This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.
| 1. |
ग्रामीण क्षेत्रों में बेकारी पर टिप्पणी लिखिए। |
|
Answer» ग्रामीण क्षेत्र में हमें कृषि में मौसमी एवं छिपी प्रकृति की बेकारी मिलती है। भारत की 72.22 प्रतिशत जनसंख्या गाँवों में रहती है और 64 प्रतिशत लोग किसी-न-किसी प्रकार से कृषि पर निर्भर हैं। कृषि में फसल बोने एवं काटने के समय कार्य की अधिकता रहती है और शेष समय में किसानों को बेकार बैठे रहना पड़ता है। रायल कमीशन का मत है कि “भारतीय कृषक 4 – 5 महीने ही कार्य करता है।” राधाकमल मुखर्जी के अनुसार, “उत्तर प्रदेश में किसान वर्ष में 200 दिन एवं जैक के अनुसार, बंगाल में पटसन की खेती करने वाले वर्ष में 4-5 माह ही कार्यरत रहते हैं।” डॉ० स्लेटर के अनुसार, “दक्षिण भारत के किसान वर्ष में 200 दिन ही कार्यरत रहते हैं।” कुटीर व्यवसायों का अभाव, कृषि की मौसमी प्रकृति आदि के कारण ग्रामीणों को वर्ष-भर कार्य नहीं मिल पाता। हमारे यहाँ कृषि मजदूरों की संख्या करीब 475 लाख है, जो वर्ष में 200 दिन से भी कम समय तक कार्य करते हैं। यहाँ कृषि-योग्य भूमि के 15 से 20 प्रतिशत भाग पर ही एक से अधिक बार फसल उगायी जाती है। इसका अर्थ यह है कि यहाँ ऐसे व्यक्ति अधिक हैं जो वर्ष में 165 दिन बेकार रहते हैं। इसके अतिरिक्त भारतीय ग्रामों में अदृश्य बेकारी भी व्याप्त है। संयुक्त परिवार प्रणाली के कारण एक परिवार के सभी सदस्य भूमि के छोटे-छोटे टुकड़ों पर कृषि-कार्य करते हैं, जिनकी सीमान्त उत्पादकता शून्य होती है। यदि इनको कृषि से हटाकर अन्य व्यवसायों में लगा दिया जाए तो भी कृषि उत्पादन पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा। इन्हें हम अतिरिक्त श्रम की श्रेणी में रख सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बेकारी का प्रतिशत 40 आँका गया है। |
|
| 2. |
शिक्षित वर्ग में बेकारी पर टिप्पणी लिखिए। |
|
Answer» बेकारी केवल निरक्षरों एवं कम पढ़े-लिखे लोगों में ही नहीं, वरन् शिक्षित, बुद्धिमान एवं प्रबुद्ध लोगों में भी व्याप्त है। डॉक्टर, इन्जीनियर, तकनीकी विशेषज्ञ आदि जिन्हें भारत में काम नहीं मिलता, विदेशों में चले जाते हैं और जो विदेशों में शिक्षा ग्रहण कर यहाँ आते हैं, उन्हें यहाँ उपयुक्त कार्य नहीं मिल पाता। लाल फीताशाही एवं आन्तरिक राजनीति से पीड़ित होकर वे पुनः विदेश चले जाते हैं। शिक्षित बेकारों में उन्हीं लोगों को सम्मिलित किया जाता है जो मैट्रिक या उससे अधिक शिक्षा ग्रहण किये हुए हैं। शिक्षा के प्रसार के साथ-साथ शिक्षित बेकारी में भी वृद्धि होती गयी, क्योंकि आधुनिक शिक्षा छात्रों को रोजी-रोटी के लिए तैयार नहीं करती। शिक्षित व्यक्ति केवल वेतनभोगी सेवाएँ ही पसन्द करते हैं। उच्च शिक्षा सस्ती होने के कारण जब तक नौकरी नहीं मिलती विद्यार्थी पढ़ते रहते हैं। भारत में अधिकांश शिक्षित बेरोजगार पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश एवं महाराष्ट्र में केन्द्रित हैं। |
|
| 3. |
प्रदूषण के स्रोतों की विवेचना कीजिए।याप्रदूषण के उत्तरदायी कारणों की विवेचना कीजिए। |
|
Answer» प्रदूषण के उत्तरदायी स्रोत या कारण निम्नलिखित हैं – ⦁ उद्योगों से निकलने वाले स्राव (अपशिष्ट) प्रदूषण का प्रमुख कारण हैं। इनसे मुख्य रूप से वायु एवं जल प्रदूषण बढ़ता है। |
|
| 4. |
पारिस्थितिकी किसे कहते हैं? पारिस्थितिकी एवं समाज में संबंध स्पष्ट कीजिए।यापारिस्थितिकी क्या है? पारिस्थितिकीय अवक्रमण के प्रमुख कारण बताइए। |
|
Answer» पारिस्थितिकी का अर्थ संतुलित पर्यावरण को पारिस्थितिकतंत्र (Ecosystem) कहा जाता है। इस शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम ए० जी० टेन्सले नामक वैज्ञानिक ने 1935 ई० में किया था पर्यावरण के जैविक एवं अजैविक, सभी कारकों के परस्पर संबंधों को पारिस्थितिक तंत्र कहा जाता है। जब इसमें मानवीय प्रयासों के परिणामस्वरूप अवक्रमण होता है तो उसे पारिस्थितिकीय अवक्रमण कहा जाता है। पारिस्थितिकी एवं समाज का संबंध पारिस्थितिकीय अवक्रमण के कारण भारत का अधिकतर भौगोलिक क्षेत्र किसी-न-किसी प्रकार के पारिस्थितिकीय अवक्रमण से प्रभावित हुआ है। वनों का बड़ी तेजी से विनाश हुआ है तथा पानी के स्रोत (नदियों, झीलों तथा जमीन के नीचे पानी) सूखते जा रहे हैं तथा पानी की गुणवत्ता प्रभावित होती जा रही है। प्राकृतिक साधनों का अवक्रमण आर्थिक विकास का परिणाम तो है ही यह भारत जैसे विकासशील देश में सामाजिक-आर्थिक विकास तथा विश्व पर्यावरण के लिए खतरा भी बनता जा रहा है। पारिस्थितिकीय अवक्रमण के निम्नलिखित कारण हैं – 1. वनों का विनाश – वनों की लकड़ी व्यवसाय में उपयोग करने तथा जड़ी-बूटियों हेतु किए जाने वाले वनों के कटाव के परिणामस्वरूप भारत में वन क्षेत्र बड़ी तेजी से घटता जा रहा है। जितने पेड़ लगाए जाते हैं उससे कहीं अधिक संख्या में काटे जाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि भारत में । वन गाँवों से दूर होते जा रहे हैं। अनेक बार तो निजी स्वार्थों हेतु बड़े पैमाने पर वनों में आग लगा दी जाती है। गर्मियों में ग्रामवासी वनों में आग इसलिए भी लगा देते हैं कि बरसात के बाद अच्छी घास उपलब्ध हो पाएगी। अनेक बार तो विभागीय स्तर पर भी वन के कुछ हिस्से में। आग इसलिए लगा दी जाती है ताकि उसे कृषि योग्य बनाया जा सके और आग के पूरे वन क्षेत्र में फैलने से बचा जा सके। इससे मूल्यवान पेड़ नष्ट हो जाते हैं। विकास के नाम पर बनाए जाने वाले बड़े-बड़े बाँध भी पारिस्थितिकीय अवक्रमण विकसित करते हैं। सरकार ने भारत में बढ़ते हुए पारिस्थितिकीय अवक्रमण को देखते हुए आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण की दीर्घकालिक नीति बनाई है। इसके अंतर्गत पारिस्थितिकीय अवक्रमण को रोकने एवं प्रदूषण नियंत्रण हेतु चरणबद्ध ढंग से अनेक कार्यक्रम लागू किए गए हैं। अनेक गैर-सरकारी संगठनों को भी इस कार्य में सहयोग देने हेतु आर्थिक सहायता दी जा रही है। 2002 ई० में ‘नवीन राष्ट्रीय जल नीति‘ को स्वीकृति प्रदान की गई। इस योजना के अंतर्गत देश के जल संसाधनों के विकास की ओर विशेष ध्यान दिया जा रही है। राष्ट्रीय जल बोर्ड, राष्ट्रीय जल संसाधन परिषद्, केंद्रीय भूमिगत जल प्राधिकरण तथा संबंधित जल संसाधन विकास योजना द्वारा इस दिशा में अनेक कदम उठाए गए हैं जिनसे थोड़ी सफलता ही मिल पाई है। पर्यावरणीय शिक्षा एवं सामान्य जागरूकता द्वारा जन-जागृति आने पर मिलने वाला नागरिकों का सहयोग ही इस समस्या के समाधान में सार्थक सिद्ध हो सकता है। |
|
| 5. |
प्रदूषण संबंधित प्राकृतिक विपदाओं के मुख्य रूप कौन-कौन से हैं? |
|
Answer» प्रदूषण संबंधित प्राकृतिक विपदाओं के अनेक रूप होते हैं। भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट, बाढ़ अथवा ज्वारभाटीय लहरें (जैसे सुनामी लहरें) इत्यादि प्राकृतिक विपदाएँ समाज को पूर्ण रूप से बदलकर रख देती हैं। यह बदलाव, अपरिवर्तनीय अर्थात् स्थायी होते हैं तथा चीजों को वापस अपनी पूर्वावस्था में नहीं आने देते। साथ ही, प्रदूषण से संबंधित अनेक प्राकृतिक विपदाओं के उदाहरण आज हमारे सामने हैं। इन सब में वायु प्रदूषण से संबंधित विपदाएँ; जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण तथा ध्वनि प्रदूषण की तुलना में कहीं अधिक हुई हैं। पूर्व सोवियत संघ के यूक्रेन प्रांत में हुए चेरनोबिल काण्ड तथा भारत में भोपाल गैस कांड वायु प्रदूषण से संबंधित प्रमुख विपदाओं के उदाहरण हैं। 3 दिसम्बर, 1984 ई० की रात को भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड कीटनाशक फैक्ट्री से मिथाइल आइसोसाइनेट नामक गैस के रिसाव से 4,000 लोगों की मृत्यु हो गई तथा 2,00,000 व्यक्ति हमेशा के लिए अपंग हो गए। इस प्रकार की दुर्घटना रोकने हेतु इस फैक्ट्री में कंप्यूटरीकृत अग्रिम चेतावनी व्यवस्था नहीं थी जो अमेरिका स्थित इसी कंपनी के प्रत्येक प्लांट का एक अनिवार्य हिस्सा है। ध्वनि प्रदूषण बहरेपन को तो मृदा प्रदूषण अनेक रोगों को जन्म देता है। इसीलिए प्रदूषण से संबंधित प्राकृतिक विपदाओं के सभी रूप विनाशकारी होते हैं। भारत में प्रतिवर्ष घरेलू वायु प्रदूषण से मरने वाले लोगों की संख्या लाखों में है। |
|
| 6. |
पर्यावरण व्यवस्था समाज के लिए एक महत्त्वपूर्ण तथा जटिल कार्य क्यों है? |
|
Answer» पर्यावरण का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इसीलिए पर्यावरण व्यवस्था समाज के लिए। महत्त्वपूर्ण मानी जाती है परंतु पर्यावरण प्रबंधन एक कठिन कार्य है। औद्योगीकरण के कारण संसाधनों के बड़े पैमाने पर दोहन ने पर्यावरण के साथ मनुष्य के संबंध और जटिल बना दिए हैं। इसलिए यह माना जाता है कि आज हम जोखिम भरे समाज में रह रहे हैं जहाँ ऐसी तकनीकों तथा वस्तुओं का हम प्रयोग करते हैं जिनके बारे में हमें पूरी समझ नहीं है। नाभिकीय विपदा (जैसे-चेरनोबिल कांड, भोपाल गैस कांड, यूरोप में फैली ‘मैड काऊ’ बीमारी आदि) औद्योगिक पर्यावरण में होने वाले खतरों को दिखाते हैं। संसाधनों में निरंतर होने वाली कमी, प्रदूषण, वैश्विक तापमान वृद्धि, जैनेटिकली मोडिफाइड, ऑर्गेनिज्म, प्राकृतिक एवं मानव निर्मित पर्यावरण विनाश आदि पर्यावरण की प्रमुख समस्याओं एवं जोखिमों ने पर्यावरण व्यवस्था को समाज के लिए न केवल महत्त्वपूर्ण बना दिया है, अपितु इसे ऐसी जटिल व्यवस्था बना दिया है कि इसका प्रबंधन अधिकांश समाज उचित प्रकार से नहीं कर पा रहे हैं। |
|
| 7. |
पारिस्थितिकी तंत्र का पतन एवं पर्यावरण प्रदूषण पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। |
|
Answer» पारिस्थितिकी तंत्र से अभिप्राय किसी समुदाय के निर्जीव पर्यावरण तथा उसमें पाए जाने वाले जीवधारियों की समग्र व्यवस्था से है। संतुलित पर्यावरण को पारिस्थितिकी तंत्र कहते हैं। जब इसमें मानवीय प्रयासों के परिणामस्वरूप अवक्रमण होता है तो इसे पारिस्थितिकी तंत्र का पतन कहते हैं। पारिस्थितिकी तंत्र के पतन का कारण वनों का विनाश, भूमि या मृदा का कटाव, जल स्रोतों की कमी तथा खतरनाक उद्योग (जैसे-दून घाटी में चूना उद्योग) इत्यादि हैं। यह सब ऐसे कारण हैं जिनसे पर्यावरणीय प्रदूषण में वृद्धि होती है। जैसे-जैसे विकास हेतु पारिस्थितिकी तंत्र का पतन होता है, वैसे-वैसे पर्यावरण प्रदूषण में वृद्धि होती है। वनों के विनाश से वायु प्रदूषण, मृदा के कटाव अथवा मृदा में होने वाले अस्वाभाविक परिवर्तन से मृदीय प्रदूषण तथा जल स्रोतों के दूषित होने से जलप्रदूषण होता है। खतरनाक उद्योगों से पानी का स्तर नीचे पहुँच जाता है, पेड़ धूल से भरे रहते हैं तथा उद्योगों से हानिकारक गैसों का स्राव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। इसीलिए पारिस्थितिकी तंत्र के पतन एवं पर्यावरण प्रदूषण में गहरा संबंध पाया जाता है। |
|
| 8. |
संसाधनों की क्षीणता से संबंधित पर्यावरण के प्रमुख मुद्दे कौन-कौन से हैं? |
|
Answer» संसाधनों की क्षीणता से संबंधित पर्यावरण के अनेक प्रमुख मुद्दे हैं। इससे न केवल वन्य जीवों की अनेक किस्में खत्म हो चुकी हैं तथा अनेक अन्य समाप्त होने के कगार पर हैं, अपितु आने वाले वर्ष मानव के लिए भी संघर्षमय हो सकते हैं। जैव ऊर्जा (मुख्यतः पेट्रोलियम) की कमी दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। यदि इसका कोई विकल्प शीघ्र सामने नहीं आया तो पेट्रोलियम इतने महगे हो जाएँगे कि सामान्य जनता की पहुँच उन तक नहीं हो पाएगी। पानी तथा भूमि में क्षीणता तेजी से बढ़ रही है। भू-जल के स्तर में लगातार कमी वैसे तो पूरे भारत में है पर मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, पंजाब तथा हरियाणा में इसे स्पष्ट देखा जा सकता है। कुछ ही दशकों में कृषि, उद्योग तथा नगरीय केंद्रों की बढ़ती माँगों के कारण पानी खत्म होने के कगार पर है। नदियों के बहाव को मोड़े जाने के कारण जल बेसिन को भी नुकस्मन पहुँचा है जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती। भू-जल की भाँति हजारों वर्षों से मृदा की ऊपरी परत को होने वाला निर्माण भी पर्यावरण के कुप्रबंधन (भू-कटाव, पानी का जमाव, पानी का खारा होना आदि) के कारण नष्ट होता जा रहा है। भवन निर्माण के लिए ईंटों का उत्पादन भी मृदा की ऊपरी सतह के नाश के लिए जिम्मेदार है। जंगल, घास के मैदान तथा आर्द्रभूमि आदि दूसरे मुख्य संसाधन भी समाप्ति के कगार पर खड़े हैं। यदि वृक्षारोपण द्वारा पर्यावरण के संतुलन के प्रयास नहीं किए गए तो आने वाले वर्षों में पर्यावरणीय संसाधनों की क्षीणता मानव के सामने सबसे गंभीर चुनौती होगी। |
|
| 9. |
पर्यावरण की समस्याएँ सामाजिक समस्याएँ भी हैं। कैसे? स्पष्ट कीजिए। |
|
Answer» पर्यावरण से संबंधित अनेक सामाजिक समस्याएँ हैं। इससे जनता का स्वास्थ्य प्रभावित होता है। आर्सेनिक कैंसर, टाइफाइड, हैजा एवं पीलिया जैसी बीमारियाँ प्रदूषित जल से फैलती हैं तथा गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न कर देती हैं। वायुमंडलीय प्रदूषण से विश्व तापमान में वृद्धि हो रही है। मृदा का कटाव होने से उपज कम हो जाती हैं जिससे महँगाई बढ़ती है तथा निर्धन लोग अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में असमर्थ होने लगते हैं। ध्वनि प्रदूषण न केवल सिरदर्द अपितु बेचैनी बढ़ने, हृदय की गति तीव्र होने, ब्लड प्रेशर बढ़ने आदि अनेक अन्य बीमारियों के लिए भी उत्तरदायी है। पर्यावरणीय असंतुलन के कारण अपंगता में वृद्धि होती है। अध्ययनों से पता चला है कि रेडियोधर्मी पदार्थों से उत्पन्न प्रदूषण का परिणाम अपंग संतान का उत्पन्न होना है। प्रदूषण स्वस्थ शरीर में रोग निवारक शक्ति को कम करता है। प्रदूषण का जीवन-प्रक्रम तथा मानवीय गतिविधियों पर काफी प्रभाव पड़ता है। अत्यधिक प्रदूषण शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है जिससे बच्चों का विकास ठीक प्रकार से नहीं हो पाता। पर्यावरणीय प्रदूषण के कारण फसलें भी नष्ट हो जाती हैं। जलीय जीवों के नष्ट हो जाने से खाद्य पदार्थों की हानि होती है। बड़ी संख्या में मछलियों आदि का मरना, बीमार होना आदि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होने के साथ-साथ मछलियों के व्यापार से जुड़े लोगों के सामने अनेक आर्थिक समस्याएँ भी उत्पन्न कर देता है। |
|
| 10. |
भारत में राष्ट्रीय पारिस्थितिकी बोर्ड की स्थापना किस वर्ष हुई थी? |
|
Answer» भारत में राष्ट्रीय पारिस्थितिकी बोर्ड की स्थापना वर्ष 1981 में हुई थी। |
|
| 11. |
उस दोहरी प्रक्रिया का वर्णन करें जिसके कारण सामाजिक पर्यावरण का उद्भव होता है? |
|
Answer» सामाजिक पर्यावरण का उद्भव जैव भौतिक पारिस्थितिकी तथा मनुष्य के लिए हस्तक्षेप की अंत:क्रिया के द्वारा होता है। यह प्रक्रिया दोनों ओर से होती है। जिस प्रकार से प्रकृति समाज को आकार देती है, ठीक उसी प्रकार से समाज भी प्रकृति को रूप देता है। उदाहरणार्थ-सिंधु-गंगा के बाढ़ के मैदान की उपजाऊ भूमि गहन कृषि के लिए उपयुक्त है। इसकी उच्च उत्पादन क्षमता के कारण यह घनी आबादी का क्षेत्र बन जाता है। ठीक इसके विपरीत, राजस्थान के मरुस्थल केवल पशुपालकों को सहारा देते हैं जो अपने पशुओं के चारे की खोज में इधर-उधर भटकते रहते हैं। इन उदाहरणों से पता चलता है कि किस प्रकार पारिस्थितिकी मनुष्य के जीवन और उसकी संस्कृति को रूप देती है। दूसरी ओर, पूँजीवादी सामाजिक संगठनों ने विश्व भर की प्रकृति को आकार दिया है। निजी परिवहन पूँजीवादी वस्तु का एक ऐसा उदाहरण है जिसने जीवन तथा भू-दृश्य को बदला है। नगरों में वायु प्रदूषण तथा जनसंख्या वृद्धि, प्रादेशिक झगड़े, तेल के लिए युद्ध तथा विश्वव्यापी तापमान वृद्धि आदि पर्यावरण पर होने वाले प्रभावों के कुछ उदाहरण हैं। इसीलिए यह माना जाता है कि बढ़ता हुआ मानवीय हस्तक्षेप पर्यावरण को पूरी तरह से बदलने में समर्थ है। |
|
| 12. |
सामाजिक संस्थाएँ कैसे तथा किस प्रकार से पर्यावरण तथा समाज के आपसी रिश्तों को आकार देती हैं? |
|
Answer» सामाजिक संगठन में विद्यमान संस्थाओं द्वारा पर्यावरण तथा समाज के आपसी संबंधों को आकार प्रदान किया जाता है। उदाहरणार्थ- यदि वनों पर सरकार का आधिपत्य है तो यह निर्णय लेने का अधिकार भी सरकार के पास होता है कि वह वनों को लकड़ी के किसी व्यापारी को पट्टे पर दे अथवा ग्रामीणों को वन उत्पादों को संग्रहीत करने का अधिकार दे। यदि भूमि तथा जल संसाधनों पर व्यक्तिगत स्वामित्व है तो मालिक ही यह निर्धारित करेंगे कि अन्य लोगों का किन नियमों एवं शर्तों के अंतर्गत इन संसाधनों के उपयोग का अधिकार होगा। इस प्रकार, सामाजिक संस्थाएँ पर्यावरण तथा समाज के आपसी संबंधों को निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। |
|
| 13. |
ध्वनि प्रदूषण से आप क्या समझते हैं? आधुनिक समाज पर इसका कुप्रभाव सोदाहरण स्पष्ट कीजिए। |
|
Answer» तीखी आवाज से उत्पन्न होने वाले प्रदूषण को ध्वनि प्रदूषण कहा जाता है। इस प्रकार का प्रदूषण गाँव की तुलना में नगरों में अधिक पाया जाता है। विभिन्न प्रकार के यंत्रों, वाहनों, मशीनों, जहाजों, रॉकेटों, रेडियो व टेलीविजन, पटाखों, लाउड्स्पीकरों आदि के प्रयोग से ध्वनि प्रदूषण विकसित होता है। ध्वनि प्रदूषण जनसंख्या वृद्धि के कारण निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। ध्वनि प्रदूषण अनेक प्रकार के रोगों का कारण माना जाता है। इससे सुनने की क्षमता का ह्वास होता है, रुधिर चाप बढ़ जाता है, हृदय रोग की आशंका बढ़ जाती है तथा तंत्रिका तंत्र संबंधी रोग हो सकते हैं। ध्वनि प्रदूषण से व्यक्ति को ठीक प्रकार से नींद नहीं आती तथा वह चिड़चिड़ा हो जाता है। इससे उसमें मानसिक तनाव बढ़ जाता है। साथ ही, कुछ विशेष प्रकार की ध्वनियाँ सूक्ष्म जीवों को नष्ट कर देती है, जिससे जैव अपघटन क्रिया में रुकावट उत्पन्न होती है। |
|
| 14. |
पर्यावरण क्या है? इसके दो प्रकार बताइए।यापर्यावरण क्या है? इसके प्रमुख प्रकार बताइए। |
|
Answer» पर्यावरण से अभिप्राय उन सभी वस्तुओं से है जो हमें चारों ओर से घेरे रखती हैं। हमारे चारों ओर की प्राकृतिक वस्तुएँ तथा सांस्कृतिक वातावरण पर्यावरण के अंतर्गत ही आते हैं। पर्यावरण प्रमुख रूप से दो प्रकार का होता है- भौगोलिक (प्राकृतिक) पर्यावरण तथा सांस्कृतिक पर्यावरण। |
|
| 15. |
प्रदूषण किसे कहते हैं? |
|
Answer» पर्यावरण की लय एवं संतुलन में होने वाले अवांछनीय परिवर्तन, जो मानव जीवन के लिए हानिकारक होते हैं अथवा जीवनदायिनी शक्तियों को नष्ट करते हैं, प्रदूषण कहलाते हैं। |
|
| 16. |
भौगोलिक पर्यावरण क्या है? यह किस प्रकार मानव समाज को प्रभावित करता है? |
|
Answer» प्रकृति द्वारा निर्मित पर्यावरण को भौगोलिक पर्यावरण कहा जाता है। इसमें वे सभी वस्तुएँ सम्मिलित होती हैं जिनको मानव ने नहीं बनाया है। कुछ विद्वानों का कहना है कि भौगोलिक पर्यावरण मानव समाज को अत्यधिक प्रभावित करता है। जनसंख्या का घनत्व, व्यवसाय, आर्थिक जीवन, धार्मिक जीवन, व्यक्ति की कार्यक्षमता तथा सामाजिक संस्थाओं पर इसका गहरा प्रभाव पड़ता है। |
|
| 17. |
‘भौगोलिक पर्यावरण क्या है? यह किस प्रकार मानव-समाज को प्रभावित करता है? |
|
Answer» भौगोलिक पर्यावरण प्रकृति द्वारा निर्मित पर्यावरण है। मनुष्य पर जिन प्राकृतिक शक्तियों का चारों ओर से प्रभाव पड़ता है, उसे ‘भौगोलिक पर्यावरण’ कहा जाता है। ये सभी शक्तियाँ स्वतन्त्र रहकर मानव को प्रभावित करती हैं। पर्वत, सरिता, वन, पवन, आकाश, पृथ्वी तथा जीव जगत् सभी भौगोलिक पर्यावरण के अंग हैं। भौगोलिक पर्यावरण प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मानव-समाज को प्रभावित करता है। प्रत्यक्ष रूप में यह मानव-समाज को जनसंख्या, आवास, वेश-भूषा, खान-पान, पशु-जीवन आदि पर प्रभाव डालकर उसको प्रभावित करता है। अप्रत्यक्ष रूप में यह मानव-समाज को सामाजिक संगठन, आर्थिक संरचना, राजनीतिक संगठन, धार्मिक जीवन, साहित्य, कला आदि पर प्रभाव डालकर उनको प्रभावित करता है। |
|
| 18. |
प्रदूषण से आप क्या समझते हैं? प्रदूषण के समाज पर पड़ रहे दुष्प्रभावों की विवेचना कीजिए।यापर्यावरण प्रदूषण पर एक निबन्ध लिखिए। याप्रदूषण के उत्तर दायी कारकों की विवेचना कीजिए। पर्यावरण प्रदूषण क्या है? आधुनिक भारत में प्रदूषण की समस्या का कारण क्या है? यापर्यावरण प्रदूषण के कौन-कौन से प्रमुख कारण हैं? यापर्यावरणीय प्रदूषण से आप क्या समझते हैं? इसे समाप्त करने हेतु अपने सुझाव दीजिए। प्रदूषण के स्रोतों की विवेचना कीजिए। याप्रदूषण क्या है? प्रदूषण के कुप्रभावों का वर्णन कीजिए।यापर्यावरण को जल-प्रदूषण से कैसे बचाया जा सकता है?याप्रदूषण से आप क्या समझते हैं? विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों को समझाते हुए इनके नियन्त्रण के उपायों को समझाइए। यामानव जीवन पर पर्यावरण प्रदूषण के प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रभावों का वर्णन कीजिए। |
|
Answer» पर्यावरण प्रदूषण का अर्थ एवं प्रकार पर्यावरण प्रदषण का सामान्य अर्थ है – हमारे पर्यावरण का दूषित हो जाना। पर्यावरण का निर्माण प्रकृति ने किया है। प्रकृति-प्रदत्त पर्यावरण में जब किन्हीं तत्त्वों का अनुपात इस रूप में बदलने लगता है जिसको जीवन के किसी भी पक्ष पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका होती है, तब कहा जाता है कि पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है। उदाहरण के लिए, यदि पर्यावरण के मुख्य भाग वायु में ऑक्सीजन के स्थान पर अन्य विषैली एवं अनुपयोगी गैसों का अनुपात बढ़ जाए तो कहा। जाएगा कि वायु प्रदूषण हो गया है। वायु के अतिरिक्त पर्यावरण के किसी भी भाग के दूषित हो जाने को पर्यावरण प्रदूषण ही कहा जाएगा। पर्यावरण के मुख्य भागों या पक्षों को ध्यान में रखते हुए पर्यावरण प्रदूषण के विभिन्न प्रकारों या स्वरूपों का निर्धारण किया गया है। पर्यावरण प्रदूषण के मुख्य प्रकार हैं-जल-प्रदूषण, वायुप्रदूषण,ध्वनि-प्रदूषण तथा मृदा-प्रदूषण। 1. जल-प्रदूषण जल में जीव रासायनिक ऑक्सीजन तथा विषैले रसायन, खनिज, ताँबा, सीसा, अरगजी, बेरियम फॉस्फेट, सायनाइड आदि की मात्रा में वृद्धि होना ही जल-प्रदूषण है। जल-प्रदूषण दो प्रकार का होता है ⦁ दृश्य – प्रदूषण तथा जल-प्रदूषण के कारण – जल-प्रदूषण निम्नलिखित कारणों से होता है– ⦁ औद्योगीकरण जल-प्रदूषण के लिए सर्वाधिक उत्तर दायी है। चमड़े के कारखाने, चीनी एवं ऐल्कोहॉल के कारखाने, कागज की मिलें तथा अन्य अनेकानेक उद्योग नदियों के जल को प्रदूषित करते हैं। ⦁ नगरीकरण भी जल-प्रदूषण के लिए उत्तर दायी है। नगरों की गन्दगी, मल व औद्योगिक अपशिष्टों के विषैले तत्त्व भी जल को प्रदूषित करते हैं। ⦁ समुद्रों में जहाजरानी एवं परमाणु अस्त्रों के परीक्षण से भी जल प्रदूषित होता है। ⦁ नदियों के प्रति भक्ति-भाव होते हुए भी तमाम गन्दगी; जैसे-अधजले शव, जानवरों की लाशें तथा अस्थि-विसर्जन आदि-भी नदियों में ही किया जाता है, जो नदियों के जल प्रदूषण का एक कारण है। ⦁ जल में अनेक रोगों के हानिकारक कीटाणु मिल जाते हैं, जिससे प्रदूषण उत्पन्न हो जाता ⦁ भूमिक्षरण के कारण मिट्टी के साथ रासायनिक उर्वरक तथा कीटनाशक पदार्थों के नदियों में पहुँच जाने से नदियों का जल प्रदूषित हो जाता है। ⦁ घरों से बहकर निकलने वाला फिनायल, साबुन, सर्फ आदि से युक्त गन्दा पानी तथा शौचालय का दूषित मल नालियों में प्रवाहित होता हुआ नदियों और झील के जल में मिलकर उसे प्रदूषित कर देता है। ⦁ नदियों और झीलों के जल में पशुओं को नहलाना, पुरुषों तथा स्त्रियों द्वारा स्नान करना वे साबुन आदि से गन्दे वस्त्र धोना भी जल-प्रदूषण का मुख्य कारण है। ⦁ नगरों के दूषित जल और मल को नदियों और झीलों के स्वच्छ जल में मिलने से रोका जाए। ⦁ कल-कारखानों के दूषित और विषैले जल को नदियों और झीलों के जल में न गिरने दिया जाए। ⦁ मल-मूत्र एवं गन्दगीयुक्त जल का उपयोग बायोगैस बनाने या सिंचाई के लिए करके प्रदूषण को रोका जा सकता है। ⦁ सागरों के जल में आणविक परीक्षण न कराए जाएँ। ⦁ नदियों के तटों पर शव ठीक से जलाए जाएँ तथा उनकी राख भूमि में दबा दी जाए। ⦁ पशुओं के मृतक शरीर तथा मानव शवों को स्वच्छ जल में प्रवाहित न करने दिया जाए। ⦁ जल-प्रदूषण रोकने के लिए नियम बनाये जाएँ तथा उनका कठोरता से पालन किया जाए। ⦁ नदियों, कुओं, तालाबों और झीलों के जल को शुद्ध बनाये रखने के लिए प्रभावी उपाय काम में लाये जाएँ। ⦁ जल-प्रदूषण के कुप्रभाव तथा रोकने के उपायों का जनसामान्य में प्रचार-प्रसार कराया जाए। ⦁ जल उपयोग तथा जल-संसाधन संरक्षण के लिए राष्ट्रीय नीति बनायी जाए। ⦁ जल, जो जीवन की रक्षा करता है, प्रदूषित हो जाने पर जीव की मृत्यु का सबसे बड़ा कारण बनता है और बनता जा रहा है। ⦁ जल-प्रदूषण से अनेक बीमारियाँ; जैसे-हैजा, पीलिया, पेट में कीड़े, यहाँ तक कि टायफाइड भी प्रदूषित जल के कारण ही होता है, जिससे विकासशील देशों में पाँच में से चार बच्चे पानी की गन्दगी के कारण उत्पन्न रोगों से मरते हैं। ⦁ प्रदूषित जल का प्रभाव जल में रहने वाले जन्तुओं और जलीय पौधों पर भी पड़ रहा है। जल-प्रदूषण के कारण मछली और जलीय पौधों में 30 से 50 प्रतिशत तक की कमी हो गयी है। जो व्यक्ति खाद्य-पदार्थ के रूप में मछली आदि का उपयोग करते हैं, उनके स्वास्थ्य को भी हानि पहुँचती है।। ⦁ प्रदूषित जल का प्रभाव कृषि-उपजों पर भी पड़ता है। कृषि से उत्पन्न खाद्य-पदार्थों को मानव व पशुओं के उपयोग में लाते हैं, जिससे मानव व पशुओं के स्वास्थ्य को हानि होती ⦁ जल-जन्तुओं के विनाश से पर्यावरण असन्तुलित होकर विभिन्न प्रकार के कुप्रभाव उत्पन्न करता है। 2. वायु-प्रदूषण वायु में विजातीय तत्त्वों की उपस्थिति चाहे गैसीय हो या पार्थक्य या दोनों का मिश्रण, जो कि मानव के स्वास्थ्य और कल्याण के लिए हानिकारक हो, वायु-प्रदूषण कहलाता है। वायु-प्रदूषण के कारण – वायु-प्रदूषण निम्नलिखित कारणों से होता है ⦁ नगरीकरण, औद्योगीकरण एवं अनियन्त्रित भवन-निर्माण से वायु प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हो रही है। ⦁ परिवहन के साधनों (ऑटोमोबाइलों) से निकलता धुआँ वायु-प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण ⦁ नगरीकरण एवं नगरों की बढ़ती गन्दगी भी वायु को प्रदूषित कर रही है। ⦁ वनों की अनियमित एवं अनियन्त्रित केटाई से भी वायु प्रदूषण बढ़ रहा है। ⦁ रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशक औषधियों के कृषि में अधिकाधिक उपयोग से भी वायु-प्रदूषण बढ़ रहा है। ⦁ रसोईघरों तथा कारखानों की चिमनियों से निकलते धुएँ के कारण वायु प्रदूषण बढ़ रहा है। ⦁ विभिन्न प्रदूषकों के भूमि पर फेंकने से वायु-प्रदूषण उत्पन्न हो रहा है। ⦁ दूषित जल-मल के एकत्र होकर दुर्गन्ध फैलाने से वायु प्रदूषित हो रही है। ⦁ युद्ध, आणविक विस्फोट तथा दहन की क्रियाएँ वायु-प्रदूषण उत्पन्न करती हैं। ⦁ कीटनाशक पदार्थों के छिड़काव के कारण वायुमण्डल प्रदूषित हो जाता है। ⦁ कल-कारखानों को नगरों से दूर स्थापित करना तथा उनसे निकलने वाले धुएँ, गैस तथा राख पर नियन्त्रण करना। ⦁ परिवहन के साधनों पर धुआं-रहित यन्त्र लगाना। ⦁ नगरों में हरित पट्टी के रूप में युद्ध स्तर पर वृक्षारोपण कराना। ⦁ नगरों में स्वच्छता, जल-मल निकास तथा अवशिष्ट पदार्थों के मार्जन की उचित व्यवस्था करना। ⦁ वन लगाने तथा वृक्ष संरक्षण पर बल देना। ⦁ रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशकों के प्रयोग को नियन्त्रित करना। ⦁ घरों में बायोगैस, पेट्रोलियम गैस या धुआँ-रहित चूल्हों का प्रयोग करना। ⦁ खुले में मैला, कूड़ा-करकट तथा अवशिष्ट पदार्थ सड़ने के लिए न फेंकना। ⦁ गन्दा जल एकत्र न होने देना। ⦁ वायु-प्रदूषण रोकने के लिए कठोर नियम बनाना और दृढ़ता से उनका पालन कराना। ⦁ वायु-प्रदूषण से जानलेवा बीमारियाँ; जैसे-छाती और साँस की बीमारियाँ, ब्रांकाइटिस, फेफड़ों के कैंसर आदि बीमारियाँ उत्पन्न होती हैं। ⦁ वायु-प्रदूषण मानव-शरीर, मानव की खुशियों और मानव की सभ्यता के लिए खतरा बना हुआ है। नीला, भूरा, सफेद, तरह-तरह का परिवहन के साधनों का धुआँ पूँघता हुआ आदमी जब सड़कों पर चलता है तो वह नहीं जानता कि यह धुआँ उसकी आँखों में ही डंक नहीं मार रहा है, उसके गले को भी दबाता है और उसके फेफड़ों को भी जहरीले नाखूनों से नोच रहा है। ⦁ वायु प्रदूषण न केवल चारों ओर फैले खेतों, हरे-भरे पेड़ों, रमणीक दृश्यों को भी धुंधला करता है व उन पर झीनी चादर डालता है, बल्कि खेतों, तालाबों व जलाशयों को अपने – कृमिकणों से विषाक्त करता रहता है, जिसका सीधा प्रभाव मानव के स्वास्थ्य पर पड़ता है। ⦁ डॉक्टरों ने परीक्षण कर देखा है कि जहाँ वायु-प्रदूषण अधिक है वहाँ बच्चों की हड्डियों का विकास कम होता है, हड्डियों की उम्र घट जाती है तथा बच्चों में खाँसी और सॉस फूलना तो देखा ही जा सकता है। ⦁ वायु-प्रदूषण का प्रभाव वृक्षों पर भी देखा जा सकता है। चण्डीगढ़ के पेड़ों और लखनऊ के दशहरी आमों पर वायु-प्रदूषण के बढ़ते हुए खतरे को देखा गया है, जिससे मानव को फल तो कम मात्रा में मिल ही रहे हैं, किन्तु जो मिल रहे हैं वे भी विषाक्त हैं, जिसको सीधा प्रभाव मानव पर पड़ रहा है। ⦁ दिल्ली के वायुमण्डल में व्याप्त प्रदूषण का प्रभाव आम नागरिकों के स्वास्थ्य पर तो पड़ा ही, दिल्ली की परिवहन पुलिस पर भी पड़ा है और यही दशा कोलकाता और मुम्बई की | भी है, अर्थात् इससे मानव का जीवन (आयु) घट रहा है। ⦁ वायु-प्रदूषण के कारण ही फेफड़ों का कैंसर, टी० बी० तथा अन्य घातक रोग फैल रहे हैं। ⦁ वायु-प्रदूषण के कारण ओजोन की परत में छेद होने की सम्भावना व्यक्त होने से सम्पूर्ण विश्व भयाक्रान्त हो उठा है। ⦁ शुद्ध वायु न मिलने से शारीरिक विकास रुक गया है तथा शारीरिक क्षमता घटती जा रही है। ⦁ वायु-प्रदूषण मानव अस्तित्व के सम्मुख एक गम्भीर समस्या बन कर खड़ा हो गया है, जिसे रोकने में भारी व्यय करना पड़ रहा है। 3. ध्वनिप्रदूषण पर्यावरण प्रदूषण का एक रूप ध्वनि-प्रदूषण भी है। ध्वनि-प्रदूषण की समस्या नगरों में अधिक है। ध्वनि-प्रदूषण को साधारण शब्दों में शोर बढ़ने के रूप में स्पष्ट किया जा सकता है। पर्यावरण में शोर अर्थात् ध्वनियों का बढ़ जाना ही ध्वनि-प्रदूषण है। अब प्रश्न उठता है कि शोर क्या है? वास्तव में, प्रत्येक अनचाही तथा तीव्र आवाज शोर है। शोर का बढ़ना ही ध्वनि-प्रदूषण का बढ़ना कहा जाता है। ध्वनि-प्रदूषण के कारण – ध्वनि-प्रदूषण के लिए निम्नलिखित कारक उत्तर दायी हैं ⦁ ध्वनि-प्रदूषण परिवहन के साधनों; जैसे—बसों, ट्रकों, रेलों, वायुयानों, स्कूटरों आदि के द्वारा होता है। धड़धड़ाते हुए वाहन कर्कश स्वर देकर शोर उत्पन्न करते हैं, जिससे ध्वनि प्रदूषण उत्पन्न होता है। ⦁ कारखानों की विशालकाय मशीनें, कल-पुर्जे, इंजन आदि भयंकर शोर उत्पन्न करके ध्वनि प्रदूषण के स्रोत बने हुए हैं। ⦁ मस्जिदों में ध्वनि-विस्तारक यन्त्रों से होने वाली अजान, मन्दिरों में भजन, कीर्तन तथा गुरुद्वारों में शबद कीर्तन भी प्रदूषण के कारण हैं। ⦁ विभिन्न प्रकार के विस्फोटक भी ध्वनि-प्रदूषण के जन्मदाता हैं। ⦁ घरों पर जोर से बजने वाले रेडियो, टेलीविजन, टेपरिकॉर्डर, कैसेट्स तथा बच्चों की चिल्ल-पौं की ध्वनि भी प्रदूषण उत्पन्न करने के मुख्य साधन हैं। ⦁ वायुयान, सुपरसोनिक विमान व अन्तरिक्ष यान भी ध्वनि-प्रदूषण फैलाते हैं। ⦁ मानव एवं पशु-पक्षियों द्वारा उत्पन्न शोर भी ध्वनि-प्रदूषण का मुख्य कारण है। ⦁ आँधी, तूफान तथा ज्वालामुखी के उद्गार के फलस्वरूप भी ध्वनि-प्रदूषण उत्पन्न होता ⦁ ध्वनि-प्रदूषण निरोधक कानूनों को बनाना तथा उन्हें अमल में लाना।। ⦁ कम शोर करने वाली मशीनों को बनाना। ⦁ इमारतों के बाहर पेड़-पौधों, घास-झाड़ियों तथा घरों के अन्दर ध्वनि-शोषक साज-सज्जा एवं भवन निर्माण सामग्री का उपयोग करके ध्वनि-प्रदूषण के प्रभाव को कम करना। ⦁ सामाजिक दबाव बनाकर ध्वनि-प्रदूषण फैलाने वाले यन्त्रों को प्रयोग में लाने वाले व्यक्तियों को आवासीय बस्तियों तथा मनोरंजन के स्थानों से पृथक् करना। ⦁ जिन उद्योगों में तीव्र ध्वनि को नियन्त्रित करना सम्भव नहीं है, वहाँ कामगारों को श्रवणेन्द्रियों की रक्षा हेतु कान में लगायी जाने वाली उपयुक्त रक्षा-डाटों को उपलब्ध कराना। ⦁ जनसाधारण को ध्वनि-प्रदूषण के कुप्रभावों के प्रति जन-जागरण कार्यक्रमों के माध्यम से सचेत करना तथा संवेदनशील बनाना।। ⦁ स्कूलों में ध्वनि-प्रदूषण के विषय में ज्ञान देना। ⦁ ध्वनि-प्रदूषण मानव के कानों के परदों पर, मस्तिष्क और शरीर पर इतना घातक आक्रमण करता है कि संसार के सारे वैज्ञानिक तथा डॉक्टर इससे चिन्तित हो रहे हैं। ⦁ ध्वनि-प्रदूषण वायुमण्डल में अनेक समस्याएँ उत्पन्न करता है और मानव के लिए एक गम्भीर खतरा बन गया है। जर्मन नोबेल पुरस्कार विजेता रॉबर्ट कोक ने कहा है कि वह दिन दूर नहीं जब आदमी को अपने स्वास्थ्य के इस सबसे नृशंस शत्रु ‘शोर’ से पूरे जी-जान से लड़ना पड़ेगा। ⦁ ध्वनि-प्रदूषण के कारण व्यक्ति की नींद में बाधा उत्पन्न होती है। इससे चिड़चिड़ापन बढ़ता है तथा स्वास्थ्य खराब होने लगता है। ⦁ शोर के कारण सुनने की शक्ति कम होती है। बढ़ते हुए शोर के कारण मानव समुदाय बहरेपन की ओर बढ़ रहा है। ⦁ ध्वनि-प्रदूषण के कारण मानसिक तनाव बढ़ने से स्वास्थ्य पर कुप्रभाव पड़ता है। ⦁ ध्वनि-प्रदूषण मनुष्य के आराम में बाधक बनता जा रहा है। ध्वनि-प्रदूषण की समस्या दिन-प्रति – दिन बढ़ती जा रही है। इस अदृश्य समस्या का निश्चित समाधान खोजना नितान्त आवश्यक है। विक्टर गुएन ने ध्वनि प्रदूषण के दुष्प्रभावों को इन शब्दों में व्यक्त किया है, “शोर मृत्यु का मन्द गति अभिकर्ता है। यह मानव-मात्र का एक अदृश्य शत्रु है।” 4. मृदा-प्रदूषण भूमि पेड़-पौधों की वृद्धि एवं विकास के लिए आवश्यक लवण, खनिज तत्त्व, जल, वायु तथा कार्बनिक पदार्थ संचित रखती है। भूमि में उपर्युक्त पदार्थ प्रायः निश्चित अनुपात में पाये जाते हैं। इन पदार्थों की मात्रा में किन्हीं प्राकृतिक अथवा अप्राकृतिक कारणों से उत्पन्न होने वाला अवांछनीय परिवर्तन मृदा-प्रदूषण कहलाता है। दूसरे शब्दों में, “भूमि के भौतिक, रासायनिक या जैविक गुणों में ऐसा कोई भी अवांछित परिवर्तन जिसका हानिकारक प्रभाव मनुष्य तथा अन्य जीवों पर पड़ता है। अथवा जिससे भूमि की प्राकृतिक गुणवत्ता तथा उपयोगिता नष्ट हो जाती है, मृदा-प्रदूषण कहलाता है।” मृदा-प्रदूषण के कारण मृदा-प्रदूषण के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं ⦁ नगरों द्वारा ठोस कूड़ा-करकट फेंकने से तथा खानों के पास बेकार पदार्थों के ढेर जमा होने से भूमि अन्य कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं रहती। ⦁ दूषित क्षेत्रों से बहकर आया जल नदियों को प्रदूषित करता है। इन्हीं क्षेत्रों से जल का रिसाव भूमिगत जल में प्रदूषण फैलाता है। ⦁ सिंचाई से भी भूमि का प्रदूषण होने लगा है। सिंचित भूमि पर नमक या नमकीन परत जम जाती है, ऐसी भूमि खेती योग्य नहीं रहती। ⦁ अर्द्धमरुस्थलीय प्रदेशों में पवनें भारी मात्रा में बालू उड़ाकर पास-पड़ोस के खेतों में जमा कर देती हैं और खेत कृषि के लिए बेकार हो जाते हैं। ⦁ बाढ़ के दौरान कंकड़, पत्थर तथा रेत जमा हो जाने से खेत बर्बाद हो जाते हैं। ⦁ इसी प्रकार जनसंख्या की वृद्धि के साथ-साथ अधिक फसल पैदा करने के लिए भूमि की उर्वरता बढ़ाने या बनाये रखने के लिए उर्वरकों का उपयोग किया जाता है। विभिन्न प्रकार के कीटाणुनाशक पदार्थ (Pesticides), अपतृणनाशी पदार्थ (weedicides) आदि फसलों पर छिड़के जाते हैं। ये सभी पदार्थ मृदा के साथ मिलकर हानिकारक प्रभाव उत्पन्न कर सकते हैं। ⦁ मृदा में कार्बनिक खादों का प्रयोग करना चाहिए। ⦁ खेत में सदैव कम सिंचाई करनी चाहिए। ⦁ खेत में जल-निकास का उचित प्रबन्ध होना चाहिए। ⦁ खेतों की मेड़बन्दी करनी चाहिए, जिससे वर्षा के पानी से या भूमि के कटाव से जीवांश पदार्थ बहकर न निकल जाएँ। ⦁ विभिन्न प्रकार के कीटनाशक, साबुन व अपमार्जक, अपतृणनाशक व अन्य रासायनिक पदार्थ आदि सामान्य मृदा प्रदूषक होते हैं। अतः इन पदार्थों से भूमि को बचाना चाहिए। ⦁ दूषित-मृदा में रोगों के जीवाणु पनपते हैं, जिनसे मनुष्यों व अन्य जीवों में रोग फैलते हैं। ⦁ मृदा-प्रदूषण से पौधों की वृद्धि रुक जाती है, जिससे पूरी फसल ही बर्बाद हो जाती है। ⦁ फसल की बर्बादी से जीव-जन्तुओं तथा मनुष्यों को अनेक प्रकार की मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। यह स्पष्ट है कि अभी बताये गये उपायों को लागू करना केवल एक व्यक्ति के द्वारा सम्भव नहीं है। इस कार्य के लिए सरकार, विधिवेत्ताओं, वास्तुकारों, ध्वनि-अभियन्ता, नगर-परियोजना-अधिकारियों, पुलिस, मनोवैज्ञानिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा शिक्षकों सभी के सहयोग की आवश्यकता होगी। |
|
| 19. |
पर्यावरण को शुद्ध रखने के सम्बन्ध में केन्द्र सरकार तथा उत्तर : प्रदेश सरकार ने कौन-कौन से उपाय किये हैं ? यापर्यावरण शुद्धि के लिए केन्द्र सरकार तथा उत्तर : प्रदेश सरकार ने कौन-से उपाय किए हैं? |
|
Answer» पर्यावरण को शुद्ध रखने के उपाय पर्यावरण प्रदूषण की समस्या आज इतनी विस्फोटक हो चुकी है कि मानव अस्तित्व को खतरा उत्पन्न हो गया है। वर्तमान समय में हमें न तो शुद्ध वायु, जल तथा भोजन मिल रहा है और न शुद्ध पर्यावरण प्रदूषण की समस्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। वास्तव में, पर्यावरण के अशुद्ध होने से इस समस्या का जन्म हुआ है। अत: पर्यावरण को शुद्ध रखकर ही प्रदूषण की घातक समस्या का मुकाबला किया जा सकता है। पर्यावरण को निम्नलिखित उपायों द्वारा शुद्ध रखा जा सकता है (क) वायु-प्रदूषण के उपाय – पर्यावरण प्रदूषण में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण वायु-प्रदूषण है। वायु-प्रदूषण मनुष्य के जीवन और स्वास्थ्य के लिए सबसे अधिक हानिकारक है। वायु-प्रदूषण सबसे अधिक परिवहन के साधनों, उद्योगों व वनों की कटाई से होता है। अतः वायु-प्रदूषण को रोकने के लिए आवश्यक है कि 1. भारत जैसे विकासशील देश में, जहाँ नगरीकरण और औद्योगीकरण बढ़ रहा है, वायु प्रदूषण पर नियन्त्रण पाने के लिए वायुमण्डल की जाँच कराना प्रथम आवश्यक कार्य है, जिससे कि प्रदूषण के संकेन्द्रण को सीमा से अधिक बढ़ने से रोका जा सके। (ख) जल-प्रदूषण के उपाय – पर्यावरण को अशुद्ध करने में जल-प्रदूषण भी सबसे बड़ी समस्या है। जल को प्रदूषण से मुक्त करने के लिए निम्नलिखित उपाय किये जाने चाहिए – ग्रामीण अंचल में – ⦁ शौचालय तथा मल के गड्ढे खोदकर बनाये जाएँ। नगरीय क्षेत्रों में – ⦁ जल संयन्त्रों से पानी साफ किया जाए और उनकी समुचित देखभाल की व्यवस्था की जाए। (ग) ध्वनि-प्रदूषण के उपाय – पर्यावरण को ध्वनि प्रदूषण भी प्रदूषित कर रहा है। ध्वनिप्रदूषणकोरोकने के लिए निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं ⦁ वायुयानों, रेलों, बसों, कारों, स्कूटरों एवं मोटर साइकिलों आदि में शोर-शमन यन्त्र (साइलेंसर) ठीक काम करते हैं या नहीं इसकी पूरी देख-रेख की जाए। जहाँ ये ठीक काम न कर रहे हों वहाँ इनका सड़क पर चलना तुरन्त बन्द कराया जाए और इस व्यवस्था को न मानने वालों को दण्डित किया जाए। (घ) अन्य उपाय- ⦁ पर्यावरण को अशुद्ध करने में जनसंख्या में तीव्र वृद्धि भी मुख्य कारण है। अतः जनसंख्या-वृद्धि पर नियन्त्रण किया जाए। पर्यावरण को शुद्ध बनाये रखने के सम्बन्ध में केन्द्र पर्यावरण को शुद्ध रखने के सम्बन्ध में केन्द्र सरकार ने निम्नलिखित उपाय किये हैं ⦁ जल-प्रदूषण निवारण के लिए केन्द्र सरकार ने जल-प्रदूषण निवारण एवं नियन्त्रण अधिनियम, 1974 बनाया है। पर्यावरण को शुद्ध बनाये रखने के लिए उत्तर : प्रदेश सरकार ने निम्नलिखित प्रयास किये हैं 1. उत्तर प्रदेश शासन ने पर्यावरण सम्बन्धी समस्याओं पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने तथा उसके निदान के लिए पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी निदेशालय की स्थापना की। संक्षेप में, प्रदेश सरकार पर्यावरण को संरक्षण प्रदान करने के लिए उपर्युक्त सभी कार्य कर रही है। भारत सरकार का वायु प्रदूषण अधिनियम, 1981 जो अपने प्रदेश में भी लागू है, वायु-प्रदूषण पर नियन्त्रण कर रहा है। इसी प्रकार जल-प्रदूषण निवारण एवं नियन्त्रण अधिनियम, 1974 बना हुआ है, जो जल-प्रदूषण पर नियन्त्रण कर रहा है। प्रदेश में मोटर परिवहन ऐक्ट भी लागू है, जो धुआँ उगलने वाले एवं शोर करने वाले परिवहनों पर नियन्त्रण करके पर्यावरण को शुद्ध करने में सहायक है। पर्यावरण को शुद्ध रखने एवं पर्यावरण को संरक्षण प्रदान करने के लिए पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी विभाग, उत्तर : प्रदेश कार्यरत है। |
|
| 20. |
कल्पना कीजिए कि आप 14-15 साल के झुग्गी-झोंपड़ी में रहने वाले लड़का/लड़की हैं। आपका परिवार क्या काम करता है और आप कैसे रहते हैं? अपनी दिनचर्या का वर्णन करते हुए उस पर एक छोटा निबंध लिखिए। |
|
Answer» यदि आपने कोई झुग्गी-झोपड़ी देखी है तो आप वहाँ रहने वाले परिवार का वर्णन सरलता से कर सकते हैं। प्रायः झुग्गी-झोंपड़ी नगर में बड़ी-बड़ी इमारतों, होटलों एवं सरकारी कार्यालयों, पुलों, रेल की पटरियों के किनारों, रेलवे स्टेशनों के नजदीक, नगर के बाहरी इलाकों में स्थित होती हैं। झुग्गी-झोपड़ियाँ प्रायः छप्पर की या खपरैल की होती हैं तथा पूरा परिवार इसी में निवास करता है। पुरुष काम के लिए (रिक्शा चलाने, किसी निर्माण स्थल पर मजदूरी करने, कूड़ा बीनने या कोई अन्य कार्य करने हेतु) बाहर चला जाता है। कई बार परिवार की स्त्री भी अपने छोटे बच्चे के साथ मजूदरी करने चली जाती है। ऐसे परिवार में दिन में कोई भी नहीं रहता। जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते जाते हैं, वैसे-वैसे बच्चों को भी मजदूरी या अन्य किसी ऐसे काम (जैसे-पास के मुहल्ले में कारों की सफाई करना, पास के घरों में सफाई करना) में लगा दिया जाता है जिससे वह परिवार के लिए कुछ पैसे प्रतिदिन कमाकर लाएँ तथा परिवार का बोझ कम करें। 14-15 साल के लड़के/लड़कियाँ घरों में सारा दिन अथवा सुबह-शाम काम करते हैं तथा अपने हमउम्र साथियों के साथ बैठकर अपना समय बिताते हैं। यदि परिवार कोई अपना कार्य (जैसे-लोहे, लकड़ी या मिट्टी की कोई वस्तु बनाना) करता है तो बच्चे इस कार्य में परिवार की सहायता करते हैं। यदि झुग्गी-झोंपड़ी में रहने वाले परिवार मध्यम स्थिति में है तो वह बच्चों को शिक्षा के लिए सरकारी स्कूल में भी भेज सकता है। ऐसी स्थिति में 14-15 साल के लड़के/लड़कियाँ पढ़ाई के अतिरिक्त अन्य घरों में काम करके अथवा पारिवारिक काम में हाथ बँटाकर परिवार को सहयोग देते हैं। चूंकि झुग्गी-झोंपड़ियों में न तो पानी का इंतजाम होता है और न ही सार्वजनिक शौचालयों का, अतः इस आयु के बच्चे आस-पास से पानी भरकर लाने का भी काम करते हैं। |
|
| 21. |
“पर्यावरण किसी भी उस बाह्य शक्ति को कहते हैं जो हमें प्रभावित करती है। यह परिभाषा किस विद्वान ने प्रस्तुत की है?(क) जिसबर्ट(ख) रॉस(ग) मैकाइवर(घ) डेविस |
|
Answer» सही विकल्प है (ख) रॉस |
|
| 22. |
“पर्यावरण एक बाहरी शक्ति है, जो हमें प्रभावित करती है।” यह कथन किसका है ? (क) जिसबर्ट(ख) लैण्डिस(ग) मोटवानी(घ) रॉस |
|
Answer» सही विकल्प है (घ) रॉस |
|
| 23. |
पर्यावरणीय प्रदूषण क्या है? यह कितने प्रकार का होता है?यापर्यावरणीय प्रदूषण की परिभाषा कीजिए तथा इसके सामाजिक प्रभावों की विवेचना कीजिए।याभारत में प्रदूषण नियंत्रण हेतु सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की समीक्षा कीजिए।याप्रदूषण नियंत्रण हेतु कुछ उपाय बताइए। |
|
Answer» मानव ने अपनी सुख-सुविधाओं में वृद्धि हेतु पर्यावरण में इतना अधिक परिवर्तन कर दिया है। कि इससे पर्यावरणीय प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हो गई है। यह समस्या आज किसी एक देश की नहीं, है, अपितु सभी दे, कम या अधिक सीमा में इस समस्या का सामना कर रहे हैं। भारत में यह समस्या एक गंभीर स्थिति बनती जा रही है जिसके अनेक दुष्परिणाम आज हमारे सामने आ रहे हैं। पर्यावरण के विभिन्न घटकों में मानवीय क्रिया-कलापों से जो असंतुलन आता जा रहा है, वही प्रदूषण कहलाता है। पर्यावरणीय प्रदूषण का अर्थ एवं परिभाषाएँ जब पर्यावरण अनुकूल होता है तो उससे प्रभावित होने वाली वस्तु का विकास होता है और जब यह प्रतिकूल होता है तो विकास अवरूद्ध हो जाता है। उदाहरण के लिए एक बीज को यदि उपजाऊ भूमि में डाल दिया जाएगा और पानी नहीं दिया जाएगा तो प्रतिकूल पर्यावरण के कारण वह नष्ट हो जाएगा। इसी प्रकार, मनुष्य का विकास भी अनुकूल व प्रतिकूल पर्यावरण से भिन्न-भिन्न रूप से प्रभावित होता है। जिसबर्ट (Gisbert) के अनुसार, “प्रत्येक वह वस्तु जो किसी वस्तु को चारों ओर से घेरती एवं उस पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालती है, पर्यावरण कही जाती है।” टी०डी० इलियट के अनुसर, चैतन पदार्थ की इकाई के प्रभावकारी उद्दीपन और अन्त: क्रिया के क्षेत्रों को पर्यावरण कहते हैं। उपर्युक्त परिभाषाओं द्वारा ‘पर्यावरण’ का अर्थ स्पष्ट हो जाता है। वास्तव में, पर्यावरण एक विस्तृत अवधारणा है। इसके विभिन्न रूप एवं प्रभाव हैं। पर्यावरण जीवन के प्रत्येक पक्ष में अंतर्निहित होता है। यह मानव-शक्तियों को निर्देशित या विमुक्त, उत्साहित या हतोत्साहित कर देता है। यह उसकी वाणी को मोड़ देता है, यह उसके संगठन को सूक्ष्म रूप से परिवर्तित करता है। केवल इतना ही नहीं, बल्कि इससे भी अधिक यह उसके अंदर निवास करता है। यह उसके मस्तिष्क और मांसपेशियों में अंकित है। यह उसके रक्त में भी कार्य करता है। ‘प्रदूषण’ का अर्थ पर्यावरण के किसी एक घटक या संपूर्ण पर्यावरण में होने वाला ऐसा परिवर्तन है जो कि मानव व अन्य प्राणियों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। जब पर्यावरण में होने वाले परिवर्तन मानव तथा अन्य सजीवों व निर्जीवों को हानि पहुँचाने की स्थिति में पहुँच जाते हैं तो उसे हम प्रदूषण कहते हैं। मृदा (भूमि), जल एवं वायु भौतिक पर्यावरण के तीन प्रमुख घटक हैं। इनमें होने वाला असंतुलन जब जीवन-प्रक्रम चलाने में कठिनाई उत्पन्न करने लगता है तो उसे हम प्रदूषण कहते हैं। इसे निम्नांकित रूप में परिभाषित किया गया है – 1. अमेरिका के राष्ट्रपति की विज्ञान सलाहकार समिति (Science Advisory Committee to President of U.S.A) के अनुसार – “पर्यावरणीय प्रदूषण मनुष्यों की गतिविधियों द्वारा ऊर्जा स्वरूपों, विकिरण स्तरों, रासायनिक तथा भौतिक संगठनों और जीवों की संख्या में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से किए जाने वाले परिवर्तन के परिणामस्वरूप उत्पन्न उप-उत्पाद हैं जो हमारे परिवेश में पूर्ण अथवा अधिकतम प्रतिकूल परिवर्तन उत्पन्न करता है।” उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि पर्यावरणीय प्रदूषण हमारे पर्यावरण में होने वाला ऐसा रासायनिक, भौतिक या अन्य किसी प्रकार का परिवर्तन है जो मानव जीवन व अन्य प्राणियों के जीवन-प्रक्रम पर अवांछनीय या हानिकारक प्रभाव डालता है। पर्यावरणीय प्रदूषण के प्रकार ⦁ स्थलमण्डल (Lithosphere), 1. मृदीय प्रदूषण – मृदीय प्रदूषण का कारण मृदा में होने वाले अस्वाभाविक परिवर्तन हैं। प्रदूषित जल व वायु, उर्वरक, कीटाणुनाशक पदार्थ, अपतृणनाशी पदार्थ इत्यादि मृदा को भी प्रदूषित कर देते हैं। इसके काफी हानिकारक प्रभाव होते हैं तथा पौधों की वृद्धि रुक जाती है, कम हो जाती है अथवा उनकी मृत्यु होने लगती है। अगर मृदीय स्वरूप, मृदीय संगठन, मृदीय जल व वायु तथा मृदीय ताप में अस्वाभाविक परिवर्तन लाने का प्रयास किया जाता है तो इसका जीव-जंतुओं पर अत्यंत हानिकारक प्रभाव होता है। पर्यावरणीय प्रदूषण के प्रमुख कारण 1. कार्बन डाइऑक्साइड की बढ़ती मात्रा – वायुमंडल में प्रमुखतः नाइट्रोजन, ऑक्सीजन तथा कार्बन डाई-ऑक्साइड गैसों का संतुलित अनुपात होता है; किंतु मानव द्वारा विभिन्न प्रकार से वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ाई जा रही है। अनुमानतः गत 100 वर्षों में केवल मनुष्य ने ही वायुमण्डल में 36 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ी है। कल-कारखानों, यातायात के साधनों, ईंधन (Fuel) के जलाने आदि से यह कार्य हो रहा है। इस गैस का अनुपात बढ़ने से दोहरी हानि होने की आशंका है—एक तो यह स्वयं हानिकारक है। और दूसरे ऑक्सीजन जैसी प्राणदायक वायु का अनुपात कम होने का खतरा है। ये पदार्थ अवांछित रूप से भूमि, वायु, जल आदि में एकत्रित होकर उन स्थानों को प्रदूषित कर देते हैं। वहाँ से ये पौधों, भोजन, फलों इत्यादि के द्वारा जंतुओं और मनुष्यों के शरीर में पहुँच जाते हैं। इनमें देर से अपघटित (Decompose) होने वाले पदार्थ अधिक, खतरनाक होते हैं। भूमि में इनके एकत्रित होने से ह्युमस बनाने वाले जीव नष्ट हो जाते हैं। अतः भूमि की उर्वरता भी कम हो जाती है। मनुष्यों के शरीर में पहुँचकर ये तरह-तरह की हानियाँ पहुँचाते हैं। उपर्युक्त कारणों के अतिरिक्त जनसंख्या में अत्यधिक वृद्धि, वनों से वृक्षों का काटा जाना, नाभिकीय ऊर्जा, मृत पदार्थों तथा युद्ध इत्यादि को भी पर्यावरणीय प्रदूषण का कारण माना गया है। पर्यावरणीय प्रदूषण के सामाजिक प्रभाव 1. जीवन-प्रक्रम पर प्रभाव – प्रदूषण व्यक्तियों के जीवन-प्रक्रम तथा गतिविधियों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों रूपों से प्रभावित करता है। अत्यधिक प्रदूषण शारीरिक स्वास्थ्य तथा मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। बच्चों का विकास ठीक प्रकार से नहीं हो पाता तथा बीमारियों में वृद्धि हो जाती है। पर्यावरणीय प्रदूषण के निराकरण के उपाय 1. पर्यावरण संगठनों का गठन – सबसे पहले चौथी योजना के प्रारंभ में सरकार का ध्यान पर्यावरण संबंधी समस्याओं की ओर आकर्षित हुआ। इस दृष्टि से सरकार ने सर्वप्रथम 1972 ई० में एक पर्यावरण समन्वय समिति का गठन किया। जनवरी 1980 ई० में एक अन्य समिति का गठन किया जिसे विभिन्न कानूनों तथा पर्यावरण को बढ़ावा देने वाले प्रशासनिक तंत्र की विवेचना करने और उन्हें सुदृढ़ करने हेतु सिफारिशें देने का कार्य सौंपा गया। इस समिति की सिफारिश पर 1980 ई० में पर्यावरण विभाग की स्थापना की गई। परिणामस्वरूप पर्यावरण के कार्यक्रमों के आयोजन, प्रोत्साहन और समन्वय के लिए 1985 ई० में ‘पर्यावरण और वन्य-जीवन मंत्रालय की स्थापना की गई। 5. अन्य योजनाएँ – पर्यावरणीय प्रदूषण के निराकरण हेतु जो योजनाएँ बनाई गईं, उनमें से प्रमुख योजनाएँ इस प्रकार हैं – |
|
| 24. |
निम्नलिखित में से किस विद्वान ने भौगोलिक निश्चयवाद का समर्थन किया है?(क) बकल(ख) लीप्ले(ग) हटिंग्टन(घ) ये सभी |
|
Answer» सही विकल्प है (घ) ये सभी |
|
| 25. |
क्या आप जानते हैं कि रिज इलाके के जंगल में पायी जाने वाली वनस्पति क्षेत्रीय नहीं है। बलिक अंग्रेजों द्वारा लगभग सन 1915 में लगाई गई थी? |
|
Answer» यह सही है कि रिज इलाके के जंगल में पायी जाने वाली वनस्पति क्षेत्रीय नहीं है बल्कि अंग्रेजों द्वारा लगभग 1915 ई० में लगाई गई थी। इस इलाके में मुख्य रूप से विलायती कीकर अथवा विलायती बबूल के वृक्ष पाए जाते हैं जो दक्षिणी अमेरिका से लाकर यहाँ लगाए गए थे और अब संपूर्ण उत्तरी भारत में ऐसे वृक्ष प्राकृतिक रूप में पाए जाते हैं। |
|
| 26. |
निम्नलिखित में भौतिक संस्कृति का गुण है।(क) बाध्यता का गुण(ख) क्रमिक विकास का गुण(ग) माप का गुण।(घ) स्थिरता का गुण |
|
Answer» (ग) माप का गुण |
|
| 27. |
निम्नलिखित में से कौन भौगोलिक तत्त्व नहीं है ?(क) नदी(ख) आकाश(ग) सूर्य(घ) लकड़ी का फर्नीचर |
|
Answer» (घ) लकड़ी का फर्नीचर |
|
| 28. |
निम्नलिखित में से आप किसे सांस्कृतिक पर्यावरण में सम्मिलित करेंगे ?(क) मौसम को(ख) मन्दिर को(ग) भाषा को(घ) नदी को |
|
Answer» सही विकल्प है (ग) भाषा को |
|
| 29. |
सांस्कृतिक पर्यावरण व्यक्तित्व-निर्माण को कैसे प्रभावित करता है ? |
|
Answer» मानव जन्म से कुछ शारीरिक गुण एवं क्षमताएँ लेकर पैदा होता है, किन्तु संस्कृति लेकर नहीं। सांस्कृतिक पर्यावरण में ही मानव के गुणों व क्षमता का विकास होता है। समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा व्यक्ति को समाज व संस्कृति की अनेक बातें सिखायी जाती हैं। व्यक्तित्व संस्कृति की ही देन है, संस्कृति के अभाव में व्यक्तित्व का समुचित विकास नहीं हो सकता। सांस्कृतिक पर्यावरण में रहकर ही व्यक्ति परम्पराओं, विश्वासों, नैतिकता, आदर्श आदि को ग्रहण करता है, जो उसके व्यक्तित्व का अंग बन जाते हैं। सांस्कृतिक पर्यावरण में भिन्नता के कारण ही हमें विभिन्न प्रकार के व्यक्तित्व देखने को मिलते हैं और व्यक्ति की मनोवृत्तियों, विचारों, विश्वासों एवं व्यवहारों में भिन्नता पायी जाती है। उदाहरणार्थ-भारत में किसी व्यक्ति का सम्मान करने के लिए लोग खड़े हो जाते हैं और हाथ जोड़ते हैं, जब कि अंग्रेज लोग सम्मान प्रकट करने के लिए सिर से अपना टोप उतार देते हैं। मुस्लिम स्त्रियाँ बुर्का पहनती हैं, किन्तु अमेरिकन स्त्रियाँ नहीं। स्पष्ट है कि व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण में सांस्कृतिक पर्यावरण महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। |
|
| 30. |
प्राकृतिक पर्यावरण तथा सांस्कृतिक पर्यावरण का सम्बन्ध स्पष्ट कीजिए। |
|
Answer» प्राकृतिक पर्यावरण के अन्तर्गत सभी प्राकृतिक और भौगोलिक शक्तियों का समावेश होता है। पृथ्वी, आकाश, वायु, जल, वनस्पति और जीव-जन्तु पर्यावरण के अंग हैं। प्राकृतिक पर्यावरण का मानव-जीवन पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है। मनुष्य द्वारा निर्मित वस्तुओं का समग्र रूप का परिवेश सांस्कृतिक पर्यावरण कहलाता है। आवास, विद्यालय, टेलीविजन, मशीनें, धर्म, संस्कृति, भाषा, रूढ़ियाँ, सभी सांस्कृतिक पर्यावरण के अंग हैं। इन सभी का निर्धारण प्राकृतिक पर्यावरण द्वारा किया जाता है। इस प्रकार प्राकृतिक पर्यावरण हमारे रहनसहन, भोज्य पदार्थ, वस्त्र-चयन आदि सभी को प्रभावित करता है। इन दोनों में घनिष्ठ सम्बन्ध है। |
|
| 31. |
प्राकृतिक पर्यावरण और सांस्कृतिक पर्यावरण की किन्हीं दो विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। |
|
Answer» प्राकृतिक पर्यावरण की दो विशेषताएँ— ⦁ प्राकृतिक पर्यावरण प्रकृति-प्रदत्त है तथा इसमें भौतिक वस्तुएँ; जैसे-नदी, पहाड़, नक्षत्र, पृथ्वी, समुद्र आदि आते हैं तथा सांस्कृतिक पर्यावरण की दो विशेषताएँ– ⦁ सांस्कृतिक पर्यावरण केवल मानव को प्रभावित करता है तथा |
|
| 32. |
निम्नलिखित में से किसे आप सांस्कृतिक पर्यावरण में सम्मिलित नहीं करेंगे ?(क) भाषा को(ख) रीति-रिवाज को(ग) मार्गों की बनावट को(घ) धार्मिक विश्वास को |
|
Answer» (ग) मार्गों की बनावट को |
|
| 33. |
हंटिंग्टन ने प्रतिभा व सभ्यताओं के विकास के लिए क्या आवश्यक माना है ? |
|
Answer» हंटिंग्टन ने प्रतिभा व सभ्यताओं के विकास के लिए अनुकूल जलवायु का होना आवश्यक माना है। |
|
| 34. |
निम्नलिखित में आप किसे अभौतिक संस्कृति के अन्तर्गत नहीं रखेंगे ?(क) उपन्यास को(ख) भवन को(ग) अन्धविश्वास को(घ) संस्कार को |
|
Answer» सही विकल्प है (ख) भवन को |
|
| 35. |
भौगोलिक पर्यावरण का जन्म-दर व मृत्यु-दर पर क्या प्रभाव पड़ता है ? |
|
Answer» भौगोलिक पर्यावरण एवं जन्म व मृत्यु-दर के बीच सह-सम्बन्ध बताते हुए जेनकिन (Jenkin) कहते हैं कि भूमध्य रेखा की ओर मृत्यु-दर अधिक व ध्रुवीय प्रदेशों की ओर कम होती जाती है। उष्ण प्रदेशों में शीत प्रदेशों की तुलना में जीवन-अवधि कम होती है। इसी प्रकार से जुलाई, अगस्त, सितम्बर व अक्टूबर में जन्म-दर अन्य महीनों की अपेक्षा अधिक एवं जनवरी, फरवरी व मार्च में बहुत कम होती है। मौसम का परिवर्तन यौन-व्यवहारों को प्रभावित करता है, जिससे जन्म-दर पर भी असर पड़ता है। प्राकृतिक विपदाएँ, रोग एवं महामारियाँ मृत्यु-दर को प्रभावित करती हैं। इस तरह प्राकृतिक कारक एवं जन्म तथा मृत्यु-दर परस्पर सम्बन्धित हैं। |
|
| 36. |
मैकाइवर एवं पेज ने सम्पूर्ण पर्यावरण को क्या वर्गीकरण किया है ? |
|
Answer» मैकाइवर एवं पेज ने सम्पूर्ण पर्यावरण को दो प्रमुख भागों में विभाजित किया हैसामाजिक पहलू एवं भौतिक पहलू। सामाजिक पहलू के अन्तर्गत लोकरीतियों, प्रथाओं, कानूनों, संस्थाओं, सामाजिक सम्बन्धों, जातीय समूहों, वंशानुगत प्रथाओं, सामाजिक विरासत आदि को सम्मिलित किया गया है। भौतिक या प्राकृतिक पहलू बहुत विस्तृत है, इसे दो भागों में बाँटा गया है– ⦁ मानव द्वारा असंशोधित एवं |
|
| 37. |
लैण्डिस द्वारा प्रस्तुत पर्यावरण के वर्गीकरण को लिखिए। |
|
Answer» लैण्डिस ने सम्पूर्ण पर्यावरण को निम्नलिखित तीन भागों में बाँटा है 1. प्राकृतिक पर्यावरण – इसके अन्तर्गत वे सभी प्राकृतिक शक्तियाँ एवं वस्तुएँ आती हैं, जिनका निर्माण प्रकृति ने किया है; जैसे-भूमि, तारे, सूर्य, चन्द्र, नदी, पहाड़, समुद्र, जलवायु, पेड़-पौधे, पशु-जगत्, भूकम्प, बाढ़ आदि। ये सभी मानव एवं समाज को प्रभावित करते हैं। 2, सामाजिक पर्यावरण – इसके अन्तर्गत मानवीय सम्बन्धों से निर्मित सामाजिक समूह, संगठन, समाज, समुदाय, समिति, संस्था आदि आते हैं, जो व्यक्ति को जन्म से लेकर मृत्यु तक प्रभावित करते हैं, उसका समाजीकरण करते हैं और उसे मानव की संज्ञा प्रदान करने में सहायक होते हैं। 3. सांस्कृतिक पर्यावरण – इसके अन्तर्गत धर्म, नैतिकता, प्रथाएँ, लोकाचार, कानून, प्रौद्योगिकी, व्यवहार-प्रतिमान आदि आते हैं, जिन्हें मनुष्य अपने अनुभवों एवं सामाजिक सम्पर्क के कारण सीखता है और उनके अनुरूप अपने को ढालने का प्रयास करता है। |
|
| 38. |
विचारात्मक (संवेदनात्मक) संस्कृति की अवधारणा किस समाजशास्त्री से सम्बन्धित है ? |
|
Answer» विचारात्मक संस्कृति की अवधारणा मैकाइवर एवं पेज से सम्बन्धित है। |
|
| 39. |
सोरोकिन द्वारा वर्णित दो संस्कृतियों के नाम लिखिए। |
|
Answer» (i) भावात्मक संस्कृति, |
|
| 40. |
सामाजिक पर्यावरण से क्या तात्पर्य है ? |
|
Answer» सामाजिक पर्यावरण के अन्तर्गत मानवीय सम्बन्धों से निर्मित सामाजिक समूह, संगठन, समुदाय, समिति आदि आते हैं, जो व्यक्ति को जन्म से लेकर मृत्यु तक प्रभावित करते हैं और उसका समाजीकरण करते हैं। |
|
| 41. |
संस्कृति केवल मानव-समाज में ही क्यों पायी जाती है ? |
|
Answer» मनुष्य में कुछ ऐसी मानसिक एवं शारीरिक विशेषताएँ हैं जिनके कारण वह संस्कृति को निर्मित एवं विकसित कर सका है। अन्य प्राणियों में, मानवे के समान शारीरिक एवं मानसिक क्षमताओं के अभाव के कारण संस्कृति का निर्माण नहीं हो सका। |
|
| 42. |
आधुनिकीकरण के भारतीय समाज एवं संस्कृति पर पड़ने वाले प्रभावों की विवेचना कीजिए। |
|
Answer» भारतीय समाज आज आधुनिकीकरण की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है। भारतीय समाज एवं संस्कृति पर आधुनिकीकरण के प्रभाव से उत्पन्न होने वाले प्रमुख परिवर्तनों को निम्नलिखित क्षेत्रों में देखा जा सकता है| 1. प्रौद्योगिक विकास – भारत में आधुनिकीकरण का सर्वप्रमुख परिणाम प्रौद्योगिक विकास के रूप में देखने को मिलता है। आज भारत में सूती कपड़ों, रासायनिक खादों, सीमेण्ट, जूट, भारी मशीनों, दवाइयों, कारों आदि के उत्पादन के बड़े-बड़े कारखाने स्थापित हो चुके हैं। प्रौद्योगिक विकास के साथ विभिन्न प्रकार के व्यवसायों में इतनी वृद्धि हुई कि हमारे समाज में अनेक संरचनात्मक परिवर्तन होने लगे। 2. जीवन-स्तर में सुधार – भारत में भूमि-सुधारों तथा विभिन्न विकास कार्यक्रमों के फलस्वरूप जीवन के सभी पक्षों में आधुनिकीकरण को प्रोत्साहन मिला। कुछ समय पहले तक समाज के जो दुर्बल वर्ग जीवन की अनिवार्य सुविधाएँ पाने से भी वंचित थे, उनमें भी चीनी और स्टील के बर्तनों का उपयोग देखने को मिलता है। जीवन-स्तर में होने वाला यह सुधार उन मनोवृत्तियों का परिणाम है, जो आधुनिकता की उपज हैं। 3; कृषि का आधुनिकीकरण – आधुनिकता का स्पष्ट प्रभाव ग्रामीण समाज पर देखने को मिलता है, जहाँ कृषि की नयी प्रविधियों का प्रयोग बढ़ता जा रहा है। अब अधिकांश ग्रामीण ट्रैक्टर, कल्टीवेटर, पम्पिंग सैटों, श्रेसर तथा स्प्रेयर आदि का प्रयोग करके कृषि उत्पादन को बढ़ाने में लगे हैं। कृषि के आधुनिकीकरण से गाँव और नगर के लोगों की दूरी कम हुई तथा ग्रामीणों का विस्तृत जगत से सम्पर्क बढ़ने लगा। 4. समाज-सुधार को प्रोत्साहन – आधुनिकीकरण का सामाजिक संरचना पर सबसे स्पष्ट प्रभाव समाज-सुधार की प्रक्रिया के रूप में देखने को मिलता है। आधुनिकीकरण से उत्पन्न होने वाली मनोवृत्तियों के परिणामस्वरूप उन अन्धविश्वासों और कुरीतियों का प्रभाव तेजी से कम होने लगा जो सैकड़ों वर्षों से भारतीय सामाजिक जीवन को विघटित कर रही थीं। अस्पृश्यता, पर्दा प्रथा, बहुपत्नी विवाह तथा दहेज-प्रथा जैसी सामाजिक कमजोरियाँ क्षीण होती जा रही हैं। 5. शिक्षा का प्रसार – आधुनिकीकरण का एक अन्य प्रभाव शिक्षा के प्रति लोगों की मनोवृत्तियों में व्यापक परिवर्तन होना है। आज अधिकांश माता-पिता आर्थिक तंगी के बाद भी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के पक्षधर हैं। इसी के फलस्वरूप शिक्षित लोगों के प्रतिशत तथा शिक्षा के स्तर में व्यापक सुधार हो सका। 6. सामाजिक मूल्यों एवं मनोवृत्तियों में परिवर्तन – आधुनिकीकरण के प्रभाव से भारत के परम्परागत मूल्यों में परिवर्तन होने के साथ ही विभिन्न वर्गों की मनोवृत्तियों में भी व्यापक परिवर्तन हुए। अब अधिकांश लोग भाग्य की अपेक्षा व्यक्तिगत योग्यता और परिश्रम को अधिक महत्त्व देने लगे हैं। जातिगत विभेदों की जगह समानता और सामाजिक न्याय के मूल्यों के प्रभाव में वृद्धि हुई है। |
|
| 43. |
आदर्शात्मक संस्कृति की अवधारणा किसने दी ? |
|
Answer» आदर्शात्मक संस्कृति की अवधारणा पिटरिम ए० सोरोकिन ने दी। |
|
| 44. |
किस विद्वान ने प्राकृतिक परिस्थितियों को धार्मिक व्यवहार के साथ जोड़ने का प्रयास किया है ? |
|
Answer» मैक्स मूलर विद्वान ने प्राकृतिक परिस्थितियों को धार्मिक व्यवहार के साथ जोड़ने का प्रयास किया है । |
|
| 45. |
भौगोलिक पर्यावरण के चार प्रत्यक्ष प्रभाव बताइए। |
|
Answer» भौगोलिक पर्यावरण के चार प्रत्यक्ष प्रभाव निम्नवत् हैं 1. जनसंख्या पर प्रभाव – किसी देश की जनसंख्या कितनी होगी यह वहाँ की अनुकूल या भौगोलिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है। 2. आवास पर प्रभाव – भौगोलिक पर्यावरण का मनुष्य के आवास पर पर सीधा प्रभाव पड़ता है। उदाहरणार्थ-पर्वतीय क्षेत्रों में मकानों को बनाने में पत्थरों और लकड़ियों का अधिक प्रयोग होता है। वहीं, मैदानी इलाकों में ईंटों या मिट्टी आदि का। 3. वेशभूषा पर प्रभाव – भौगोलिक पर्यावरण का मनुष्य की वेशभूषा पर पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। गर्म जलवायु वाले देशों में लोग बारीक व ढीले वस्त्र पहनते हैं, वहीं ठण्डे क्षेत्रों में गर्म व चुस्त कपड़ों का अधिक उपयोग होता है। खान-पान पर प्रभाव-भोजन की सामग्री भी भौगोलिक पर्यावरण से प्रभावित होती है। जिस क्षेत्र में जो खाद्य पदार्थ अधिक होते हैं। उनका प्रचलन वहीं पर अधिक होता है। |
|
| 46. |
निम्नांकित में किसने ‘द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद’ की अवधारणा प्रस्तुत की हैं?(क) आगस्त कॉम्टे(ख) कार्ल मार्क्स(ग) हरबर्ट स्पेन्सर(घ) जॉर्ज सिपेल |
|
Answer» सही विकल्प है (ख) कार्ल मार्क्स |
|
| 47. |
निम्नलिखित में से कौन-सा अभौतिक संस्कृति का गुण है ?(क) परिवर्तनशीलता का गुण(ख) स्थिरता का गुण(ग) माप का गुण(घ) वैकल्पिकता का गुण |
|
Answer» (ख) स्थिरता का गुण |
|
| 48. |
सांस्कृतिक पर्यावरण से क्या तात्पर्य है ? सांस्कृतिक पर्यावरण के समाज पर प्रभावों को बताइएयासांस्कृतिक पर्यावरण क्या है? इसके भिन्न-भिन्न प्रभावों का उल्लेख कीजिए यासांस्कृतिक पर्यावरण की परिभाषा दीजिए यह सामाजिक जीवन को किस प्रकार से प्रभावित करता है? |
|
Answer» सांस्कृतिक पर्यावरण का अर्थ और परिभाषा पर्यावरण के निर्माण में प्रकृति के साथ-साथ मनुष्य का भी हाथ रहता है मनुष्य द्वारा निर्मित पर्यावरण सांस्कृतिक पर्यावरण कहलाता है सांस्कृतिक पर्यावरण के स्वरूप को सँभालने में प्रत्येक आगामी पीढ़ी का योगदान रहता है इस प्रकार भौतिक और अभौतिक रूप में पीढ़ी को अपने पूर्वजों से जो प्राप्त होता है उसे ही सांस्कृतिक पर्यावरण कहा जाता है भवन, विद्यालय, बाँध, शक्तिगृह, जलयान, रेलगाड़ी, मेज, पेन व चश्मा सभी सांस्कृतिक पर्यावरण के अंग हैं इन्हें भौतिक संस्कृति के अन्तर्गत रखा जाता है रीति-रिवाज, धर्म, आचरण, भाषा, लिपि व साहित्य भी सांस्कृतिक पर्यावरण के अंग हैं इन्हें अभौतिक संस्कृति कहा जाता है विभिन्न विद्वानों ने सांस्कृतिक पर्यावरण को निम्नलिखित रूप से परिभाषित किया है हर्सकोविट्स के अनुसार, “सांस्कृतिक पर्यावरण के अन्तर्गत वे सभी भौतिक और अभौतिक वस्तुएँ सम्मिलित हैं जिनका निर्माण मानव ने किया है” मैकाइवर एवं पेज के अनुसार, “सम्पूर्ण सामाजिक विरासत सांस्कृतिक पर्यावरण है’ उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि भूमण्डल की समस्त भौतिक और अभौतिक सांस्कृतिक धरोहर सांस्कृतिक पर्यावरण है हर्सकोविट्स का मानना है कि सांस्कृतिक पर्यावरण का निर्माण मानव द्वारा होता है प्राकृतिक पर्यावरण से मानव जिस कृति को निर्माण करती है, इन्हीं कृतियों के सम्पूर्ण योग को सांस्कृतिक पर्यावरण कही जाता है सम्पूर्ण भौतिक, अभौतिक सांस्कृतिक विरासत को सांस्कृतिक पर्यावरण कहा जाता है सांस्कृतिक पर्यावरण पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित होता है प्रत्येक काल में इसमें सुधार होता है और इसकी अभिवृद्धि होती है सांस्कृतिक पर्यावरण को इस प्रकार भी समझा जा सकता है यदि सम्पूर्ण पर्यावरण में से भौगोलिक पर्यावरण को घटा दें तो जो कुछ बचता है उसे सांस्कृतिक पर्यावरण कहा जाता है प्राकृतिक पर्यावरण की तरह सांस्कृतिक पर्यावरण भी मानव के सामाजिक जीवन का अभिन्न अंग होता है सांस्कृतिक पर्यावरण का सामाजिक जीवन पर प्रभाव संस्कृति सीखा हुआ व्यवहार है यह मानव के सामाजिक जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है संस्कृति से सांस्कृतिक पर्यावरण जन्म लेता है सम्पूर्ण सांस्कृतिक विरासत सांस्कृतिक पर्यावरण के रूप में सामाजिक मानव का प्रत्येक क्षेत्र में मार्गदर्शन करती है यह पग-पग पर मानव-व्यवहार को नियन्त्रित कर उसे सुखी और सम्पन्न जीवनयापन का मार्ग दिखाती है सम्पूर्ण सांस्कृतिक विरासत मनुष्य को पशुवत् व्यवहार करने से रोककर समाज में सद्गुणों का समावेश करती है सांस्कृतिक पर्यावरण के समाज पर पड़ने वाले प्रभावों को निम्नलिखित रूप में स्पष्ट किया जा सकता है– 1. सामाजिक संगठन पर प्रभाव – सांस्कृतिक पर्यावरण सामाजिक संगठन को प्रभावित करता है, क्योंकि संस्कृति के अनुरूप ही सामाजिक संगठन, सामाजिक संरचना तथा सामाजिक संस्थाओं का विकास होता है उदाहरण के लिए, किसी समाज में परिवार तथा विवाह का क्या रूप होगा, यह वहाँ के सांस्कृतिक मूल्यों और आदर्शों पर निर्भर करता है व्यक्ति की सामाजिक स्थिति, महिलाओं की सामाजिक स्थिति, उत्तर :ाधिकार के नियम, विवाह-विच्छेद के नियम इत्यादि सांस्कृतिक मान्यताओं से प्रभावित होते हैं इसीलिए विभिन्न संस्कृतियों में पनपने वाले सामाजिक संगठन भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं सांस्कृतिक पर्यावरण की परिवर्तनशील प्रकृति होने पर सामाजिक संगठन में भी तेजी से परिवर्तन आता है 2. आर्थिक जीवन पर प्रभाव – सांस्कृतिक पर्यावरण व्यक्तियों के आर्थिक जीवन को भी प्रभावित करता है। यदि सांस्कृतिक मूल्य आर्थिक विकास में सहायता देने वाले हैं तो वहाँ व्यक्तियों का आर्थिक जीवन अधिक उन्नत होगा। मैक्स वेबर (Max Weber) ने हमें बताया है कि प्रोटेस्टेण्ट ईसाइयों की धार्मिक मान्यताएँ पूँजीवादी प्रवृत्ति के विकास में सहायक हुई हैं। इसीलिए प्रोटेस्टेण्ट ईसाइयों के बहुमत वाले देशों में पूँजीवाद अधिक है। यदि सांस्कृतिक मूल्ये आर्थिक विकास में बाधक हैं तो व्यक्तियों के आर्थिक जीवन पर इनका कुप्रभाव पड़ता है तथा वे आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हुए रहते हैं। 3. प्रौद्योगिकीय विकास पर प्रभाव – सांस्कृतिक पर्यावरण आर्थिक जीवन को प्रभावित करने के साथ-साथ प्रौद्योगिकीय विकास की गति को भी निर्धारित करता है। भौतिकवादी संस्कृति भौतिक उपलब्धियों तथा भोग-विलास पर अधिक बल देती है तथा वैज्ञानिक आविष्कारों को तीव्र गति प्रदान करती है। आध्यात्मिकता पर बल देने वाली संस्कृति में रचनात्मक व आध्यात्मिक सुख के साधनों के विकास पर अधिक बल दिया जाता है। इस प्रकार प्रौद्योगिकीय विकास व आविष्कार भी सांस्कृतिक पर्यावरण द्वारा प्रभावित होते हैं। 4. राजनीतिक संगठन पर प्रभाव – सांस्कृतिक पर्यावरण का राजनीतिक संगठन तथा राजनीतिक संस्थाओं पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। किसी देश में सरकार का स्वरूप क्या होगा, सभी व्यक्तियों को समान रूप से वयस्क मताधिकार मिलेगा या नहीं, सभी को राजनीतिक क्रियाओं में भाग लेने की स्वतन्त्रता होगी या नहीं इत्यादि सभी बातों पर सांस्कृतिक मूल्यों का गहरा प्रभाव पड़ता है। राज्य द्वारा सभी नागरिकों की रक्षा या विशेष वर्ग की रक्षा करना अथवा राज्य द्वारा बनाये जाने वाले कानूनों व अधिनियमों पर भी सांस्कृतिक पर्यावरण का प्रभाव पड़ता है। इसी कारण विभिन्न संस्कृतियों वाले समाजों में राजनीतिक संगठन की दृष्टि से अन्तर पाये जाते हैं। 5. धार्मिक व्यवस्था पर प्रभाव – व्यक्तियों का धार्मिक जीवन भी सांस्कृतिक पर्यावरण द्वारा प्रभावित होता है। धार्मिक संस्थाओं व संगठनों का रूप संस्कृति द्वारा निर्धारित होता है; उदाहरणार्थ-भारतीय संस्कृति ने धर्म के विकास में सहायता दी है और इसी कारण आज सभी प्रमुख धर्मों के लोग भारत में विद्यमान हैं। आज भी भारतीय अलौकिक शक्तियों में विश्वास करते हैं, जब कि पश्चिमी देशों में लौकिकीकरण तेजी से हुआ है और धर्म का प्रभाव भौतिकवादी संस्कृति के कारण दिन-प्रतिदिन कम होता जा रहा है। सांस्कृतिक पर्यावरण में परिवर्तन आने पर ही धर्म का स्वरूप भी बदल जाता है। भारतीय संस्कृति के कारण ही धर्म जीवन पद्धति का अंग बना हुआ है। यहाँ सामाजिक जीवन में अध्यात्मवाद विशेष स्थान प्राप्त कर चुका है। 6. समाजीकरण की प्रक्रिया पर प्रभाव – सांस्कृतिक पर्यावरण समाजीकरण की प्रक्रिया को भी प्रभावित करता है। बच्चा जन्म के समय तो केवल एक जीवित पुतला होता है जिसे सामाजिक गुण वहाँ की संस्कृति के अनुरूप प्राप्त होते हैं। सांस्कृतिक आदर्शों के अनुरूप वह बोलना, खाना-पीना, वस्त्र पहनना तथा प्रथाओं व रीति-रिवाजों को सीखता है। भारतीय समाज में समाजीकरण की प्रक्रिया भारतीय संस्कृति से प्रभावित है, जब कि पश्चिमी देशों में समाजीकरण की प्रक्रिया वहाँ की संस्कृति के अनुरूप है। अतः व्यक्ति में विकसित होने वाले सामाजिक गुण उसके सांस्कृतिक पर्यावरण की उपज होते हैं। 7. व्यक्तित्व के निर्माण पर प्रभाव – संस्कृति का व्यक्तित्व से गहरा सम्बन्ध है। व्यक्ति को व्यक्तित्व किस प्रकार से निर्मित होगा, यह वहाँ की संस्कृति पर निर्भर करता है। समाजीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से ही व्यक्ति उन बातों को ग्रहण करता है जो वहाँ की संस्कृति के अनुरूप होती हैं। अहिंसा, त्याग, सम्मान, नैतिकता, स्वतन्त्रता आदि मूल्यों का अधिग्रहण व्यक्ति संस्कृति द्वारा ही करता है। अनेक अध्ययनों से हमें पता चला है कि संस्कृति के अनुरूप ही व्यक्तित्व का विकास होता है। उपर्युक्त विवेचना से यह स्पष्ट हो जाता है कि सांस्कृतिक पर्यावरण का व्यक्ति के सामाजिक जीवन तथा अन्य सभी पक्षों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। समाज का सम्पूर्ण ढाँचा सांस्कृतिक पर्यावरण के अनुरूप ही बनता है। सांस्कृतिक पर्यावरण वह महत्त्वपूर्ण शक्ति है जो मानव-जीवन को समग्र रूप से प्रभावित और परिवर्तित करती है। यद्यपि सांस्कृतिक पर्यावरण का निर्माण मनुष्य द्वारा ही होता है फिर भी वह उससे पूरी तरह प्रभावित होता है। एक व्यक्ति जिस सांस्कृतिक पर्यावरण में रहता है उसमें वैसी ही संस्कृति का उविकास होता है। वहाँ के सांस्कृतिक मूल्य उसके व्यवहार में पूरी तरह रच-बस जाते हैं। मानवीय जीवन की दशाएँ और सामाजिक जीवन के प्रतिमान सांस्कृतिक पर्यावरण द्वारा ही निर्धारित होते हैं |
|
| 49. |
‘सांस्कृतिक विलम्बना या पिछड़न किसकी अवधारणा है ?यासांस्कृतिक विलम्बना का सिद्धान्त किसने प्रस्तुत किया ? |
|
Answer» ‘सांस्कृतिक विलम्बना या पिछड़न’ ऑगबर्न की अवधारणा है। |
|
| 50. |
निम्नलिखित में से किस विद्वान ने सामाजिक परिवर्तन को बौद्धिक विकास का परिणाम माना है ?(क) जॉर्ज सी० होमंस ने(ख) बीसेज एवं बीसेज ने(ग) आगस्त कॉम्टे ने(घ) रॉबर्ट बीरस्टीड ने |
|
Answer» सही विकल्प है (ग) आगस्त कॉम्टे ने |
|