This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.
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Which of the following compound is/are a pair of isomers ?A. B. C. D. |
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Answer» Correct Answer - A,C,D (a)`Ph-undersetunderset(O)(||)C-NH-CH_3` and `Ph-undersetunderset(CH_3)(|)C=N-OH` are structural isomers. (b)These compounds are identicle (c )These are chain isomers |
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What is calcium carbonate (caco3)commonly known as? |
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Answer» Calcium Carbonate (CaCO3) commonly known as Limestone, Marble, Chalk. Limestone is the common name for CaCo3. |
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Which of the following is strongest base?A. B. C. D. |
| Answer» Correct Answer - 4 | |
| 4. |
Which of the following statements are correct ?A. A meso compound has chiral centres but ehibits no optical activityB. A racemic mixture is optically inactive because of two equal and opposite rotation of same isomers, of the molecules in the mixtureC. A meso compound has molecules which are superimpossable on their mirror images even though they contain chiral centresD. A meso compound is optically inactive because the rotation caused by any molecule is cancelled by an equal and opposite rotation caused by another molecules that is the mirror image of the first |
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Answer» Correct Answer - A,B,C A meso compound has minimum two chiral centres and it has a plane of symmetry and it is optically inactive. |
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| 5. |
When the compounds `CH_3COOH, C_2H_5OH` and `C_6H_5OH` are arranged in order of increasing acidity in aqueous solution, which order is correct?A. `C_(2)H_(5)OH lt CH_(3) CH_(3)COOH lt C_(2)H_(5)OH`B. `C_(6)H_(5)OG lt CH_(3)COOH lt C_(2) H_(5)OH`C. `CH_(3)COOH lt C_(6)H_(5)OH lt C_(2)H_(5)OH`D. `C_(2)H_(5)OH lt C_(6)H_(5)OH lt CH_(3)COOH` |
| Answer» Correct Answer - 4 | |
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Consider the following compounds: Choose the correct statements(s) from the following:A. I,II and III are functional isomersB. I and II are position isomersC. III and IV are chain isomersD. III and IV are metamers |
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Answer» Correct Answer - A,D For being functional isomers , functional group should not match. (Phenol and aliphatic alcohol are considered as different functional groups) |
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| 7. |
In the following there are three carbon-oxygen bonds denoted by x, y and z.`H_(3)C overset(x)(-)overset(O)overset(||)(C)underset(y)(-)Ounderset(z)(-)CH_(3)` Their lengths are in orderA. x=y=zB. `x=y ltz`C. `xltyltz`D. `zltyltx` |
| Answer» Correct Answer - 2 | |
| 8. |
Which of the following statements is/are true about the following compounds. A. (I) and (III) are structural isomersB. (I) and (II) are geometrical diastereomersC. (II) and (III) are structural isomersD. (I) and (II) are identical |
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Answer» Correct Answer - A,B,C I is trans isomer and II is cis isomers I and III are position isomers similarly II and III are position isomers. |
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Degree of unsaturation for A. 20B. 21C. 22D. 33 |
| Answer» Correct Answer - 2 | |
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Which of the following carboxylic acids could be resolved by reaction with an enantiomerically pure chiral amineA. B. C. D. |
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Answer» Correct Answer - A,B,D Ortho substituted biphenyls are optically active (c ) and exists as enantiomers |
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`{:("Column I",,"Column II"),("(A) " PCl_(5),,"(P) Central atoms is "sp^(3)d " hybridised"),("(B) " SF_(6),,"(Q) " d_(z^(2)) "orbital is involved in hybridusation"),("(C) " XeF_(4) ,,"(R) Non polar molecule"),(,,"(S) All bonds are of equal length"):}` |
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Answer» Correct Answer - PQR QRS QRS |
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Give correct IUPAC name of A. Ethyl -2 -ethyl -5,5 dimethyl cyclopentane carboxylateB. Ethenyl-2-ethyl -5,5-dimethyl cyclopentane carboxylate.C. Ethenyl -5-ethyl-2,2-dimethyl cyclopentanoate.D. Ethenyl-5-ethyl-2,2-dimethyl cyclopentane carboxylate |
| Answer» Correct Answer - D | |
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Which of the following wavelengths are not possible for an electron of `He^(+)` in any of its Bohr orbit? `["Assume": h= 6.626xx10^(-34) J-sec, M_(e)=9.1xx10^(-3)]`A. 1.5 ÅB. `sqrt(150/10.2) Å`C. `sqrt(150/3.4) nm`D. `h/(m_(e)xx3xx10^(8)) m ` |
| Answer» Correct Answer - ABCD | |
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An organic compound A was found to contain degree of unsaturation 2, one `2^(@)` alcoholic group, one `3^(@)` corbon atoms compound A can be :A. B. C. D. |
| Answer» Correct Answer - C | |
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निम्नलिखित अनुच्छेद पढ़कर उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिएः“ऐतिहासिक नगरी आगरा के निकट सतत प्रवाहिनी नीली-धारा वाली यमुना के दाहिने तट पर ताजमहल स्थित है। बादशाह शाहजहाँ ने इसे अपनी बेगम मुमताज की स्मृति में बनवाया था। अपने पति से बेगम ने इस संसार से बिदा लेते समय निवेदन किया था कि, ‘मेरी मृत्यु होने पर एक ऐसा मकबरा बनवाना जो संसार में सबसे सुंदर एवं स्थायी हो।’ बादशाह ने अपनी प्राणेश्वरी की अंतिम आकांक्षा की पूर्ति का भरसक प्रयास किया। इसमें उनको सफलता भी मिली। ताजमहल संसार के सात आश्चर्यों में से एक है। वर्षों के बाद भी वह अपने यथावत् रूप में दर्शकों के मन को मोह रहा है। सैकड़ों कारीगरों एवं मजदूरों के निरंतर बीस वर्ष के परिश्रम का परिणाम यह ताजमहल है। इसके बनवाने में बाईस करोड़ रुपया खर्च हुआ था।”1) ताजमहल किस नगर में स्थित है?2) ताजमहल को किसने बनवाया?3) ताजमहल को किसकी अंतिम आकांक्षा की पूर्ति के लिए बनवाया गया?4) ताजमहल के निर्माण में कितने वर्ष लगे?5) ताजमहल को बनवाने में कितने रुपये खर्च हुए? |
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Answer» 1. ताजमहल को शाहजहाँ ने बनवाया। 2. ताजमहल को शाहजहाँ ने बनवाया। 3. ताजमहल को बादशाह शाहजहाँ ने अपनी बेगम मुमताज की आकांक्षा की पूर्ति के लिए बनवाया था। 4. ताजमहल के निर्माण में बीस वर्ष लगे। 5. ताजमहल को बनवाने के लिए बाइस करोड़ रुपये खर्च हुए। |
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निम्नलिखित अनुच्छेद पढ़कर उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिएःईश्वर ने संसार के सारे रहस्य प्रकृति में छिपा कर रख दिये थे। मनुष्य ने अपने परिश्रम और प्रयत्न से उन रहस्यों पर से पर्दा उठा दिया। यह कहना गलत है कि मनुष्य संसार में अपना भाग्य लेकर आता है: वास्तव में वह अपने भाग्य का स्वयं निर्माता है जो वह अपनी मेहनत से बनाता है। प्रकृति मनुष्य के भाग्य से डर कर नहीं बल्कि इसके परिश्रम से हार मानती है। जो लोग भाग्य पर विश्वास करते हैं, वे आलसी हैं। वास्तव में वीर और परिश्रमी व्यक्ति अपना भाग्य स्वयं बनाता है।1) ईश्वर ने संसार के सारे रहस्य किसमें छिपाकर रख दिये थे?2) किसने अपने परिश्रम और प्रयत्न से रहस्यों पर से पर्दा उठा दिया?3) प्रकृति किससे हार मानती है?4) भाग्य पर विश्वास करनेवाले लोग कैसे होते हैं?5) अपने भाग्य का निर्माता कौन है? |
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Answer» 1. ईश्वर ने संसार के सारे रहस्य प्रकृति में छिपाकर रख दिये थे। 2. मनुष्य ने अपने परिश्रम और प्रयत्न से रहस्यों से पर्दा उठा दिया। 3. प्रकृति मनुष्य के परिश्रम से हार मानती है। 4. भाग्य पर विश्वास करनेवाले लोग आलसी हैं। 5. परिश्रमी व्यक्ति अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है। |
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गंगा का हमारे देश के लिए बहुत अधिक महत्व है। गंगा नदी तीन राज्यों में से होकर गुजरती है। वे हैं उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल। भारत के इस मध्यम भाग को ‘गंगा का मैदान’ कहा जाता है। यह प्रदेश अत्यधिक उपजाऊ, संपन्न तथा हरा-भरा है जिसका श्रेय गंगा को ही है। इन राज्यों में कृषि उपज से संबंधित तथा कृषि पर आधारित अनेक उद्योग-धंधे भी फैले हुए हैं जिनसे लाखों लोगों की जीविका तो चलती ही है, राष्ट्रीय आय में वृद्धि भी होती है। पेयजल भी गंगा तथा उसकी नहरों के माध्यम से ही प्राप्त होता है। यदि गंगा न होती तो हमारे देश का एक महत्वपूर्ण भाग बंजर तथा रेगिस्तान होता। इसीलिए गंगा उत्तर भारत की सबसे पवित्र तथा महत्वपूर्ण नदी है। गंगा नदी भारतीय संस्कृति का भी अभिन्न अंग है। भारत के प्राचीन ग्रंथों जैसे वेद, पुराण, महाभारत आदि में गंगा की पवित्रता का वर्णन है। भारत के अनेक तीर्थ गंगा के किनारे पर ही स्थित हैं।1) भारत के किस भाग को गंगा का मैदान कहा जाता है और क्यों?2) गंगा के मैदान की क्या विशेषता है?3) इस गद्यांश के लिए उपयुक्त शीर्षक दीजिए।4) गंगा भारतीय संस्कृति से कैसे जुड़ी है?5) यदि गंगा न होती तो क्या होता? |
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Answer» 1) भारत के मध्यम भाग को ‘गंगा का मैदान’ कहा जाता है। इसका कारण यह इलाका अत्यधिक उपजाऊ, संपन्न तथा हरा भरा है। |
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संसार में तीन बातें बड़ी महत्वपूर्ण होती है। इनको प्राप्त करके तुम संसार के किसी भी कोने में जाओगे, तो अपना निर्वाह कर सकोगे। ये तीन बातें हैं – अपनी आत्मा का, अपने आप का और ईश्वर का सच्चा ज्ञान प्राप्त करना। इनका मतलब यह नहीं कि तुम्हें अक्षर ज्ञान नहीं मिलेगा। वह तो मिलेगा ही। लेकिन तुम उसकी चिंता करो, यह मैं नहीं कहता। इसके लिए तुम्हारे पास अभी बहुत समय है। अक्षर-ज्ञान तो इसलिए होता है कि जो कुछ तुम्हें मिला है, उसे तुम दूसरों को दे सको। इतना और याद रखना कि अब से हमें गरीबी में रहना है। जितना अधिक मैं विचार करता हूँ, उतना ही अधिक मुझे लगता है कि गरीबी में ही सुख है। इसलिए मेरी इच्छा है कि अपने परिवार में तुम एक योग्य किसान बनो। अक्षर-ज्ञान में गणित और संस्कृत पर पूरा ध्यान रखना। भविष्य में संस्कृत तुम्हारे लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होगी। ये दोनों विषय बड़ी उम्र में सीखना कठिन है।1) उपर्युक्त गद्यांश में किन तीन महत्वपूर्ण बातों की चर्चा की गई है?2) लेखक के अनुसार ‘अक्षर-ज्ञान’ का क्या उद्देश्य है?3) लेखक अपने पुत्र को योग्य किसान बनने की सलाह क्यों दे रहा है?4) अक्षर-ज्ञान में कौन सी दो विषयों का ध्यान रखना है?5) इस गद्यांश के लिए उपयुक्त शीर्षक दीजिए। |
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Answer» 1) अपनी आत्मा का, अपने आप का और ईश्वर का सच्चा ज्ञान प्राप्त करना – इन तीन महत्वपूर्ण बातों की चर्चा की गई है। |
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हमारी खराबी का स्रोत कहाँ है – इसका पता हमें लगाना चाहिए और वहीं से उसे ठीक करने का प्रयत्न करना चाहिए। स्रोत वहीं हो सकता है, जहाँ से हमारा जीवन प्रारंभ होता है और वह है हमारा घर। हमारे घर की इस समय बड़ी दुर्व्यवस्था है। अवश्य ही आप लोगों को अपने घर में असंतोष होगा। असंतोष इसी कारण हो सकता है कि अपने घर में कुछ दोष आप पाते हैं परंतु दोष की कुछ जिम्मेदारी आपके ऊपर भी तो है। ऐसी स्थिति में आपका कर्तव्य है कि आप इन दोषों को दूर करने का यत्न करें। सबके भावों का आदर करते हुए आपको ऐसा प्रयास करना होगा कि आपके कारण किसी दूसरे को कष्ट न हो। इससे घर की शांति और सौहार्द में वृद्धि होगी। आजकल की सबसे विचित्र बात यह है कि कोई अपने को दोष नहीं देता, सब कोई दूसरे को दोष देते हैं। आज के संसार में आपकी बड़ी जिम्मेदारी है। आगे का भारत वैसा ही होगा जैसा आप लोग अपने जीवन से उसे बनाएँगे। यदि आप अपना काम ठीक तरह से करते हैं तो आप सब देशभक्त हैं और यदि अपने काम के प्रति उदासीन हैं तो आप वास्तव में देशद्रोही हैं।1) लेखक द्वारा ‘घर’ को खराबी का स्रोत बताए जाने का क्या कारण है?2) आज के युवकों को अपने घर के प्रति असंतोष क्यों है?3) घर में शांति एवं सौहार्द की वृद्धि करने के लिए लेखक ने क्या सुझाव दिया है?4) लेखक ने वक्तव्य में किसे देशद्रोही कहा है?5) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए। |
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Answer» 1) घर से ही हमारा जीवन प्रारंभ होता है। इसलिए लेखक ने ‘घर’ को खराबी का स्त्रोत बताया है। |
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'jay jay Bharat mata' kavita ke kavi kon hai? |
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Answer» 'Jay Jay Bharat mata' kavita ke kavi mutillisharn gupta hai?
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Q19- लेखक को मूर्ख रहना क्यो पसंद है ?A) क्योकि वह मेहनत नही करना चाहताB) पढना उसके वश मे नही थाC) भाई सहिब के उपदेश सुनना पसंद नही थाD) सभी |
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Answer» Answer: (d) सभी |
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शाहेरूम की क्या दशा हुई?(a) अहंकार के कारण उसे भीख माँगना पड़ा(b) उसने पढ़ना बंद कर दिया(c) वह परीक्षा में फेल हो गया(d)इनमें से कोई नहीं |
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Answer» (a) अहंकार के कारण उसे भीख माँगना पड़ा option a is the right answer |
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Q25- लेखक की अपने बारे में क्या धारणा बन गई थी ?A) वह बिना पढ़े भी प्रथम आएगाB) कि वह फेल हो जायेगाC) कि वह नहीं पढ़ सकताD) कोई नहीं |
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Answer» option a is the right answer |
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भारत एक महान देश है। विश्व में यही एकमात्र एसा देश है जो इतनी विविधताओं और विभिन्नताओं से परिपूर्ण है। स्थान-स्थान की जलवायु में भी विभिन्नता दिखाई देती है। यहाँ के अनेक धर्मों, विश्वासों, मत-मतांतरों तथा संस्कृतियों के संगम को देखखर इसे ‘अनेकताओं’ का देश कहकर पुकारा गया है। परंतु विभिन्नताएँ होते हुए भी भारत विभाजित नहीं है तथा जीवन के सभी क्षेत्रों में एकता का एक अखंड सूत्र जुड़ा हुआ है। भारत को उस पुष्पहार की संज्ञा दी जाती है जिसमें अनेकानेक रंग-रूप के पुष्पों को एक सूत्र द्वारा पिरोया गया है। हमारी जीवन मीमांसा, रहन-सहन, साहित्य, धार्मिक विश्वास, पूजा-पद्धति, देवी-देवता, तीर्थ स्थान, संगीत भारत की एकता को प्रदर्शित करते हैं। परंतु विदेशियों ने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति को अपनाकर इस देश पर राज्य किया तथा हम सैकड़ों वर्षों तक गुलामी की जंजीरों में जकड़े रहे। विदेशी शासकों ने बड़ी कूटनीति से हमारी भावनात्मक एकता को खंडित कर दिया। उन्होंने भारतीय संस्कृति से भारतीयों को विमुख करने का जो चक्र चलाया, वह आज भी जारी है। आज भी हम अपनी संस्कृति एवं जीवन दर्शन से दूर होकर पश्चिम की चकाचौंध से प्रभावित होकर अपने जीवन-मूल्यों को भूल बैठे हैं।1) भारत को अनेकताओं का देश कहकर क्यों संबोधित किया गया है?2) भारत की उपमा एक पुष्पहार से क्यों दी जाती है?3) भारत में अनेक प्रकार की विविधताएँ होते हुए भी उसकी एकता किन बातों से प्रकट होती है?4) पश्चिम की चकाचौंध के कारण हम किसे भूल बैठे हैं?5) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए। |
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Answer» 1) भारत के अनेक धर्मों, विश्वासों, मत-मतांतरों तथा संस्कृतियों के संगम को देखकर इसे ‘अनेकताओं’ का देश कहकर पुकारा गया है। |
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लोकमान्य तिलक का कथन है – “मैं नरक में भी पुस्तकों का स्वागत करूँगा, क्योंकि इनमें वह शक्ति है कि जहाँ वे होंगी, वहाँ अपने आप स्वर्ग बन जाएगा।” श्रेष्ठ पुस्तकें मनुष्य, समाज और राष्ट्र का मार्गदर्शन करती हैं। संसार के इतिहास पर दृष्टिपात करने पर हम देखते हैं कि संसार की अनेक महान विभूतियों पर किसी-न-किसी श्रेष्ठ पुस्तक का प्रभाव पड़ा। महात्मा गाँधी, टालस्टॉय, अब्राहम लिंकन – सभी के जीवन में श्रेष्ठ पुस्तकों का महत्वपूर्ण योगदान था। लेनिन में क्रांति की भावना कार्ल मार्क्स के साहित्य को पढ़कर ही जागी थी। किसी भी जाति के उत्कर्ष या अपकर्ष का लेखा-जोखा उसके साहित्य से पता चलता है। गुप्तकाल को भारतीय इतिहास का ‘स्वर्ण युग’ कहा जाता है क्योंकि उस काल में अत्यंत उत्कृष्ट पुस्तकों की रचना हुई। विचारों के युद्ध में पुस्तकें ही अस्त्र हैं क्योंकि पुस्तकों का हमारे विचारों पर अत्यंत गहरा प्रभाव पड़ता है तथा पुस्तकों के विचार ही समाज की काया पलट कर देते हैं। श्रेष्ठ पुस्तकें मनुष्य को पशु से देवता बनाती है, उसकी सात्विक वृत्तियों को जाग्रत करती हैं तथा उसे असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलती हैं।1) लोकमान्य तिलक ने क्यों कहा कि ‘मैं नरक में भी पुस्तकों का स्वागत करूँगा’?2) लेनिन के मन में क्रांति की भावना किस प्रकार जागी?3) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।4) श्रेष्ठ पुस्तकों का व्यक्ति पर क्या प्रभाव पड़ता है?5) किन विभूतियों के जीवन में श्रेष्ठ पुस्तकों का योगदान था? |
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Answer» 1) क्योंकि पुस्तकों में वह शक्ति है, जहाँ वे होंगी, वहाँ अपने आप स्वर्ग बन जाएगा। 4) श्रेष्ठ पुस्तकें मनुष्य को पशु से देवता बनाती हैं। उसकी सात्विक वृत्तियों को जागृत करती हैं। |
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विनय का अभाव एक प्रकार का खोखलापन प्रकट करता है। जिन लोगों में कोई श्लाघनीय गुण नहीं होता, वे अपनी ऐंठ और डाँट-फटकार से लोगों पर प्रभाव जमाते हैं, किंतु गुणवानों को इनकी आवश्यकता नहीं। उनका प्रभाव तो स्वतः सिद्ध है। यदि विनयशील मनुष्य का समाज में प्रभाव थोड़ा हो, तो विनयशील मनुष्य का दोष नहीं; यह समाज का दोष है। इसके अतिरिक्त प्रेम का प्रभाव चाहे थोड़ा हो, पर दबाव के प्रभाव की अपेक्षा, वह चिरस्थायी होता है। यदि थोड़ी देर के लिए मान भी लिया जाए कि विनय सब स्थानों में काम नहीं देती – जैसे शत्रु के सम्मुख, तथापि हमें वह कहना पड़ेगा कि विनयशील पुरुष को ऐसे अवसर कम आएँगे कि जब अपनी विनय के कारण दुखद अनुभव करना पड़े। विनय के साथ निरभिमानता, मानव जाति का आदर, सहनशीलता, धैर्य आदि अनेक सद्गुण लगे हुए हैं।1) विनय के साथ जुड़े अन्य सद्गुण कौन-से हैं?2) प्रेम तथा दबाव के प्रभाव में क्या अंतर है?3) विनय किन-किन स्थानों पर प्रभावशाली नहीं होता?4) विनय का अभाव क्या प्रकट करता है?5) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए। |
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Answer» 1) विनय के साथ निरभिमानता, मानव जाति का आदर, सहनशीलता, धैर्य आदि सद्गुण जुड़े हुए हैं। |
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साहित्य का आधार जीवन है। इसी नींव पर साहित्य की दीवार खड़ी होती है। उसकी अटारियाँ, मीनार और गुंबद बनते हैं। लेकिन बुनियाद मिट्टी के नीचे दबी पड़ी है। जीवन परमात्मा की सृष्टि है, इसलिए सुबोध है, सुगम है और मर्यादाओं से परिमित है। जीवन परमात्मा को अपने कामों का जवाबदेह है या नहीं हमें मालूम नहीं, लेकिन साहित्य तो मनुष्य के सामने जवाबदेह है। इसके लिए कानून है जिससे वह इधर-उधर नहीं जा सकता। मनुष्य जीवन पर्यंत आनंद की खोज में लगा रहता है। किसी को वह रत्न द्रव्य में मिलता है, किसी को भरे-पूरे परिवार में, किसी को लंबे-चौड़े भवन में, किसी को ऐश्वर्य में। लेकिन साहित्य का आनंद इस आनंद से ऊँचा है। उसका आधार सुंदर और सत्य है। वास्तव में सच्चा आनंद सुंदर और सत्य से मिलता है, उसी आनंद को दर्शाना, वही आनंद उत्पन्न करना साहित्य का उद्देश्य है।1) साहित्य और जीवन का क्या संबंध है?2) इस गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।3) साहित्य के आनंद का क्या आधार है?4) साहित्य का क्या उद्देश्य है?5) परमात्मा की सृष्टि का वर्णन किस प्रकार किया है? |
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Answer» 1) साहित्य का आधार ही जीवन है। इसी की नींव पर साहित्य की दीवार खड़ी होती है। |
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Name the 21st amino acid. |
| Answer» Selenocysteine is the 21st amino acid. | |
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Which amino acid is specified by start codon AUG? |
| Answer» The amino acid f-methionine is specified by start condon AUG. | |
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‘वायु-प्रदूषण’ का सबसे अधिक प्रकोप महानगरों पर हुआ है। इसका कारण है बढ़ता हुआ औद्योगीकरण। गत बीस वर्षों में भारत के प्रत्येक नगर में कारखानों की जितनी तेजी से वृद्धि हुई है उससे वायुमंडल पर बहुत प्रभाव पड़ा है क्योंकि इन कारखानों की चिमनियाँ से चौबीसों घंटे निकलने वाले धुएँ ने सारे वातावरण को विषाक्त बना दिया है। इसके अलावा सड़कों पर चलने वाले वाहनों की संख्या में तेजी से होने वाली वृद्धि भी वायु-प्रदूषण के लिए पूरी तरह उत्तरदायी है। इन वाहनों के धुएँ से निकलने वाली ‘कार्बन मोनो आक्सा के कारण आज न जाने कितने प्रकार की साँस और फेफड़ों की बीमारियाँ आम बात हो गई हैं। इधर बढ़ती हुई जनसंख्या, लोगों का काम की तलाश में गाँवों से शहरों की ओर भागना भी वायु-प्रदूषण के लिए अप्रत्यक्ष रूप से उत्तरदायी है। शहरों की बढ़ती जनसंख्या के लिए आवास की सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए वृक्षों और वनों को भी निरंतर काटा जा रहा है। वायु-प्रदूषण को बचाने वाले कारणों की हमें खोज करनी चाहिए। पर्यावरण की सुरक्षा के लिए अधिक से अधिक वृक्ष लगाने चाहिए।1) वायु-प्रदूषण का सबसे अधिक प्रकोप महानगरों पर ही क्यों हुआ है?2) सड़कों पर चलने वाले वाहन वायु-प्रदूषण में किस प्रकार वृद्धि करते हैं?3) बढ़ती हुई जनसंख्या का पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ा है?4) पर्यावरण की रक्षा के लिए क्या किया जाना चाहिए?5) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए। |
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Answer» 1) शहरों में बढ़ते हुए औद्योगीकरण से वायु-प्रदूषण का सबसे ज्यादा प्रकोप हुआ है। |
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मुखिया किसे कहते हैं? मुखिया शब्द मुख से निकला है। जिस प्रकार मुख सब अंगों में श्रेष्ठ है और यदि वह काम करना बंद कर दे तो शरीर के सभी अंग निकम्मे हो जाएंगे, उसी प्रकार मुखिया भी एक पूज्य, सदाचारी, श्रेष्ठ, सज्जन पुरुष है। मुख के दो कार्य हैं खाना और बोलना। खाने और बोलने का एक समान द्वार है। सच्चा मुखिया वही है, जो सोच-विचार करके बोले और किसी का पैसा भी न खाए। बुद्धिमान मनुष्य वह है, जिसका मुख दिल में हो अर्थात् सोच करके बोले। मूर्ख वह है जिसका दिल मुख में हो अर्थात् जो उसके मुख में आए, वह कह दे। आप भी अगर शुभ संकल्प मन में धारण करोगे और अशुभ वचन मुख से न निकालोगे, सोच-समझकर चलोगे तो पौ-बारह हैं। आपसे स्वयं ही शुभ कार्य होते रहेंगे फिर तो आपका बाल भी बाँका न होगा। जिधर जाओगे उधर आपका यश होगा।1) मुखिया और मुख में क्या समानता है?2) सच्चे मुखिया में कौन-कौन से गुण होने चाहिए?3) बुद्धिमान और मूर्ख मनुष्य में क्या अंतर है?4) शुभ संकल्प करने से क्या फायदा होगा?5) इस गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए। |
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Answer» 1) मुख सभी अंगों में श्रेष्ठ है। शरीर के सभी अंग उससे संचालित होते हैं। उसी तरह मुखिया भी एक पूज्य, सदाचारी, श्रेष्ठ सज्जन पुरुष है। |
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हमारी संस्कृति में मानव जीवन के चार उद्देश्य बताए गए हैं – धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। जीवन के इन उद्देश्यों को स्वस्थ शरीर द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। जब व्यक्ति स्वयं सुखी एवं संतुष्ट होता है, तो दूसरों को भी सुखी बनाने का प्रयास करता है तथा समाज एवं राष्ट्र के लिए कुछ कर पाने में समर्थ होता है। इसीलिए अच्छे स्वास्थ्य को महावरदान कहा गया है। जो व्यक्ति अच्छे स्वास्थ्य की उपेक्षा कर देता है, वह मानो अपने सभी सुखों की उपेक्षा कर रहा है। दुर्बल, रोगी तथा अशक्त मनुष्य न तो स्वयं की, न अपने परिवार की, न अपने राष्ट्र की और न ही मानवता की रेवा कर सकता है। इसलिए शरीर को पुष्ट, चुस्त एवं बलिष्ठ बनाना आवश्यक है। अस्वस्थ व्यक्ति घर बैठे अपनी दुर्बलता और असमर्थता पर नौ-नौ आँसू बहाया करते हैं जबकि स्वस्थ व्यक्ति असंभव को भी संभव में बदलने की क्षमता रखते हैं। इसीलिए प्रायः देखा गया है कि दुर्बल और अशक्त व्यक्ति निराशावादी और भाग्यवादी बन जाया करते हैं।1) जीवन के चार उद्देश्य कौन-कौन से हैं तथा उन्हें किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है?2) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।3) राष्ट्र और मानवता की सेवा के लिए किस बात की सर्वाधिक आवश्यकता है?4) किस प्रकार के व्यक्ति निराशावादी और भाग्यवादी बन जाते हैं और क्यों?5) किसे महावरदान कहा गया है? |
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Answer» 1) जीवन के चार उद्देश्य – धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष हैं। इनको स्वस्थ शरीर के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। |
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विद्यार्थियों की अनुशासनहीनता का मुख्य कारण माता-पिता की ढिलाई है। माता-पिता के संस्कार ही बच्चे पर पड़ते हैं। बच्चे की प्राथमिक पाठशाला घर होता है। उसके संस्कार घर में से ही खराब हो जाते हैं। पहले तो प्यार के कारण माता-पिता कुछ करते नहीं; वह जहाँ बैठे और जहाँ चाहे खेले, जो मन में आए वह करे। पर जब हाथी के दाँत बाहर निकल आते हैं, तो उन्हें चिंता होती है, फिर वे अध्यापकों की आलोचना करना आरंभ कर देते हैं। दूसरा कारण आज की अपनी शिक्षा प्रणाली है जिसमें नैतिक या चारित्रिक शिक्षा को कोई स्थान नहीं दिया जाता। पहले विद्यार्थियों को दंड का भय बना रहता था पर अब आप विद्यार्थियों को हाथ नहीं लगा सकते क्योंकि शारीरिक दंड अपराध है। केवल जबानी जमा खर्च कर सकते हैं। इसमें विद्यार्थी बहुत तेज होता है, आप एक कहेंगे, वह आपको चार सुनाएगा। पश्चिमी संगीत, नृत्य तथा चलचित्रों ने भी विद्यार्थियों का बिगड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। इनके कारण उनमें चरित्रहीनता, उच्छृखलता इस हद तक बढ़ती जा रही है कि यदि समय रहते इस ओर ध्यान नहीं दिया गया, तो देश का भविष्य ही अंधकारपूर्ण हो जाएगा।1) माता-पिता की ढिलाई किस प्रकार विद्यार्थियों को अनुशासनहीन बनाती है?2) ‘पर जब हाथी के दाँत निकल आते हैं, तो उन्हें चिंता होती है’ पंक्ति का क्या आशय है?3) आज की शिक्षा प्रणाली अनुशासनहीनता को किस प्रकार बढ़ावा देती है?4) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।।5) वर्तमान विद्यार्थियों में क्या हद तक बढ़ती जा रही है? |
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Answer» 1) माता-पिता के प्यार के कारण, नहीं डाँटने के कारण बच्चे अनुशासनहीन हो जाते हैं। |
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सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी मानव है। अतीत में एक समय था जब वह प्रायः पशु के समान ही था। दीर्घकालीन संघर्ष के पश्चात वह सर्वश्रेष्ठ बन सका। भीमकाय, बड़े भयंकर और अति-बलशाली पशुओं से संघर्ष था। मानव की विजय का कारण उसका शारीरिक बल उतना नहीं था जितना उसका बौद्धिक बल था। पशु अंतःप्रेरणा से एक सीमित क्षेत्र में ही काम करते हैं। उनमें जो परिवर्तन होता है, वह प्रकृति के कारण से होता है जबकि मानव अपनी बुद्धि का प्रयोग करके विस्तृत क्षेत्र में काम करता है। मानव की ‘जिज्ञासा वृत्ति’ भी उसे पशुओं से भिन्न करती है। प्रकृति के रहस्यों को खोजने, उन्हें उपयोग में लाकर जीवन को अधिक सुखमय बनाने तथा ज्ञान-विस्तार के मूल में उसकी ‘जिज्ञासा’ ही है, जिसका पशुओं में सर्वथा अभाव है। एक विशेष गुण मानव में और है, वह है – ‘सौंदर्यानुभूति’। सृष्टि के समस्त चराचरों में केवल मानव ही सुंदर और भद्दी वस्तुओं में भेद कर सकता है। अपने इस विवेक के कारण ही वह कलाकार बन सकता है तथा ललित कलाओं का विकास भी संभव हो पाया है।1) मनुष्य को सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी क्यों कहा जाता है?2) मनुष्य और पशु में क्या अंतर है?3) मनुष्य की ‘जिज्ञासा’ वृत्ति ने उसे क्या लाभ पहुँचाया है?4) मानव में कौन सा विशेष गुण है?5) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए। |
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Answer» 1) बौद्धिक बल के कारण मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ प्राणी कहा गया है। |
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मानव जीवन में कितनी संभावनाएँ छिपी हैं, इसकी कोई सीमा नहीं है। पशु से लेकर देवत्व तक की सारी सीढ़ियाँ मानवीय चोले में से होकर गुजरती है। शर्त एक ही है – उसके लिए चुनौती चाहिए। बिना चुनौती के वे सारी संभावनाएँ सोई रहती हैं। संसार में जितने भी पैगंबर या अवतार हुए हैं, वे सब अपने-अपने समय की चुनौतियों के उत्तर हैं। हरेक युग की अपनी चुनौतियाँ होती हैं, जन सामान्य इन चुनौतियों को न तो पहचान पाता है, न उनका सामना करने की सामर्थ्य जुटा पाता है। पर जो तेजस्वी पुरुष उन चुनौतियों को पहचान कर उनका उत्तर देने के लिए मैदान में कूद पड़ता है लोग उसे ‘महापुरुष’ कहकर स्वयं उसका अनुगमन करने को तैयार हो जाते हैं। संसार में ज्ञान-विज्ञान की जितनी भी उन्नति हई है. उन सबके मल में भी वही चुनौतियों वाली बात है। मनुष्य के मन में कुछ प्रश्न पैदा होते हैं, उन प्रश्नों का उत्तर देने के लिए वह अपनी बुद्धि का प्रयोग करता है। .. फिर कुछ नए प्रश्न पैदा होते हैं, वह फिर उनका उत्तर देने का प्रयत्न करता है – और यों ज्ञान-विज्ञान की दृष्टि से मानव-कोश में वृद्धि होती चली जाती है।1) मानव जीवन में चुनौतियों का क्या महत्व है?2) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।3) ‘सामान्य पुरुष’ और ‘तेजस्वी पुरुष’ में क्या अंतर होता है?4) ज्ञान-विज्ञान की दृष्टि से मानव-कोश में किस प्रकार वृद्धि होती रहती है?5) किसके बिना सारी संभावनाएँ सोई रहती है? |
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Answer» 1) चुनौतियाँ ही मनुष्य जीवन की अनंत संभावनाओं को सामने लाती हैं। चुनौतियाँ ही महापुरुषों एवं पैगम्बरों को सामने लाती हैं। |
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कवि किसे प्रणाम कर रहा है? |
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Answer» कवि मातृभूमि को प्रणाम कर रहे हैं। |
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यद्यपि लार्ड हार्डिग ने सिक्खों को हराकर पंजाब को ब्रिटिश साम्राज्य में सम्मिलित नहीं किया, पर लाहौर सरकार को कमजोर अवश्य कर दिया। अंग्रेजों ने लाहौर राज्य के सतलुज के दक्षिण स्थित क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया। उन्होंने दोआबा बिस्त जालन्धर के उपजाऊ क्षेत्रों पर अधिकार जमा लिया। कश्मीर, कांगड़ा और हजारा के पहाड़ी राज्य लाहौर राज्य से स्वतंत्र कर दिए गए। लाहौर राज्य की सेना कम कर दी गई। लाहौर राज्य से बहुत बड़ी धनराशि वसूल की गई। पंजाब को आर्थिक और सैनिक दृष्टि से इतना कमज़ोर कर दिया गया कि अंग्रेज़ जब भी चाहें उस पर कब्जा कर सकते थे।(a) महाराजा रणजीत सिंह के बाद कौन उसका उत्तराधिकारी बना?(b) लाहौर की दूसरी सन्धि की धाराएं क्या थी? |
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Answer» (a) महाराजा रणजीत सिंह के बाद खड़क सिंह उसका उत्तराधिकारी बना। (b) लाहौर की दूसरी सन्धि 11 मार्च, 1846 ई० को अंग्रेज़ों तथा सिक्खों के बीच हुई। इसकी मुख्य धाराएं निम्नलिखित थीं-
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1837 ई० में भारत का गवर्नर-जनरल लार्ड ऑक्लैड-अफगानिस्तान में रूस के बढ़ते हुए प्रभाव से भयभीत हो गया। वह यह भी महसूस करता था कि दोस्त मुहम्मद अंग्रेजों के शत्रु रूस से मित्रतापूर्ण सम्बन्ध कायम कर रहा था। इन हालातों में लार्ड ऑकलैंड ने दोस्त मुहम्मद की जगह शाह शुजाह को (अफगानिस्तान का भूतपूर्वकशासक जो अंग्रेजों की पैन्शन पर पलता था) अफगानिस्तान का शासक बनाना चाहा। इस उद्देश्य से 26 जून, 1838 ई० को अंग्रेज सरकार की आज्ञा से अंग्रेजों, रणजीत सिंह तथा शाह शुजाह के दरम्यान, एक संधि हुई जिसे ‘त्रिपक्षीय संधि’ कहा जाता है। इसके अनुसार अफगानिस्तान के होने वाले शासक शाह शुजाह ने अपनी तरफ से महाराजा के अफगानों से जीते गए सारे प्रदेश (कश्मीर, मुलतान, पेशावर, अटक, डेराजात आदि) पर उसका अधिकार स्वीकार कर लिया। महाराजा ने उस संधि की एक शर्त कि अफगान-युद्ध के समय वह अंग्रेजों को अपने इलाके में से होकर आगे जाने देगा, न मानी। इस पर अंग्रेजों तथा महाराजा के सम्बन्धों में बड़ी दरार पैदा हो गई। जून, 1839 ई० को महाराजा का देहान्त हो गया।(a) रणजीत सिंह का जन्म कब हुआ तथा उसके पिता का क्या नाम था?(b) त्रिपक्षीय सन्धि क्या थी? |
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Answer» (a) रणजीत सिंह का जन्म 13 नवम्बर, 1780 को हुआ। उसके पिता का नाम सरदार महा सिंह था। (b) त्रिपक्षीय सन्धि 26 जून, 1838 ई० में महाराजा रणजीत सिंह, अंग्रेज़ों तथा शाह शुजाह के बीच हुई। इसकी शर्ते निम्नलिखित थीं-
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निबन्ध : रक्षाबंधन |
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Answer» हिन्दुओं के चार प्रमुख त्योहार हैं- दशहरा, दीपावली, रक्षाबन्धन और होली। इनमें रक्षाबन्धन भाई और बहन के असीन स्नेह को प्रकट करने वाला त्योहार है। यह प्राचीनकाल से भारतवर्ष में मनाया जाता है। इस त्योहार को ‘सलूनो’ भी कहा जाता है। रक्षाबन्धन के दिन बहनें भाइयों के हाथों पर राखी बाँधती हैं। पुराने समय में चावल की पोटली को लाल कलावे में बाँधकर राखी बनाई जाती थीं। किन्तु आजकल तो बाजारों में बड़ी सुन्दर राखियाँ बिकती हैं। राखी के त्योहार से कई दिन पहले से ही राखियों की बिक्री आरम्भ हो जाती है। राखी बेचने वालों की दुकानें रंग-बिरंगी राखियों से जगमगा उठती हैं और वहाँ ग्राहकों की भीड़ दिखाई देने लगती है। इस दिन घरों में मीठे जवे, सेवई तथा खीर आदि बनाई जाती हैं। दीवारों पर चित्र बनाए जाते हैं और पूजा होती है। पूजा के बाद बहनें भाइयों की कलाई पर राखी बाँधती हैं। यह राखी उनके अटूट बन्धन को प्रकट करती है। भाई अपनी बहन को रक्षा का वचन देते हैं और बहन को रुपये आदि देकर प्रसन्न करते हैं। इसी दिन ब्राह्मण भी व्यक्तियों की कलाई पर राखी बाँधकर उनके सुख की कामना करते हैं तथा दक्षिणा पाते हैं। प्राचीनकाल से इस त्योहार के बारे में अनेक कथाएँ प्रचलित हैं। इनमें से एक कहानी तो बहुत प्रसिद्ध हैं- कहते है कि एक बार देवताओं और राक्षसों में भयंकर युद्ध छिड़ गया। धीरे-धीरे देवताओं का बल घटने लगा और ऐसा लगने लगा; जैसे देवता हार जाएँगे। देवताओं के राजा इन्द्र को इससे बड़ी चिन्ता हुई। इन्द्र के गुरु ने विजय के लिए श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन इन्द्र के हाथ पर रक्षा-कवच बाँधा और इसके प्रभाव से राक्षस हार गए। कहा जाता है। कि तभी से रक्षाबन्धन का यह त्योहार आज तक मनाया जाता है। भारतीय इतिहास में भी राखी से सम्बन्धित एक कथा प्रचलित है। एक बार चित्तौड़ की महारानी कर्मवती पर गुजरात के बहादुर शाह ने आक्रमण कर दिया। कर्मक्ती ने रक्षाबन्धन के दिन सम्राट हुमायूँ के पास राखी भेजी और उसे अपना धर्म, भाई माना। कर्मवती ने भाई के नाते हुमायूँ को चित्तौड़ की रक्षा के लिए भी बुलाया। हुमायूँ उस समय एक युद्ध में फैसा हुआ था। किन्तु वह राखी के महत्त्व को भली प्रकार समझता था। इसलिए । वह तुरन्त चित्तौड़ की रक्षा के लिए चल पड़ा। इस प्रकार राखी बहन और भाई के पवित्र प्रेम को प्रकट करती है। सूत के इन धागों में बहन और भाई के सम्बन्ध को अधिकाधिक दृढ़ बनाने की शक्ति होती है। रक्षाबन्धन हमारा पवित्र और महत्त्वपूर्ण त्योहार है। हमें धन और लेन-देन के लोभ को त्यागकर इसकी पवित्रता का आदर करना चाहिए। वास्तव में यह त्योहार सभी को स्नेह और कर्तव्यपालन का संदेश प्रदान करता है। वास्तव में हमारे प्राचीन ऋषियों ने त्योहारों की जो योजना प्राचीन युग में बनाई थी, उसका महत्त्व आज भी ज्यों का त्यों बना है। हमें अपने इस त्योहार के प्राचीन गौरव को सदैव ही स्मरण रखना चाहिए तथा इसे बड़े ही उल्लास और पवित्र भाव से मनाना चाहिए। |
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निबन्ध : बालचर |
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Answer» सारे समाज की नि:स्वार्थ सेवा करने वाले बालचर (Boy Scout) को आज कौन नहीं जानता? वे अपनी सेवा, सहानुभूति, देश-प्रेम और कर्तव्यनिष्ठा से ही सबको मोह लेते हैं। बालचर संस्था का जन्म आज से लगभग 85 वर्ष पूर्व हुआ। दक्षिण अफ्रीका के बोयर युद्ध में हजारों सैनिक घायल हुए थे, उनके उपचार को कोई उचित साधन भी नहीं था। सर राबर्ट बेडेन पावेल यह सब न देख सके। उन्होंने ही सबसे पहले ‘बालचर संगठन’ बनाकर घायलों की सेवा की। भारतवर्ष में इस संस्था की स्थापना श्रीमती एनी बेसेण्ट ने की थी। आठ वर्ष की आयु का या उससे अधिक आयु का प्रत्येक बालक इसका सदस्य हो सकता है। आयु के अनुसार ही उन्हें शेरबच्चा, ‘बालचर’ या ‘रोबर्स’ के नाम से पुकारते है।स्काउट कहलाने में । उसे विशेष गौरव का अनुभव होता है। बालचरों को उनके कर्तव्य का ठीक-ठीक ज्ञान कराया जाता है। इसके नेता को पेट्रोल लीडर’ कहते हैं। चार या उससे अधिक पेट्रोल मिलाकर एक ‘टुप’ कहलाता है। इसके नेता को ‘टुप लीडर’ कहते हैं। उन्हें प्रशिक्षित करने के लिए बालचर शिक्षक होता है। जिले के सभी टुप जिला स्काउट कमिश्नर के अधीन कार्य करते हैं। इस प्रकार एक बालचर से लेकर पूरे टुप तक को सुसंगठित करके रखा जाता है। समस्त बालचरों की वेशभूषा भी एक समान होती है। उनके सिर पर पगड़ी टोपी या हैट होता है तथा वे खाकी कमीज, नेकर तथा कपड़े के जूते पहनते हैं उनके गले में एक तिकोना रूमाल (स्कार्फ) भी बँधा होता है। वे एक सीटी, झण्डी, रस्सी तथा चाकू भी साथ रखते हैं, जिससे संकट के समय में वे सहायता कर सकें। मानव समाज की तन, मन और धन से सहायता करने को तैयार रहना प्रत्येक बालचर का प्रथम कर्तव्य होता है। वह उदार, आज्ञाकारी, नम्र, दयालु, परोपकारी, धैर्यवान तथा परिश्रमी होता है। बालचरों को दी जाने वाली प्रमुख शिक्षाएँ इस प्रकार हैं-भोजन बनाना, तैरना, नदी पर पुल बनाना, घायल को पट्टी बाँधना, प्रारम्भिक चिकित्सा करना, घायल को अस्पताल पहुँचाना, गाँठ लगाना, मार्ग ढूँढ़ना, संकेतों द्वारा संदेश भेजना, सामयिक घर और सड़क बनाना आदि। प्रत्येक बालचर अपने साथ एक डायरी रखता है, जिसमें वह अपने दिनभर के कार्यों को मुख्य रूप से लिखता है। वह कठिनाइयों को हँसते-हँसते पार कर लेता है। गर्मी, शीत, वर्षा या अग्नि आदि बालचर को उसके कर्तव्य-पथ से विचलित नहीं कर सकते। बालचर संस्था समाज के लिए बड़ी ही उपयोगी है। बड़े-बड़े मेलों, रामलीला तथा बड़ी-बड़ी सभाओं आदि में बालचर अनुशासन और प्रबन्ध को बनाए रखने में बड़े सहायक सिद्ध होते हैं। खोए बच्चों को उनके माता-पिता के पास पहुँचाना, डूबते को बचाना, आग से जान तथा माल की रक्षा करना आदि बालचरों के प्रशंसनीय कार्य हैं। वास्तव में यह संस्था समाज के लिए बड़ी ही उपयोगी है। इसके द्वारा चरित्र, स्वास्थ्य तथा सेवा की उच्च शिक्षा प्राप्त होती है। अतः इसका प्रसार तथा प्रचार होना अत्यन्त आवश्यक है। प्रत्येक विद्यालय में अनिवार्य रूप से बालचर संस्था होनी चाहिए तथा उनके प्रशिक्षण का उचित प्रबन्ध होना चाहिए, जिससे हमारे बालक देश के सुयोग्य नागरिक बन सकें। |
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निबन्ध : वसन्त ऋतु |
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Answer» भारतवर्ष में तीन ऋतुएँ प्रमुख हैं-जाड़ा, गर्मी और वर्षा। जहाँ जाड़े में बहुत जाड़ा पड़ता है, गर्मी में बहुत गर्मी पड़ती हैं और वर्षा ऋतु में चारों ओर जल ही जल हो जाता है। इन तीनों ऋतुओं के बीच में वसन्त ऋतु भी आती है, जो चैत्र और बैसाख में मनायी जाती है। यह ऋतु अन्य सब ऋतुओं में श्रेष्ठ होती है। इनमें न अधिक ठण्ड पड़ती है और न अधिक गर्मी। चारों ओर हरियाली ही हरियाली छा जाती है और सुगन्धित वायु सबको प्रसन्न कर देती है। वसन्त में सभी को सुख मिलना है। इसीलिए इसे ऋतुराजे भी कहा जाता है। वसन्त ऋतु में खेतों में चारों ओर हरियाली दिखाई पड़ने लगती है। कहीं दूर तक पीली सरसों के खेत दिखाई देते हैं तो कहीं मटर, गेहूँ और चने के खेत भरे दिखाई देते हैं। वसन्त ऋतु में गुलाब, गेंदा, गुलमेंहदी आदि सैकड़ों प्रकार के फूल खिल उठते हैं और अपनी सुगन्ध से हवा को भी सुगन्धित कर देते हैं। वसन्त पंचमी और होली इस ऋतु के प्रमुख उत्सव हैं। वसन्त पंचमी को लोग पीले वस्त्र पहनते हैं। और हँसी-खुशी से हवन करते हैं। होली तो मस्ती और प्रसन्नता का त्योहार है। इस ऋतु में स्थान-स्थान पर फाग के गीत गाए जाते हैं। प्राचीन काल में तो राजा लोग अपने राज्य का भ्रमण करने के लिए इसी ऋतु में यात्राएँ किया करते थे। वसन्त ऋतु का स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। इस ऋतु में प्रात:काल का टहलना तो बहुत ही लाभदायक होता है। इससे शरीर का रक्त शुद्ध हो जाता है। व्यायाम करने के लिए तो यह ऋतु बहुत ही उपयोगी है। शीतल और मन्द-सुगन्धित वायु इसी ऋतु में मिलती है जो सबके मन को हर लेती है। अनेक कवियों ने वसन्त को ऋतुराज के रूप में चित्रित किया है। । वास्तव में वसन्त ऋतुराज सब ऋतुओं में महत्त्वपूर्ण है। तितलियों, भौरों और शहद की मक्खियों . को तो इस ऋतु में बहुत ही सुख मिलता है। रंग-बिरंगे फूलों पर भौंरे तथा तितलियाँ मँडराती हुई बड़ी । भली मालूम होती हैं। स्वास्थ्य, प्रसन्नता और प्राकृतिक सुन्दरता की दृष्टि से तो यह बड़ी महत्त्वपूर्ण ऋतु है। मनुष्य जितना प्रसन्न इस ऋतु में रहता है उतना वह किसी अन्य ऋतु में नहीं रहता। |
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निबन्ध : वर्षा ऋतु |
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Answer» हमारे देश को प्रकृति का अनुपम वरदान प्राप्त है। बारह महीनों में छह ऋतुएँ बारी-बारी से इस वर्षा ऋतु का आरम्भ प्रायः आषाढ़ मास से माना जाता है। इसके पश्चात धीरे-धीरे वर्षा बढ़ने लगती है तथा भादों में जोर की वर्षा होने लगती है। वर्षा आरम्भ होते ही चारों ओर हरियाली ही हरियाली छा जाती है। वृक्ष, घास तथा छोटे-बड़े पौधे सब हरे-भरे हो जाते हैं। आम और जामुन के वृक्षों पर तो वर्षा ऋतु में विशेष बहार आ जाती है। पशु तथा पक्षियों को इस ऋतु में बड़ा सुख मिलता है। ग्रीष्म में तपे पशु-पक्षी शीतल जल की फुहार से प्रसन्न हो जाते हैं। मेंढक टर्र-टर्र की ध्वनि से आकाश को सिर पर उठा लेते हैं। कहीं तोते आम पर झपटते दिखाई देते हैं तो कहीं नीलकण्ठ उड़ते दिखाई देते हैं। चारों ओर प्रसन्नता का वातावरण छा जाता है। वर्षा ऋतु में आकाश की शोभा का तो कहना ही क्या? कभी काले बादल उमड़कर आते हैं तो कभी पूरे। इन सबके बीच में आकाश की शोभा बहुत बढ़ जाती है। बादलों से भरपूर आकाश के बीच में जब सतरंगी इन्द्रधनुष दिखाई पड़ता है तो आकाश की शोभा द्विगुणित हो जाती है। कविवर ‘दिनकर’ ने तो इसे ऋतुओं की रानी बताते हुए कहा है- “है वसन्त ऋतुओं का राजा, वर्षा ऋतु की रानी।” वर्षा ऋतु मानव समाज के लिए अत्यन्त ही लाभदायक है। इसी के कारण उसकी खेती सम्भव होती है। यद्यपि सिंचाई के कृत्रिम साधन वर्षा की कमी में थोड़ी बहुत सहायता कर देते हैं किन्तु बिना भादो के बरसे धरती का पेट नहीं भरता। वर्षा की झड़ी लगने पर ही किसान खेत बोना आरम्भ कर देते हैं। इसके अतिरिक्त ग्रीष्म ऋतु में जो तालाब, कुएँ अथवा नदियाँ आदि सूख जाती है, वर्षा में वे फिर जलयुक्त हो जाती हैं। इस प्रकार वर्षा मानव के लिए अत्यन्त उपयोगी है। वर्षा ऋतु में निर्धन समाज को विशेष रूप से बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अधिक वर्षा से उनके मकान गिरने लगते हैं। विषैले कीड़े जैसे साँप, बिच्छू आदि इसी ऋतु में अधिक निकलते हैं। वर्षा के कारण कच्चे मार्ग कीचड़ से भर जाते हैं। किसी-किसी गाँव को तो पानी चारों ओर से घेर . लेता है और आने-जाने के मार्ग बिल्कुल ही बन्द हो जाते हैं। अत्यधिक वर्षा से जब नदियों में बाढ़ आ जाती है तो प्रलयंकारी दृश्य उपस्थित हो जाता है। बाढ़ से धन-जन की अपार हानि होती है। वर्षा ऋतु में जल इधर-उधर रुक भी जाता है। रुके हुए इस जल में अनेक रोगों को फैलाने वाले मच्छर जन्म लेते हैं और इसके कारण अनेक व्यक्तियों को जान से हाथ धोना पड़ जाता है। इस प्रकार मानव समाज को वर्षा ऋतु में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इतनी कठिनाइयाँ होने पर भी मानव प्रतिवर्ष वर्षा की प्रतीक्षा करता है क्योंकि इससे उसे अनन्त लाभ है। ठीक समय पर हुई वर्षा से जितना लाभ होता है, उतना अन्य किसी से भी नहीं हो सकता। इसीलिए तो भारतीय ऋषियों ने कहा है- “काले वर्षतु पर्जन्यः, पृथ्वी शस्य शालिनी।” वास्तव में किसान की खेती और देश की उन्नति ठीक समय की वर्षा पर ही निर्भर है। |
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निबन्ध:दूरसंचार के साधन |
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Answer» प्रस्तावना–आधुनिक युग में विज्ञान के नवीन आविष्कारों ने विश्व में क्रान्ति सी ला दी है। वैज्ञानिक उपकरणों की सहायता से एक छोर पर मौजूद व्यक्ति दुनिया के दूसरे छोर से बातें करने में सक्षम है। दूरसंचार के क्षेत्र में कम्प्यूटर नेटवर्क के माध्यम से देश के ही नहीं, बल्कि विश्व के भी लगभग सभी मुख्य नगर एक-दूसरे से जुड़ चुके हैं। दूरसंचार से लोगों को देश की हर गतिविधि सामाजिक, राजनीति, आर्थिक एवं सांस्कृतिक की जानकारी मिलती है। हर परिस्थितियों में सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों से जनसाधारण को अवगत कराने की जिम्मेदारी भी दूरसंचार को ही वहन करनी पड़ती है।। दूरसंचार के साधन-दूरसंचार के साधनों के माध्यम से ही जनता की समस्याओं एवं सूचनाओं को ” जन-जन तक पहुँचाया जाता है। टेलीफोन, रेडियो, टेलीविजन, इत्यादि दूरसंचार के ऐसे ही साधन हैं। टेलीफोन ऐसा माध्यम है, जिसकी सहायता से एक बार में कुछ ही व्यक्तियों से संचार किया जा सकता है, किन्तु दूरसंचार के कुछ साधने ऐसे भी हैं, जिनकी सहायता से एक साथ कई व्यक्तियों से संचार किया जा सकता है। जिन साधनों का प्रयोग कर एक बड़ी जनसंख्या तक विचारों, भावनाओं व सूचनाओं को सम्प्रेषित किया जाता है, उन्हें हम जनसंचार माध्यम भी कहते हैं। जनसंचार माध्यमों को कुल तीन वर्गों-मुद्रण माध्यम, इलेक्ट्रॉनिक माध्यम एवं नव-इलेक्ट्रॉनिक माध्यम; में विभजित किया जा सकता है। मुद्रण माध्यम के अन्तर्गत समाचार-पत्र, पत्रिकाएँ, पैम्फलेट, पोस्टर, जर्नल, पुस्तकें इत्यादि आती हैं। इलेक्ट्रॉनिक माध्यम के अन्तर्गत रेडियो, टेलीविजन एवं फिल्म आती हैं और इन्टरनेट नव-इलेक्ट्रॉनिक माध्यम है। आइए इनके प्रमुख साधनों के बारे में जानते हैं। रेडियो-आधुनिक काल में रेडियो दूरसंचार का एक प्रमुख साधन है, खासकर दूरदराज के उन क्षेत्रों में जहाँ अभी तक बिजली नहीं पहुंच पाई है या जिन क्षेत्रों के लोग आर्थिक रूप से पिछड़े हैं। भारत में सन् 1923 में रेडियो के प्रसारण के प्रारम्भिक प्रयास और 1927 ई० में प्रायोगिक तौर पर इसकी शुरुआत के बाद से अब तक इस क्षेत्र में अत्यधिक प्रगति हासिल की जा चुकी है और इसका सर्वोत्तम उदाहरण एफ.एम. रेडियो प्रसारण है। एफ.एम. फ्रीक्वेंसी मॉड्यूल का संक्षिप्त रूप है। यह एक ऐसा रेडियो प्रसारण है जिसमें आवृत्ति को प्रसारण ध्वनि के अनुसार मॉड्यूल किया जाता है। टेलीविजन-टेलीविजन का आविष्कार सन् 1925 में जे०एल० बेयर्ड ने किया था। आजकल यह दूरसंचार का प्रमुख साधन बन चुका है। पहले इस पर प्रसारित धारावाहिकों एवं सिनेमा के कारण यह लोकप्रिय था। बाद में कई न्यूज चैनलों की स्थापना के साथ ही यह दूरसंचार का एक ऐसा सशक्त माध्यम बन गया, जिसकी पहुँच करोड़ों लोगों तक हो गई। भारत में इसकी शुरूआत सन् 1959 में हुई थी। वर्तमान में तीन सौ से अधिक टेलीविजन चैनल चौबीसों घण्टे विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम प्रसारित कर दर्शकों का मनोरंजन कर रहे हैं। कम्प्यूटर एवं इन्टरनेट–इन्टरनेट दूरसंचार का एक नवीन इलेक्ट्रॉनिक माध्यम है। इसका आविष्कार 1969 में हुआ था। इसके बाद से अब तक इसमें काफी विकास हो चुका है। इन्टरनेट वह जिन्न है। जो व्यक्ति के सभी आदेशों का पालन करने को तैयार रहता है। विदेश जाने के लिए हवाई जहाज का टिकट बुक कराना हो, किसी पर्यटन स्थल पर स्थित होटल का कोई कमरा बुक कराना हो, किसी किताब का ऑर्डर देना हो, अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए विज्ञापन देना हो, अपने मित्रों से ऑनलाइन चैटिंग करनी हो, डॉक्टरों से स्वास्थ्य सम्बन्धी सलाह लेनी हो या वकीलों से कानूनी सलाह लेनी हो; इन्टरनेट हर मर्ज की दवा है। इन्टरनेट ने सरकार, व्यापार और शिक्षा को नए अवसर दिए हैं। सरकार अपने प्रशासनिक कार्यों के संचालन, विभिन्न कर प्रणाली, प्रबन्धन और सूचनाओं के प्रसारण जैसे अनेकानेक कार्यों के लिए इन्टरनेट का उपयोग करती हैं। कुछ वर्ष पहले तक इन्टरनेट व्यापार और वाणिज्य में प्रभावी नहीं था, लेकिन आज सभी तरह के विपणन और व्यापारिक लेन-देन इसके माध्यम से सम्भव हैं। दूरसंचार का कार्यक्षेत्र उपसंहार-दूरसंचार के माध्यम से हर क्षेत्र सुगम हो चुका है। इसके द्वारा अपने विचारों को कुछ ही क्षणों में विश्वभर में कहीं भी प्रेषित कर सकते हैं। आज इसे वैज्ञानिक तकनीक ने और भी सुगम और आसान बना दिया है। दूरसंचार या मीडिया के माध्यमों के द्वारा ताजातरीन खबरें और मौसम सम्बन्धी जानकारियाँ हमें आसानी से प्राप्त हो रही हैं। |
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निबन्ध:तुलसीदास |
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Answer» प्रस्तावना–संसार में अनेक प्रसिद्ध साहित्यकार हुए हैं, जिनकी अपनी-अपनी विशेषताएँ हैं। यदि मुझसे पूछा जाए कि मेरा प्रिय साहित्यकार कौन है? तो मेरा उत्तर होगा-महाकवि तुलसीदास। यद्यपि तुलसी के काव्य में भक्ति-भावना प्रधान है, परन्तु उनका काव्य कई सौ वर्षों के बाद भी भारतीय जनमानस में रचा-बसा हुआ है और उनका मार्ग-दर्शन कर रही है, इसलिए तुलसीदास मेरे प्रिय साहित्यकार हैं। उनकी भक्ति-भावना, समन्वयात्मक दृष्टिकोण तथा काव्य सौष्ठव ने मुझे अनायास अपनी ओर आकृष्ट किया है। जन्म की परिस्थितियाँ—तुलसीदास जी का जन्म अत्यन्त विषम परिस्थितियों में हुआ था। हिन्दू समाज अशक्त होकर मुगलों के चंगुल में फंसा हुआ था। हिन्दू-समाज की संस्कृति और सभ्यता पर निरन्तर आघात हो रहे थे। कहीं पर कोई भी उचित आदर्श नहीं था। इस युग में मन्दिरों का विध्वंस और ग्रामों व नगरों का नाश दे रहा था। अच्छे संस्कार समाप्त हो रहे थे। तलवार के बल पर हिन्दुओं को मुसलमान बनाया जा रहा था। सर्वत्र धार्मिक विषमता व्याप्त थी। विभिन्न सम्प्रदायों ने अपनी इफली, अपना राग अलापना आरम्भ कर दिया था। ऐसी स्थिति में भोली-भाली जनता यह समझने में असमर्थ थी कि वह किस सम्प्रदाय का आश्रय ले। दिग्भ्रमित जनता को ऐसे नाविक की आवश्यकता थी, जो उनकी जीवन-नौका को सँभाल सके। गोस्वामी तुलसीदास ने निराशा के अन्धकार में डूबी हुई जनता के समक्ष भगवान् राम का लोकमंगलकारी रूप प्रस्तुत किया। इस प्रकार उन्होंने जनता में अपूर्व आशा एवं शक्ति का संचार किया। युगद्रष्टा तुलसी ने अपनी रचना ‘श्रीरामचरितमानस’ के द्वारा विभिन्न मतों, सम्प्रदायों एवं धाराओं का समन्वय किया। उन्होंने अपने युग को नवीन दिशा, नई गति एवं नवीन प्रेरणा दी। सच्चे लोकनायक के समान उन्होंने लोगों को मानवता के सूत्र में बाँधने का सफल प्रयास किया। लोकनायक तुलसीदास-आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का कथन है-“लोकनायक वही हो सकता है, जो समन्वय कर सके। भारतीय समाज में विभिन्न प्रकार की परस्पर विरोधी संस्कृतियाँ, जातियाँ, आचार, निष्ठा और विचार-पद्धतियाँ प्रचलित हैं। बुद्धदेव समन्वयकारी थे, ‘गीता’ ने समन्वय की चेष्टा की और तुसलीदास भी समन्वयकारी थे।” तुलसी के राम-तुलसीदास उन राम के उपासक थे, जो सच्चिदानन्द परब्रह्म हैं तथा जिनका भूमि पर पापरूपी हरण करने के लिए अवतार होता है। जब-जब होइ धरम कै हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी ॥ तुलसीदास जी ने अपने काव्य में सभी देवी-देवताओं की स्तुति की है, लेकिन अन्त में वे यही कहते तुलसीद हैं। माँगत तुलसीदास कर जोरे। बसहिं रामसिय मानस मोरे॥ निम्नलिखित पंक्तियों में भगवान राम के प्रति उनकी अनन्यता और भी अधिक पुष्ट हुई है– एक भरोसो एक बल, एक आस बिस्वास । तुलसीदास के समक्ष ऐसे राम का जीवन था, जो मर्यादाशील थे तथा शक्ति एवं सौन्दर्य के अवतार थे। मो सम दीन ने दीन हित, तुम्ह समान रघुबीर।। धर्म-समन्वय की भावना-तुलसीदासजी के काव्य की सबसे बड़ी विशेषता धर्म-समन्वय है। इसे प्रवृत्ति के कारण वे वास्तविक अर्थों में लोकनायक कहलाए। उनके काव्य में धर्म-समन्वय के अग्रलिखित रूप दृष्टिगोचर होते हैं (i) सगुण-निर्गुण का समन्वय ईश्वर के सगुण और निर्गुण दोनों रूपों का विवाह दर्शन एवं भक्ति दोनों ही क्षेत्रों में प्रचलित था। तुलसीदास ने कहा है सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा। गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा॥ (ii) कर्म, ज्ञान एवं भक्ति का समन्वय-तुलसीदास जी की भक्ति मनुष्य को संसार से विमुख करके अकर्मण्य बनाने वाली नहीं है, अपितु सत्कर्म की प्रबल प्रेरणा देने वाली है। उनका सिद्धान्त है कि राम के समान आचरण करो, रावण सदृश नहीं— भगतिहि ग्यानहि नहिं कछु भेदा। उभय हरहिं भव सम्भव खेदा॥ तुलसी ने ज्ञान और भक्ति के धागे में राम के नाम का मोती पिरो दिया है, जो सबके लिए मान्य है– हिय निर्गुन नयनन्हे सगुन, रसना राम सुनाम। (iii) युगधर्म समन्वय-भगवान को प्राप्त करने के लिए अनेक प्रकार के बाह्य तथा आन्तरिक साधनों की आवश्यकता होती है। ये साधन प्रत्येक युग के अनुसार बदलते रहते हैं और इन्हीं को युगधर्म की संज्ञा दी जाती है। तुलसीदास जी ने इनका भी समन्वय प्रस्तुत किया है कृतयुग त्रेता द्वापर, पूजा मख अरु जोग। (iv) सामाजिक समन्वय-तुलसीदास जी के समय में भारतीय समाज अनेक प्रकार की विषमताओं तथा कुरीतियों से ग्रस्त था। आपस में भेदभाव की खाई चौड़ी होती जा रही थी। ऊँच-नीच, धनी-निर्धन, स्त्री-पुरुष तथा गृहस्थ व संयासो का अन्तर बढ़ता जा रहा था। रामकथा की चित्रात्मकता एवं विषय-सम्बन्धी अभिव्यक्ति इतनी व्यापक और सक्षम थी कि उससे तुलसीदास जी के दोनों उद्देश्य सिद्ध हो जाते थे। सन्त-असन्त का समन्वय, व्यक्ति और समाज का समन्वय तथा व्यक्ति और परिवार का समन्वय आदि तुलसीदास के काव्य में सर्वत्र दृष्टिगोचर हुआ है। (v) साहित्यिक समन्वय-साहित्य की दृष्टि से भी तुलसी का काव्य अद्वितीय है। इनके काव्य में सभी रसों को स्थान मिला है जिनका प्रभाव इनके काव्य में देखने को मिलता है। साहित्यिक क्षेत्र में भाषा, छन्द, सामग्री, रस, अलंकार आदि की दृष्टि से भी तुलसी ने अनुपम समन्वय स्थापित किया। उस समय साहित्यिक क्षेत्र में विभिन्न भाषाएँ विद्यमान थीं तथा विभिन्न छन्दों में रचनाएँ की जाती थीं। तुलसी ने अपने काव्य में संस्कृत, अवधी तथा ब्रजभाषा का अद्भुत समन्वय किया। उपसंहार—तुलसी ने अपने युग और भविष्य, स्वदेश और विश्व, व्यष्टि सभी के सन्दर्भ में महत्त्वपूर्ण सामग्री दी है। तुलसीदास जी को ‘आधुनिक दृष्टि ही नहीं, हर युग की दृष्टि मूल्यवान् मानेगी; क्योंकि मणि की चमक अन्दर से आती है बाहर से नहीं।। कवि तुलसीदास जी की भाषा अत्यन्त सरल और सरस है। उन्होंने श्रीरामचरितमानस का जितना सरल गेयरूप में वर्णन किया है वह अतुलनीय है। यद्यपि मैंने जितने भी साहित्यों का अध्ययन किया है मानस जैसा सरलीकरण और शब्दों की अभिव्यक्ति किसी में नहीं पायी। अतैव इनकी अतुलनीय साहित्यिक विशेषताओं के कारण इनके बारे में यही कहा जा सकता है- “कविता करके तुलसी न लसे, कविता लसी पा तुलसी की कला।” |
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निबन्ध:व्यायाम और स्वास्थ्य |
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Answer» प्रस्तावना-मानव-जीवन में स्वास्थ्य का अत्यधिक महत्त्व है। यदि मनुष्य का शरीर स्वस्थ है तो वह जीवन में अपने उद्देश्य की प्राप्ति कर सकता है। यह मानव-जीवन की सर्वश्रेष्ठ पूँजी है। एक तन्दुरुस्ती हजार नियामत’ के अनुसार, स्वास्थ्य वह सम्पदा है जिसके द्वारा मनुष्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों को प्राप्त कर सकता है-‘धर्मार्थ-काम-मोक्षाणाम्, आरोग्यं मूलकारणम्।’ अंग्रेजी में भी कहावत है-‘Health is wealth.’; अर्थात् स्वास्थ्य ही धन है। प्राचीन काल से ही स्वास्थ्य की महत्ता पर बल दिया जाता रहा है। शारीरिक स्वास्थ्य के लिए पौष्टिक भोजन, चिन्तामुक्त जीवन, उचित विश्राम और पर्याप्त व्यायाम की आवश्यकता होती है। उत्तम स्वास्थ्य के लिए व्यायाम सर्वोत्तम साधन है। व्यायाम का अर्थ मन को प्रफुल्लित रखने एवं तन को सशक्त एवं स्फूर्तिमय बनाने के लिए हम कुछ नियमों के अनुसार जो शारीरिक गति करते हैं, उसे ही व्यायाम कहते हैं। केवल दण्ड-बैठक, कुश्ती, आसन आदि ही व्यायाम नहीं हैं, वरन् शरीर के अंग-प्रत्यंग का संचालन भी, जिससे स्वास्थ्य की वृद्धि होती है, व्यायाम कहा जाता है। व्यायाम के रूप-मन की शक्ति के विकास के लिए चिन्तन-मनन करना आदि मानसिक व्यायाम कहे जाते हैं। शारीरिक बल व स्फूर्ति बढ़ाने को शारीरिक व्यायाम कहा जाता है। प्रधान रूप से व्यायाम शरीर को पुष्ट करने के लिए किया जाता है। खेल-कूद में रस्साकशी, कूदना, दौड़ना, कबड्डी, तैरना आदि व्यायाम आते हैं। इनके करने से रक्त का तेजी से संचार होता है और प्राण-वायु की वृद्धि होती है। आधुनिक खेलों में हॉकी, फुटबाल, वॉलीबाल, क्रिकेट आदि खेल व्यायाम के रूप हैं। खेल-कूद सभी स्थानों पर सभी लोग सुविधापूर्वक नहीं कर पाते, इसलिए वे शरीर को पुष्ट रखने के लिए कुश्ती, मुग्दर घुमाना, योगासन आदि अन्य नियमित व्यायाम करते हैं। व्यायाम केवल पुरुषों के लिए ही आवश्यक नहीं है, अपितु स्त्रियों को भी व्यायाम करना चाहिए। रस्सी कूदना, नृत्य करना आदि स्त्रियों के लिए परम उपयोगी व्यायाम हैं। व्यायाम की मात्रा–व्यायाम कितना किया जाये, यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है। बालक, युवा, स्त्री, वृद्ध आदि के लिए व्यायाम की अलग-अलग मात्रा है। कुछ के लिए हल्के व्यायाम, कुछ के लिए प्रातः भ्रमण तथा कुछ के लिए अन्य प्रकार के खेल व्यायाम का कार्य करते हैं। आयु, शक्ति, लिंग एवं स्थान के भेद से व्यायाम की मात्रा में अन्तर हो जाता है। व्यायाम के लिए आवश्यक बातें–व्यायाम का उचित समय प्रात:काल है। प्रातः शौच आदि से निवृत्त होकर बिना कुछ खाये, शरीर पर तेल लगाकरे व्यायाम करना चाहिए। व्यायाम शुद्ध वायु में लाभकारी होता है। व्यायाम प्रत्येक अंग का होना चाहिए। व्यायाम का अभ्यास धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए। व्यायाम के विभिन्न रूप प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रत्येक अवस्था में लाभदायक नहीं हो सकते; अतः उपयुक्त समय में उचित मात्रा में अपने लिए उपयुक्त व्यायाम का चुनाव करना चाहिए। व्यायाम करते समय नाक से साँस लेना चाहिए और व्यायाम के बाद कुछ देर रुककर स्नान करना चाहिए। व्यायाम करने के बाद दूध आदि पौष्टिक पदार्थों का सेवन आवश्यकता व सामर्थ्य के अनुसार अवश्य करना चाहिए। व्यायाम से लाभ-व्यायाम से शरीर पुष्ट होता है, बुद्धि और तेज बढ़ता है, अंग-प्रत्यंग में उष्ण रक्त प्रवाहित होने से स्फूर्ति आती है, मांसपेशियाँ सुदृढ़ होती हैं, पाचन-शक्ति ठीक रहती है तथा शरीर स्वस्थ और हल्का प्रतीत होता है। व्यायाम के साथ मनोरंजन का समावेश होने से लाभ द्विगुणित होता है। इससे मन प्रफुल्लित रहता है और व्यायाम की थकावट भी अनुभव नहीं होती। शरीर स्वस्थ होने से सभी , इन्द्रियाँ सुचारु रूप से काम करती हैं। व्यायाम से शरीर नीरोग, मन प्रसन्न और जीवन सरस हो जाता है। शरीर और मन के स्वस्थ रहने से बुद्धि भी ठीक कार्य करती है। अंग्रेजी में कहावत है—’Sound mind exists in a sound body’; अर्थात् स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है। मन प्रसन्न और बुद्धि सक्रिय रहने से मनुष्य की कार्यक्षमता बढ़ जाती है। वह परिश्रमी और स्वावलम्बी हो जाता है। व्यायाम करने से अनेक लाभ होते हैं, परन्तु इसमें असावधानी करने के कारण हानियाँ भी हो सकती हैं। व्यायाम का चुनाव करते समय, आयु एवं शारीरिक शक्ति का ध्यान अवश्य रखना चाहिए। उचित समय पर, उचित मात्रा में और उपयुक्त व्यायाम न करने से लाभ के बजाय हानि होती है। व्यायाम करने वालों के लिए ब्रह्मचर्य का पालन करना अधिक लाभकारी होता है। उपसंहार-आज के इस मशीनी युग में व्यायाम की उपयोगिता अत्यधिक बढ़ गयी है; क्योंकि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मशीनों का आधिपत्य हो गया है। दिन-भर कार्यालय में कुर्सी पर बैठकर कलम घिसना अब गौरव की बात समझी जाती है तथा शारीरिक श्रम को तिरस्कार और उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है। जर्जर कर दिया है। अत: आज देश के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह सुन्दर शरीर, निर्मल मन तथा विवेकपूर्ण बुद्धि के लिए उपयुक्त व्यायाम नियमित रूप से प्रतिदिन करता रहे। |
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`sqrt(5 p^(2)+q^(2)+r^(2))` के बराबर है।A. 8B. 2qC. 5pD. 4r |
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Answer» Correct Answer - C `{:(P,:,q,:,r),(1,:,2,:,4),(x,:,2x,:,4x):}` `:. sqrt(5p^(2)+q^(2)+r^(2))` `=sqrt(5x^(2)+4x^(2)+16x^(2))` `=sqrt(25x^(2))=5x` `=5p` |
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विलोम शब्द लिखिए :1. प्यार 2. पराया3. ज्यादा 4. थोडा स्वर्ग 5. सुखी 6. सुखद 7. प्रकाश 8. बुझना 9. दिवस 10. रोना11. अपना12. चढ़ना 13. बढ़ना 14. लघु 15. गौरव 16. जीवन 17. दु:ख 18. सत्य 19. धर्म20. स्वदेश 21. समर्थ22. सबल 23. ज्ञान 24. सुगंध25. दूर 26. अंत 27. धीरे28. मुरझाना 29. गिरना 30. सुबह |
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Answer» 1. प्यार × द्वेष 2. पराया × अपना 3. ज्यादा × कम, 4. थोडा स्वर्ग ×नरक 5. सुखी × दुःखी 6. सुखद × दु:खद 7. प्रकाश × अंधेरा 8. बुझना × जलना 9. दिवस × रात 10. रोना × हँसना 11. अपना × पराया 12. चढ़ना × उतरना 13. बढ़ना × घटना 14. लघु × भारी 15. गौरव × अगौरव 16. जीवन × मरण 17. दु:ख × सुख 18. सत्य × असत्य 19. धर्म × अधर्म 20. स्वदेश × विदेश 21. समर्थ × असमर्थ 22. सबल × निर्बल 23. ज्ञान × अज्ञान 24. सुगंध × दुर्गंध 25. दूर × पास 26. अंत × आदि 27. धीरे × जल्दी 28. मुरझाना × विकसित 29. गिरना × उठना 30. सुबह × शाम |
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एक रेल का पहली श्रेणी व श्रेणी के किराया का अनुपात `4:1` है। और यात्रियों का अनुपात `1:40` है। यदि एक दिन में कुल किराया रू 1100 प्राप्त हुआ तो प्रथम श्रेणी से प्राप्त किराया ज्ञात करे।A. रू 315B. रू 275C. रू 137.50D. रू 100 |
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Answer» Correct Answer - D `{:("Ist",,:,"IInd"),("Fare","4x",:,"x"),("Passengers",1,:,40):}` Total fare `4x : 40x =44x` `44x =(1100)/(44) = 25` `:.` Fare = Ist class amount received per day (प्रथम श्रेणी से प्रतिदिन प्राप्त राशि) . |
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निबन्ध:चलचित्र : लाभ और हानियाँ |
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Answer» प्रस्तावना मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, जो समाज में रह कर ही अपने मनोरंजन के माध्यम हूँढ़ने का यत्न करता है। समय और परिस्थिति के अनुसार उसके मनोरंजन के साधन बदलते रहते हैं। जब तक विज्ञान का पूर्ण विकास नहीं हुआ था, तब तक वह मेले-तमाशे आदि के माध्यम से अपना मनोरंजन करता था, परन्तु वैज्ञानिक विकास के साथ उसने अपनी सुख-सुविधाओं के नवीन साधनों का भी आविष्कार किया है। उसने दृश्य और श्रव्य की सहायता से अनेक आविष्कार किये हैं और इन्हीं के संयोग से चलचित्र का निर्माण किया है। सन् 1929 तक बने चलचित्रों में फोटोग्राफी तो सचल थी पर उनमें ध्वनि की कमी थी। सवाक् चलचित्रों का निर्माण सन् 1930 से आरम्भ हो गया था। पिछले वर्षों में इसने जो भी उन्नति की है, उसी के कारण मानव-मनोरंजन के क्षेत्र में इनको प्रमुख स्थान हो गया है। चलचित्रों की व्यापकता–चलचित्रों ने समाज को अत्यधिक प्रभावित किया है। प्रारम्भ में जनता ने कौतूहल के साथ इस मनोरंजन का आस्वादन किया। धीरे-धीरे उसको इसमें कथा, नाटक, प्रहसन आदि का आनन्द भी मिलने लगा। इससे सिनेमा के दर्शकों की संख्या में वृद्धि होने लगी। जनता के प्रत्येक वर्ग में इसके प्रति मोह बढ़ने लगा। आज भारत में अमेरिका के बाद दूसरे नम्बर पर चलचित्रों का निर्माण होता है। प्रतिवर्ष भारत में बनने वाले चलचित्रों की संख्या लगभग एक हजार है। इनके निर्माण पर अरबों रुपये खर्च होते हैं। यह एक सफल व्यवसाय बन चुका है, जिसमें न जाने कितने लागों को रोजगार के अवसर प्राप्त होते हैं। मनोरंजन का साधन–सिनेमा आज मनोरंजन का प्रमुख, सर्वसुलभ एवं सस्ता माध्यम माना जाता है। दिन भर विभिन्न कार्यों में लगे रहने के कारण लोगों का मन श्रान्त-क्लान्त रहता है। अपनी शारीरिक एवं मानसिक थकान को दूर करने के लिए वे थोड़ी-सी राशि व्यय करके सिनेमा देखते हैं तथा इसे देखते हुए आनन्द की धारा में बहकर अपनी समस्त पीड़ाओं को भूल जाते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें जो मानसिक सन्तुष्टि प्राप्त होती है, उससे वे अपने अगले दिन के कार्यों के लिए उत्साह प्राप्त करते हैं। सिनेमा शिक्षा के प्रचार का साधन भी स्वीकार किया जाता है। इसके द्वारा हमें अनेक प्रकार की शिक्षाएँ प्राप्त होती हैं। जिनके आधार पर दर्शक अपनी बुद्धि का प्रयोग करते हुए अपने जीवन से विभिन्न बुराइयों को दूर कर अपना जीवन ‘आदर्श जीवन’ बना सकते हैं। अनेक समस्याओं के सहज, स्वाभाविक समाधान भी चलचित्रों के माध्यम से सुझाये जा सकते हैं, जो समाज में नवचेतना उत्पन्न कर सकते हैं। वीरों एवं देशभक्तों के चरित्रों पर बनी फिल्में राष्ट्रीय भावना को जाग्रत करती हैं। समाज पर कुप्रभाव-सिनेमा ने आधुनिक समाज को जहाँ अत्यधिक प्रभावित करते हुए उसमें नव-चेतना जाग्रत की है, वहीं उसे पर्याप्त हानि भी पहुँचाई है। धन के लोभी फिल्म-निर्देशकों ने भद्दी-अश्लील और फूहड़ फिल्में बनानी आरम्भ कर दी हैं। इस प्रकार के चलचित्रों से दर्शकों के आचरण पर बुरा प्रभाव पड़ता है। श्रृंगार एवं फैशन के प्रति आकर्षण भी चलचित्रों के प्रभाव से बढ़ रहा है। जिन लोगों को इसका व्यसन लग जाता है, वे अपनी आर्थिक स्थिति की चिन्ता किये बिना अपना सर्वस्व इसी में स्वाहा कर देते हैं। फिल्मों से मानवीय मूल्य नष्ट हो रहे हैं। लोगों को दृष्टिकोण हीन और कामुक होने लगा है तथा जीवन की वास्तविकता के प्रति उनकी आस्था समाप्त होने लगी है। कम आयु के बालक जब चलचित्र में अश्लील, अमानवीय और अतिमानवीय व्यवहार देखते हैं तो वे भविष्य में वैसा ही करने की प्रेरणा लेकर घर आते हैं। आज स्थिति ऐसी हो गयी है कि सिनेमाघर बच्चों के बिगड़ने के अड्डे बन गये हैं। बच्चों के आयु से पहले परिपक्व हो जाने के पीछे भी सिनेमा का प्रमुख हाथ है। फिल्मों ने भारतीय समाज को ‘प्रेम-संस्कृति प्रदान की है जिसमें ‘गर्ल फ्रेण्ड’ और ‘ब्वॉय फ्रेण्ड’ का प्रचलन बढ़ा है, पति-पत्नी में मानसिक प्रतिरोध बढ़ा है तथा सामाजिक और पारिवारिक सम्बन्धों में विकार उत्पन्न हुए हैं। उपसंहार–सिनेमा सैद्धान्तिक रूप से ज्ञानवर्द्धक है। इसका व्यावसायिक रूप अत्यन्त हानिकारक है। आज हमें इस प्रकार के चलचित्रों की आवश्यकता है जो सामाजिक, राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक चेतना जगाने वाली हों। फिल्म निर्माण में संलग्न निर्माता, निर्देशकों, अभिनेताओं आदि को भी अपना उत्तरदायित्व समझते हुए समाज-सुधार एवं राष्ट्र-निर्माण में योगदान देना चाहिए। दर्शकों को सिनेमा मनोरंजन के लिए देखना चाहिए, व्यसन के रूप में नहीं तभी सिनेमा की सार्थकता सिद्ध होगी। |
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जनसंख्या की समस्या पर निबन्ध अँग्रेजी में लिखें। |
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Answer» Population Problem Summary in English: Introduction to the matter: Population Problems is the problem of the world. There will be a birth of two babies for every second in this world. But in India, this problem has become the most burning issue. So for as area is concerned India stands in the 7th place. Amongst all the countries on this globe. But in Population, it stands in the second place. It is just one place below China, that stands first in Population. At present India has 100 crores of Population. Reasons for population growth : 1. On account of science and medical progress has been much developed, the death rate of just born babies is decreasing average life span of Indians has grown-up. So totally the death-rate has become less. 2. Indians believe that children are gift of god. So they are not ready to follow the rules of family planning strictly. 3. Most of the poor Indians believe that if there are more children in the house they may be used to earn money in one way or the other. 4. Most of the people have no idea about the advantages of small size family. 5. Most of the Indians are not interested in government activities to control population 6. Population Explosion has very effect on the development of the nation. So most of our five year plans have become waste to control the population. If the population is not under control our national plans will be waste. The Population Problem leads to the unemployment problem. The growth of employment is very so if we compare with growth of Population. The youth of the country are engaged in destructive work. It leads to political indiscipline in the country. The growth of the population may lead to many types of crimes. These crimes spoil the environment and the spoiled environment generates diseases. It results in an unhealthy society. Nowadays, both central and state governments are planning a number of welfare plans for women’s and even in schools, ladies are taking education free of cost. So women must understand their responsibility and help the nation in controlling the Population. Everyone must understand that our family should have only two children so that our family will be happy. |
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