero) and 1(one). The binary numbers here are expressed in the base-2 numeral system. For example, (101)2 is a binary number.

13.

Ag

Answer»

A binary number system is one of the four types of number system. In computer applications, where binary numbers are represented by only two symbols or digits, i.e. 0 (zero) and 1(one). The binary numbers here are expressed in the base-2 numeral system. For example, (101)2 is a binary number.

14.

निबन्ध : फुटबॉल मैच का वर्णन

Answer»

शरीर को स्वस्थ रखने के लिए खेलना भी अत्यन्त आवश्यक है। इस सम्बन्ध में एक कहावत भी प्रसिद्ध है-“स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करती है।” छात्रों को स्वस्थ और बलवान बनाने के लिए ही विद्यालयों में अनेक प्रकार के खेल-खिलाए जाते हैं। इन मैचों से आपस में मिलकर काम करने की भावना तथा खेलों के प्रति रुचि जाग्रत् हो जाती है।

हमारे विद्यालय में 11 मई, 2002 को एक फुटबॉल मैच हुआ था। यह मैच हमारे विद्यालय की टीम और राजकीय माध्यमिक विद्यालय की टीम के बीच खेला गया। इस मैच को देखने के लिए सैकड़ों छात्र दूर-दूर से आए थे। मैच चार बजे शुरू होने वाला था। समय से पहले ही हजारों दर्शक मैदान के चारों ओर इकट्ठा हो गए थे। आज तो खेल का मैदान भी बड़ा साफ दिखाई दे रहा था।

लगभग चार बजे दोनों दल मैदान में उतर पड़े। दोनों दलों के खिलाड़ियों ने अलग-अलग रंग की कमीजें पहन रखी थीं। दोनों दलों के कप्तानों ने अपने-अपने खिलाड़ियों को ठीक-ठीक स्थान पर खड़ा कर दिया। एक-एक खिलाड़ी गोल के पास भी खड़ा कर दिया गया। ठीक चार बजे रेफरी ने सीटी बजाई और खेल आरम्भ हो गया। पूरे मैदान में दौड़-सी लग गई। जिधर भी गेंद जाती थी, उधर से ही धम-धम की आवाजें आने लगती थीं। गेंद बड़ी तेजी से कभी इधर जाती थी तो कभी उधर जाती थी। दोनों ओर के गोल रक्षक बड़े ही फुर्तीले थे। यदि कोई खिलाड़ी गोल को गोल के पास ले भी जाता था तो गोल रक्षक बड़े कौशल से उसे वापस लौटा देता था। दर्शक ताली बजा-बजाकर खिलाड़ियों को उत्साह बढ़ा रहे थे। सबकी दृष्टि राजकीय माध्यमिक विद्यालय के कप्तान पर जमी हुई थी। उसमें तो बिजली जैसी फुर्ती थी। जब वह गेंद को लेकर आगे बढ़ता था तो दर्शक उछल पड़ते थे। एक बार हमारे विद्यालय का होनहार खिलाड़ी राजेन्द्र सिंह गेंद को लेकर आगे बढ़ा। वह गोल के पास तक जा पहुँचा। दूसरे दल के खिलाड़ियों के तो छक्के छूटे गए किन्तु उसी समय रेफरी ने लम्बी सीटी बजाकर अल्पावकाश की सूचना दी। खेल थोड़ी देर के लिए रोक दिया गया।

सभी खिलाड़ियों को जलपान कराया गया। खिलाड़ियों ने खेल के बारे में नई योजनाएँ बनाईं और कोई दस मिनट बाद फिर खेल शुरू हो गया। अबकी बार खिलाड़ी बड़े उत्साह से खेल रहे थे। हमारी टीम के कप्तान ने दूसरे दल के गोल के पास गेंद ले जाकर गोल करना चाही किन्तु गोल रक्षक ने गेंद को रोक दिया। गोल होते-होते बच गया। उसी समय एक खिलाड़ी के पैर की एक ही चोट से गेंद मैदान के दूसरे किनारे पर आ पहुँची और उधर एकदम हलचल सी मच गई। विपक्षी तो अवसर की तलाश में थे ही। एक खिलाड़ी ने ‘चक्र’ में जाकर ऐसा ‘किक’ मारा कि बेचारा गोल रक्षक भी देखता ही रह गया। चारों ओर से ‘गोल-गोल’ की आवाजें आने लगीं। सभी दर्शक प्रसन्नता से उछल पड़े।

तुरन्त ही गेंद को फिर बीच में लाया गया और खेल फिर शुरू हो गया। दर्शक चारों ओर से खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ा रहे थे और खेल की प्रशंसा कर रहे थे। हमारे विद्यालय के खिलाड़ी गेंद को उतारने के लिए जी जान से प्रयत्न कर रहे थे किन्तु विपक्षी तो लोहे की दीवार बने हुए थे। फुटबॉल तेजी से नाचने लगी किन्तु गोल न हो सका। ठीक साढे पाँच बजे रेफरी ने सीटी बजाई और मैच समाप्त हो गया।

विजयी टीम के खिलाड़ियों को दर्शकों ने गोदी में उठा लिया। दोनों टीमों के खिलाड़ियों को एक-एक टी-शर्ट इनाम में दी गई और विजयी टीम को ‘टी-सेट व मेडल’ प्रदान किया गया। विद्यालय के प्रधानाचार्य महोदय ने दोनों ओर के खिलाड़ियों को धन्यवाद दिया और सभी प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने घरों को लौट गए।

15.

निबन्ध : भारतीय किसान

Answer»

हमारे दैनिक जीवन में काम आनेवाली वस्तुओं का मूलाधार कृषि ही है। हमारा भोजन, वस्त्र तथा फल-फूल आदि हमें सभी कुछ कृषि से ही प्राप्त होता है। हमारे देश की जनसख्या का 70% भाग कृषि-कार्य करके अपनी आजीविका कमाता है। कृषि-कार्य में जुटे हुए ये लोग ही किसान कहलाते हैं। ये भारतीय सभ्यता, संस्कृति और आचार-विचार के प्रतीक होते हैं। इन्हीं के बल तथा सेवा कार्य पर समाजका ढाँचा खड़ा रहता है। शहर की चमक-दमक, नारियों के फैशन तथा नेताओं के सैर-सपाटे सबके सब किसानों के कन्धों पर ही टिके हैं। यह सबका अन्नदाता, वस्त्रदाता और जीवनदाता है। सारा समाज उसी के बल पर पनपता है। अतः जन-जीवन के लिए उसका विशेष महत्त्व है।

किसान का जीवन सादा और सरल होता है। वास्तव में भारतीय किसान ‘सादा जीवन उच्च विचार’ का प्रतीक होता है। उसका प्रकृति से सीधा सम्बन्ध होता है। प्रकृति के निकट रहने से उसका स्वास्थ्य उत्तम हो जाता है। किसान का स्वभाव भी सरल होता है। छल-कपट, ईर्ष्या और द्वेष तो वह जानता ही नहीं। यदि उसके खेत से कोई कुछ ले भी जाता है तो वह इसकी कोई चिन्ता नहीं करता और न बदले की भावना रखता है। इस प्रकार भारतीय किसान का जीवन सादा, सरल और स्वास्थ्य से पूर्ण होता है।

कृषक जीवन में जहाँ कुछ सुख हैं, वहाँ अनेक दुःख भी हैं। अतिवृष्टि, आँधी, जंगल पशु, चोर और फसल की बीमारी का भय उसे सदैव आतंकित रखता है। घोर गर्मी, शीत और वर्षा में भी वह अपने खेत में काम करता है, तब जाकर कहीं उसकी फसल तैयार होती है और सफल सकुशल घर आ जाए तो यह उसकी सबसे बड़ी विजय होती है।

स्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व भारतीय किसान की दशा बहुत शोचनीय थी। उसका उचित मान भी न था और उसके परिश्रम का उसे बहुत कम मूल्य मिलता था। साहूकारों और जमींदारों के कारण उसका सारा जीवन ब्याज चुकाते-चुकाते ही बीतता था। पहले जमींदार भी किसानों का खूब शोषण करते थे। इसीलिए भारत सरकार ने सर्वप्रथम जमींदारी और साहूकारी प्रथा को ही समाप्त किया। इसके अतिरिक्त आज भी ग्रामों में सफाई, शिक्षा और मनोरंजन के साधनों का अभाव रहता है। इसीलिए किसानों का सारा सुख, दुख में बदल जाता है। वर्षा ऋतु में तो ग्रामों में कीचड़, गन्दगी और मच्छरों का राज हो जाता है। इससे भी किसान का जीवन दुर्लभ हो जाता है। अच्छे हल, बैल, बीज, खाद, कृषि-यन्त्र तथा उचित सिंचाई के अभाव से उसे अपने परिश्रम का उचित फल नहीं मिलता है, जिससे कि वह सदैव दुखी रहता है।

स्वतन्त्र भारत की लोकप्रिय सरकार ने किसानों की दशा को सुधारने के लिए अनेक प्रयास किए हैं। सरकार ने जमींदारी प्रथा को समाप्त कर दिया, चकबन्दी योजना चलाई, पंचायतों को नए अधिकार दिए, ग्रामों में विद्यालय खोले तथा सरकारी समितियों की स्थापना की। इन सुविधाओं के मिलने से भारतीय किसान अब जमींदार, व्यापारी और साहूकार के चंगुल से मुक्त हो गए हैं। आज उसे सरकार की ओर से आर्थिक सहायता भी दी जा रही है, जिससे कि वह अच्छे बीज, खाद और कृषि-यन्त्र खरीद सके। किसान को अन्न का उचित मूल्य दिलाने के उद्देश्य से भारत सरकार प्रत्येक वर्ष गेहूँ का एक न्यूनतम मूल्य निश्चित कर देती है तथा उस मूल्य पर किसान से स्वयं गेहूं खरीदती है, जिससे किसान को अन्न का उचित मूल्य मिल जाता है और इस प्रकार वह अब थोक व्यापारियों के चंगुल से मुक्त हो गया है। सन् 1988 में भारत सरकार ने अपने वार्षिक बजट में कृषि एवं कृषकों को अनेकानेक सुविधाएँ दी हैं। अब इन सुविधाओं के मिलने से किसान के जीवन में पर्याप्त परिवर्तन होता जा रहा है।

यद्यपि भारतीय किसान साहूकारों, जमींदारों और व्यापारियों से मुक्ति पा चुका है किन्तु प्रायः अब भ्रष्ट सरकारी अधिकारी उसे परेशान करते हैं, आज भी उसकी अशिक्षा, दुर्बलता और पिछड़ेपन का लाभ अधिकारी, क्लर्क और चपरासी तक उठाते हैं। सरकार से मिलने वाली सुविधा का लाभ भी गिने-चुने किसानों को ही मिल पाता है। इसलिए फरवरी 1988 में किसानों ने अपनी माँगों को मनवाने के लिए मेरठ में विशाल प्रदर्शन किया था।

आजकल भारत सरकार अपनी पंचवर्षीय योजनाओं पर अरबों रुपये व्यय कर रही है। इन योजनाओं को कृषि पर केन्द्रीभूत कर दिया है। सरकार ने गन्ने तथा अनाज के मूल्यों को ऊँचा बनाकर किसानों को उसके परिश्रम का उचित मूल्य दिलवाया है। इससे भारतीय किसान का जीवन बदल गया है। आज अधिकतर किसान कच्चे झोंपड़ों के स्थान पर पक्के मकान बनवा चुके हैं। उनके बच्चे नगरों में उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं तथा आधुनिक कृषि-यन्त्रों के प्रयोग से उनकी उपज दिन-दुनी-रात चौगुनी बढ़ती जा रही है।

वास्तव में किसान का जीवन त्याग, तपस्या, सेवा और सरलता का प्रतीक है। उन्होंने देश की खाद्य समस्या को हल करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। उनके महत्त्व को समझकर स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्री ने देश को “जय जवान जय किसान” का नारा दिया था। हमें भी किसानों के प्रति सहानुभूति का व्यवहार करना चाहिए तथा उनकी उन्नति के लिए निरन्तर प्रयत्न करते रहना चाहिए। वह सुखी हैं, तो जग सुखी है।

16.

निबन्ध : देशाटन

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‘देशाटन’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है- देश + अटन। ‘अटन’ शब्द का अर्थ ‘घूमना’ है। इस प्रकार देशाटन शब्द का अर्थ ‘देश-विदेश में भ्रमण करना है।’

प्राचीनकाल से ही लोग देशाटन करते आ रहे हैं। प्राचीन काल में लोग पैदल, घोड़ों पर या रथों पर यात्राएँ किया करते थे। उस समय देशाटन करना बड़ा कठिन था। पचास या सौ मील दूर जाने में कई दिन लग जाते थे और मार्ग में लुट जाने का भी डर रहता था। इसीलिए पहले समय में लोग देशाटन के लिए बहुत कम जाया करते थे।

आधुनिक काल में देशाटन के नए-नए साधन उपलब्ध हो गए हैं। आज तो मोटर, रेलगाड़ी, हवाई जहाज आदि अनेक आने-जाने के साधन उपलब्ध हो गए हैं। इन सबके कारण देशाटन करना बड़ा सरल हो गया है। अब तो हजारों मील तक की यात्रा एक दिन में पूरी हो सकती है और मार्ग में लुट जाने का भय भी नहीं रहा है। इसीलिए आजकल लोग देशाटन को बहुत जाते है।

देशाटन का सबसे बड़ा लाभ ज्ञान-वृद्धि है। जब कोई यात्री किसी दूसरे देश की यात्रा करता है तो वहाँ जाकर नई-नई बातें देखता है और उन्हें सीखता है, इस प्रकार उसका ज्ञान बढ़ता है। देशाटन का एक प्रमुख लाभ मनोरंजन भी है। बहुत से लोग तो केवल मन को प्रसन्न करने के लिए ही देशाटन किया करते हैं। नई-नई वस्तुएँ तथा स्थानों को देखकर जहाँ ज्ञान बढ़ता है, वहाँ मनोरंजन भी होता है।

देशाटन का एक लाभ यह भी है कि देशाटन का स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। गर्मियों में लोग प्रायः पहाड़ी क्षेत्रों की यात्राएँ किया करते हैं। जिन देशों में बहुत अधिक ठण्ड पड़ती है, उन देशों के लोग ठण्ड के दिनों में गर्म देशों में आ जाते हैं। इसका उनके स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।

देशाटन में एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से मिलता है। इससे उनमें व्यवहार कुशलता आती है। वह दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करना भी सीख जाता है। इस प्रकार देशाटन से व्यक्ति को अनेक लाभ होते हैं।

आज भी देशाटन के मार्ग में अनेक बाधाएँ आती हैं। सबसे पहली बाधा धन की है। यदि पास में धन की कमी हो तो देशाटन का पूरा-पूरा लाभ नहीं उठाया जा सकता। परिवार और व्यापार की चिन्ताएँ भी देशाटन के मार्ग में बाधक बन जाती हैं। अतः इन सब बाधाओं को पार करके ही देशाटन करना उचित है। इसके अतिरिक्त जिस देश की यात्रा करनी हो, वहाँ की भाषा का भी ज्ञान प्राप्त कर लेना चाहिए अन्यथा बड़ी परेशानी उठानी पड़ती है।

अन्त में कहा जा सकता है कि देशाटन करना बहुत ही लाभदायक और आवश्यक है। विश्व के अनेक महापुरुष देशाटन के कारण ही महान बन सके हैं। राहुल सांकृत्यायन तथा मोहन राकेश हिन्दी के ऐसे लेखक हैं, जिन्होंने बहुत देशाटन किया है। महात्मा गांधी, पं० नेहरू, आचार्य विनोवा भावे, टाटा और बिरला जो देश की इतनी सेवा कर रहे हैं, उसका कारण उनका देशाटन ही है। वास्तक में देशाटन करना बहुत ही उपयोगी है।

17.

निबन्ध : पुस्तकालय से लाभ

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पुस्तकालय शब्द का अर्थ है ‘पुस्तकों का संग्रहालय’। पुस्तकालय से पढ़ने वालों को पढ़ने के लिए पुस्तकें दी जाती हैं। वे उन्हें पढ़कर फिर वापस लौटा देते हैं।

पुस्तकालये कई प्रकार के होते हैं। प्रथम प्रकार के वे पुस्तकालय हैं, जो विद्यालयों में होते हैं। इनमें छात्रों और अध्यापकों को पुस्तकें पढ़ने के लिए दी जाती हैं। दूसरे प्रकार के वे पुस्तकालय हैं, जिन्हें धनवान लोग अपने घर पर ही बना लेते हैं। तीसरे प्रकार के राज्य पुस्तकालय होते हैं जहाँ से जनता को वहीं पर पुस्तकें पढ़ने के लिए दी जाती हैं। पुस्तकालय से निम्नलिखित लाभ हैं पुस्तकों को पढ़ने से पढ़ने वाले का ज्ञान बढ़ता है। जब कोई व्यक्ति पुस्तकालय जाता है तो वहाँ तरह-तरह की पुस्तकें दिखाई देती हैं। वह उनमें से कोई एक पुस्तक पढ़ने के लिए ले आता है। इस प्रकार व्यक्ति को पुस्तकें पढ़ने की आदत पड़ जाती है और इससे उसका ज्ञान बढ़ता है।

पुस्तकालय मनोरंजन का भी श्रेष्ठ साधन है। आजकल पुस्तकालयों में कहानी और उपन्यास आदि की पुस्तकों के ढेर लगे रहते हैं। इन पुस्तकों के पढ़ने से व्यक्ति का मनोरंजन होता है। आज सैकड़ों नागरिक अपने व्यस्त जीवन से फुर्सत पाते ही पुस्तकालय पहुँच जाते हैं और अपनी मनपसन्द पुस्तकें पढ़कर अपना मन बहलाते हैं।

पुस्तकालय से खाली समय का सदुपयोग होता है। अपने कामों से फुर्सत पाकर खाली समय को यूँ ही बरबाद करना अच्छा नहीं होता। कहा भी हैं “काव्य शास्त्र विनोदेन कालो गच्छति धीमताम्।” अतः सबसे अच्छा तो यही है कि पुस्तकालय से पुस्तकें लेकर पढ़ी जाएँ और अपने समय का सदुपयोग किया जाए।

अध्ययन को प्रोत्साहन-पुस्तकालयों से अध्ययन करने का बल मिलता है। वहाँ की नई-नई पुस्तकें देखकर उन्हें पढ़ने को मन करता है। छात्रों के लिए तो पुस्तकालयों को होना बहुत ही आवश्यक है। इसलिए आजकल प्रत्येक विद्यालय में एक पुस्तकालय अवश्य होता है। वहाँ से छात्र एक-दूसरे की । देखा-देखी पुस्तकें लाते हैं और पढ़ते हैं।

पुस्तकालय से धन की बचत भी होती है। पुस्तकालय का चन्दा बहुत ही कम होता है किन्तु उससे सैकड़ों रुपये की पुस्तकें लेकर पढ़ी जा सकती हैं। बहुमूल्य पुस्तकें तो प्रायः पुस्तकालय से ही लेकर पढ़ी जाती हैं। इस प्रकार अनेक पुस्तकें भी पढ़ने को मिल जाती हैं और धन भी अधिक खर्च नहीं होने पाता है।

वास्तव में पुस्तकालयों से समाज को बहुत लाभ होता है। हमें इनसे पूरा-पूरा लाभ तो उठाना ही चाहिए किन्तु उनके प्रति जो हमारे कर्तव्य हैं, उनका भी पालन करना चाहिए। हमें पुस्तकें समय पर लौटा देनी चाहिए। पुस्तकें किसी भी तरह से खराब नहीं करनी चाहिए। पुस्तकों पर चिह्न लगाना, चित्र या पृष्ठ फाड़ना बहुत बुरा है। हमें पुस्तकालय की पुस्तकों की मन से रक्षा करनी चाहिए।

वास्तव में पुस्तकालय हमारे सच्चे मित्र हैं। सरकार भी पुस्तकालयों को उत्तम बनाने तथा उनकी संख्या बढ़ाने के लिए प्रयत्न कर रही है। फिर भी हमारे देश में पुस्तकालयों की कमी है। आशा है यह कमी शीघ्र ही पूरी हो जाएगी।

18.

निबन्ध : गणतन्त्र दिवस 26 जनवरी

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छब्बीस जनवरी हमारे देश का एक राष्ट्रीय पर्व है। इसी दिन सबसे पहले सन् 1929 को भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की महासभा ने लाहौर में रावी नदी के तट पर पूर्ण स्वराज्य प्राप्त करने की घोषणा की थी। तब ये निरन्तर देश के सपूत स्वराज्य प्राप्त करने के लिए सचेष्ट रहे तथा 26 जनवरी को एक पवित्र पर्व के रूप में मनाते रहे। महान त्याग और बलिदानों के बाद 15 अगस्त सन् 1947 को भारत देश स्वतन्त्र हुआ तथा देश के नेताओं ने अपने देश के लिए अपने संविधान का निर्माण किया। यह संविधान 26 जनवरी, सन् 1950 को लागू हुआ और उसी दिन भारत देश एक प्रभुता सम्पन्न गणराज्य घोषित हुआ। इसीलिए 26 जनवरी को गणतन्त्र दिवस के रूप में मनाते है।

गणतन्त्र दिवस सारे भारतवर्ष में बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। यह हमारा एक राष्ट्रीय पर्व है तथा इस दिन सभी कार्यालय तथा विद्यालय आदि बन्द रहते हैं, जिससे सभी लोग गणतन्त्र दिवस को धूम-धाम से मना सकें। अन्य वर्षों की भाँति इस वर्ष भी यह पर्व हमारे नगर में बड़ी धूम-धाम से मनाया गया। प्रात:काल प्रभात फेरियाँ निकाली गईं- ‘उठ जाग मुसाफिर भोर’ के मधुर गान से नगर गूंज उठा। चारों ओर ” भारत माता की जय” के नारे सुनाई दे रहे थे। प्रात: आठ बजे नगर के अनेक स्थानों पर झण्डा फहराया गया। हमारे विद्यालय में ठीक 8 बजे झण्डा फहराया गया था। विद्यार्थियों और अध्यापकों ने भाषण दिए और कविताएँ सुनाईं। इस दिन पढ़ाई नहीं हुई। भाषणों के बाद मिठाई बाँटी गईं और खेल के मैदान में खेल-कूद शुरू हो गए। विद्यालय में लगभग दो बजे तक यह कार्यक्रम चलता रहा। दोपहर बाद नगर में एक विशाल जुलूस निकाला गया। इस जुलूस में नगर के चुने हुए पुलिस जवान, होमगार्ड और एन०सी०सी० के छात्र-सैनिक शामिल हुए। बाजे की धुन के साथ कदम से कदम मिलाता हुआ यह जुलूस शहर के मुख्य बाजारों से होकर निकला। जिस सड़क से होकर यह जुलूस जाता था, उसी सड़क पर नर-नारी उसका स्वागत करते थे। सारे नगर से प्रसन्नता छा गई थी। सभी को स्वराज्य का सुख मिल रहा था।

सन्ध्या समय साहित्य परिषद् के मैदान में एक विशाल सभा हुई। इस सभा में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया गया था। हमारे विद्यालय के छात्रों ने एक समूहगान प्रस्तुत किया। कन्या पाठशाला की छात्राओं ने एक लोकनृत्य प्रस्तुत किया। नगर के प्रमुख समाज-सेवी और कार्यकर्ताओं ने स्वतन्त्रता, पर बलिदान हो जाने वालों के प्रति अपनी भावपूर्ण श्रद्धांजलियाँ अर्पित कीं।

रात्रि को नगर में अनेक स्थानों पर प्रकाश किया गया। विद्यालयों में कवि-सम्मेलनों का आयोजन किया गया। इस प्रकार 26 जनवरी का पूरा दिन बड़ी प्रसन्नता के साथ व्यतीत हुआ। वास्तव में गणतन्त्र दिवस एक ओर तो हमें देश पर बलिदान हुए युवकों की याद दिलाता है तथा दूसरी ओर मेल से रहने की शिक्षा देता है। हमें एकता, प्रेम और पारस्परिक सहयोग के साथ शान्तिपूर्ण जीवन व्यतीत करना चाहिए, तभी हमारी स्वतन्त्रता दृढ़ रह सकती है। हमें इस दिन अपने देश की उन्नति और विकास में सहयोग देने के लिए शपथ लेनी चाहिए। यही गणतन्त्र दिवस को मनाने का उचित ढंग हो सकता है।

19.

निम्नलिखित प्रश्नों में से किन्हीं दस वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के उत्तर दीजि(1) 'गोदान' उपन्यास का नायक कौन है ?

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गोदान का नायक होरी एक किसान है जो किसान वर्ग के प्रतिनिधि के तौर पर मौजूद है।

20.

निबन्ध:विद्यालय का वार्षिकोत्सव

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प्रस्तावना-मानव-जीवन संघर्षों का जीवन है। समय-समय पर आयोजित उत्सव उसके जीवन में नवस्फूर्ति भर देते हैं। उसका हृदय उल्लास से भर जाता है और वह कठिनाइयों से जूझता हुआ जीवन-पथ पर आगे बढ़ता चलता है। इसी को दृष्टि में रखकर विभिन्न विद्यालयों में अनेक उत्सवों का आयोजन किया जाता है। हमारे विद्यालय में भी प्रतिवर्ष खेलकूद और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, यही वार्षिकोत्सव कहलाता है जो  बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। विद्यालय का वार्षिकोत्सव मेरा सर्वप्रिय उत्सव रही है। मैं बहुत दिनों पहले से ही इस उत्सव पर अपने कार्यक्रम को प्रस्तुत करने की तैयारी में जुट जाता हूँ। यह उत्सव प्राय: जनवरी माह में मनाया जाता है। इसके साथ ही वार्षिकोत्सव में विद्यालय की भावी प्रगति की रूपरेखा प्रस्तुत की जाती है।

उत्सव की तैयारी-इस वर्ष 4-5-6 जनवरी को विद्यालय का वार्षिकोत्सव होना निश्चित हुआ। प्रधानाचार्य द्वारा इसकी घोषणा से सभी विद्यार्थियों में आनन्द की लहर दौड़ गयी। उत्सव प्रारम्भ होने में 20 दिन का समय शेष था। अब जोर-शोर से खेलकूद और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की तैयारी शुरू हो गयी। कुछ छात्र लम्बी कूद, ऊँची कूद, भाला फेंक, गोला फेंक में जुटे हुए थे तो कुछ वाद-विवाद, अन्त्याक्षरी, गीतों, नाटक आदि के पूर्वाभ्यास में। इन तैयारियों के लिए प्रधानाचार्य महोदय ने कुछ समय निर्धारित कर दिया और शेष समय में पढ़ाई नियमित रूप से जारी रखने का निर्देश दिया। सभी छात्रों में नया उत्साह और नया जोश था। विद्यालय की विधिवत् सफाई शुरू हो गयी थी।

मुख्य अतिथि का आगमन और उत्सव का आरम्भ-न जाने कब प्रतीक्षा के दिन समाप्त हुए और 4 जनवरी आ गयी, पता ही नहीं चला। इस दिन खेल-कूद की प्रतियोगिताओं का आयोजन था। मैदान हरा-भरा था। चूने की सफेदी से बनी रेखाएँ और रंग-बिरंगी झण्डियाँ मैदान की शोभा को द्विगुणित कर रही थीं। जिला विद्यालय निरीक्षक हमारे खेल-कूद कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे। हमारे प्रधानाचार्य और गणमान्य अतिथि खेल के मैदान पर पहुँचे। सभी ने खड़े होकर तालियों की गड़गड़ाहट के साथ उनका अभिवादन किया। इसके बाद खेलकूद प्रतियोगिता आरम्भ हुई।

रोचक कार्यक्रम-खेलों की शुरुआत ने मैदान में हलचल मचा दी। भिन्न-भिन्न प्रकार के खेलों के : लिए अलग-अलग स्थान निर्धारित थे। दिनभर खेल प्रतियोगिताएँ चलती रहीं। मैंने भी ऊँची कूद में भाग लिया और नया कीर्तिमान स्थापित कर खुशी से फूला न समाया। सभी कार्यक्रम बहुत सुव्यवस्थित एवं आकर्षक ढंग से सम्पादित होते रहे।

अगले दिन शाम चार बजे से विद्यालय प्रांगण में बने भव्य पण्डाल में अन्त्याक्षरी कार्यक्रम का आरम्भ हुआ। कार्यक्रम बहुत रोचक रहा। इसके बाद वाद-विवाद प्रतियोगिता शुरू हुई, जिसका विषय था-‘आज की शिक्षा-नीति का देश की प्रगति में योगदान’। इसके  पक्ष-विपक्ष में वक्ताओं ने अपने-अपने विचार रखे और जोरदार तर्क प्रस्तुत किये। विद्यालय के 12वीं कक्षा के छात्र पंकज गुप्ता ने प्रथम और निर्मल जैन ने द्वितीय स्थान प्राप्त किया। रात्रि के आठ बजे से सांस्कृतिक कार्यक्रम रखा गया था।. सांस्कृतिक कार्यक्रमों में गीत, नाटक, एकांकी, पैरोडी, समूह गान आदि का आयोजन किया गया था। रात्रि के लगभग 12 बजे कार्यक्रम की समाप्ति हुई।

तीसरे दिन का उत्सव प्रदर्शनी और पुरस्कार वितरण के लिए निश्चित था। विद्यालय के बड़े हॉल में छात्रों द्वारा बनाये गये चित्र, मूर्तियों और हस्तनिर्मित अनेक कलात्मक कृतियों की प्रदर्शनी सजी हुई थी। सभी दर्शकों ने छात्रों के सुन्दर व कलात्मक प्रयासों की बहुत सराहना की। इसके बाद तीनों दिनों के कार्यक्रमों के विजेताओं और श्रेष्ठ कलाकारों को पुरस्कार वितरित किये गये। पुरस्कार समारोह के मुख्य अतिथि हमारे क्षेत्र के माननीय उपशिक्षा निदेशक महोदय थे।

उत्सव का समापन और मुख्य अतिथि का सन्देश-पुरस्कार वितरण के बाद हमारे प्रधानाचार्य ने विद्यालय की वर्षभर की प्रगति का विवरण प्रस्तुत किया और वार्षिकोत्सव की सफलता के लिए सम्बन्धित सभी अध्यापकों और विद्यार्थियों का आभार प्रकट किया।

मुख्य अतिथि ने अपने सन्देश में सर्वप्रथम अपने हार्दिक स्वागत पर आभार प्रकट किया और विद्यालय की प्रगति तथा वार्षिकोत्सव के सफल आयोजन पर प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने विजेताओं को बधाई दी और अन्य छात्रों को भी आगामी वार्षिकोत्सव में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया।

उपसंहार–हमारे विद्यालय का वार्षिकोत्सव बहुत सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। इस उत्सव पर सभी छात्रों का हृदय आनन्द-विभोर हो गया। प्रत्येक कार्यक्रम बहुत रोचक और आकर्षक था। सचमुच ऐसे उत्सवों से छात्रों की बहुमुखी प्रतिभा प्रकट होती है और उनके व्यक्तित्व के विकास में सहायता मिलती है। इसलिए इस प्रकार के उत्सवों का आयोजन प्रत्येक विद्यालय में किया जाना चाहिए।

21.

निबन्ध:मनोरंजन के साधन

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प्रस्तावना : जीवन में मनोरंजन का महत्त्व-जीवन में मनोरंजन, सब्जी में नमक की भाँति आवश्यक है। यह मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता है। यह उसे प्रसन्नचित्त बनाने की गारण्टी तथा जीवन के कटु अनुभवों को भुलाने की ओषधि दोनों ही हैं। एक नन्हा शिशु भी इसका आकांक्षी है और एक वयोवृद्ध व्यक्ति के लिए भी यह उतना ही महत्त्वपूर्ण है। बच्चे को बेवजह रोना इस बात का संकेत है कि वह उकता रहा है। यदि वृद्ध सनकी और चिड़चिड़े हो उठते हैं तो उसका कारण भी मनोरंजन का अभाव ही है।

मनोरंजन वस्तुतः हमारे जीवन की सफलता का मूल है। मनोरंजनरहित जीवन हमारे लिए भारस्वरूप बन जाएगा। यह केवल हमारे मस्तिष्क के लिए ही नहीं, शारीरिक स्वास्थ्य-वृद्धि के लिए भी परमावश्यक है। मनोरंजन के विविध रूपों-खेलकूद, अध्ययन व सुन्दर दृश्यों के अवलोकन से हमारा हृदय असीम आनन्द से भर उठता है। इससे शरीर के रक्त-संचार को नवीन गति और स्फूर्ति मिलती है तथा हमारे स्वास्थ्य की अभिवृद्धि भी होती है।

मनोरंजन के साधनों का विकास-मनोरंजन की इसी गौरव-गरिमा के कारण बहुत प्राचीन काल से ही मानव-समाज मनोरंजन के साधनों का उपयोग करता आया है। शिकार खेलना, रथ दौड़ाना आदि विविध कार्य प्राचीन काल में मनोरंजन के प्रमुख साधन थे, परन्तु आजकल युग के परिवर्तन के साथ-साथ मनोरंजन के साधन भी बदल गये हैं। विज्ञान ने मनोरंजन के क्षेत्र में क्रान्ति कर दी है। आज कठपुतलियों का नाच जनसमाज की आँखों के लिए उतना प्रिय नहीं रहा, जितना कि सिनेमा के परदे पर हँसते-बोलते नयनाभिराम दृश्य।

आधुनिक काल में मनोरंजन के विविध साधन :

(क) वैज्ञानिक साधन–सिनेमा, रेडियो, टेलीविजन आदि विज्ञान प्रदत्त मनोरंजन के साधनों ने आधुनिक जनसमाज में अत्यन्त लोकप्रियता प्राप्त कर ली है। रेडियो तो मनोरंजन का पिटारा है ही इसे अपने घर में रखे सुन्दर गाने, भाषण, समाचार आदि सुन सकते हैं। टेलीविजन तो इससे भी आगे बढ़ गया है। विविध कार्यक्रमों, खेलों आदि के सजीव प्रसारण को देखकर पर्याप्त मनोरंजन किया जा सकता है।

(ख) अध्ययन-साहित्य का अध्ययन भी मनोरंजन की श्रेणी में आता है। यह हमें मानसिक आनन्द देता है और चित्त को प्रफुल्लित करता है। साहित्य द्वारा होने वाले मनोरंजन से मन की थकान ही नहीं मिटती, वरन् ज्ञान की अभिवृद्धि भी होती है।

(ग) ललित कलाएँ–संगीत, नृत्य, अभिनय, चित्रकला आदि ललित कलाएँ भी मनोरंजन के उत्कृष्ट साधन हैं। संगीत के मधुर स्वरों में आत्म-विस्मृत करने की अपूर्व शक्ति होती है।

(घ) खेल-ललित कलाओं के साथ-साथ खेल भी मनोरंजन के प्रिय विषय हैं। हॉकी, फुटबॉल, क्रिकेट, टेनिस, बैडमिण्टन आदि खेलों से खिलाड़ी एवं दर्शकों का बहुत मनोरंजन होता है। विद्यार्थी वर्ग के लिए खेल बहुत ही हितकर हैं। इनके द्वारा उनका मनोरंजन ही नहीं होता, अपितु स्वास्थ्य भी ठीक रहता है। गर्मी की साँय-साँय करती लूओं से भरे वातावरण में घर बैठकर साँप-सीढ़ी, लूडो, ताश, कैरम, शतरंज खूब खेले जाते हैं।

(ङ) अन्य साधन–कुछ ऐसे व्यक्ति होते हैं, जिन्हें अभीष्ट कार्य को पूर्ण करने में ही आनन्द की प्राप्ति हो जाती है। कुछ लोग अपने कार्य-स्थलों से लौटने के बाद अपने उद्यान को ठीक प्रकार से सँवारने में ही घण्टों व्यतीत कर देते हैं। कुछ लोगों का मनोरंजन फोटोग्राफी होता है। कहीं मन-लुभावना आकर्षक-सा दृश्य दिखाई दिया और उन्होंने उसे कैमरे में कैद कर लिया। इसी से मन प्रफुल्लित हो उठा।

मेले-तमाशे, सैर-सपाटे, यात्रा-देशाटन आदि मनोरंजन के विविध साधन हैं। इनसे हमारा मनोरंजन तो होता ही है, साथ-ही-साथ हमारा व्यावहारिक ज्ञान भी बढ़ता है। राहुल सांकृत्यायनं तो देशाटन द्वारा अर्जित ज्ञान के कारण ही महापण्डित कहलाये। सन्तों ने तो हर काम को हँसते-खेलते अर्थात् मनोरंजन करते हुए करने को कहा है, यहाँ तक कि ध्यान (meditation) भी मन को प्रसन्न करते हुए किया जा सकता। है-हसिबो खेलिबो धरिबो ध्यानम्।

उपसंहार-निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि जीवन में अन्य कार्यों की भाँति मनोरंजन भी उचित मात्रा में होना आवश्यक है। सीमा से अधिक मनोरंजन समय जैसी अमूल्य सम्पत्ति को नष्ट करता है। जिस प्रकार आवश्यकता से अधिक भोजन अपच का कारण बन शरीर के रुधिर-संचरण में विकार उत्पन्न करता है, उसी प्रकार अधिक मनोरंजन भी हानिकारक होता है। हमें चाहिए कि उचित मात्रा में मनोरंजन करते हुए अपने जीवन को उल्लासमय और सरल बनाएँ।

22.

निबन्ध : विज्ञान के चमत्कार

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वर्तमान युग को वैज्ञानिक युग कहा जाता है। आज हमारे सारे जीवन पर विज्ञान का प्रभाव दिखाई पड़ता है। यदि विज्ञान की देन को आज हमसे छीन लिया जाए तो हम सभी कठिनाइयों में फंस जाएँगे। विज्ञान ने आज हमको जो सुख-सुविधाएँ प्रदान की हैं, वे सब विज्ञान के चमत्कार कहलाते हैं। हमारे शरीर के सुकोमल वस्त्र, घड़ी, ट्रांजिस्टर, पेन आदि सभी विज्ञान की देन हैं। वायुयान, एटम बम, इंजेक्शन, ट्रेन, रेडियो, चलचित्र, टेलीविजन तथा एक्सरे आदि सभी विज्ञान ने ही दिए हैं। विज्ञान के चमत्कारों ने आने-जाने के साधनों में बहुत बड़ा परिवर्तन कर दिया है। प्राचीन काल में मनुष्य अपने घर से दस-बीस मील तक जाने में भी घबराता था किन्तु आज तो वह पृथ्वी का चक्कर लगाने में भी नहीं घबराता। हजारों व्यक्ति विश्व का चक्कर लगा चुके हैं और अब मानव मंगल, ग्रह पर जाने की तैयारी कर रही है। यह सब विज्ञान के ही कारण सम्भव हो सका है। आज जन-साधारण की सेवा के लिए साइकिल, मोटर साइकिल, मोटर कार, ट्रेन, वायुयान आदि हर समय तैयार रहते हैं।

आजकल समाचार भेजने में भी विज्ञान मानव की बड़ी सहायता कर रहा है। टेलीफोन, बेतार का तार, समाचार-पत्र और रेडियो ये सब विज्ञान ने ही दिए हैं। आज कुछ ही सेकंडों में एक समाचार सारे संसार में फैल सकता है। हजारों मील बैठा हुआ एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से इस प्रकार बातचीत कर सकता है मानो वह उसके सामने ही बैठा हो। ये सब कुछ सुविधाएँ विज्ञान ने ही तो दी हैं।

विज्ञान में मन बहलाने के लिए चलचित्र, रेडियो, ग्रामोफोन और टेलीविजन आदि भी प्रदान किए हैं। अपने काम से थककर कोई रेडियो सुनता है तो कोई चलचित्र देखने चला जाता है। बन्दूक, तोप, एटम बम, लड़ाकू विमान तथा दूरमारक शस्त्र विज्ञान के अद्भुत चमत्कार हैं। आज एक देश को मिनट में नष्ट किया जा सकता है। आज संसार का बड़े से बड़ा देश भी विज्ञान के इन विनाशकारी चमत्कारों से काँपता है। आज विज्ञान के बल से एक सैनिक पूरी सेना का नाश कर सकता है।

वास्तव में आज हमारा जीवन विज्ञान के सहारे व्यतीत हो रहा है। विद्युत् तो ‘विज्ञान का महान चमत्कार है। इससे आज हमें प्रकाश मिलता है, मशीनें चलती हैं, पंखे चलते हैं, गेहूं पिसती है तथा खाना तैयार होता है। हमारे दैनिक जीवन में काम आने वाली सभी वस्तुएँ विज्ञान ने दी हैं। हमारे शरीर के लिए उत्तम वस्त्र, पढ़ने को उत्तम पुस्तकें, खेतों को अच्छी खाद, रोगों के लिए उत्तम दवाइयाँ, फोटो खींचने के लिए कैमरा और लिखने के लिए कागज विज्ञान ने ही दिए हैं। आज विज्ञान के चमत्कारों के कारण चेचक, हैजा, पोलियो तथा मलेरिया आदि घातक बीमारियों पर पूरी तरह विजय प्राप्त कर ली गई है। वास्तव में विज्ञान के ये चमत्कार समाज के लिए वरदान ही हैं।

मनुष्य प्रत्येक वस्तु को अपने मनमाने ढंग से प्रयोग में लाता है। तेज ब्लेड से साफ हजामत भी बनती है और जेब भी काटी जा सकती है। विज्ञान के इन चमत्कारों का मानव ने अनेक स्थानों पर दुरुपयोग भी किया है। महाविनाशके अणु-शक्ति का मानव-कल्याण के लिए भी उपयोग किया जा सकता है।

अतः हमारे वैज्ञानिकों को चाहिए कि वे इन चमत्कारों का प्रयोग केवल मानव-कल्याण के लिए ही करें।
संक्षेप में हम कह सकते हैं कि विज्ञान के चमत्कारों ने मानव जाति को बहुत सुख-सुविधाएँ प्रदान की हैं।

आज भी समझदार लोग इस बात के लिए प्रयत्ल कर रहे हैं कि विज्ञान के ये चमत्कार मानव की सेवा करते रहें, उसे हानि न पहुँचाने पाएँ। आशा है कि मानव इनसे पूरा लाभ उठाता रहेगा तथा जीवन और अधिक सुखमय हो जाएगा।

23.

निबन्ध : चलचित्र

Answer»

आधुनिक युग में चलचित्र विज्ञान की एक बड़ी देन है। आज यह मनोरंजन का लोकप्रिय साधन हो गया है। आज देश का कोई भी ऐसा नगर नहीं है जहाँ दो-चार सिनेमाघर न हों।

चलचित्र का आविष्कार सन् 1870 ई० में अमेरिका के एक वैज्ञानिक एडीसन ने किया था। उस समय केवल मूक चित्र ही दिखाए जाते थे। धीरे-धीरे बोलते हुए चित्र भी दिखाए जाने लगे और अब तो रंगीन चित्र इस प्रकार दिखाए जाते हैं कि ऐसा लगता है मानो सचमुच का नाटक ही देख रहे हों। चलचित्र तैयार करने वाले लोग मूवी कैमरे की सहायता से अभिनेताओं के चित्र खींचते हैं और उसी रील पर उनकी ध्वनि भी अंकित कर ली जाती है। सिनेमा हाल में प्रोजेक्टर की सहायता से इसी रील को दिखाया जाता , है। भारतवर्ष में मुम्बई, मद्रास और कलकत्ता में अनेक फिल्मी कम्पनियाँ आजकल फिल्में तैयार कर रही हैं। चलचित्र से निम्नलिखित लाभ हैं आज सिनेमा मनोरंजन का सर्वश्रेष्ठ साधन माना जाता है। मनुष्य चाहे कितना ही थका क्यों न हो, सिनेमा, देखकर मन प्रसन्न हो जाता है। यही कारण है कि आज संसार के करोड़ों व्यक्ति प्रतिदिन सिनेमा देखने जाते हैं।

सिनेमा देखने से दर्शकों को नई-नई बातों का पता लगता है। शिक्षा और समाज-सुधार के क्षेत्र में तो सिनेमा बहुत कार्य कर रहे हैं। आजकल तो भूगोल, इतिहास तथा नागरिक शास्त्र आदि अनेक विषयों की शिक्षा भी सिनेमा के द्वारा दी जाने लगी है। यदि अच्छी फिल्में छात्रों को दिखाई जाएँ तो इनसे बहुत लाभ हो सकता है। चलचित्र के द्वारा व्यापारी अपनी वस्तुओं का प्रचार भी करते हैं। साबुन, दवाइयाँ, तेल, कपड़ा तथा अन्य वस्तुओं के विज्ञापन जब चित्रपट पर दिखाए जाते हैं तो उनका व्यापार पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। आज इस व्यवसाय से लाखों व्यक्ति धन कमा रहे हैं।

सिनेमा से आजकल लाभ के स्थान पर हानि अधिक हो रही है। मारधाड़ की फिल्में छात्रों को मारधाड़ करने के लिए प्रेरित करती हैं। आज अनेक विद्यार्थी तो स्कूल से पढ़ाई के घण्टे छोड़-छोड़कर सिनेमा देखने जाते हैं और अपना सब कुछ चौपट कर डालते हैं। अधिक सिनेमा देखने में उनके स्वास्थ्य और चरित्र दोनों का नाश होता है। इस प्रकार चलचित्र से समाज को लाभ के स्थान पर हानि भी हो रही है।

देश के स्वतन्त्र होने पर नेताओं, समाज-सुधारकों और फिल्म तैयार करने वालों का ध्यान इस ओर गया है और अब तक अनेक शिक्षाप्रद फिल्में तैयार हो चुकी हैं। देश-प्रेम और समाज-सुधार सम्बन्धी फिल्मों को सरकार सहायता भी देने लगी है किन्तु अभी तक इस ओर विशेष सुधार नहीं हुआ है। यदि चलचित्र द्वारा चरित्र गठन और देश-प्रेम की शिक्षा दी जाए तो इससे देश का बहुत उपकार हो सकता है।

24.

Why do you think ordinary man and woman did not generally kepp record of what they dfid

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25.

निबन्ध : मनोरंजन के साधन

Answer»

जब मनुष्य काम करते-करते थक जाता है तो उसे मनोरंजन की आवश्यकता होती है। थोड़ी देर मनोरंजन करने से उसका मन प्रसन्न हो जाता है, वह फिर अपने काम में जुट जाता है। विद्यार्थियों से लेकर बड़े अधिकारी तक अपनी थकान दूर करने के लिए मनोरंजन करते हैं। वास्तव में मनोरंजन के साधन मनुष्य को शक्ति देते हैं। थकावट दूर करते हैं और जीवन में स्फूर्ति लाते हैं। अतः मानव जीवन में इनकी बड़ी आवश्यकता है।

मनुष्य अपने मन को बहलाने के लिए अलग-अलग ढंग से मनोरंजन के साधन अपनाता आया है। प्राचीनकाल में चौपड़, बाजीगर के खेल, कठपुतली के खेल, रामलीला, पशुओं की लड़ाई शिकार खेलना आदि मनोरंजन के साधन थे किन्तु आज बहुत कम लोग इनके द्वारा अपना मनोरंजन करते हैं। विज्ञान ने मनुष्य को मनोरंजन के लिए बड़े सस्ते और अच्छे साधन दिए हैं। आधनिक समय में मनोरंजन के प्रमुख साधन निम्नलिखित हैं आधुनिक युग में मनोरंजन का सबसे सस्ता और अच्छा साधन रेडियो है। अपने कार्यों से थका हुआ मनुष्य रेडियो सुनकर अपना मन बहला लेता है। रेडियो पर तरह-तरह के गाने, कहानी तथा नाटक सुनकर आज करोड़ों मनुष्य अपनी मनोरंजन करते हैं। अब तो टेलीविजन पर गाने वाले या बोलने वाले का चित्र भी साथ-साथ दिखाया जाने लगा है। रंगीन टेलीविजन ने इस क्षेत्र में क्रान्ति ला दी है। इससे उत्तम मनोरंजन के साथ-साथ उत्तम शिक्षाप्रद कार्यक्रम भी देखने को मिलते हैं। सिनेमा भी मनोरंजन का प्रमुख साधन हैं। जब से सिनेमा का प्रचार हुआ है तब से सर्कस, थियेटर और नाटक के खेल बहुत कम हो गए हैं। सिनेमा करोड़ों व्यक्तियों का प्रतिदिन मनोरंजन करते हैं। यह भी मनोरंजन का बड़ा सस्ता और अच्छा साधन है।

आज लाखों लोग खेल-कूद द्वारा अपना मनोरंजन करते हैं। विद्यार्थियों के लिए खेल-कूद ही मनोरंजन का सर्वश्रेष्ठ साधन है। हॉकी, फुटबॉल तथा बैडमिंटन खेलना, दौड़ना, कूदना आदि मनोरंजन के उत्तम साधन माने गए हैं। दिन भर के कार्य से थका हुआ मनुष्य इन खेलों से प्रसन्न हो जाता है, वह फिर अपने काम में जुट जाता है। कुछ लोग घर के बाहर जाना अधिक पसन्द नहीं करते हैं। वे घर पर ही रहकर अपना मनोरंजन कर लेते हैं। कोई कहानी और उपन्यास पढ़कर प्रसन्न होता है, तो कोई सितार, बाँसुरी या पियानो बजाकर अपना मन प्रसन्न कर लेता है। कोई मित्रों के साथ बैठकर ताश खेलना पसन्द करता है तो कोई ग्रामोफोन और रेडियो पर गाने सुनता है। जिसकी जैसी रुचि होती है, वह वैसा ही साधन अपना लेता है।
मनोरंजन के साधनों की कोई सीमा नहीं है। जिसका जिससे मन बहल जाए, उसके लिए वही मनोरंजन का साधन है। घूमना, फोटो खींचना, चित्रकारी, नदी की सैर या शतरंज खेलनी, नाव चलाना, कैरम खेलना, समाचार-पत्र पढ़ना, काढ़ना-बुनना, गाना आदि सभी मनोरंजन के साधन हैं।

कभी-कभी लोग नशा करके भी अपना मनोरंजन किया करते हैं किन्तु नशा करना या जुआ खेलना मनोरंजन का उत्तम साधन नहीं है, इनसे तो धन की बर्बादी होती है और स्वास्थ्य भी खराब हो जाता है। अत; जो साधन हानिकारक हैं, उनको कभी भी नहीं अपनाना चाहिए। वास्तव में जो लोग शारीरिक कार्य करते हैं, उनको घरेलू मनोरंजन के साधन अपनाने चाहिए और जो लोग मानसिक कार्य करते हैं, उन्हें भाग-दौड़ साधन अपनाने चाहिए। इसी से मानव का अधिक कल्याण हो सकता है।

26.

हिन्दी के प्रमुख सामाजिक उपन्यासकारों के नाम लिखिए।

Answer»

मुंशी प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद, बाबू वृन्दावनलाल वर्मा, आचार्य चतुरसेन शास्त्री व विश्वम्भरनाथ शर्मा ‘कौशिक आदि हिन्दी के प्रमुख सामाजिक उपन्यासकार हैं।

27.

द्विवेदी युग में प्रायः किस प्रकार के उपन्यास लिखे गये?

Answer»

द्विवेदी युग में प्रायः तिलस्मी, जासूसी, सामाजिक, ऐतिहासिक, पौराणिक, चरित्र प्रधान तथा भाव-प्रधान उपन्यास लिखे गये। लिखिए।

28.

अच्छी जीवनी की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।

Answer»

अच्छी जीवनी की प्रमुख विशेषताएँ हैं।

⦁    प्रामाणिकता
⦁    तथ्यपूर्ण साहित्यिक विवरण
⦁    आत्मीयता
⦁    प्रेरणादायक स्थलों पर बल तथा
⦁    रोचकता

29.

आत्मकथा से आप क्या समझते हैं? किन्हीं दो आत्मकथा-लेखकों और उनकी रचनाओं के नाम लिखिए।

Answer»

लेखक जब स्वयं अपने जीवन की कथा को पाठकों के समक्ष पूर्ण आत्मीयता के साथ प्रस्तुत करता है तो उसे आत्मकथा कहते हैं। बाबू गुलाबराय और पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ हिन्दी के प्रसिद्ध आत्मकथा-लेखक हैं और उनकी आत्मकथा का नाम क्रमश: ‘मेरी असफलताएँ’ और ‘अपनी खबर है।

30.

जीवनी-साहित्य को समृद्ध बनाने वाले किन्हीं दो प्रसिद्ध लेखकों के नाम लिखिए।

Answer»

जीवनी-साहित्य को समृद्ध बनाने वाले दो प्रसिद्ध लेखक हैं।

⦁    बाबू गुलाबराय तथा
⦁    श्री रामनाथ सुमन

31.

शुक्लोत्तर युग के दो प्रमुख जीवनी-लेखकों एवं उनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए।

Answer»

शुक्लोत्तर युग के दो प्रमुख जीवनी-लेखक और उनकी कृतियाँ हैं—

⦁     विष्णु प्रभाकर आवारा मसीहा तथा
⦁    रामविलास शर्मा–निराला की साहित्य-साधना।

32.

शुक्ल युग के एक प्रमुख जीवनी-लेखक एवं उनकी कृति का उल्लेख कीजिए।याकिसी एक जीवनी-लेखक का नाम लिखिए।

Answer»

शुक्ल युग के प्रमुख जीवनी-लेखक और उनकी कृति है—बाबू गुलाबराय-गाँधी की देन।

33.

‘कलम का सिपाही’ किस साहित्यकार की जीवनी है?

Answer»

‘कलम का सिपाही’ प्रसिद्ध कहानीकार-उपन्यासकार प्रेमचन्द की जीवनी है।

34.

‘हंस’ पत्रिका के संस्थापक का नाम बताइए।

Answer»

मुंशी प्रेमचन्द ‘हंस’ पत्रिका के संस्थापक थे।

35.

‘कलम का सिपाही’ लेखक का नाम लिखिए।

Answer»

‘कलम का सिपाही’ लेखक का नाम अमृत राय है।

36.

रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा सम्पादित दो पत्रिकाओं के नाम लिखिए।

Answer»
  • तरुण भारत
  • कर्मवीर।
37.

किसी एक यात्रावृत्त’ लेखक का नाम लिखिए।

Answer»

राहुल सांकृत्यायन।

38.

‘राज्यश्री’ कृति के लेखक का नाम लिखिए।

Answer»

जयशंकर प्रसाद।

39.

‘चतुर चंचला’ कृति के लेखक का नाम लिखिए।

Answer»

बाबू गोपालराम (गहमरी)।

40.

प्रतिध्वनि’ कृति के लेखक का नाम लिखिए।

Answer»

जयशंकर प्रसाद।

41.

‘सरस्वती’ पत्रिका के प्रथम सम्पादक का नाम लिखिए।अथवाद्विवेदी युग की प्रमुख पत्रिका और उसके सम्पादक का नाम लिखिए।अथवाहिन्दी की किसी साहित्यिक पत्रिका का नाम तथा उसके सम्पादक का नाम लिखिए।

Answer»

‘सरस्वती’ पत्रिका के प्रथम सम्पादक बाबू श्यामसुन्दर दास थे (‘सरस्वती’ की स्थापना 1900 ई० में हुई थी, तब उसके सम्पादक बाबू श्यामसुन्दर दास थे। 1903 से 1920 ई० तक इसका सम्पादन आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने किया)

42.

‘सरस्वती’ पत्रिका के प्रमुख सम्पादक का नाम बताइए।

Answer»

आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी।

43.

‘प्रायश्चित’ के लेखक का नामोल्लेख कीजिए।

Answer»

भगवती चन्द्र वर्मा।

44.

‘सरस्वती’ पत्रिका के प्रथम सम्पादक का नाम लिखिए।यामहावीरप्रसाद द्विवेदी किस प्रसिद्ध हिन्दी-पत्रिका का सम्पादन करते थे ?याद्विवेदी युग की प्रमुख पत्रिका और उसके सम्पादक का नाम लिखिए।या‘सरस्वती’ पत्रिका किस युग में प्रकाशित हुई ?या‘सरस्वती’ पत्रिका के सम्पादक का नाम लिखिए।

Answer»

‘सरस्वती’ का प्रकाशनारम्भ सन् 1900 ई० में हुआ था उस समय ‘सरस्वती’ का एक सम्पादक मण्डल था, जिसमें पाँच सदस्य थे। इनमें एक सदस्य श्यामसुन्दर दास थे। इस सम्पादक मण्डल ने एक वर्ष तक ‘सरस्वती’ का सम्पादन किया।  इसके पश्चात् दो वर्षों तक ‘सरस्वती’ का सम्पादन श्यामसुन्दर दास ने किया। तत्पश्चात् सन् 1903 से 1920 ई० तक ‘सरस्वती’ का सम्पादन महावीरप्रसाद द्विवेदी ने किया था।

45.

‘किन्नर देश में कृति के लेखक का नाम लिखिए।

Answer»

राहुल सांकृत्यायन।

46.

‘गिरती दीवारें किस विधा की रचना है?

Answer»

‘गिरती दीवारें” नाटक विधा की रचना है।

47.

‘सरस्वती’ पत्रिका का सम्पादन पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ने कब-से-कब तक किया ? इसके अतिरिक्त इन्होंने किस पत्रिका का सम्पादन किया ?

Answer»

पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ने सन् 1920 से 1927 ई० तक सरस्वती का सम्पादन किया। इसके अतिरिक्त इन्होंने ‘छाया’ मासिक पत्रिका का सम्पादन भी किया।

48.

‘सरस्वती’ पत्रिका के सर्वाधिक प्रसिद्ध सम्पादक का नाम लिखिए।

Answer»

आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी।

49.

‘क्या भूलें क्या याद करूँ किस विधा पर आधारित रचना है?

Answer»

‘क्या भूलें क्या याद करूँ आत्मकथा विधा पर आधारित रचना है।

50.

‘किन्नर देश में रचना किस विधा पर आधारित है?

Answer»

‘किन्नर देश में रचना यात्रावृत्त विधा पर आधारित है।