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धनराम भी उन अनेक छात्रों में से एक था जिसने त्रिलोक सिंह मास्टर के आदेश पर अपने हमजोली मोहन के हाथों कई बार बेंत खाए थे या कान खिंचवाए थे। मोहन के प्रति थोड़ी बहुत ईर्ष्या रहने पर भी धनराम प्रारंभ से ही उसके प्रति स्नेह और आदर का भाव रखता था । इसका एक कारण शायद यह था कि बचपन से ही मन में बैठा दी गई जातिगत हीनता के कारण धनराम ने कभी मोहन को अपना प्रतिद्वंदी नहीं समझा बल्कि वह इसे मोहन का अधिकार ही समझता रहा था । बीच-बीच में त्रिलोक सिंह मास्टर का यह कहना कि मोहन एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनकर स्कूल का और उनका नाम ऊँचा करेगा, धनराम के लिए किसी और तरह से सोचने की गुंजाइश ही नहीं रखता था।धनराम ने किसके हाथों अपने कान खिंचवाए थे ?धनराम मोहन को अपना प्रतिद्वंदी क्यों नहीं मानता था ?त्रिलोक सिंह मास्टर मोहन के बारे में क्या कहते थे ?

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  1. धनराम ने त्रिलोक सिंह मास्टर के आदेश पर अपने हमजोली मोहन के हाथों कई बार बेंत खाए थे तथा कान भी खिंचवाए थे।
  2. धनराम मोहन को अपना प्रतिद्वंद्वी नहीं मानता था, क्योंकि उसके मन में बचपन से ही जातिगत हीनता के बीज बोये गये थे । इसीलिए वह मोहन की मार को अपना अधिकार समझता था।
  3. त्रिलोक सिंह मास्टर मोहन के बारे में कहते थे कि मोहन एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनकर स्कूल का और उनका नाम ऊँचा करेगा।


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